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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

अविनाश वाचस्पति की चार प्रतिकविताएं

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मेरे प्रिय भाई अविनाश वाचस्पति एक ब्लॉगर  और व्यंग्यकार ही नहीं एक संवेदनशील कवि, रचनाकार भी हैं. बार-बार उनकी इस प्रतिभा को मैं देखता आया हूँ. आखर कलश में प्रकाशित मेरी कविताओं पर उनकी प्रतिक्रिया देखकर मैं अपने को रोक नहीं पाया. ये सिर्फ प्रतिक्रिया भर नहीं हैं, ये स्वतंत्र रचनाएँ हैं. उन्होंने लिखा भी है, मेरी विवशता है कि मैं प्रतिक्रिया में क्रिया की प्रक्रिया में जूझने लगता हूं। यह क्रिया की प्रक्रिया ही उनकी निधि है. यही उन्हें निरंतर सकारात्मक और रचनात्मक बनाए रखती है. उनकी चार प्रतिकविताएं यहाँ पेश हैं.....



1.
रचने का सच

रचना का सच
सच और सिर्फ सच
कवि की सच्‍चाई है
जो इंसानियत की रोशनाई है।


2.
फूल सदा खिला रहता है
मन की तरह
मन है न
नमन मन को।


3.
रोजाना झुलस रहा है
पर सोचता है पक रहा है
इतना पकना ठीक नहीं
जल्‍दी ही थकेगा
कब यह क्रोध रूकेगा।


4.
भाप को नहीं बनने देंगे बूंद
इस‍के लिए काटेंगे रोज ही
ऐसी फसल जमीन पर
जो इंसानियत को
कर देगी ढेर।

शनिवार, 12 जून 2010

मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे

ओ मेरे पिता! तुम्हारा
अंश हूँ मैं सम्पूर्ण
मां के गर्भ में रचा
तुमने मुझे अपने लहू से 

तुमसे मुक्त कैसे
हो पाऊंगा कभी
कैसे वापस लौटा सकूँगा तुझे
उसका अंश भी जो
तुमने दिया है मुझे 
सब कुछ निछावर करके भी

अपने आंसुओं के साथ
रखा तुमने मुझे
जो करुणा  और प्रेम
पाता हूँ अपने भीतर
तुम्हारी संवेदना से सिंचित है वह
कैसे विछड़ सकता हूँ मैं
तुमसे, तुम्हारे आंसुओं से

मैं जानता हूँ तुम रहोगे
सदा, सर्वदा मेरी आत्मा  में
ज्योति की तरह दीप्त
मेरी नसों में बहते हुए
शताब्दियों के इतिहास की तरह
समय में ओझल  वर्तमान की तरह
युग-युगों में फैले
भविष्य की तरह

भले ही तुम्हारा शरीर थम जाये
तुम्हारी हड्डियाँ  तुम्हारा बोझ
उठाने से मना कर दें
तुम्हारा ह्रदय धड़कने से
इनकार कर दे
भले ही तुम संसार को
उसके  पार्थिवत्व  को
किसी भी पल अस्वीकार कर दो
पर मैं तुम्हारा मूर्त स्वीकार हूँ
तुम्हारा पूर्ण प्राकट्य  हूँ 
मेरे भीतर तुम उपस्थित रहोगे
तब भी, जब नहीं होगे
किसी जागतिक दृश्य में

मां ने तुम्हारी प्रतिकृति में
जो नवचैतन्य  सौंपा था तुझे
उसकी प्रथम श्वांस के साक्षी हो तुम 
तुम्हारी बाँहों में अनंत
अंधकार से मुक्ति पाई मैंने
अपनी अजस्र निश्छलता से
सींचकर तुमने मनुष्यत्व  दिया मुझे
जब तक आसमान के नीचे
मनुष्य होगा, मैं हूँगा, तुम होगे

मैं जब कभी हताश होता हूँ
थक जाता हूँ, असहज हो जाता हूँ
अपने कंधे पर महसूस करता हूँ
तुम्हारे खुरदरे हाथ
और निकल आता हूँ
नैराश्य  के विकट व्यूह से
जीवन का पहिया हाथों में
सम्हाले युद्ध को तत्पर
अभिमन्यु की तरह

