सोमवार, 18 अप्रैल 2011

शब्दों के आगे


 मित्रों ८ अक्टूबर २०१० के बाद अपने ब्लाग पर यह मेरी पहली उपस्थिति है. हिन्दी दैनिक जन सन्देश टाइम्स के संपादक के रूप में लखनऊ आ जाने के बाद व्यस्तता काफी बढ़ जाने से ब्लॉग पर नहीं आ सका. यह पिछले रविवार के साहित्य परिशिष्ट के लिए लिखा गया सम्पादकीय है, जो यथावत आप के सामने प्रस्तुत है. आशा है आप इस विचार प्रवाह को आगे बढ़ाएंगे. 
 
नहीं लगता कि कलाकारों और रचनाकारों में अब इस बात पर कोई विवाद है कि कला जीवन के लिए होनी चाहिए. आनंद उसका एक मूल्य हो सकता है पर केवल आनंद ही उसका अंतिम मूल्य है, यह स्वीकार करने योग्य बात नहीं है. कोई भी रचना मनुष्य का, उसके जीवन क़ा, उससे रू-ब-रू परिस्थितियों क़ा विश्लेषण करती है और यथार्थ के साथ रचनाकार के आदर्श और उसकी कल्पना क़ा एक संसार रचती है. समाज और जीवन में ऐसा बहुत कुछ होता है, जो अन्यायपूर्ण, अमानवीय और अवांछित होता है. एक सच्चा रचनाकार इसे स्वीकार नहीं कर पाता, वह उस ढांचे को तोड़ना चाहता है, जिसके कारण इस तरह की सामाजिक विसंगतियां पैदा होती हैं. इसी प्रक्रिया में वह अपनी कल्पना के एक ऐसे समाज क़ा, एक ऐसे ढांचे क़ा निर्माण भी करता है, जो इन असंगत और मनुष्यविरोधी परिस्थितियों से मुक्त हो. वह आदमी की पीड़ा से उसे मुक्त करना चाहता है. ऐसे में निरंतर वह ऐसी संभाव्य परिस्थितियों और मूल्यों की तलाश करता रहता है, जो ज्यादा से ज्यादा मानवीय संसार की रचना कर सकें. इस खोज में वह खुद से लड़ता है, बाहर की दुनिया से भी लड़ता है. हर घटना क़ा, हर बदलाव क़ा गहराई से निरीक्षण करता है. 

 वह नहीं जनता कि  उसकी रचना क़ा समाज कभी सच होगा या नहीं, पर यह संभाव्य असम्भाव्यता उसे अपना काम करने से रोक नहीं पाती. मतलब यह नहीं कि वह किसी आदर्श में या निरी कल्पना में जीता है. वह जानता है कि जो अवांछित है, उसका टूटना जरूरी है. इसलिए कोई  भी बेहतर रचना समाज के संक्रमित, विगलित और सड़े-गले हिस्से पर सांघातिक प्रहार करती है. एक रचना इस काम में जितनी सफल हो पाती है, वही उसकी शक्ति है, उसकी श्रेष्ठता भी. बेशक वह इसके आगे भी जाती है, नवनिर्माण क़ा संकेत भी करती है, पर इस प्रक्रिया में सीधे कोई दखल देने की जगह सामाजिक ताकतों को अपना कम करने देती है.

 कला या रचना केवल विचार नहीं है, नारा या भाषण भी नहीं. अपनी प्रभविष्णुता को बढ़ाने के लिए रचनाकार कला और शिल्प के उपकरणों क़ा इस्तेमाल करता है, कइÊ बार पुराने औजारों की जड़ता या प्रभावहीनता उसे नए शिल्प गढ़ने को भी मजबूर करती है. यह कलात्मकता ही उसे दर्शकों, पाठकों या श्रोताओं के बीच ले जाती है. यह सब कला के सिद्धांत और दर्शन की बातें हैं, अगर आप इन पर बहस कर सकते हैं तो केवल पेट और तिजोरी के खेल में प्राणपण से जुटे लोगों की भीड़ से अलग नजर आ सकते हैं पर क्या आप इस मान-प्रतिष्ठा से संतुष्ट होकर उपदेशक की भूमिका अख्तियार करना चाहेंगे या एक जरूरी सवाल से जूझने क़ा साहस करेंगे. क्या सचमुच आज के समाज में रचना या कला अपनी कोई भूमिका निभा पा रही है, क्या उसका कोई सार्थक हस्तक्षेप कहीं दिखाई पड़ता है?

