सोमवार, 3 मई 2010

दिल क्यों है परेशां?

बेनाम से इक ख़ौफ से दिल क्यों है परेशा
जब तय है कि कुछ वक्त से पहले नहीं होगा

शहरयार साहब जब यह बात कहते हैं तो इस पर सोचने का मन करता है। यह सच है या नहीं पर लोग ऐसा ही कहते हैं। वक्त से पहले कुछ भी नहीं मिलता। हर मुलाकात का, हर बात का, हर खयाल का वक्त तय है। तकदीर का एक-एक पन्ना वक्त ही लिखता है। फिर दिल क्यों हो परेशां?

अगर यह सच है तब तो हमें केवल वक्त का इंतजार करते रहना चाहिए। जब उसने पहले से तय कर रखा है कि किसे, कब, क्या मिलना है तो बेवजह भाग-दौड़ का क्या मतलब, ख्वाब बुनने का क्या फायदा? तो क्या जो आलसी बनकर बैठा रहेगा, उसके लिए भी वक्त कुछ अच्छे सपने हकीकत की जमीन पर उतार सकता है, बिना कुछ किये केवल इंतजार से भूख मिट सकती है, प्यास जा सकती है? क्या वक्त खुद-ब-खुद भोजन-पानी का प्रबंध कर सकता है? एक कवि ने कहा है-
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम
दास मलूका कह गये सबके दाता राम

दास मलूका की बात सच मान लें तो सारी दुनिया का कारोबार रुक जायेगा। जब राम को ही सब करना है। किसी को खाना देना है, किसी को भूखा रखना है तो फिर आदमी की मेहनत का क्या? तुलसीदास भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं--
होइहि वहि जो राम रचि राखा
को करि तर्क बढ़ावहि शाखा

जो राम ने रच रखा है, वही होगा। बेकार तर्क करने का कोई फायदा नहीं। राम ने जब सब पहले ही तय कर दिया और उसमें कोई फेर-बदल नहीं हो सकता तो कोई अपना पांव क्यों दुखाये, क्यों सोचे, क्यों भागे?

नहीं निरा भाग्यवाद सही नहीं है। इसका मतलब कुछ और है। भविष्य अज्ञात है, कल क्या होगा, किसी को मालूम नहीं, कोई बता भी नहीं सकता। जो भविष्य बताने का दावा करते हैं, वे लोगों को धोखा देते हैं, उनकी परेशानियों का लाभ उठाते हैं। यही अनिश्चितता मनुष्य को सक्रिय रखती है, कुछ करते रहने को प्रेरित करती है।

हम देखते हैं कि कई बार हम बहुत अच्छा करते हैं लेकिन परिणाम उतना अच्छा नहीं आता, कई बार हम उदास मन से ऐसा सोचकर काम करते हैं कि यह तो हो ही नहीं सकता, लेकिन वह चमत्कारिक ढंग से बहुत अच्छा हो जाता है। हताशा तब होती है, जब हम अपनी मेहनत के अनुकूल परिणाम नहीं हासिल कर पाते।

यहीं वक्त की महत्ता सामने आती है। उसकी महत्ता सीमित है। असल में हम जब यह मान लेते हैं कि क्या होगा, उस पर हमारा अधिकार है, तभी कठिनाई आती है। तभी वक्त बीच में आ खड़ा होता है। परिणाम पर हम अपना अधिकार वक्त के आगे कई बार साबित नहीं कर पाते और हताश हो जाते हैं।

यहां एक बात समझने की है। वह यह कि हमें केवल कर्म का अधिकार है। करने के लिए हम पूरी तरह आजाद हैं। क्या करना है, यह हमें ही तय करना होता है। पर क्या होगा, इस पर हमारा पूरा अधिकार नहीं हो सकता। फिर क्या करें कि हताशा से बचे रहें। अपना काम करते रहें पर जो परिणाम आये, वह जैसा भी हो, उसे वैसा ही स्वीकार करें और आगे अपने काम में जुट जायें। जब कर्म की निरंतरता जीवन का हिस्सा बन जायेगी, तब परिणाम के प्रति भी एक निश्चिंतता का भाव पैदा हो जायेगा। यह मनस्थिति कभी हताश नहीं होने देगी। फिर वक्त या भाग्य की चिंता भी खत्म हो जायेगी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सही लिखा आपने कि"अपना काम करते रहें पर जो परिणाम आये, वह जैसा भी हो, उसे वैसा ही स्वीकार करें और आगे अपने काम में जुट जायें। जब कर्म की निरंतरता जीवन का हिस्सा बन जायेगी, तब परिणाम के प्रति भी एक निश्चिंतता का भाव पैदा हो जायेगा। यह मनस्थिति कभी हताश नहीं होने देगी। फिर वक्त या भाग्य की चिंता भी खत्म हो जाएगी"
    यही तो जीवन मूल फलसफा है।

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