जब कभी आत्मीय प्रवंचनाएं
क्रोधाविष्ट हो घेरतीं हैं मुझे
छल-छद्म के साथ
उपस्थित होतीं हैं
तुम्ही मुझे मृत्यु  से संवाद
की शक्ति सौंपते हो
और मैं यमराज से भी नहीं डरता
नचिकेता हो जाता हूँ

जब कभी संशय में होता हूँ
समरभूमि के बीच में
लडूं या मुक्ति पा लूं रण से
संघर्ष  और कर्तव्य के संबंधों
को समझने में असमर्थ
हो जाता हूँ पूरी तरह
मेरे भीतर से निकलकर
सामने आ जाते हो
पटु महानायक कृष्ण की तरह  
पलायन की ओर
रथ हांकने से रोक लेते हो
मेरा अर्जुन उठ खड़ा होता है
अपने गांडीव  के साथ
याद आ जाता है जीवन
का आप्त वाक्य-
मामनुस्मर युद्ध च

मैं जानता हूँ तुम कुछ नहीं
कुछ भी नहीं चाहते मुझसे
पर मैं कुछ देना चाहता हूँ
सिर्फ यही है मेरे पास
लो, मैं देता हूँ वचन
तम्हे कभी आहत नहीं करूँगा
दुःख नहीं दूंगा
बना रहूँगा
तुम्हारा अभिमन्यु
तुम्हारा नचिकेता
तुम्हारा अर्जुन




 
 

सोमवार, 7 जून 2010

जा रहा हूँ गाँव

मित्रों  मैं गाँव जा रहा हूँ  . ११ जून तक लौटूंगा. जाने से पहले गाँव की याद आ रही थी. लीजिये अब कुछ दिन इसे बार-बार पढ़िए.

जा रहा हूँ गाँव
कुछ नयी कहानियों
की तलाश में 
कुछ पुरानी फिर से
जगाने यादों  के तहखाने से

शहर में आकर भी
छूटा नहीं है गाँव
पर जो गाँव लेकर
निकला था मेरा किशोर मन
वह खो गया है कहीं
समय के कुहासे में

गाँव के पोखरे ग़ुम
हो गए हैं शहर होते
संस्कारों के जंगल में
ताल की सतह पर
उग आये  हैं फॉर्म
बरसात का पानी  अब
ठहरता नहीं कहीं
बहते-बहते उड़ जाता  है
वाष्प बनकर

गाँव में अब बुवाई,
निराई और कटाई के गीत
नहीं सुनायी पड़ते
ट्रैक्टर  गड़गडाते  हैं
बच्चों के पैदा होने पर
सोहर नहीं गातीं महिलाएं
शादी के गीत याद नहीं
शहर में पढने जाती
किशोरियों  को

गाँव में  अब नौटंकी
नहीं होती, नहीं होता
रहीम चाचा का आल्हा
काका बूढ़े हो गए हैं
बैल बिक गए हैं
गाएं इतनी नहीं रहीं
कि चुन्नू उन्हें चराने निकले
वही उसका रोजगार था
वह सबकी गाएं सुबह-सुबह
खूंटे से खोल लेता था
दिन भर उनके साथ घूमता था  
और शाम को छोड़ जाता था
सबके दरवाजे, सबकी गाएं
वह दारु पीता रहता है
सुबह से शाम तक, रात तक

बच्चे खेलने नहीं निकलते
दो साल बाद ही पढने लगते हैं
इंजीनियरी, डाक्टरी
जो पढ़ते नहीं वे
रोब गांठना सीखते हैं
उन्हें ठेकेदार या नेता
बनना होता है
देश का भविष्य
संवारना होता है

जानता हूँ कि मेरा गाँव
मेरा गाँव नहीं रहा
पर मेरी यादें दफन हैं
वहां कण-कण में
जा रहा हूँ तो थोड़ी  सी
लेकर आऊंगा वो मिटटी
जिससे मैं बना हूँ
जिससे मैं जिन्दा हूँ

 

रविवार, 6 जून 2010

मुझे आगे भी जाना है.

