गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

उत्तेजक चर्चा के दबाव में प्रयाग शुक्ल

रीता भदौरिया के दूसरे काव्य संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर वीरेन डंगवाल, प्रयाग शुक्ल, कवयित्री स्वयं, अशोक चक्रधर और असगर वजाहत
पानी पर गांठ के बहाने कविता और समाज पर गहन चर्चा

शेष नारायण सिंह की कलम से 
 हिन्दी की कवयित्री रीता भदौरिया के दूसरे काव्य संग्रह 'पानी में गाँठ' के लोकार्पण का अवसर। दिल्ली में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के सभागार में राजधानी की नामचीन अदबी और शहाफी शख्सीयतों की मौजदगी में रीता की कविताओं पर चर्चा हुई और कविता और समाज पर भी। रीता के संवेदन और उनकी रचना प्रतिभा में वक्ताओं को प्रचुर संभावना दिखी। सदारत कर रहे थे हिन्दी के बड़े कवि प्रयाग शुक्ल। अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने समय की कमी और विमर्श से उपजे उत्तेजनात्मक तनाव के बीच से निकलने की सधी हुई कोशिश की पर समय पर तनाव भारी रहा। संक्षिप्ति की वकालत के बावजूद विस्तार से बचना उन जैसे बड़े साहित्यकार के लिए भी संभव नहीं हो सका और सच तो यह है कि यही श्रोताओं के लिए आनंददायक रहा। वे चिंतित थे कि खराब और अच्छी कविता की बात की गयी, वे चिंतित थे कि कलावाद पर आक्षेप किया गया। उन्होंने जवाब भी दिया, बहुत स्पष्ट और साफ सुथरा, कलावाद कोई बुरी चीज नहीं है, मैं स्वयं कलावादी हूँ। कला लोक से ही जन्मती है, लोक के साथ ही आगे बढ़ती है। न तो कविता के पाठक कम हुए हैं, न ही अच्छी कविताएं। सारे देश में घूमा हूँ मैं, हर जगह कविता लिखने वाले, उसके प्रशंसक मिले हैं। मैं कविता को अच्छी या बुरी कविता के रूप में नहीं देखता हूँ, मेरे लिए कविता सिर्फ अच्छी होती है, कोई ज्यादा अच्छी, कोई कम अच्छी।
इस मौके पर प्रयाग शुक्ल के अलावा असगर वजाहत, वीरेन डंगवाल, अशोक चक्रधर, आलोक पुराणिक, कमर वहीद नकवी, राम कृपाल सिंह, प्रभात कुमार राय, प्रो. जय प्रकाश द्विवेदी, कुलदीप तलवार, कुलदीप कुमार, राम बहादुर राय, सुभाष राय, वंशीधर मिश्र, मिथिलेश कुमार सिंह, मधु जोशी आदि मौजूद थे। दिल्ली के  हिन्दी पत्रकारों का भी बड़ा जमावड़ा था। असगर वजाहत ने कविता के महत्व का प्रतिपादन करते हुए उसे जीवन और समाज के परिष्कार का सबसे बड़ा औजार कहा। उन्होंने कहा कि जब आप को सभी छोड़ दें, कोई भी आप की मदद करने वाला न हो, तब भी कविता अपनी समूची ताकत और संभावना के साथ आप के साथ होगी। असगर साहब ने कहा कि कविता समानांतर समाज बनाती है, वह समाज को दिशा देने, उसे विकसित करने का काम करती है। वीरेन डंगवाल ने कहा कि बीते सालों में कविता का जनतांत्रीकरण हुआ है और बहुत से नए कवि सामने आये हैं। सुभाष राय और बंधीधर मिश्र ने कुछ खतरों की ओर संकेत किया और कविताप्रेमियों और आलोचकों को आगाह करने की कोशिश की। राय का मानना था कि बहुत सारे नकली या अखबारी अनुभवों पर कविताएं लिखी जा रहीं हैं। कवि वहां उपस्थित नहीं है, जहाँ से वह रचना का कथ्य उठाता है। अनुभव की प्रामाणिकता के अभाव में कविता भी संदेह के घेरे में है। कवि सम्मान, पुरस्कार के पीछे भाग रहा है, अच्छी कविताएं भी आ रहीं हैं लेकिन खराब कविताएं ज्यादा आ रहीं हैं। मिश्र ने धूमिल के उद्घरण देते हुए कहा कि कविताएं सार्थक वक्तव्य होने की जगह केवल वक्तव्य हो जाएँ तो वे अपना प्रभाव खो देंगी। उन्होंने दृष्टिसम्पन्नता के अभाव की ओर संकेत किया।
मधु जोशी ने विस्तार से रीता भदौरिया के संघर्ष और संवेदनात्मक विकास की चर्चा की और उनकी कविताओं को सराहा। जोशी ने कहा कि रीता की कविताओं में विचारों की निरंतरता है। अशोक चक्रधर ने रीता के संग्रह से कुछ कविताओं का पाठ किया और उनमें  एक वृहत्तर संभावना की चर्चा करते हुए कहा कि पुस्तक पर अलग से बात होनी चाहिए। इस मौके पर कवयित्री रीता ने स्वयं की रचना प्रकिया के बारे में बताया और कहा कि उन्होंने जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। अपने विभाग के कामकाज के सिलसिले में ऐसे लोग भी देखे हैं जिनके पास दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं है और ऐसे लोग भी, जिनके पास अपनी संपत्ति को ठिकाने लगाने का तरीका नहीं सूझ रहा। उन्होंने विकास का भ्रम और अंतिम पड़ाव, अपने कविता संग्रह से दो कविताएं पढ़कर सुनाई। गोष्ठी का संचालन जाने-माने रंगकर्मी और पत्रकार अनिल शुक्ल ने किया।

