शनिवार, 8 मई 2010

अशोक रावत की गजलें

अशोक रावत गजलगोई में एक जाना-पहचाना नाम है। बकौल सोम ठाकुर, अशोक रावत उन गजलकारों में से एक हैं, जिनकी गजलों में युगीन दुर्व्यवस्था, दिग्भ्रमित राजनीति और संस्कारहीन मानसिकता को नितांत नवीन, चिंतना-सम्मत सहजात भाषा सौष्ठव के साथ कभी व्यंग्य, कभी विक्षोभ और कभी शुभाशंसा के रूप में पूर्ण परिपक्वता के साथ शब्दायित किया गया है। रावतजी मथुरा के गांव मलिकपुर में नवंबर 1953 में जन्मे। पेशे से इंजीनियर होते हुए भी उन्होंने गजल को अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में चुना। उनकी रचनाओं का साहित्य जगत में खूब स्वागत हुआ, उन्हें बहुत सराहा गया। देश की सैकड़ों पत्रिकाओं में उनकी गजलें प्रकाशित हुईं। हिंदी गजल यात्रा-2, लोकप्रिय हिंदी गजलें, गजलें हिंदुस्तानी, नयी सदी के प्रतिनिधि गजलकार, धूप आयी सीढ़ियों तक, कोई दावा न फैसला कोई, आरम्भ जैसे कई संकलनों में उनकी गजलें शामिल की गयी हैं। थोड़ा सा ईमान नाम से उनका एक गजल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। यहां उनकी कुछ बेहतरीन गजलें पेश हैं।

1.
दुश्मनों से भी निभाना चाहते हैं
दोस्त मेरे क्या पता क्या चाहते हैं

हम अगर बुझ भी गये तो फिर जलेंगे
आँधियों को ये बताना चाहते हैं

साँस लेना सीख लें पहले धुएं में
जो हमें जीना सिखाना चाहते हैं

ये जुबां क्यों तल्ख हो जाती है जब हम
गीत कोई गुनगुनाना चाहते हैं
2.
रोज कोई कहीं हादसा देखना
अब तो आदत में है ये फजां देखना

उन दरख्तों की मुरझा गयी कोपलें
जिनको आँखों ने चाहा हरा देखना

रंग आकाश के, गंध बारूद की
और क्या सोचना, और क्या देखना

जाने लोगों को क्या हो गया हर समय
बस बुरा सोचना, बस बुरा देखना

उसको आना नहीं है कभी लौटकर
फिर भी उसका मुझे रास्ता देखना

एक जोखिम भरा काम है दोस्तों
इस समय ख्वाब कोई नया देखना
3.
सारा आलम बस्ती का जंगल जैसा ही है
बदला क्या है आज, सभी कुछ कल जैसा ही है

बरसें तो जानूं ये धब्बे, बादल हैं, क्या हैं
रंग-रूप तो इनका भी बादल जैसा ही है

गमलों में ही पनप रही है सारी हरियाली
बाकी सारा मंजर तो मरुथल जैसा ही है

मंत्रों का उच्चारण हो, या पूजा हो या जाप
मंगल ध्वनियों में भी कोलाहल जैसा ही है

हाथ लगाने पर ही होता है सच का आभास
आँखों देखा तो सब कुछ मखमल जैसा ही है

कितना सच है अब भी गंगा के पानी का स्वाद
सरकारी लेखों में गंगाजल जैसा ही है
4.
थोड़ी मस्ती थोड़ा सा ईमान बचा पाया हूं
ये क्या कम है मैं अपनी पहचान बचा पाया हूं

मैंने सिर्फ उसूलों के बारे में सोचा भर था
कितनी मुश्किल से मैं अपनी जान बचा पाया हूं

कुछ उम्मीदें, कुछ सपने, कुछ महकी-महकी यादें
जीने का मैं इतना ही सामान बचा पाया हूं

मुझमें शायद थोड़ा सा आकाश कहीं पर होगा
मैं जो घर के खिड़की रोशनदान बचा पाया हूं

इसकी कीमत क्या समझेंगे ये सब दुनिया वाले
अपने भीतर मैं जो इक इंसान बचा पाया हूं

खुशबू के अहसास सभी रंगों ने छीन लिए हैं
जैसे-तैसे फूलों की मुस्कान बचा पाया हूं
5.
तय तो करना था सफर हमको सवेरों की तरफ
ले गये लेकिन उजाले ही अंधेरों की तरफ

मील के कुछ पत्थरों तक ही नहीं ये सिलसिला
मंजिलें भी हो गयीं हैं अब लुटेरों की तरफ

जो समंदर मछलियों पर जान देता था कभी
वो समंदर हो गया है अब मछेरों की तरफ

साँप ने काटा जिसे उसकी तरफ कोई नहीं
लोग साँपों की तरफ हैं या सपेरों की तरफ

शाम तक रहती थीं जिन पर धूप की ये झालरें
धूप आती ही नहीं अब उन मुडेरों की तरफ

कुछ तो कम होगा अंधेरा, रोज कुछ जलती हुई
तीलियां जो फेंकता हूं मैं अंधेरों की तरफ

अशोक रावत जी से संपर्क करना चाहते हों तो फोन करें...09458400433

धन्यवाद, डा. त्रिमोहन तरल जी को। उन्होंने साहित्य पहेली हल कर दी। इसलिए कि उनके लिए यह कभी पहेली रही ही नहीं। अच्छे कवि होने के नाते वे स्वयं अशोक रावत जी के अंतरंग मित्र हैं। फिर भी वे वक्त पर बात-बेबात पर पहुंचे, इसके लिए उन्हें बधाई।

3 टिप्‍पणियां:

  1. एक से बढकर एक! आभार इन खूबसूरत ग़ज़लों को पढवाने के लिये।

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 09.05.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. बहुत अच्छी गजलें हैं रावत जी....बधाई

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