सुबह का सूरज
तुम्हारे भाल पर
उगा रहता है अक्सर
मेरे ह्रदय तक 
उजास किये हुए

मेरी सबसे सुन्दर
रचना भी कमजोर
लगने लगती  है
जब देखता हूँ
तुम्हें सम्पूर्णता में

दिए की तरह जलते
तुम्हारे रक्ताभ नाख़ून
दो पंखडियों जैसे अधर
काले आसमान पर लाल
नदी बहती देखता हूँ मैं

सचमुच  एक पूरा
आकाश है तुम्हारे होने में
जिसमें बिना पंख के
भी उड़ना  संभव है
जिसमें उड़कर भी
उड़ान होती ही नहीं
 चाहे जितनी दूर
चला जाऊं किसी भी ओर
पर होता वहीँ हूँ
जहाँ से भरी थी उड़ान

तुम नहीं होती तो
अपने भीतर की चिंगारी से
जलकर नष्ट हो गया होता
बह गया होता दहक कर
तुम चट्टान के बंद
कटोरे में संभाल कर
रखती हो मुझे
खुद सहती हुई
मेरा अनहद उत्ताप
जलकर भी शांत
रहती हो निरंतर

जो बंधता नहीं
कभी भी, कहीं भी
वह जाने कैसे बंध गया
कोमल कमल-नाल से
जो अनंत बाधाओं के आगे भी
रुकता नहीं, झुकता नहीं
कहीं भी ठहरता नहीं
वह फूलों की घाटी में
आकर भूल गया चलना
भूल गया कि कोई  और भी
मंजिल है मधु के अलावा

सुन रही हो तुम
या सो गयी सुनते-सुनते
पहले तुम कहती थी
मैं सो जाता था
अब मैं कह रहा हूँ
पर तुम सो चुकी हो

उठो, जागो और सुनो
मुझे आगे भी जाना  है.  

शुक्रवार, 14 मई 2010

डरना क्यों

जो डरता है
वह पल-पल मरता है

बहुत डरावनी है मौत
बताकर कभी नहीं आती
चलने का न्योता नहीं देती
ताकि आदमी मन बना सके
घर वालों को समझा सके
और कोई बहुत जरूरी
काम हो तो निपटा सके

इसीलिए  हर कोई
डरता है मौत से
सब कुछ जल्दी-जल्दी
कर लेना चाहता है
धन-संपदा से
घर भर लेना चाहता है
संपदा आ जाती है
तो उसकी सुरक्षा के लिए
परेशान रहने लगता है
यह जानते हुए कि
ले नहीं जायेगा
अगले जीवन के लिए
एक भी सिक्का

असफलता भी डराती है
कोई हार को गले
नहीं लगाना चाहता
कोई पीछे नहीं रहना चाहता
दुनिया की चूहा दौड़ में
आशंका रहती है
कछुआ पता नहीं
आगे निकल पाए या नहीं

अब आप समझ सकते हैं
कि लोगों को नींद
क्यों रात भर नहीं आती

सारा डर इसलिए है कि
हमने अपना काम भुला दिया है
केवल कर्म का अधिकार मिला है
आदमी को
बस वह कर्म ही नहीं करता
दिन-रात परिणाम की
चिंता में मगन रहता है

इसिलिये हर वक्त
डरता रहता है

शनिवार, 8 मई 2010

मंज़िल तक

सुबह हो  गयी है. उठने और चल पड़ने का वक्त आ गया है, पर कहाँ, किसलिए औए क्यों? इन्हीं  सवालों की छानबीन  करते कुछ शब्द------

जो लीक पर

चलते हैं
वे पहुँचते हैं
दूसरों द्वारा तलाशी
गयी मंज़िल तक

वे सिर्फ़ चलना जानते हैं
अनुकरण करना
उनकी अपनी
कोई मंज़िल नहीं होती

जो लीक से हटकर
चलते हैं मगर
सिर्फ़ चलते हैं
चलने के लिए
कहीं पहुँचने के लिए नहीं
वे नहीं पहुँचते कहीं भी

