शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

बाबागीरी में गलत क्या है

   अगर आप को एक राष्ट्र के नाते भारत को परिभाषित करना हो तो क्या कहेंगे? यह कि भारत दुनिया के नक्शे पर एक भौगोलिक टुकड़ा है, या यह कि एक निश्चित सीमाओं में बंधा हुआ ऐसा भूभाग, जिस पर भारत सरकार की प्रभुसत्ता स्थापित है, जिस पर भारत का संविधान और कानून लागू होता है? नहीं, इन परिभाषाओं में हर नागरिक को भावनात्मक रूप से इस ईकाई के साथ जोड़ने की जीवंत शक्ति नहीं झलकती, इनमें वह प्राणतत्व नहीं दिखता, जो किसी को भी अपने देश से प्यार करना सिखाता है, जो हृदय में देशभक्ति के बीज बोता है, जो किसी भी नागरिक के मन में देश के लिए प्राण न्योछावर कर देने का जज्बा भर देता है। राष्ट्र एक जीवंत ईकाई है, वह हमारी जुबान से बोलता है, वह हमारे रहन-सहन, खान-पान, पहनावे, हमारी भाषा, हमारी संस्कृति के रूप में अभिव्यक्त होता है, तमाम अलग-अलग संस्कारों, जीवन पद्धतियों, धर्मों के बावजूद एक अरब से ज्यादा लोगों को एक सूत्र में बांधे रखने में सफल भूमिका का निर्वाह करता है। इन अर्थों में राष्ट्र यहां के समस्त नागरिकों का एक अखंड सांस्कृतिक समवेत है, एक वृहत्तर सांस्कृतिक ईकाई है, जो हम सबके दिलों में धड़कती रहती है।

इसीलिए हर नागरिक को देश के बारे में सोचने का हक है। उसकी बेहतरी के बारे में, इस रास्ते में आने वाले अवरोधों के बारे में और उन्हें हटाने के तौर-तरीकों के बारे में। बाबा रामदेव को अगर देश की चिंता है और उनके पास देश की बेहतरी के लिए कुछ सुझाव हैं, तो यह कहकर उनका उपहास नहीं किया जाना चाहिए कि वे योग कराते हैं, तो योग ही करायें, उन्हें राजनीति के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। इस तरह तो हर पेशे के लोगों से कहा जा सकता है। चिकित्सक लोगों का इलाज करें, उन्हें देश के बारे में सोचने की जरूरत नहीं है, अधिवक्ता मुकदमे लड़ें, उन्हें देश के लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं है, शिक्षक बच्चों को पढ़ायें, उन्हें देश की दुर्दशा से क्या मतलब? ये तर्क अनर्गल और अतार्किक हैं। बाबा ने योग के महत्व और  जरूरत को पुनर्स्थापित किया है, बहुत से लोग उनके तरीके से अनेक बीमारियों से ठीक हुए हैं। योगासनों और प्राणायामों का वैज्ञानिक प्रभाव भी परीक्षित है। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी है, उनके प्रति लोगों का आदर बढ़ा है। वे भी इस देश से उतना ही प्यार करते हैं, जितना कोई  और कर सकता है। फिर उन्हें देश की बदहाल स्थिति के बारे में चिंता करने का उतना ही अधिकार है, जितना किसी राजनेता को। बाबा जानते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्यों करना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात की, उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया, इसमें क्या गलत है। अगर वे समझते हैं कि उन्हें चुनाव में अपने लोगों को सक्रिय करना चाहिए तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए। इससे उनके विचार लोगों तक पहुंचेंगे, हो सकता है, उनसे लोगों को कोई दिशा मिले। भविष्य जो भी हो पर बाबागीरी चलती रहनी चाहिए। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. Dr. Rai Sahab, Mai ap ki baaton se ittafaq rakhata hun. Is desh me aj sab taraf anachar macha hua hai. Har ek pareshan hai par kisi sarthak prayas hetu kahata hai ki akele mujhse kya hone wala hai. Ab jab koi majboot kadam barhane ki baat kar raha hai to us ka bhi virodh shuru ho gaya hai. Achhai kahin se bhi shuru ho to kya bura hai? Hamen aadat par gai hai sab chup chap sahane ki aur bhrasth neta aur babuon ki chaplusi karane ki!

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  2. पहले के बाबा लोग ( संत ) ही राजाओं को महत्वपूर्ण सलाह देते
    थे । इस तरह राजाओं के गुरु और सन्तों की ही शासन संचालन में
    अप्रत्यक्ष मगर महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी । एक इंसान की उसके
    दिमागी क्षमतानुसार अलग अलग स्तर पर कई भूमिकायें हो सकती हैं ।
    कोई भी बाबा सिर्फ़ पूजा पाठ या योग से ही मतलब रखें । ऐसा
    सोचने वाले मानसिक रूप से दिवालिया हैं ।

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  3. Param adarniya Dr. Rai ji, Kuch mahino pahale tak ap ke sakriya lekhan ke chalate kuch achha parahne ko mil jata tha par ab ap yahan bilkul hi nishkriya ho gaye hai. Kya koi vishesh vyastata hai?

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