सोमवार, 31 मई 2010

विनाश का द्वार दिखता ही नहीं

आदमी अकेला नहीं जी सकता। उसकी जिंदगी धरती के अन्य प्राणियों से बेतरह जुड़ी हुई है। वह बहुत खतरनाक समय होगा, जब धरती पर केवल आदमी बच जायेगा। यद्यपि इस तरह की कल्पना की अभी कोई गुंजाइश नहीं दिखती लेकिन हम धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। दरअसल आदमी बहुत स्वार्थी हो गया है। वह सिर्फ और सिर्फ अपनी चिंता करता है। बाकी जीवधारियों की चिंता के लिए उसके पास वक्त नहीं है।

सभी जानते हैं कि पर्यावरण में हर प्राणी की अपनी जगह है और कोई न कोई महत्वपूर्ण भूमिका उसे मिली हुई है। बहुत सारे पक्षी और छोटे उड़ने वाले जीव फलों और बीजों को दूर तक ले जाते हैं और इस तरह प्रकृति की विविधता के विस्तार में सहायक होते हैं। अनेक जानवर आदमी द्वारा इकट्ठे किये गये कूड़े-कचरे को साफ करते हैं, वह उनकी भोजन की कड़ी के रूप में इस्तेमाल होता है। कई पशु-पक्षी मरे हुए जानवरों को खाते हैं और इस तरह वे वातावरण को संतुलित रखने में मदद करते हैं। कई कीड़े ऐसे होते हैं जो जमीन की उर्वरा बढ़ाने में सहायक होते हैं और इस तरह आदमी की खाद्यान्न समस्या हल करने में मदद करते हैं।

ध्यान से देखें तो प्रकृति ने सभी प्राणियों के जीवन में अन्योन्याश्रय का संबंध बना रखा है। सृजन और विनाश की जो प्रक्रिया प्रकृति में निरंतर चलती रहती है, वह बड़ी ही अद्भुत है। जंगल में एक जानवर मरता है तो उसके शरीर से अनेक जानवर पोषण प्राप्त करते हैं। हड्डियों से चिपका जो कुछ थोड़ा-बहुत बच जाता है, उस पर छोटे-छोटे कीट पलते हैं। बचे हुए हिस्से का भी विघटन हो जाता है और वह मिट्टी के साथ मिलकर उसकी उपजाऊ शक्ति को बढ़ा देता है। दूर कहीं से हवा में उड़ते हुए बीज आकर जब वहां गिरते हैं तो अपने-आप उग आते हैं। नयी सृष्टि नयी कोंपलों में व्यक्त हो उठती हैं। यह विनाश पर सृजन नहीं तो और क्या है।

प्रकृति अपना कुछ भी जाया नहीं करती। जो चीजें आदमी के लिए घृणास्पद और त्याज्य हैं, उनका भी मनुष्य के उपयोग के लिए ही प्रकृति रूपांतरण कर देती है। हम जो त्याग देते हैं, उससे भी कुछ प्राणी पोषण प्राप्त कर लेते हैं और जो बच जाता है, वह रूपांतरित होकर अन्न या फल के रूप में हमारे पास ही वापस आ जाता है। बड़ी अद्भुत व्यवस्था है। लेकिन इस व्यवस्था को आदमी ही अपनी नासमझी से नष्ट कर रहा है।

शहर बढ़ रहे हैं, जंगल कम हो रहे हैं, पेड़ कट रहे हैं। इस नाते तमाम प्राणियों का प्राकृतिक आवास खत्म हो रहा है। जाहिर है वे खुले आसमान में अपनी रक्षा नहीं कर सकते। इससे दुहरा नुकसान हो रहा है। एक तो कई पशु-पक्षी धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर हैं, दूसरे प्राकृतिक संतुलन डगमगा रहा है। इस बार की गर्मी को ही लीजिए. कितनी भयानक है, आप कल्पना नहीं कर सकते। आम तौर पर 45 डिग्री से ऊपर तापमान। कई जगहों पर इससे भी ज्यादा। सहना मुश्किल है। जब आदमी इससे परेशान है तो पशु-पक्षियों का क्या हाल होगा।