स्वयं रचनाकारों और आलोचकों में अक्सर इस बात पर मतभेद दिखाई पड़ता रहता है कि कोई कहानी, कोई कविता या कोई रचना श्रेष्ठ है या नहीं. सबके अपने-अपने मानक हैं, अपनी-अपनी चौहद्दियां.जो रचना एक महंत आलोचक की नजर में सर्वश्रेष्ठ हो सकती है, उसे हो सकता है, दूसरा साहित्य पीठाधीश्वर सिरे से खारिज कर दे. रचना अपनी ताकत से लोगों तक पहुंचे, इसका कोई माध्यम नहीं है. जो गिने-चुने श्रेष्ठ परीक्षक समझे जाते हैं, उनकी बातें भी कितनी दूर तक जाती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. जो  लिखते हैं या  रचते हैं और जो उसका मूल्यांकन करते हैं, सारी बातें उ³हीं के बीच रह जाती हैं. जिसे लोक कहा जाता है, वहां तक इनकी पहुँच नहीं के बराबर है। फिर किसी बदलाव में इनकी भूमिका आखिर क्या हो सकती है? यह भी एक  महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या रचनाकार की जिम्मेदारी रचना के पूर्ण होते ही खत्म हो जाती है  या उसे शब्द से आगे जाकर भौतिक स्तर पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जरूरत है? कलाकार और रचनाकार इस सवाल क़ा उत्तर अक्सर नकार में देते हैं और यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह  काम तो सामाजिक और राजनीतिक एक्टिविस्ट का है, उनका नहीं. कोई भी रचनाकार हमेशा अपने रचनाकार व्यक्तित्व के साथ जीता रहेगा, ऐसा सोचना गलत होगा. वह औरो की ही तरह समाज की एक इकाई है और अगर वह असामाजिक नहीं है तो उसे अपने सामाजिक दायित्व के प्रति भी सजग रहना होगा. अपनी रचना के संसार की स्थापना के लिए जूझने क़ा साहस अगर उसमें नहीं है तो यह माना जाना चाहिए कि वह कला और रचना के नाम पर केवल आत्मप्रतिष्ठा के रास्ते पर अग्रसर है। हर सूरत में उसे शब्दों के बाहर की दुनिया में सक्रिय रहना होगा, शब्दों का नेतृत्व करना होगा, उनसे आगे जाना होगा. 

             

17 टिप्‍पणियां:

  1. कला या रचना केवल विचार नहीं है, नारा या भाषण भी नहीं. अपनी प्रभविष्णुता को बढ़ाने के लिए रचनाकार कला और शिल्प के उपकरणों क़ा इस्तेमाल करता है, कइÊ बार पुराने औजारों की जड़ता या प्रभावहीनता उसे नए शिल्प गढ़ने को भी मजबूर करती है. यह कलात्मकता ही उसे दर्शकों, पाठकों या श्रोताओं के बीच ले जाती है.

    पूरा लेख विचारणीय है.....आपसे सहमत हूँ....

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  2. स्‍वागत है सुभाष भाई, आपके स्‍नेह का कायल हो गया हूं। बहुत बहुत आभारी हूं। ब्‍लॉग जगत में आई शून्‍यता के आगे कई अक्षरों को जमाने की विकट की सामर्थ्‍य है आपकी।

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  3. एक अंतराल के बाद पुनः देखना सुखद रहा. स्वागत है.

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  4. रचनाकार जिन मूल्यों को अपनी रचना में आगे बढ़ाता है स्वयं ही उन का अनुसरण नहीं करता तो उस की रचना पर कौन विश्वास करेगा? उस का व्यक्तित्व भी मिथ्या लगने लगेगा। रचनाकर्म आरंभिक बिंदु है। लक्ष्य तो समाज परिवर्तन ही है।

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  5. बहुत स्वागत है.. बहुत दिनों से यह कमी खल रही थी. जन संदेश टाइम्स ने कम समय में कलात्मकता,समाचार,विचार और साहित्य का शानदार समन्वय किया है ...आप और आप की टीम को बधाई...