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

सरकार और सरोकार नहीं बाजार बदल रहा है स्त्री को


देवेन्द्र
कथाकार 

गांव में रहते हुए बचपन से ही हमने जिस समाज को देखा है उसमें स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक कहना लहीम-शहीम नागरिकता पर गोबर करना होगा। मनुष्य की योनि में जन्म लेकर परम्पराओं के नाम पर स्त्री के साथ जिस बर्बर सामाजिक आचरण को व्यवहार की तरह अपनाया जाता है, उसे देखते हुए ‘नागरिक’ शब्द जैसा कोई सम्बोधन मुझे उपयुक्त नहीं लगता। हमारी भाभियां जब ब्याह कर आयी थीं, तब उनकी उम्र बमुश्किल चौदह-पन्द्रह साल रही होगी। उन्हें अहरिहार्य प्राकृतिक जरूरतों के निबटान हेतु सुबह से पहले और शाम के देर बाद मुंहअंधेरे में तय समय के लिए बिना खिड़कियों और बिना झरोखों वाले सीलबंद कमरों की घुटन से बाहर निकलने दिया जाता था।

चाहे कैसी भी तबीयत हो, हजारों साल से वे एक ऐसी व्यवस्था की अभ्यस्त थीं कि पूरे दिन पेट में मैला ढोती रहती थीं। सेक्स तथा सहवास की कामना के कारण ही नहीं,दिन-दोपहर प्राकृतिक निबटान की अपरिहार्य जरूरतों के कारण भी वे चरित्रहीन समझी जा सकती थीं। हमारा घर बनिस्बत गांव का सम्पन्न घर था फिर भी ऐसी कोई व्यवस्था हमने नहीं देखी सुनी थी। पच्चीस-तीस साल तक एक पर एक चार-पांच बच्चों को पैदा कर चुकने के बाद उनकी सांसों में पायरिया भर जाता था, दांत हिलने लगते थे। चालीस साल औरतों के बूढ़ी होने की उम्र होती थी। धूमिल की एक कविता है-


‘प्रजातंत्र का वह कौन सा  नुस्खा है कि
 जिस उम्र में मेरी मां का चेहरा चकत्तियों की थैली है
 उसी उम्र की मेरी पड़ोसन के चेहरे पर
 मेरी प्रेमिका जैसा लोच है।’ 


सम्पन्न माने जाने वाले हमारे गांव में ढेर सारे जानवर थे, जिनके बीमार होने से हमारी खेती लड़खड़ा जाती। आर्थिक ढांचा गड़बड़ा जाता है। उनका समय से इलाज कराया जाता। उनके डाक्टर गांवों में आते थे। लड़कियों के लिए कहा जाता था-बिन ब्याहे बेटी मरे, ठाढ़ी ऊख बिकाय, बिन मारे वैरी मरे, ई सुख कहां समाय।


पूरे परिवार की मुसीबत यही लड़कियां ब्याह कर ससुराल भेजी जाती थीं। उन्हें बाकायदा विवाह नामक संस्था में बांधकर लाया जाता था। वे पिता, भाई और मां की जिम्मेदारियों से बेदखल कर दी जाती थीं। परम्परागत जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं होता था। मां, बाप, भाई, बहन, सहेलियां, गांव के पेड़, तालाब और दूर-दूर तक फैले-फू ले सरसों के खेत, बेलों और बकरियों से होकर जो रिश्ते उनके जीवन में घुस आये थे, उनकी महक, उनकी स्मृतियों को ससुर के घर में खुरच-खुरच कर बेरहमी से मिटा दिया जाता था।