सौ साल का रिकार्ड टूट रहा है। इतनी गर्मी पहले नहीं पड़ी। गर्मी ही क्यों, पिछली ठंड ने यूरोप और अमेरिका को जमा ही दिया था। दुबई में बर्फ पड़ी, कोई सोच भी नहीं सकता। बारिश अमूमन या तो बहुत भयानक होती है या होती ही नहीं। यह सारे खतरे आदमी ने खड़े किये हैं। खास तौर से औद्योगिक रूप से विकसित देशों ने। अब वे खतरा पहचानने भी लगे हैं लेकिन पीछे लौटने में बड़ी मुश्किल है। आगे विनाश का द्वार है पर तय कर लिया है कि आगे ही बढ़ते जाना है।

पिछले दिनों बड़ी चर्चा हुई, अब गिद्ध नहीं दिखते। पर अब तो बहुत सारे पक्षी नहीं दिखते, बहुत सारे कीट-पतंग जो हम-आप बचपन में गांवों में देखते थे, अब कहां हैं। गौरेया कितनी बची हैं? भगजोगनी कहां गयी? जुलाहे कहां हैं? बतखें कितनी बचीं? अगर हम इनके बारे में नहीं सोचेंगे तो हमारे जीवन के बारे में प्रकृति भी नहीं सोचेगी, यह साफ-साफ समझ लेने की जरूरत है।

रविवार, 30 मई 2010

नजर एटवी के जाने का मतलब



(शाहिद नदीम द्वारा प्रस्तुत)

शऊर फिक्रो-अमल दूर-दूर छोड़ गया, वो जिंदगी के अंधेरों में नूर छोड़ गया.
नजर एटवी साहब बिना किसी को खबर किये चुपचाप रुखसत हो गए. हम सबको आंसू बहाने का भी मौका नहीं दिया. पता नहीं कितने लोग होंगे जिनको कई सप्ताह  तक खबर नहीं हुई. मीडिया भी अब साफ-सुथरे, इमानदार और नेक इंसानों की मौत की परवाह नहीं करता, इसीलिए  उनके जाने की खबर एटा के अख़बारों में भले ही छप कर रह गयी हो, पर बड़ी खबर नहीं बन सकी. यह  उलाहना इसलिए  मुनासिब लग रहा है क्योंकि वे  केवल अच्छे इन्सान ही नहीं, उर्दू-हिंदी और हिन्दुस्तानी के एक बड़े अदीब थे, चमकते शायर थे. उनके जाने से हिन्दुस्तानी जुबान और अदब का जो नुकसान हुआ है, वह कभी पूरा नहीं हो सकता. उर्दू मुशायरों पर वे लगातार ३५ सालों से छाये हुए थे. विदेशों से भी उन्हें मुशायरों में बुलाया जाता था. वे खुद भी अदबी गोष्ठियां और मुशायरे करते रहते थे और हमेशा इस बात का ख्याल रखते थे कि  उसका मयार और संजीदगी कायम रहे. उनकी अपनी शायरी के क्या कहने. उसमें समाज और मुल्क के मुस्तकबिल के चिराग रोशन थे. उन्होंने कुछ समय तक लकीर नाम से एक अख़बार भी निकाला. उर्दू जुबान की जो खिदमत उन्होंने की, उसकी कितनी भी तारीफ की जाय काम होगी.
नजर एटवी का जन्म २८ फरवरी १९५३ को एटा के हाता प्यारेलाल में हुआ था. उनका बचपन का नाम शमसुल हसन था. उनके पिता अब्दुल लतीफ़ सिविल कोर्ट में काम करते थे. प्रारंभिक शिक्षा आर्य विद्यालय एटा में हुई. एटा से ही उन्होंने बी ए किया. पहले उनकी दिलचस्पी  फिल्मों में थी. १९७२ में वे उर्दू शायरी की ओर  मुड़े और बहुत जल्दी वहां अपना बेहतर मुकाम बना लिया.
अभी  उम्र भी क्या थी. यही कोई ५६  साल. यह भी कोई जाने की उम्र है. अभी तो उनसे समाज को, शायरी को बहुत कुछ हासिल होना था. वह एक मई २०१० का मनहूस दिन था, जो उन्हें हमसे छीन ले गया. बुखार आया और चढ़ता ही गया. रक्तचाप कम होता गया और वे बचाए नहीं जा सके.  इतने वक्त तक उनके जाने की खबर एटा से आगरा तक दो सौ किलोमीटर भी नहीं पहुंची. पहुंची भी तो कुछ ऐसे लोगों के पास रही, जिन्होंने दूसरों से शेयर नहीं किया. उनकी याद में लोग बैठे नहीं, एक गोष्ठी तक कायदे से नहीं हुई. समाज और अदब के लिए जीने-मरने वालों की क्या इतनी ही कद्र यह समाज करता है? बड़े अफसोस की बात है. इतने कम समय में भी उन्होंने बहुत लिखा, बहुत काम किया, पर वह सब भी पता नहीं अब शायरी के प्रेमियों तक पहुँच पायेगा  या नहीं. एक संग्रह जरूर उनके नाम साया हुआ है. उसका उन्वान है, सीप. उनके लिए यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी कि उनके कलाम लोगों तक पहुंचें. सीपी से नजर साहब की तीन गजलें यहाँ पेश हैं-