और जो लीक छोड़कर
चलते हैं पर
ध्यान रखते हैं
मंज़िल का भी

सिर्फ़ वे ही पहुँच पाते हैं
अपने शिखर तक
अपनी मंज़िल तक

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

आदमी कुछ सीखता नहीं

एक खिले हुए फूल के पास से
जो भी गुजरेगा
हत्यारा या बलात्कारी
संत या बीतरागी
महंक सबके पास जायेगी
बिल्कुल एक जैसी
कोई भी पास आये
फूल नहीं रोकता
अपनी सौंदर्य-गंध को
वह सिर्फ महंकना जानता है

नदी के तट
सबके लिए खुले रहते हैं
जो चाहे, आये
किनारे बैठे या डुबकी लगाये
चोर हो, बेइमान हो या साधु
या जानवर ही क्यों न हो
नदी नहीं रोकती किसी को
अपने पास आने से
अपने भीतर उतरने से
वह सिर्फ बहती रहती है

पहाड़ खड़े रहते हैं
अपने समूचे सौंदर्य के साथ
जो भी चाहे
उन पर चढ़ सकता है,
उन्हें तोड़ सकता है
उनके भीतर
गहरी, अनजान गुफाओं में
घुस सकता है,
उन पर उगे पेड़ों से
तोड़ सकता है फल
जितना चाहे
उनकी चोटियों पर
जमी बर्फ को निहार सकता है
अपलक, निरंतर
पहाड़ सिर्फ खड़े रहते हैं

सूरज निकलता है
रोशनी फैलाता हुआ
घर-घर, आंगन-आंगन
वह रावण और विभीषण में
फर्क नहीं करता
गरीब और अमीर में
अंतर नहीं देखता
वह सिर्फ अंधेरे से लड़ता है
रोशनी फैलाता है

आदमी कुछ सीखता नहीं
न फूल से, न नदी से
न पहाड़ से, न सूरज से
इसीलिए वह पूरा
आदमी नहीं हो पाता

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

याद में तूफान उठता है

मित्रों, मन यूँ ही कभी-कभी कुछ पंक्तियाँ सहेजता रहता है. कभी पन्ने पर उतर जातीं हैं, कभी मन के आकाश में खो जातीं हैं. ये  कुछ शब्द उतर आयें हैं. सोचा आप तक पहुँच जायं......

स्वाद अच्छा रंग अच्छा रूप अच्छा है
देख इसकी आड़  में ये जाल किसका है

घाव ताजा है खुला मत छोड़ तू इसको
इस तरह की चोट से तो खून रिसता है

एक जंगल था नदी थी और कल-कल था
इस तरफ अब धूल का तूफान उठता है

आँधियों के साथ दिन भर भागते रहना
क्या कहूँ हर शाम कितना पांव दुखता है

मेघ का झरना गली में बाढ़  का आना
याद में है याद में तूफान उठता है

धमनियों में लपलपाती जीभ का हिलना
थरथराती   देह मेरा दांत बजता है

रविवार, 11 अप्रैल 2010

मेरा व्यापार, यह अख़बार

मीडिया अब एक धंधे की शक्ल ले चुका है. इस पेशे से जुड़े रणनीतिकारों की एकसूत्री चिंता रहती है कि सर्कुलेशन   कैसे बढे. कैसी तस्वीरें लगायीं जाएँ, कैसी खबरें बनायीं जाएँ, कैसे हाकर्स को पटाया जाये. इसके लिए वे दिन-रात नए-नए जतन करते रहते हैं.ऐसे माहौल में रहने का, काम करने का मुझे भी अवसर मिला है. उसी का एक अनुभव चित्र इस कविता में है. यह रचना १९८७-१९८९ के बीच की है. प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका अभिनव कदम में प्रकाशित हो चुकी है. समय जरूर निकल गया है लेकिन परिस्थितियां बिल्कुल वही हैं. आप खुद देखें----

लो केवल डेढ़ रूपये में
दस आदमियों का खून
विधवा के साथ एक दर्जन
सिपाहियों द्वारा रात भर बलात्कार

चाहो तो कमीशन भी मिलेगा
पचास पैसे काट  लो
लो, केवल एक रूपये में
शहर के अमनपसंद लोगों पर
आतंक के साए
मंगरू की जवान बेटी का
अपहरण, फिर खून

तुम पुराने ग्राहक हो
तुमसे क्या सौदा
ले जाओ, बाँट दो शहर में
दंगाइयों द्वारा काटे  गए गले
जलाये गए धड

