सोमवार, 12 मार्च 2018

सुभाष राय की कविताएँ

( सुशील कुमार वरिष्ठ कवि और आलोचक हैं . झारखंड के शिक्षा विभाग में  वे एक ज़िम्मेदार पद पर काम करते हैं . समय की नब्ज़ पर उनकी उँगलियाँ रहतीं हैं . अभिनव क़दम और युगतेवर में प्रकाशित मेरी कविताओं को पढ़कर उन्होंने एक टिप्पणी लिखी, जो यहाँ प्रस्तुत है )


                                         सुशील कुमार 

साहित्य में सुभाष राय एक सुपरिचित 
नाम हैं। लखनऊ में रहते हैं । 'जनसंदेश टाइम्स' को देखते हैं। कवि-पत्रकार-संपादक हैं। लेकिन उनकी कविता की तासीर को कम ही लोग जान पाए हैं। पत्रिका 'अभिनव कदम' के हालिया अंक इनकी सात कविताएँ पढ़ने को मिली। पढ़कर मुझे लगा कि इनकी काव्यसंवेदना जितनी तरल है, शीतल है, उतनी ही प्रभाव उत्पन्न करने में भेदस और तीक्ष्ण भी। इनकी एक छोटी कविता 'जीवन' देखिए -

"जैसे पेड़ मर-मर कर जीवित हो उठता है
जमीन पर गिरे हुए अपने बीजों में
उसी तरह मैं भी बार-बार मरना चाहता हूं
नये सिरे से नयी जमीन में उगने के लिए
मैं बार-बार मृत्यु से टकराता रहता हूं
मैं जानता हूं कि मृत्यु का सामना करके ही
मैं जीवित रह सकता हूं हमेशा"
जिजीविषा की आदिम इच्छा से भरी हुई इन जैसी जीवनधर्मी कविताओं में जीवन के प्रति जो अगाध विश्वास है, उसका इस बुरे-कोफ्त समय में बहुत जरूरत है। उससे भी आगे की तो बात यह है कि इन कविताओं का 'कंटेंट' प्रगतिशील होते हुए भी कहीं से बौद्धिक नहीं हुआ हैं, न कला के हद से आगे जाने की कोशिश करता है, बल्कि बड़े काव्यानुशासन से रायशुमारी करता है-
‌'जो बीत गया
वह मुझमें ही है
जो बीत रहा है
वह भी मुझमें ही है
और जो बीतने को तैयार है
वह भी मुझमें ही है
बंद कोंपल की तरह खुलने को आतुर'/ 
अंश-कविता 'मैं मुझमें' 

- इस कविता को जिस दार्शनिक पृष्ठभूमि में रचा गया है, उसमें जितनी काव्यात्मकता है उतनी ही गीता-संदेश का भास्वर भी । गोकि, कवि जब किसी विचारबोध को कविता में प्रक्षेपित करता है तो कवि को उसकी सम्वेदना के प्रति बहुत सचेत रहना पड़ता है। असावधान कवि बौद्धिकता की प्रवाह में बह जाता है, फलतः उनकी कविता बोझिल गद्य बनकर रह जाती है। पर सुभाष राय का कवि कविता के अंत तक नेपथ्य में ही विचारतत्व को रखता है। यही उनका काव्य सौष्ठव है और कवि की सफलता का रहस्य भी, इस कारण कविता आकार में लम्बी होने के बावजूद पाठक को अंत तक जोड़े रखती है -

"यह जो पर्वत है
उत्तुंग, अनावृत, अछोर
असंख्य उपत्यकाओं पर खड़ा
पिघल कर झरनों में गिरता हुआ
झीलों को अपनी मजबूत
अंजुरी में थामे
बादलों से खेलता हुआ
बर्फ से लदा
सदियां समेटे हुए अपने भीतर
मैं ही खड़ा हूं इसमें, इसके हर रूप में
यह जो नदियां हैं
पृथ्वी की धमनियों की तरह
जीवन को जल से सींचती हुईं
यह जो झीलें हैं
असंख्य जीवन को
अपनी अंकवार में समेटे हुए
यह जो झरने हैं
जीवन का संगीत रचते हुए
यह सब मैं ही हूं
"/ 

वही कविता 'मैं मुझमें'

यह अकेली कविता ही कवि के काव्यगुण के समझने के लिए यथेष्ठ है।
'अभिनव कदम' के ताजा अंक में छपी इनकी कविताओं में पहली कविता का नाम है - 'बच्चे आएंगे '। छोटी पहल की इस कविता में इतिहासबोध से उसके भविष्णु समय की चेतावनी को कितनी संश्लिष्टता, गहनता और कलात्मकता से रखा गया है, यह देखने के लायक है- 

