हर देशवासी चाहता है कि अपने देश के गौरव, उसकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच न आये। भले ही वह स्वयं देश के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाता हो, अपने निजी कारोबार में व्यस्त रहता हो लेकिन देश तो सबके दिल में बसा होता है, रगों में धड़कता रहता है। और फिर जो मेहनत हम अपने निजी कामों में करते हैं, अपना कारोबार चलाने में, अपनी संस्थाएं मजबूत करने में, अपना उद्योग बढ़ाने में और इसी तरह के अपने अन्य कामों में जो ऊर्जा हम लगाते हैं, वह भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से देश की बेहतरी में योगदान जैसा ही होता है। हर किसी के श्रम से देश आगे बढ़ता है, विकसित होता है। इसलिए दुनिया में उसकी जो भी छवि बनती है, उसे जो भी सम्मान मिलता है, उसका श्रेय हर उस व्यक्ति को जाता है, जो मेहनत, लगन, ईमानदारी और जिम्मेदारी से अपने दायित्व का निर्वाह करता है।
यह अपेक्षा केवल आम नागरिकों से ही नहीं की जानी चाहिए, उन लोगों से भी की जानी चाहिए, जो सरकारों में बड़े ओहदों पर बैठे हुए हैं। उन्हें तो और भी जिम्मेदार होना चाहिए, और भी पारदर्शी एवं जवाबदेह होना चाहिए। पर ऐसा दिखता नहीं। पिछले दिनों एक मंत्री महोदय की छुट्टी हो गयी। वे अक्सर भूल जाते थे कि वे सरकार में मंत्री हैं और मंत्री के नाते उन्हें अपनी लक्ष्मणरेखा का ध्यान रखना है। शशि थरूर कई बार विरोधी नेताओं की भाषा में बोलने लगते थे। वे जब रौ में होते थे तो अपने नेताओं की, कांग्रेस पार्टी के इतिहास पुरुषों की भी आलोचना करने से नहीं चूकते थे। कई बार उन्होंने सरकार को परेशानी में डाला और आखिरकार मनमोहन सिंह को उनसे तौबा करनी पड़ी।
उन्हीं के रास्ते पर जयराम रमेश भी चल पड़े हैं। वे अपनी चीन यात्रा के दौरान खुद को रोक नहीं सके, चीनियों के स्वागत सत्कार से इतने भाव-विह्वल हो गये कि बीजिंग के प्रवक्ता की तरह बोलने लगे। उन्होंने अपने देश की बुराई कर डाली, भारत सरकार के गृह मंत्रालय की खिंचाई कर डाली। यह कतई अपमानजनक है। इसे कोई भी देशवासी स्वीकार नहीं कर सकता। हम सब अपनी कमियां जानते हैं, उनके लिए जिम्मेदार लोगों को भी पहचानते हैं लेकिन यह समस्याएं हमारी हैं, इनसे हम देश के भीतर लड़ते रहेंगे, किसी बाहरी की मदद मांगने नहीं जायेंगे।
मंत्री महोदय को क्या इतनी साधारण सी बात समझ में नहीं आयी। आखिर चीन में ये सब बातें करके वे क्या हासिल करना चाहते थे? आत्मप्रशंसा, थोड़ी सी वाहवाही? विदेशी जमीन पर अपने देश के मुंह पर कालिख पोतकर क्या उन्हें ऐसा नहीं महसूस हुआ कि यह कालिख तो खुद उनके ही चेहरे पर पुत गयी है? अगर नहीं तो ऐसे आत्मविस्मृत, आत्महीन और स्वाभिमानशून्य व्यक्ति को केंद्र में मंत्री बने रहने का क्या अधिकार है?
मनमोहन सिंह सरकार के कई मंत्री मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के आदर्श को भी भंग करते रहते हैं, अपना काम ठीक से करने की जगह दूसरों के काम-काज में ताक-झांक करते रहते हैं, उनकी कमियां ढूढते रहते हैं। यह बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना बात है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। अगर जरूरी हो तो इन बड़े समझे जाने वाले लोगों को भी समय-समय पर राष्ट्र की गरिमा और सम्मान के अलावा उनकी जिम्मेदारियों और जवाबदेहियों पर ज्ञान दिया जाय, उन्हें यह भी बताया जाय कि कहां, क्या बोलना है, क्या नहीं। और फिर भी अगर कोई इन मर्यादाओं को तोड़ता है तो उसको बख्शा नहीं जाना चाहिए।
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