यह तो धंधा है प्यारे
कुछ खोवो, कुछ पाओ
कुछ खिलाओ, कुछ खाओ
मौत के बाजार में हिस्सा बंटाओ
चाहो तो कुछ दोस्तों को भी
रोजगार दिलाओ

ले जाओ, पहचान के आदमी हो
पैसा कल दे देना
लो, जिस्मफरोशों  के चंगुल से
छूटी लड़की थानेदार के हाथों फँसी
लुट-लुटाकर भी चार हजार में  बिकी

 चाहो तो मोलभाव भी कर लो
नाक-भौं क्यों सिकोड़ते हो
इतना मसाला क्या कम है
चिंता न करो, ले    जाओ
न बिके तो वापस कर जाना

कुछ ऐसा है
जो कहीं नहीं मिलेगा
गरीबों के गुर्दे का व्यापार
एक के पचास हजार
दोनों के पूरे एक लाख
ले जाओ, साधु की कुटिया से बरामद
बच्चों की खोपड़ियाँ
एक साथ पुल से छलांग लगाने वाले
प्रेमी युगल के शव

बिकेगा, खूब बिकेगा
मंत्री के यौनाचार  का खुलासा
संसद में सरफोड़ तमाशा
देर मत करो
आँख मूंद कर ले जाओ
नए ग्राहक बनाओ
अब रुकने वाला नहीं है

मेरा व्यापार
यह अख़बार

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

रास्ते आसाँ बनाता हूँ

कई दिनों बाद आज नेट पर बैठ पा रहा हूँ । कुछ व्यस्तता और कुछ तबियत नाशाद रही। बहरहाल, जब बैठ ही गया हूँ तो फिर कुछ न कुछ तो आप तक पहुँचाना ही चाहिए। इधर बैठे-ठाले मेरी कलम से कुछ अशआर काग़ज़ पर उतर आये हैं। तो पेशे ख़िदमत है मेरी एक ताज़ा ग़ज़ल। मुलाहिजा कीजिये --

बड़े दुश्मन को भी मैं अपने सीने से लगाता हूँ
वो मेरा हौसला है हौसले को आजमाता हूँ

लगाता हूँ  मैं उसके सर पे आई धूप को छतरी
मैं अपने दिल का दरवाज़ा उसे ऐसे दिखाता हूँ

बड़े होकर किसी के साए को तरसें नहीं बच्चे
अभी से इसलिए मैं धूपमें उनको तपाता हूँ

क़फ़स में क़ैद बुलबुल किस तरह से छटपटाती है
 मैं आगे आने वाली पीढ़ियों  को यह दिखाता हूँ

हटाकर दूसरों के रास्तों से ख़ार औ' पत्थर
मैं अपनी ज़िन्दगी के रास्ते आसाँ बनाता हूँ

मेरे महबूब मेरी ज़िन्दगी की ज़िन्दगी है तू
रुलाता हूँ, हंसाता हूँ , रुठाता हूँ, मनाता हूँ

 तू गहरी नींद में सोता चले जाने को ख़्वाबों में
बड़े कुछ ख़्वाब दिखलाने को मैं जग को जगाता हूँ

तेरे हाथों में लोहा है मेरे हाथों में भी लोहा
तू बंदूकें बनाता मैं तवे-चिमटे बनाता हूँ

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

जबसे तुमने किया किनारा

जीवन कालचक्र है। यह निरंतर चलता रहता है। दिन और रात, मिलना  और बिछुड़ना, दुःख और सुख, यश और अपयश इसके पड़ाव  हैं। लेकिन कुछ पल या मित्र ऐसे होते हैं , जिनकी याद भुलाई नहीं जा सकती। जीवन में  कई ऐसे मित्र आये, जिनके बारे में मैं सोचा करता था की यदि इन्हें कुछ हो गया तो मेरे जीवन के पल कैसे काटेंगे। परन्तु जीवन का रथ निर्ममता के साथ दौड़ता  रहता है। उन्हीं बिछुड़े पलों को इंगित करता यह  गीत।

जबसे तुमने किया किनारा, टूट गया मेरा इकतारा
सॉस सांस में कम्पन होती, मिटा भाग्य का आज सितारा