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  6. बहुत-बहुत बधाई और अब उम्मीद है कि साखी के दिन भी फिर से लौट आयेंगे।

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  7. Aaj ke samay men rachnakar ko activist bhi banna hoga.Isase use drishti bhi milegi,oorja bhi aur vyapak sampreshan ke auzar bhi.
    Jitendra Raghuvanshi

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  8. आखिर वह क्षण आ ही गया जब आप ब्लाग के इस माध्यम से फिर से मुखातिब हैं। ऐसे लग रहा है जैसे ब्ला ग का बसंत लौट आया हो। उम्मीद है ‘साखी’ के चबूतरे पर लगे पीपल में भी फिर से पत्ते आएंगे । जिस तरह आप अखबार का संपादकीय लेकर यहां आए हैं,उसी तरह साखी को यहां फिर से जीवंत करके अखबार पर ले जा सकते हैं,यह एक नया प्रयोग होगा।
    * बहुत-बहुत स्वागत है।
    * यहां आपने जो सवाल और मुद्दा रखा है वह एक समर्थ रचनाकार के जेहन में हमेशा ही रहा है। अगर उसका लिखा हुआ शब्द समाज को कोई नेतृत्व नहीं दे पा रहा है तो वह अकारथ ही है। यह सही है कि लेखक एक्टिवस्ट‍ की तरह भले ही मैदान में न आए, पर उसके शब्दै ऐसे होने चाहिए कि वे वहां मौजूद हों। वे केवल किताबों में दर्ज होकर अलमारियों की शोभा न बढ़ाएं। इसमें भी कोई शक नहीं है कि ऐसे समर्थ रचनाकार हमेशा हुए हैं और होते रहेंगे। उनके बल पर ही शब्द न केवल जिंदा हैं वरन् नेतृत्व भी करेंगे।
    * दो तीन दिन पहले जब सुप्रीमकोर्ट से विनायक सेन को जमानत देने की खबर आई तो एनडीटीवी पर ‘कस्बा’ के रवीश कुमार एक कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। कार्यक्रम के अंत में उन्होंवने राजेन्द्र रंजन की एक कविता का पाठ किया,साथ ही कविता स्क्रीन पर स्क्रोल हो रही थी। मुझे लगा पूरा कार्यक्रम जो बात नहीं कह पाया ,वह बात एक मिनट की उस कविता ने कह दी। शब्द की ताकत का यह एक उदाहरण है।

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  9. बहुत ही सही बात कही आपने-

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  10. इस सच की अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज का लेखन दिशाहीनता और विचारशून्‍यता से परिपूर्ण है। लेकिन जब तक रचनाकार जनमानस से नहीं जुडेगा, जनता की समस्‍याओं पर संवेदनशील होकर सबके साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम नहीं करेगा। अपने लेखन के माध्‍यम से निठल्‍ला चिंतन करता रहेगा। उसकी परिकल्‍पनाओं का कोई संसार अथवा समाज नहीं होगा तो माफ करें ऐसे रचनाकार, आज समाज और देश को ऐसे लोगों की कतई जरूरत नहीं है। डा. राय ने रचनाकारों को चुनौती दी है कि शब्‍द को नेतृत्‍व करना चाहिए लेकिन ऐसे विरले ही रचनाकार होते हैं जो सुख सुविधाओं को लात मार कर समतामूलक और समरसता का समाज बनाने के लिए जमीनी लडाई लडते हैं।

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  11. ब्‍लॉग जगत में बहुत दिनों से यह कमी खल रही थी आपकी,एक अंतराल के बाद पुनः देखना सुखद रहा !पूरा लेख विचारणीय है.....आपसे सहमत हूँ....!

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  12. हों न हालात मिलेंगे हम-तुम
    बात-बेबात मिलेंगे हम-तुम

    एक सा खून रगों में अपनी
    एक है जात मिलेंगे हम-तुम

    बेरुखी छोड़ चलें शहरों में
    गाँव-देहात मिलेंगे हम-तुम

    फिर किसी मोड़ किसी मंजिल पर
    है मुलाकात मिलेंगे हम-तुम

    खो न जाना डगर अँधेरी है
    चाँद की रात मिलेंगे हम-तुम
    बात-बेबात पर आपकी वापसी का बार-बार स्वागत है.
    सादर
    मदन मोहन 'अरविन्द'

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  13. BAKAUL SAHIR LUDHIANVI -

    TERA MILNAA KHUSHEE KEE BAAT SAHEE
    TUJH SE MIL KAR UDAAS RAHTAA HOON

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