शनिवार, 8 मई 2010

मंज़िल तक

सुबह हो  गयी है. उठने और चल पड़ने का वक्त आ गया है, पर कहाँ, किसलिए औए क्यों? इन्हीं  सवालों की छानबीन  करते कुछ शब्द------

जो लीक पर

चलते हैं
वे पहुँचते हैं
दूसरों द्वारा तलाशी
गयी मंज़िल तक

वे सिर्फ़ चलना जानते हैं
अनुकरण करना
उनकी अपनी
कोई मंज़िल नहीं होती

जो लीक से हटकर
चलते हैं मगर
सिर्फ़ चलते हैं
चलने के लिए
कहीं पहुँचने के लिए नहीं
वे नहीं पहुँचते कहीं भी

और जो लीक छोड़कर
चलते हैं पर
ध्यान रखते हैं
मंज़िल का भी

सिर्फ़ वे ही पहुँच पाते हैं
अपने शिखर तक
अपनी मंज़िल तक

1 टिप्पणी:

  1. लीक से हटकर चलना और मंजिल का भी ध्यान रखन ...
    बात तो गौर करने की है
    मगर सबके वश में कहाँ ...
    प्रोत्साहित करती अच्छी कविता ...!!

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