हमने तुमने स्वप्न बुने थे, चाँद सितारे भी अपने थे
साथ रहेंगे साथ चलेंगे इक  दूजे के लिए बने थे

मधुर मिलन की बंशी बजती, खुशियाँ दरवाजे पर झरतीं
सोना सा लगता था वह दिन उपवन में जब भी तुम मिलतीं

सूरज भी हमसे जलता  था, चंदा भी नित नित गलता  था
फूलों की मुस्कानें रोतीं, भंवरा हाथों को मलता था

मैंने तुमसे प्रीत बढाई , तुम भी मंद मंद मुस्काई
अम्बर धरती लगे झूमने , रजनीगंधा भी इठलाई

बिखर गए वे सपने सारे, बदल  गए नदिया के धारे
अलगावों के बादल छाये बदल  गए अब मीत हमारे

रूपसि तेरा रहा पुजारी, लेकिन तुम निकली पाषाणी
होम दिया अपने को तुम पर, रूपनगर की ओ महरानी

तुमने अपने पथ को मोड़ा, गैरों से अब रिश्ता जोड़ा
प्यार नहीं नफ़रत पियूँगा, यादों में तेरी जियूँगा

मैंने कुछ कहा

मैं नहीं जानता कि मैंने जो कुछ लिखा है, वो ग़ज़ल है कि नहीं पर इनमें मैं कुछ कहना जरूर चाहता हूँ. इसीलिए इसे आप तक पहुंचा रहा हूँ. आप देखें, पढ़ें और तय करें कि मैं कह पाया या नहीं.
१.
हाँ सुर्ख़ियों में नाम मेरे गाँव का कल था.
चर्चा नहर के पास मिले पांव का कल था.
 
इतनी दरिंदगी न कभी धूप की देखी
पेड़ों  से झरती आग सिर्फ छाँव का कल था
 
कल ही बना था बांध अचानक दरक गया
पेड़ों पे छत पे बस्तियां थीं  नाव का कल था
 
कर्जे चुकाएगी फसल उम्मीद थी उसको
बिरजू के लिए सत्य राम-नाम का कल था
 
२.
होठों  पे हंसी बात में कितनी मिठास है
ये फूल जैसा छद्म कहीं आस-पास है
 
देखा बहुत करीब से समझा नहीं मगर
उजली है उसकी देह या उजला लिबास है
 
मुंह में हैं राम संत सी रहनी लगी  मुझे
सब उसके खास और वो सभी का खास है
 
नेकी की कथाएं तो बहुत सी सुनी गयीं
पकड़ा तो पुलिस ने कहा गर्दनतराश   है
 
 
 
 
 
 

कायर और जुआरी


महाभारत के पात्र आज भी कई प्रश्न छोड़ते हैं। जिस पात्र को धर्मराज कहा गया है वह इस महाकाव्य का सबसे कमजोर पात्र है। युधिष्ठिर   ने कई बार मर्यादा का उल्लंघन किया। अपने सत्यवादी होने के ढोंग को युद्ध  के मैदान में उजागर किया। जुआ खेलकर अपने राज्य तथा पत्नी तक को भी दांव  पर लगा दिया। द्रोपदी आज भी इस धर्मराज को कोस रही है.

मेरे तथाकथित पति को
क्या हक था मुझे  
दांव पर लगाने का

भाइयों के पराक्रम
से अर्जित
राज्य और पत्नी को
इस तरह गंवाने का

लोग भले ही
कहते रहें तुम्हें धर्मराज
जबकि सच्चाई यह है
कि तुम हो स्वाभिमान
 के टूटे साज़

धर्म को तो तुमने
उसी दिन
दफना दिया था
जिस दिन
अपनी अनुजवधू को
अपनी अंकशायिनी
बना लिया था

काश आज द्वापर नहीं
त्रेता होता
कान्हा की जगह
राम होता
तो यह निश्चित था
कि बाली की  भांति
तेरा भी वध हुआ होता

मेरे देश का इतिहास
कितना महान होता
काश तुझ जैसा
कायर और जुआरी
इस माटी   में पैदा ही
न हुआ होता






गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

आग का खेल

मेरा परिचय
उन सबका परिचय है
जो सोये नहीं हैं जनम के बाद
लपट है जिनके भीतर

जिसे छू दें भस्म कर दें
जिस पर हाथ रख दें
वह पिघलकर बहने लगे

चल पड़ें तो
जमीन अगिया जाये
रास्ते की धूल
धुआं बन जाये

बोलें तो बिजलियां कड़क उट्ठें
लिखें तो शब्द-शब्द
सोये दिमागों पर
अग्निवाण की तरह बरसें

जो खुद से टकरा रहे हों
टुकड़े-टुकड़े हो रहे हों
जो धधकते रहते हों
पृथ्वी के गर्भ की तरह
ज्वालामुखी बनने को आतुर
लावा से नया रचने को बेचैन
सूर्य को अपने भीतर समेटे
खौलते हुए

मेरा परिचय
उन अनगिनत लोगों
का परिचय है
जो मेरी ही तरह
उबल रहे हैं लगातार

जो दीवारों में
चुने जाने से खुश हैं
उनसे मुझे कुछ नहीं कहना
जो मुर्दों की मानिंद
घर से निकलते हैं
बाजारों में खरीदारी करते हैं
और खुद खरीदे हुए
सामान में बदल जाते हैं
वापस घर लौटकर
सजी हुई काफिन में
कैद हो जाते हैं चुपचाप

जो सिक्कों की खनक
पर बिक जाते हैं
चुरायी हुई खुशी में
खो जाते हैं

वे टूट सकते हैं आसानी से
उनकी ऊंगलियां
कटार नहीं बन सकतीं
उनके हाथ लाठियों में
नहीं बदल सकते

वे रोटियां नहीं खाते
रोटियां उन्हें खाती हैं
ऐसे मुर्दों पर गंवाने के लिए
वक्त नहीं है मेरे पास

मैं अपने जैसे गिने-चुने
लोगों को ढूँढ रहा हूं
मुझे आग बोनी है
और अंगारे उगाने हैं

मेरा परिचय
उन सबका परिचय है
जो एक दूसरे को जाने बिना
आग के इस खेल में शरीक हैं

लुकाठा लिए मैं
बाजार में खड़ा हूं
जो अपना घर
फूंक सकते हों
भीड़ से अलग हट जायें
मेरे साथ आ जायें

मंगलवार, 30 मार्च 2010

सोनचिरैया

सोनचिरैया
पंख फडफडा रही है

जब से मैंने होश सम्हाला
जब से समझने लगा
देश, जनता और विकास के अर्थ
जब से पहचानने लगा    
दुश्मन और   दोस्त के बीच का फर्क
जब से जाना अपने और
देश के बीच का रिश्ता

तब से देख रहा हूँ लगातार
पंख फडफडा रही है सोनचिरैया

क्या वह उड़ान भरना चाहती है
उन्मुक्त, अनंत आकाश में
या नापना चाहती है
पृथ्वी और तारों के बीच की दूरी
या सूर्य की ऊष्मा
महसूसना चाहती है नजदीक से

या वह बताना चाहती है
कि हैं उसके पास
ऊँची उड़ान के सपने
या वह अपना संकल्प तोल रही है
पंखों पर उठने के पहले

या उसे अपने लिए
घोंसला बनाना है
एक दरख्त तलाशना है
ऊँचा और सुरक्षित
ताकि वह रच सके अपना भविष्य
आगे बढ़ा सके
अपने होने का मतलब

या वह आज़ादी के मायने 
बताना चाहती है
अपने परों पर उठकर

या परों को झाड़ रही है सिर्फ 
ताकि उन पर धूल न जमे
या यूँ ही बस पंख फडफड़ाने  के लिए
फडफडा रही है पंख
सोनचिरैया

नहीं उसकी आवाज में वो
चुलबुलापन नहीं है
जो मैंने महसूस किया था
 बहेलियों के चंगुल से
उसकी मुक्ति के बाद

वह उड़ चली थी
असीम गगन की ओर
उसे गम नहीं था
कि उसके सैकड़ों  बच्चे
बलि चढ़ गए थे
निर्मम शिकारियों के हाथ

