सोमवार, 24 मई 2010

प्रेम की नगरी में प्रेम की बोली

 भोजपुरी में पढ़ें 
आगरा में दो दिन का विश्व भोजपुरी सम्मेलन संपन्न हुआ। हमारे देश में हजारों बोलियां बोली और समझी जाती हैं। जो लोग जिन बोलियों में अपने को व्यक्त करते हैं, उनके पूर्वजों द्वारा इकट्ठा किये गये समस्त ज्ञान का भंडार उन बोलियों में सुरक्षित रहता है। ये बोलियां हमारी ज्ञान परंपरा की वाहक हैं। वैश्वीकरण का खतरा तमाम अभावों के बावजूद अपनी बोली और संस्कृति को जीने वाले गरीब ग्राम्यांचलों पर बढ़ रहा है। गांव को बाजार की तरह देखने वाले उन्हें उनकी समस्त सांस्कृतिक सत्ता के साथ निगल जाने को तैयार हैं। हमारे लिए यह एक बड़ा सांस्कृतिक संकट है। शायद लंबी गुलामी से भी भयानक। इसी पृष्ठभूमि में 22-23 मई को आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भारत के अलावा मारीशस, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया समेत कई देशों से भोजपुरी के विद्वान और साहित्यकार ताज की नगरी में मिले। ब्रजभाषा की छांव में इस सम्मेलन का अपना विशेष महत्व समझा जायेगा।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन केवल भोजपुरी के संकट पर केंद्रित नहीं रहा बल्कि सभी बोलियों पर मंडराते संकट को उजागर करने और उसके लिए सबको उठ खड़े होने का संदेश देने में भी कामयाब हुआ। इस बात पर एकराय दिखी कि भोजपुरी की शब्द संपदा और उसके साहित्य को समृद्ध किया जाय। पहली बात तो यह कि भोजपुरी का अपना शब्दकोश तैयार किया जाना चाहिए। भोजपुरी के शब्दों में जो अथर्संपन्नता और सामर्थ्य है, वह दुनिया की शायद ही किसी भाषा में हो, इसलिए उनका संरक्षण जरूरी काम है। बिना देर किये भोजपुरी का संपूर्ण शब्दकोश तैयार किया जाना चाहिए।

  इसके साथ ही ज्यादा से ज्यादा प्रतिभासंपन्न रचनाकार भोजपुरी में लिखें। भोजपुरी समर्थ होगी अपने लेखकों की रचनाओं के अलावा देश और विदेश की दूसरी भाषाओं के अच्छे साहित्य की उपलब्धता से। हिंदी, बांग्ला, तमिल, मराठी, उड़िया, कन्नड़ के अलावा अंग्रेजी, रसियन तथा अन्य विश्व भाषाओं के बड़े लेखकों, कवियों को भोजपुरीभाषी अगर अपनी भाषा में पढ़ पायें, तो भोजपुरी से नयी पीढ़ी को भी जोड़े रखना संभव हो पायेगा।

मारीशस की सरिता बुधू को वह दिन बेतरह याद आया, जब कोलकाता से पहला जहाज बिहार के मजदूरों को लेकर रवाना हुआ था। कलकतवा से चलल बा जहजिया, बयरिया रे धीरे बहो। उन गिरमिटिया मजदूरों के साथ गीता, रामायण या यूं कहें कि पूरी भोजपुरी संस्कृति जहाज पर सवार हुई थी। वे अपनी मेहनत, अपनी कर्मनिष्ठा भी ले गये। यही कारण था कि वे मजूर वहां हुजूर बन गये, वे गिरमिटिया वहां गवर्नमेंट बन गये। भोजपुरी अब भी मारीशस, सूरीनाम, टोबागो, ट्रीनीडाड में बोली जाती है लेकिन जैसा भोजपुरियों का सबसे घुलमिल जाने का आचरण रहा है, वैसे ही अलग-अलग देशों में जाकर भोजपुरी भाषा ने भी वहां की स्थानीय भाषाओं के तमाम शब्द आत्मसात कर लिये, उन भाषाओं को भी अपने शब्द दिये। भारत के भोजपुरीभाषियों को उनसे सबक लेना चाहिए। भोजपुरी को उन शब्दों से परहेज नहीं करना चाहिए, जो दूसरी भाषाओं के होकर भी उनके लोकमानस में गहरे उतर गये हैं।

 सम्मलेन के अंतिम दिन भोजपुरी मां की सेवा में समूची जिंदगी होम कर देने वाले साहित्यकार और भोजपुरी आन्दोलन को निरंतर संगठित रखने में अपना सर्वस्व निछावर कर देने वाले पांडेय कपिल को सेतु सम्मान दिया गया।  भोजपुरी के समर्थ रचनाकार और पाती के संपादक अशोक द्विवेदी तथा भोजपुरी गीतों के सुकुमार गायक डा. कमलेश राय का मानना है कि  पांडेयजी का सम्मान इस सम्मेलन की एक बड़ी उपलब्धि है. इससे भोजपुरी के लिए लड़ने वालों का  उत्साह बढेगा.



1 टिप्पणी:

  1. सभी मुद्दे सार्थक चिंतन और उन पर अमल चाहते हैं। इसी के बल पर भाषाओं और बोलियों को कायम तथा नए नए सोपानों तक पहुंचाया जा सकेगा।

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