रविवार, 22 मई 2011

अविश्वास के साये में

कभी-कभी सोचता हूं क्या कुछ लोग ऐसे मिल सकते हैं, जिन पर भरोसा कर सकूं, पूरा भरोसा कि वे जो कह रहे हैं, वैसा कर दिखायेंगे, कि वे विश्वास पर खरा न उतरने की जगह मिट जाना पसंद करेंगे, कि वे कभी अविश्वास का कोई मौका नहीं आने देंगे, कि वे ऐसी किसी भी परीक्षा में धैर्य नहीं खोयेंगे और अंतिम दम तक लड़ेंगे अपनी पहचान के लिए, अपने वादे के लिए, अपने संकल्प के लिए। कई बार यह सवाल मैं खुद से भी करता हूं कि क्या मैं स्वयं ऐसा हो पाया हूं, क्या मैं दूसरों के विश्वास पर खरा उतरने लायक बन सका हूं, क्या मुझमें इतना दम है कि मैं लड़ सकूं दूसरों के विश्वास को सच साबित करने के लिए? इन सवालों के उत्तर दे पाना इतना आसान नहीं है।

विश्वास का संकट इस सदी के सबसे बड़े संकट के रूप में उभरा है। लालच ने आदमी को धूर्त और पाखंडी बना दिया है। अक्सर लोग दूसरों के सामने पहेलियों की तरह प्रस्तुत होते हैं। बूझ सको तो बूझ। जिसकी वाणी से मानस के उपदेश झर रहे हों, मर्यादा और मानवता के मंत्रों से जिसके शब्द दीप्त लगते हों, जो रावणी ताकतों के विनाश का संकल्प घोष कर रहा हो, जरूरी नहीं कि वह अपने असली रूप में वैसा ही हो। हो सकता है कि इस तरह वह अपने विरोधियों की पहचान करने की कोशिश कर रहा हो, ताकि उनसे सजग रह सके, बच सके। हो सकता है, इस तरह वह मनुष्यता के समर्थक, उसे धारण करने वालों से छल कर उनका इस्तेमाल करना चाह रहा हो, उनका शोषण करने को उद्यत हो। किसी आदमी के भाल पर टंगे त्रिपुंड, जिह्वा से निसृत होते परमार्थ छंद और शरीर पर धवल वस्त्रों की सादगी से यह समझना भूल होगी कि  वह समाज का, देश का भला करना चाहता है, वह धोखा नहीं देगा या वह ठग नहीं होगा। हाल के कुछ महीनों में सवा अरब जनता को ठगने वाले कुछ बड़े वंचक लोगों के सामने आये हैं, सबने देखा कि वे अपने हाव-भाव से, अपनी वेश-भूषा से, अपने बात-व्यवहार से कितने महान तपस्वी दिख रहे थे लेकिन अपने कर्म से कितने छली, कितने थेथर, कितने उचक्के-बदमाश।

कबीर ने अपने जमाने में ऐसे लोगों की जमकर धज्जियां उड़ायी, अति समर्थ ढोंगियों के चेहरे से नकाब खींचने में तनिक संकोच नहीं किया, शक्तिशाली साम्प्रदायिक रुढ़ियों और प्रवंचनाओं को भी अपने मजबूत, सतर्क और कठोर प्रहार से ढहा देने की कोशिश की पर जब वे नहीं रहे तो उन्हीं के नाम पर वही सब होने लगा, जिसका उन्होंने जीवन भर विरोध किया। कबीर आज भी वैसे ही चमकते दिखायी पड़ते हैं,वैसे ही बोलते, चीखते नजर आते हैं पर कौन सुनता है। सैकड़ों वर्षों से जिन लोगों को वे ललकारते रहे हैं, आज वही लोग बिना खुद को बदले उनकी आवाज में आवाज मिला रहे हैं। क्या करें कबीर? अक्सर आप भी देखते होंगे, बेईमान और भ्रष्ट नेताओं को जनता के सामने अपने प्रवचनों में दुष्यंत के चमकदार शेर उछालते हुए। सिर्फ हंगामा ख़ड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए या कौन कहता है कि आसमां में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों या इसी तरह का कुछ और। वे थोड़ी देर के लिए अपने मरे और सड़ते हुए इरादों को बदलाव की चमकीली गूंज से ढंक लेना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनका अपना चेहरा विश्वसनीय नहीं है, गंदा है, उसके पहचाने जाने का डर है। कभी-कभी यह ओढ़ी हुई चमक भी काम आ जाती है। 

ध्यान से देखें तो बुरा और बेईमान भी भला, नेक और ईमानदार दिखना चाहता है। इसलिए कि अभी भी जनता ऐसे चेहरे पसंद करती है। आमतौर पर कोई भी आदमी सही रास्ता छोड़ना नहीं चाहता, जब तक कोई बड़ी मजबूरी न हो। घटिया तरीकों से समाज में समर्थ हैसियत बना चुके लोग और गिनती के लोगों के स्वार्थसाधन में जुटी व्यवस्था आमजन को मजबूर करती है, बेईमान बनाती है। और एक बार इसका लाभ मिल गया तो लोभ बढ़ता जाता है। आदमी भटकता है और फिर भ्रष्टाचार के गहरे दलदल में डूबता चला जाता है। विश्वास अब भी अमूल्य है। आप अगर लोगों को इस बात का विश्वास दिला सकें कि आप भरोसे लायक हैं, तो आप अकेले नहीं होंगे। अपने-आप कारवां बनता जायेगा। परंतु यह एक दिन का काम नहीं है, यह लंबी लड़ाई है, इसमें बार-बार परीक्षाएं देनी पड़ सकती हैं, संदेह की सूली पर चढ़ना पड़ सकता है। आप में धैर्य होगा, साहस होगा, ऊर्जा होगी, सहज और सकारात्मक सोच होगी तो कामयाबी जरूर मिलेगी। देश के, समाज के, साथियों के भरोसे पर खरे उतरने के लिए अग्निपरीक्षाएं तो देनी ही पड़ेंगी। कोई ममता सहज ही नहीं पैदा होती, कोई बदलाव आसानी से नहीं आता। पहले विश्वास दिलाना होता है, खुद को मिटाना होता है तब लोग आप के लिए मिटने को तैयार होते हैं।           

6 टिप्‍पणियां:

  1. घटिया तरीकों से समाज में समर्थ हैसियत बना चुके लोग और गिनती के लोगों के स्वार्थसाधन में जुटी व्यवस्था आमजन को मजबूर करती है, बेईमान बनाती है।

    शुक्रिया।

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  2. विश्‍वास ही सबसे बड़ी चीज है। खुद में और दूसरों में भी।

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  3. विश्‍वास
    जो
    अविश्‍वास में भी मौजूद है
    पूरे विश्‍वास की तरह।

    भरोसा
    भरो साहब
    भर जाए तो
    उबल उबल जाए।

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  4. ये भरोसा बना पाना और उसको बनाये रख पाना ही तो कठिन है ....

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