उसका चहचहाना
नहीं रुका था तब भी
जब वह छूट गयी थी
घने जंगल में अकेली
उड़ चली थी राह बनाती
रौशनी के आकाश की ओर

शायद  वह भूल गयी है उड़ना
या कमजोर हो गए हैं उसके पंख
सपनों का वजन उठाने में असमर्थ
अपनी ही फडफडाहट  से घायल
अपंग, कातर, अभिशप्त

उसकी चोंच में फँसी
हुई है एक गहरी चीख
यह फडफडाहट
मुक्ति के लिए चीत्कार है
उड़ान का पूर्वाभ्यास नहीं

हम सबको मदद के लिए
बुला रही है सोनचिरैया
पंख फडफडा रही है
सोनचिरैया

गुरुवार, 25 मार्च 2010

प्रगति के नए प्रतिमान

बंधू आगे बढ़ता  चल,
सबका माल पचाता  चल
अगर तरक्की करनी है तो
टंगड़ी मार गिराता  चल

सच्चाई को आग लगा दे,
भाईचारे को दफना दे
उन्हें डुबोकर बीच भंवर में
अपनी कश्ती पार लगा ले
झूठ  फरेबों की नदियाँ में
गोते खूब लगाता चल.........

अगर कवि बनना  है बन्दे,
चाटुकारिता सीखले मंडे
इधर उधर की कविता लेकर
डाल दे तुकबंदी के फंदे
साहित्यिक चोरी को अपना
मान के धरम निभाता चल.......
गर नेता बनाना है लाले,
बेशरमी को गले लगा ले
ठगी दलाली और चंदे की
सदाबहारी फसल उगा ले
विश्वासों में भोंक के  खंजर
गुंडों को गले लगाता  चल.....

यदि बनना  चाहो पत्रकार
करो सच्चाई का तिरस्कार
सच का झूठ  और झूठ का सच
कर शब्दों का ऐसा चमत्कार
दारू पीकर माल पचाकर
अपनी कलम चलाता  चल....

थानेदार का यदि सपना है,
 चोर बलात्कारी अपना है
रिश्वत तेरा सगा बाप है,
फिर भी राम राम जपना है
मां  बहनों से जोड़ के  रिश्ता
गाली बेख़ौफ़ सुनाता चल.......

शिक्षक पद यदि तू पा जाये,
ट्यूशन की तू नाव चलाये
शिक्षण  करम छोड़कर प्यारे
फ़ोकट का तू वेतन पाए
कर तिकड़म नेतागीरी,
विद्या की लाश उठाता  चल.........

गुरुवार, 18 मार्च 2010

क्रांति का बिगुल

हम गीत प्यार के गाते हैं
क्रांति का बिगुल बजाते हैं
हम परिवर्तन के अग्रदूत
पानी में आग लगाते हैं

जब जब धरती का मान गिरा
और बेबस का सम्मान गिरा
मर्यादा का चीर के दामन
जब भूखे का इमान गिरा
तभी शब्द का तरकश लेकर सत्ता से टकराते हैं

धर्म  बना  मानव का बंधन
स्वार्थ  हुआ माथे का चन्दन
जहरीली पछुआ  बयारों से
होता है बगिया  में क्रंदन
काले मेघा कजरारे हम
जीवन जल बरसाते हैं

हम हरिश्चंद हें सतयुग के
घटघट वासी राम हैं
गीता का सन्देश सुनाते
हमीं स्वयं घनश्याम हैं
मानवता हित जहर को पीकर स्वयं शंकर बन जाते हैं

जब हंस चले बगुले की चाल
और नफरत की जले मसाल
भाईचारे को दफनाकर
प्यार बने बाजारू माल
कबिरा की वाणी बन जग को हम फटकार लगाते हैं

हम काँटों के मीत पुराने
हर आंसू से प्रीत है
रमते जोगी बहते पानी
यही हमारी रीत है
मिटा विषमता के जंगल को प्यार का फूल खिलाते हैं

हम गुरुकुल हैं संदीपनी के
और  कौशल  में बलराम हैं
इस सरसती के जीवनदाता
हमीं सुबह और शाम हैं
अंधकार की मिटा कालिमा सूरज हमीं उगाते हैं