मंगलवार, 4 मई 2010

आइये ग़ज़ल सुनें

कहीं जाना है मुझे. जल्दी  में हूँ लेकिन सोचा आप से कुछ बतियाता चलूँ. जब वक्त बहुत  कम हो तो जो चीज सबसे ज्यादा मन को पसंद आती है, वो है ग़ज़ल. लीजिये दो गजलें पेश कर रहा हूँ. शायर किसी परिचय का मोहताज नहीं है. बड़ा नाम है जनाब मुनव्वर  राणा का, आप जानते होंगे. उनकी दो गज़लें पेश हैं---आइये सुनें

१.
जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर एक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता  निकलता है

डरा धमका के तुम हमसे  वफा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पांव का कांटा निकलता है

जरा सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर इक चाँद है जो शब् में भी तनहा निकलता है

किसी के पास आते हैं तो दरिया सूख जाते हैं
किसी की एड़ियों  से रेत में चश्मा निकलता है

फ़जां में घोल दी है नफरतें अहले-सियासत ने
मगर पानी कुंएं से आज तक मीठा निकलता है

जिसे भी जुर्मे-गद्दारी में तुम सब क़त्ल करते हो
उसी की जेब से क्यों मुल्क का झंडा निकलता है

 दुआएं माँ की पहुँचाने को मीलों-मील जाती है
कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है

२.
भरोसा मत करो सांसों की डोरी टूट जाती है
छतें महफूज रहतीं हैं हवेली टूट जाती है

मुहब्बत भी अजब शय है की जब परदेश में रोये
तो फौरन हाथ की एक-आध चूड़ी टूट जाती है

कहीं कोई कलाई एक चूड़ी को तरसती है
कहीं कंगन के झटके से कलाई टूट जाती है

लड़कपन में किये वादे की कीमत कुछ नहीं होती
अंगूठी हाथ में रहती है मंगनी टूट जाती है

किसी की प्यास के बारे में उससे पूछिये जिसकी
कुँए में बाल्टी रहती है डोरी टूट जाती है

कभी एक गर्म आंसू काट देता है चटानों  को
कभी एक मोम के टुकड़े से छैनी टूट जाती है

4 टिप्‍पणियां:

  1. मुन्नवर राना जी के तो हम फैन हैं साहब..आभार इस गज़ल को लाने का.

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  2. बेहद सुंदर ग़ज़लें.
    बहुत पसंद आयीं.

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  3. "दुआएं माँ की पहुँचाने को मीलों-मील जाती है
    कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है"
    मुनव्वर जी के एक एक शेर तो लाखों के हैं। उनकी गजलें पढाने के लिये शुक्रिया।

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