१.
तूने चाहा नहीं हालात बदल सकते थे
मेरे आंसू तेरी आँखों से निकल सकते थे.

तुमने अल्फाज की तासीर को परखा ही नहीं
नर्म लहजे से तो पत्थर भी पिघल सकते थे

तुम तो ठहरे ही रहे झील के पानी की तरह
दरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे

क्यूँ बताते उन्हें सच्चाई हमारे रहबर
झूठे वादों से भी जो लोग पिघल सकते थे

होठ सी लेना ही बेहतर था किसी का
लबकुशाई से कई नाम उछल सकते थे

क़त्ल इन्साफ का होता है जहाँ शामो-सहर
ऐसे माहौल में हम किस तरह ढल सकते थे

डर गए हैं जो हवाओं के कसीदे सुनकर
वो दिए तुमने जलाये नहीं, जल सकते थे

हादसे इतने जियादा थे वतन में अपने
खून से छप के भी अख़बार निकल सकते थे

२.
तेरे लिए जहमत है मेरे लिए नजराना
जुगनू की तरह आना, खुशबू की तरह जाना

मौसम ने परिंदों को यह बात बता दी है
उस झील पे  खतरा है, उस झील पे मत जाना

मैंने तो किताबों में कुछ फूल ही रखे थे
दुनिया ने बना डाला कुछ और ही अफसाना

जब मैंने फसादों की तारीख को दुहराया
रोती मिली आबादी हँसता मिला वीराना

खाई है कसम तुमने वापिस नहीं लौटोगे
कश्ती को जला देना जब पार उतर जाना

चेहरे के नुकूश इतने सदमों ने बदल डाले
लोगों ने मुझे मेरी आवाज से पहचाना

३.
उनकी यादों का जश्न जारी है
आज की रात हम पे भारी है

फासले कुर्बतों में बदलेंगे
होंठ उनके दुआ हमारी है

अब बहुत हंस चुके मेरे आंसू
कहकहों  अब तुम्हारी बारी है

मुझसे ये कह के सो गया सूरज
अब चरागों की जिम्मेदारी  है

सिर्फ मीजाने-वक्त है वाकिफ
आसमाँ से जमीन  भारी है

जिक्र जिसका नजर नजर है नजर
उस नजर पर नजर हमारी है.

शुक्रवार, 28 मई 2010

बंदूकों की नाल से सत्ता नहीं निकलेगी

फिर एक बार नक्सलियों ने सत्ता को चुनौती दी है। मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के ट्रैक पर धमाका करके 65 लोगों की जान ले ली है। नक्सलियों के समर्थक बुद्धिजीवी उनका पक्ष लेते हुए कहते हैं कि समस्या के मूल में जाना होगा, समझना होगा कि वे आखिर बंदूक उठाने को मजबूर क्यों हुए। क्या वे बता सकते हैं कि इन हत्याओं से आदिवासियों की, गरीबों की समस्याएं हल हो जायेंगी? क्या इस तरह नक्सली बहुसंख्य देशवासियों की सहानुभूति खो नहीं रहे हैं? यह सर्वहारा के कल्याण का दर्शन है या निरा पागलपन?