'बच्चों को पढ़ने दो
मत मारो
मार नहीं पाओगे सारे बच्चों को
क्या करोगे जब
तुम्हारी गोलियां
कम पड़ जाएंगी
तुम्हारी बंदूकें जवाब
देने लगेंगी
बच्चे आ रहे होंगे
और तुम्हारे पास
गोलियां नहीं होंगी
बारूद नहीं होगी
फिर बच्चे तय करेंगे
तुम्हारा भविष्य
वे तय करेंगे कि
इस दुनिया में
तुम्हें होना चाहिए या नहीं
बच्चे फिर भी
तुम्हें मारेंगे नहीं
तुम्हें मरने देंगे
खुद-ब-खुद
तुम मिट जाओगे
क्योंकि बच्चे तुम्हारी तरह
बंदूकें नहीं उठायेगे
गोलियां नहीं चलाएंगे' - 

भाषा जितनी सुबोध है, उसकी कला उतनी ही स्वीकृत और समझ के दायरे में। यह कलाहीन कला (आर्टलेस आर्ट ) की बानगी है जैसे कि राजेश जोशी अपनी एक कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' में आप देखते हैं।
उसी तरह तीसरी कविता 'स्पर्श' की कुछ पंक्तियां देखिए -

स्त्री ही हो जाता हूं
तुम्हारे पास होकर मैं
बहने लगती हो मेरे भीतर
पिघलने लगता हूं मैं
पुरुष की अपेक्षा से परे
समूचे जगत को रचती हुई
अगर योनि हो तो मां हो
योनि हो तो सर्जना हो
योनि हो तो वात्सल्य हो
ब्रह्मांड में बिखरे समस्त
बीजों की धारयित्री हो
मैं पाना चाहता हूं तुम्हें
तुम्हारी अनाहत ऊष्मा में डूबकर
होना चाहता हूं
तुम्हारी हंसी में,
तुम्हारे स्पर्श में
तुममें, हां तुममें (कविता 'स्पर्श'से)

यह प्रेम को 'ब्रह्मांड में बिखरे समस्त बीजों की धारयित्री' के रूप में प्रकट कर उसे अधिक व्यापक और नया अर्थ देता है जो स्त्री-मुक्ति की देहवाद की जाती हुई प्रवृत्ति को मोड़कर उसे मनुष्योन्मुख बनाती दिखती है। यह कहना आसान नहीं कि - 'अगर योनि हो तो मां हो /योनि हो तो सर्जना हो /योनि हो तो वात्सल्य हो' , यह एक कलमकार के प्रेम में केवल आस्था का सवाल नहीं है। प्रेम में सृजन, वात्सल्य और ममता को परखना उसकी व्यापकता के क्षेत्रफल की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार कविता 'देवदूत' समकालीन सत्ता-शासन तंत्र के सच को बड़े नाटकीय संवेग (dramatic momentum) के साथ प्रस्तुत करता है , जनता के स्वप्न-भंग को पूरी जीवंतता से पाठकों के समक्ष रखता है, कविता 'देवदूत' की कुछ पंक्तियां देखिए - 

'ऑंखें बंद करते ही
दिखने लगता है वह
वादों को पूरा करने का
वादा करते हुए
सपनों को हकीकत में बदलने के
सपने दिखाता हुआ
आसमान में उंगली से छेद करने के
मंसूबे से हाथ लहराता हुआ
बदलाव के लिए बार-बार बदलाव
की पुकार लगाता हुआ
आँख खुलते ही बिखर जाती है
उसकी आवाज, उसका साज
एक स्वप्न-नाट्य की तरह'
। 

- यह अंक की बेहतरीन कविताओं में से एक है जो एक नींद, सपना या भ्रम की मानिंद लोकतंत्र के मुखौटे ओढ़े देवदूत के आलोकपूंज की रश्मियों में जल रही जनाकांक्षाओं के सत्य का उजागर करता है।
यह भी सुभाष राय की कविताओं में दीगर है कि वे कविता में ध्वन्यात्मकता और प्रगीतात्मक लय बनाए रखते हैं। उनकी भाषा और उनके मुहावरे बोलचाल की भाषा के बहुत करीब है। यह वाचाल, लच्छेदार शब्दों और बिम्बों से कविता नहीं बनाते। जीवन की अतिसाधारण घटनाक्रमों का शब्दविन्यास बुनते हुए उससे जीवन के उत्कृष्ट अनुभावों को लेते हुए उसी को साधारणीकृत (डायल्यूट)कर कविता के अक्स को पठनीय और सर्वग्राही बनाते हैं। 

इनकी कुछ कविताएँ सुधी पाठकों के लिए मैं अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ जिसका लिंक नीचे है -
http://www.sushilkumar.net/2018/01/blog-post_97.html?m=1

आप स्वयं इस सहज कवि की संश्लिष्ट कविताएं पढ़कर अनुमान लगा सकते हैं कि इनमें जन के द्वंद्व और संघर्ष से लेकर मानवीयता और प्रेम की अभिव्यक्ति जिस अंदाज में हुई है , वह कितनी लोकचेतना और जीवनराग से जुड़ी हुई हैं और पाठक के अंतर्मन को आलोड़ती हैं। ●
सुशील कुमार/मो. 7004353450

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