मार्क्सवाद अपने सैद्धांतिक चेहरे में पूरी तरह मानवीय दिखता है क्योंकि वह शक्तिसंपन्न वर्ग के हाथों शोषण के शिकार लोगों के हक की बात करता है, वह तमाम असुविधाओं में जिंदगी बसर करने वाले मजदूरों, किसानों, दलितों और गरीबों की बात करता है। यह सही है कि मौजूदा व्यवस्था गरीब को और गरीब तथा अमीर को और अमीर बनाने का औजार बन गयी है लेकिन केवल इसलिए किसी को निर्दोषों की हत्या की आजादी नहीं मिल सकती।

माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है और माओवादी नक्सली जानते हैं कि माओ का प्रयोग अभी असफल नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें पूरा भरोसा है कि वे बंदूक और बारूद की ताकत से एक न एक दिन हिंदुस्तान की सत्ता पर कब्जा कर लेंगे। वे शायद इस बात पर नहीं सोचते कि दार्शनिक माओ और शासक माओ में कितना अंतर था? क्या चीन में क्रांति के बाद सत्ता सर्वहारा के हाथ में आयी? क्या वहां सचमुच सामाजिक बराबरी आ पायी? सच तो यह है कि जब तक क्रांति नहीं होती है तब तक तो सर्वहारा के शासन की बात की जाती है, गरीबों के अधिकार की बात की जाती है लेकिन एक बार सत्ता हाथ में आते ही सारे अधिकार मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सिमट जाते हैं, विरोध और असहमति की आजादी छीन ली जाती है, किसी एक प्रभुतासंपन्न तानाशाह या समूह की तानाशाही के हाथ में मनमानी ताकत आ जाती है। सर्वहारा मुंह ताकता रह जाता है।

हिंदुस्तान के नक्सलियों को यह भी नहीं दिखायी पड़ता कि चीन ने किस चालाकी के साथ संभावित उथल-पुथल से बचने के लिए अपनी सत्ता की गाड़ी पूंजीवादी समाजवाद के रास्ते पर मोड़ दी। चीन की समृद्धि देखकर यह अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि वहां के सत्तानायकों में उदारता आ गयी है, वे अपने किसी भी विरोधी के प्रति न सिर्फ परम अनुदार हैं, बल्कि निर्मम और क्रूर भी हैं। तिब्बत में क्या किया उन्होंने? अपने ही राज्य शिनजियांग में क्या किया उन्होंने? क्या सत्ता में आकर किसान या सर्वहारा इतना कसाई हो सकता है?

छिपकर लोगों पर हमला करना और उन्हें मार देना, इसमें कौन सा शौर्य है। यह पागल, अंधी और बेवजह हत्याएं क्या नक्सलियों के लिए सत्ता के द्वार खोल देंगी? इस समस्या को इतना बिकराल बनाने में सरकारों की उदासीनता जितनी जिम्मेदार रही है, उतनी ही जिम्मेदार देश में एक खास किस्म के बुद्धिजीवियों द्वारा नक्सलियों को दिया जा रहा समर्थन भी है। क्रांति ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों के लिए एक फैशन बन गयी है। गरीबों के हित की बात करना कोई गुनाह नहीं है, उनके हको-हुकूक के लिए लड़ना भी कोई अपराध नहीं है लेकिन क्या केवल इस नाते कि सरकारों ने गरीबों के लिए अपेक्षा के अनुरूप काम नहीं किया, निर्दोष और निरपराध नागरिकों तथा अदने सरकारी मुलाजिमों की हत्या करने का उन्हेंं अधिकार दिया जा सकता है? वे यह नहीं सोचते कि यह स्वतंत्रता उन्हें नक्सलवादियों के डर से नहीं दी गयी है बल्कि यह लोकतंत्र के बीजमंत्र की तरह उन्हें अपने आप मिली हुई है। वे यह भी जरूर जानते होंगे कि सर्वहारा के शासन में इस तरह की छूट नहीं मिलती।

बेहतर यही होगा कि पहले जनपक्षधरता के छद्म की आड़ में जनाकांक्षाविरोधी संग्राम में जुटे लोगों से बातचीत करने की पूरी कोशिश की जाय। जरूरत हो तो इस काम में उनके समर्थक दार्शनिक बुद्धिजीवियों को भी लगाया जाय। फिर भी बात न बने तो उन्हें खदेड़ दिया जाये, वे लड़ते हैं तो उन्हें नष्ट करने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए। इसी में गरीबों का, आदिवासियों का, जनता का, सरकार का और देश का, सबका भला है। परंतु भविष्य में वे गलतियां जरूर सुधार ली जायं, जिनकी वजह से नक्सलियों को देश के हृदयभाग में इतनी दूर तक अपने पांव पसारने का मौका मिला था।

बुधवार, 26 मई 2010

जल्दी मौत चाहता है अफजल

क्या कालकोठरी में होना मौत से भी ज्यादा भयानक है? अफजल गुरु को तो ऐसा ही लगता है। वह कई साल से मौत के इंतजार में जेल में बंद है। उसकी दया याचिका पर राष्ट्रपति को फैसला करना है, पर इसमें जल्दी नहीं हो पा रही है। इस मामले को लेकर काफी राजनीतिक बहस भी हुई। कांग्रेस सरकार पर जानबूझकर देर करने का विपक्ष ने आरोप लगाया। कहा गया कि सरकार इस बात से डर रही है कि इससे कहीं मुसलमान नाराज न हो जाय। इस आरोप में कितनी सचाई है यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि कांग्रेस सरकार का कहना है कि मामला बहुत संवेदनशील है और जो भी विलंब हो रहा है, प्रक्रियागत कारणों से हो रहा है।
यह बात समझ में नहीं आती कि भारत के स्वाभिमान और सत्ता के प्रतीक संसद पर हमला करने के आरोपी को अगर मौत की सजा दी जाती है तो इससे मुसलमान क्यों नाराज होगा? ऐसा सोचना तो एक तरह से मुसलमानों की राष्ट्रभक्ति पर संदेह करने जैसा है। मुसलमान भी इस देश को अपनी जन्मभूमि मानता है, इसके प्रतीकों पर हमला उसे भी उतना ही मर्माहत करेगा, जितना हिंदुओं को या इस देश में रहने वाली किसी भी कौम को। यह सच है कि इस्लाम की गलत व्याख्या करके भाारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने वालों के बहकावे में आकर अनेक मुसलमान युवकों ने आतंकवाद का रास्ता अपनाया है लेकिन इससे पूरी कौम को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। ऐसे में नहीं लगता कि कांग्रेस को इस बात का डर होगा कि ंमुसलमान इससे नाराज हो जायेंगे।

जो भी हो लेकिन इस विलंब ने अफजल गुरु को तोड़ दिया है। किसी आदमी को अकेले दीवारों में कैद करके रखना, उसे किसी से मिलने न देना, किसी से बात न करने देना, उसे बाहरी दुनिया से काट देना एक तरह से उसके सार्वजनिक जीवन की मौत ही तो है। उसे रोज-रोज मरना पड़ता है। मौत की सजा तो एक सेकेंड में प्राण हर लेती है लेकिन काल कोठरी तो रोज मारती है। जो पीड़ा अफजल ने अपने वकील के माध्यम से व्यक्त की है, वह बताती है कि वह इस कैद से ऊब गया है, वह अपने जीवन की निरर्थकता से हताश हो गया है। उसकी यह हताशा आतंकवादियों के लिए एक गहरा संदेश है।

एक खतरनाक कैदी को जेल में इस तरह अकेले कैद रखने में सरकार को बहुत धन खर्च करना पड़ता है लेकिन आतंकवादियों को तोड़ने के लिए यह सजा मौत से भी कारगर है। तिल-तिल कर मरना बहुत ही यातना देता है। वह जीतेजी मार देता है। देश के दुश्मनों को यही सजा मिलनी चाहिए। अफजल ने जो किया, उसका खामियाजा तो उसे भुगतना पड़ेगा। अब इस मामले में सरकार ने भी प्रक्रिया तेज कर दी है और उम्मीद की जानी चाहिए कि बहुत जल्द अफजल को इस यातना से मुक्ति मिल जायेगी। वह जो चाहता है, वही होगा।

मंगलवार, 25 मई 2010

हां, राठौर की सजा बढ़ गयी

समाज में अपराधियों की कमी नहीं है लेकिन लोग शांति से जीना चाहते हैं। कोई नहीं चाहता कि उसका ऐसे लोगों से पाला पड़े, जिन्होंने अपराध को अपनी जीवन-शैली के रूप में स्वीकार कर लिया है। अपराधी जब केवल अपराधी होता है, तब उससे मुकाबला करना आसान हो जाता है। क्योंकि तब पूरा समाज इस मुहिम में साथ खड़ा नजर आता है। भौतिक रूप से भले कोई सामने न आये लेकिन जब भी कोई आदमी समाज के दुश्मनों से जूझता है तो लोग भीतर ही भीतर उसके लिए प्रार्थना तो करते ही हैं।

दिन पर दिन भीरु होते समाज में अभी इतनी जान बाकी है तो भला समझिये। पुलिस, प्रशासन भी देर-सबेर ऐसी मुहिम का साथ देता ही है। परंतु अगर वह अपराधी सरकारी तंत्र में हो, पुलिस में हो, प्रशासन में हो तो बहुत मुश्किल हो जाती है। कोई साथ नहीं आना चाहता, कोई पहल नहीं करना चाहता। कौन अपनी जान सांसत में डाले? और ऐसा अपराधी अपने पद, अपनी हैसियत, अपने रसूख का इस तरह इस्तेमाल करता है कि सीधे उसकी संलिप्तता उजागर होती ही नहीं। एसपीएस राठौर ने यही किया।

अभी कुछ ही महीने पहले रुचिका का मामला जब सुर्खियों में आया था तो कितनी सारी कहानियां मीडिया में उछलीं थीं। इन कहानियों ने राठौर को एक क्रूर खलनायक के रुप में सबके दिमाग में ठूस दिया था। किस तरह उसने रुचिका के भाई को उत्पीड़ित कराया, किस तरह उसने रुचिका को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया, किस तरह उसने पूरे परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया, उन्हें मकान बेचकर भाग जाने को मजबूर कर दिया।

मीडिया की पक्षधरता ने आखिरकार पूरी व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था। केंद्र सरकार तक हिल गयी और उसे कई महत्वपूर्ण फैसले करने पड़े। राठौर को मिले पदक छीन लिये गये। सीबीआई अदालत के निर्णय के बाद बाहर निकलते हुए उसके चेहरे पर जो विजय दर्प की मुस्कान उभरी थी, उसने कितना बवाल कराया था, सबको याद है। तब सभी यही अंदाज लगा रहे थे कि इस खलनायक को बड़ी सजा जरूर मिलेगी, कम से कम उम्र कैद तो होगी ही। परंतु तब भी उसकी वकील पत्नी जिस तरह के दावे ठोंक रही थी, वह अनायास नहीं था।

वह जानती थी कि उसके पति ने जो भी कराया है, उसके बहुत कम सबूत छोड़े हैं। अब जब सत्र अदालत ने राठौर को सजा सुनायी है तो इस सचाई को समझना कठिन नहीं रह गया है। कुल 18 महीने कैद की सजा। फिर भी यह सीबीआई अदालत द्वारा सुनाई गयी सजा की तीनगुनी है। यह समझा जाना चाहिए कि उसकी सजा बढ़ा दी गयी है। हालांकि अभी राठौर को आगे अपील करने का पूरा अवसर है लेकिन अगर उसे डेढ़ साल भी कैद काटनी पड़ी तो यह उस जैसे सुविधाभोगी आदमी के लिए एक दुस्वप्न की तरह होगी।

असल में ऐसे सफेदपोश अपराधियों की सजा समाज को खुद निश्चित करनी चाहिए। लोग ऐसे लोगों का संपूर्ण बहिष्कार कर सकते हैं। समाज से अलगाव की यंत्रणा बहुत कठिन होती है और यह किसी भी कैद से कई गुना भयानक होती है। राठौर को जेल की रोटी कब तोड़नी पड़ेगी, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन समाज तो उसकी सजा तुरंत शुरू कर सकता है। अभी से, आज ही से।

सोमवार, 24 मई 2010

धैर्य का इम्तेहान न लें

मनमोहन सिंह अभी आप को भूले नहीं हैं। उनको याद हैं आप सब। उन्हें याद है कि इसी जनता ने उन्हें कुर्सी सौंपी है। उन्हें याद है कि जनता महंगाई से बहुत परेशान है। जीवन कठिन हो गया है। चादर छोटी हो गयी है। लोग पांव ढंकते हैं तो सिर बाहर आ जाता है और सिर ढंकते हैं तो पांव खुल जाता है। देशवासियों का क्या दोष?

बड़ों की, अमीरों की, धनपतियों की बात नहीं कर रहा परंतु गरीब और मध्यवर्ग का मानुष तो वैसे ही परेशान रहता है। घर चलाना, बच्चों को पढ़ाना कोई आसान काम नहीं रहा। एक ईमानदार जिंदगी के लिए बहुत मुश्किल है। इसीलिए वे बेचारे तो हमेशा इसी कोशिश में रहते हैं कि जितनी बड़ी चादर हो, उतना ही पांव पसारें लेकिन अगर कोई उनकी चादर ही फाड़ने पर उतारू हो तो वे क्या करें। महंगाई ने यही तो किया। खाने-पीने के सामान से लेकर कपड़े, तेल, साबुन, बच्चों की किताबें, सबकी कीमतें बढ़ गयीं। छोटे दुपहिया से चलने वालों की मुश्किल तब और बढ़ गयी, जब पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये गये।

आम आदमी एक तो महंगाई से त्रस्त था, दूसरे मनमोहन सरकार के मंत्री उसके घाव पर अपने जले-भुने बयानों का नमक छिड़कते रहे। कोई कहता कि उसके पास जादू की छड़ी नहीं है, जो छू दे और महंगाई नीचे उतर आये। कोई कहता उसे क्या मालूम महंगाई कब कम होगी, वह कोई ज्योतिषी तो है नहीं। अरे भाई, किस बात के मंत्री हो, जब तुम्हें कुछ भी नहीं पता, जब तुम कुछ भी नहीं कर सकते। अब क्या प्रधानमंत्री ज्योतिषी हैं जो उन्होंने कह दिया है कि दिसंबर तक महंगाई पर काबू कर लेंगे?

चलो इस तरह उन्होंने बहुत लंबा समय जनता से मांग लिया है। अगर उस समय भी महंगाई नीचे नहीं उतरी तो कोई न कोई वाजिब कारण तो होगा ही। जनता को पूरी ईमानदारी से बता दिया जायेगा कि महंगाई क्यों काबू में नहीं आ पायी। मनमोहन सिंह से इमानदारी की तो उम्मीद कर ही सकते हो। कई राज्यों में नक्सली सरकारों को परेशान किये हुए हैं, उन पर भी काबू करना है। वह भी कर लेंगे। बस आप थोड़ा धैर्य रखिये। जनता के पास और अस्त्र क्या है? धैर्य रखना और चुपचाप सरकारों और मंत्रियों की गैरजिम्मेदारी का खामियाजा भुगतना, जनता के ये दो महान कर्तव्य हैं और वह कहां इन्हें निभाने में कोई चूक करती है।

यह सरासर छल है, अन्याय है, प्रशासनिक नियंत्रण के अभाव का परिणाम है, समय से उचित और माकूल निर्णय न ले पाने का अंजाम है। आखिर इसका दुष्परिणाम जनता क्यों भुगते? सरकार को यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिए कि इस तरह के वादे, बहकावे बहुत लंबे समय तक नहीं चलते। जनता धैर्य तो रखती है, पीड़ाएं चुपचाप तो सहती है लेकिन समय आने पर वह ठोकर भी मारती है। और उसकी ठोकर झेलना बड़े-बड़ों के वश की बात नहीं होती। इसलिए एक नेक सलाह मानें तो आम आदमी के धैर्य का इम्तेहान न लें।

प्रेम की नगरी में प्रेम की बोली

 भोजपुरी में पढ़ें 
आगरा में दो दिन का विश्व भोजपुरी सम्मेलन संपन्न हुआ। हमारे देश में हजारों बोलियां बोली और समझी जाती हैं। जो लोग जिन बोलियों में अपने को व्यक्त करते हैं, उनके पूर्वजों द्वारा इकट्ठा किये गये समस्त ज्ञान का भंडार उन बोलियों में सुरक्षित रहता है। ये बोलियां हमारी ज्ञान परंपरा की वाहक हैं। वैश्वीकरण का खतरा तमाम अभावों के बावजूद अपनी बोली और संस्कृति को जीने वाले गरीब ग्राम्यांचलों पर बढ़ रहा है। गांव को बाजार की तरह देखने वाले उन्हें उनकी समस्त सांस्कृतिक सत्ता के साथ निगल जाने को तैयार हैं। हमारे लिए यह एक बड़ा सांस्कृतिक संकट है। शायद लंबी गुलामी से भी भयानक। इसी पृष्ठभूमि में 22-23 मई को आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भारत के अलावा मारीशस, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया समेत कई देशों से भोजपुरी के विद्वान और साहित्यकार ताज की नगरी में मिले। ब्रजभाषा की छांव में इस सम्मेलन का अपना विशेष महत्व समझा जायेगा।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन केवल भोजपुरी के संकट पर केंद्रित नहीं रहा बल्कि सभी बोलियों पर मंडराते संकट को उजागर करने और उसके लिए सबको उठ खड़े होने का संदेश देने में भी कामयाब हुआ। इस बात पर एकराय दिखी कि भोजपुरी की शब्द संपदा और उसके साहित्य को समृद्ध किया जाय। पहली बात तो यह कि भोजपुरी का अपना शब्दकोश तैयार किया जाना चाहिए। भोजपुरी के शब्दों में जो अथर्संपन्नता और सामर्थ्य है, वह दुनिया की शायद ही किसी भाषा में हो, इसलिए उनका संरक्षण जरूरी काम है। बिना देर किये भोजपुरी का संपूर्ण शब्दकोश तैयार किया जाना चाहिए।

  इसके साथ ही ज्यादा से ज्यादा प्रतिभासंपन्न रचनाकार भोजपुरी में लिखें। भोजपुरी समर्थ होगी अपने लेखकों की रचनाओं के अलावा देश और विदेश की दूसरी भाषाओं के अच्छे साहित्य की उपलब्धता से। हिंदी, बांग्ला, तमिल, मराठी, उड़िया, कन्नड़ के अलावा अंग्रेजी, रसियन तथा अन्य विश्व भाषाओं के बड़े लेखकों, कवियों को भोजपुरीभाषी अगर अपनी भाषा में पढ़ पायें, तो भोजपुरी से नयी पीढ़ी को भी जोड़े रखना संभव हो पायेगा।

मारीशस की सरिता बुधू को वह दिन बेतरह याद आया, जब कोलकाता से पहला जहाज बिहार के मजदूरों को लेकर रवाना हुआ था। कलकतवा से चलल बा जहजिया, बयरिया रे धीरे बहो। उन गिरमिटिया मजदूरों के साथ गीता, रामायण या यूं कहें कि पूरी भोजपुरी संस्कृति जहाज पर सवार हुई थी। वे अपनी मेहनत, अपनी कर्मनिष्ठा भी ले गये। यही कारण था कि वे मजूर वहां हुजूर बन गये, वे गिरमिटिया वहां गवर्नमेंट बन गये। भोजपुरी अब भी मारीशस, सूरीनाम, टोबागो, ट्रीनीडाड में बोली जाती है लेकिन जैसा भोजपुरियों का सबसे घुलमिल जाने का आचरण रहा है, वैसे ही अलग-अलग देशों में जाकर भोजपुरी भाषा ने भी वहां की स्थानीय भाषाओं के तमाम शब्द आत्मसात कर लिये, उन भाषाओं को भी अपने शब्द दिये। भारत के भोजपुरीभाषियों को उनसे सबक लेना चाहिए। भोजपुरी को उन शब्दों से परहेज नहीं करना चाहिए, जो दूसरी भाषाओं के होकर भी उनके लोकमानस में गहरे उतर गये हैं।

 सम्मलेन के अंतिम दिन भोजपुरी मां की सेवा में समूची जिंदगी होम कर देने वाले साहित्यकार और भोजपुरी आन्दोलन को निरंतर संगठित रखने में अपना सर्वस्व निछावर कर देने वाले पांडेय कपिल को सेतु सम्मान दिया गया।  भोजपुरी के समर्थ रचनाकार और पाती के संपादक अशोक द्विवेदी तथा भोजपुरी गीतों के सुकुमार गायक डा. कमलेश राय का मानना है कि  पांडेयजी का सम्मान इस सम्मेलन की एक बड़ी उपलब्धि है. इससे भोजपुरी के लिए लड़ने वालों का  उत्साह बढेगा.