हजारों साल से वे इसे यातना की तरह नहीं उत्सव की तरह स्वीकार करती थीं। सिर्फ स्थूल और थोड़ी प्रताड़नाओं से ही नहीं, जबकि यह भी उनकी दिनचर्चा के अभिन्न अंग थे, उन्हें किस्सों, कहानियों से बहला-फुसलाकर पालतू बनाया जाता था। उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक या दास कहना दासों की स्थिति का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करना होगा क्योंकि दासों को अपने मालिक, जिसने उन्हें गुलाम बना रखा है,से नफरत करने, लड़ने का नैतिक हक प्राप्त होता है लेकिन उन लड़कियों के जेहन में यह पाप की तरह होता था।

उनकी मुक्ति का पथ कब्रगाह के डरावने और सुनसान अंधेरे में जाता था। चूल्हे और चौके की धीमी आंच में सींझती उन औरतों के जीवन में कोई सपना नहीं उगता था। हर महीने कई-कई कठोर व्रतों से गुजरते हुए वे अगले सात जन्मों के लिए उसी परिवेश और पति की कल्पना करतीथीं जो रोज रात को उन्हें सहवास सुख देता था और  बदले में वे बच्चा पैदा करती थीं। आंगन की  भर धूप और हवा में ही उन्हें जीना होता था।


अप्राकृतिक स्थितियों में पड़ी-पड़ी जब अक्सर वे मर जातीं तो उनके मरने को शोक और संवेदना की तरह नहीं, एक निर्जीव सूचना की तरह लिया जाता था। आज भी भारत की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और कमोबेश स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं।  सम्पन्न परिवार धीरे-धीरे शहरी मध्य वर्ग में रूपांतरित होने लगा है। जो विपन्न थे, उनकी बदहाली बेइंतहां बढ़ी है। संयुक्त परिवार का आर्थिक आधार छितरा गया है। संयुक्त परिवार और विवाह संस्था, इन दोनों की मजबूत चार दीवारी में स्त्रियों के प्रति जानवरों से भी कई गुना ज्यादा बर्बर आचरण हमारी दिनचर्या और व्यवहार में इस कदर शामिल था कि हमें अपनी क्रूरताओं का आभास तक नहीं होता था। हमारी महान संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा था यह सब। उनकी सुरक्षा, शील और मर्यादित आचरण की दुहाई देकर हम निर्विघ्न और निर्विवाद रूप से जायज काम में शिरकत करते थे। जैसे जेल के पुराने कैदी नये कैदियों के प्रति क्रूर आचरण को अपना नैतिक और भौतिक अधिकार मानते हैं, उसी तरह  घर की बूढ़ी औरतें सास या दादी के रूप में इन औरतों के लिए होती थीं। हजारों साल से उनके साथ यही होता चला आ रहा है।


इस भयानक सच्चाई के साथ-साथ एक और दिलचस्प तथ्य उस परिवेश का अनिवार्य हिस्सा था। अक्सर सुनाई पड़ ही जाता कि फ लां की बहू अपने नौकर से फंसी है। कोई देवर से तो कोई ससुर से। दो-तीन पीढ़ियों को मिलाकर किसी कुटुम्ब का इतिहास बनाया जाय तो यह लगभग हर घर की कहानी थी। परम्पराओं की लाख पहरेदारी और उन बिना झरोखों वाले बन्द कमरों के किसी सुराख से आती रोशनी में तैरते धूलकणों पर संवेदनाएं   अपने लिए रास्ता बना ही लेती थीं। असूयपश्या और योनिशुचिता के आदर्श अक्सर अपने जख्मों को छिपाकर ही बड़बोलापन करते रहते। यह असम्भव है कि जीवन हो और उसके चिन्ह पूरी तरह मिटाये जा सकें। रोशनी में तैरते धूलकणों पर वे झिलमिला ही जाते।


स्त्रीयातना का इतिहास संयुक्त परिवार की कठोर भित्ति पर अंकित था। जब कभी संयुक्त परिवार टूटता तो निर्विवाद तथ्य की तरह उसका जिम्मा औरतों पर डाल दिया जाता। संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर जाती सामाजिक संरचना स्त्री मुक्ति का सबसे निर्णायक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है। वासना के अंधेरे एकांत में रिरियाते और तड़पते पति की कायरता को क्षण-प्रतिक्षण धिक्कारते हुए चतुर सेनापति की तरह स्त्री ने अत्यन्त धैर्य पूर्वक, समय का इंतजार करते हुए कुशल रणनीतिकार  की भूमिका में यह युद्ध जीता है। वह जानती है कि अकेला होते ही मर्द कितना कमजोर और केंचुआ होता है।


परम्पराओं और दंभ की बैसाखी आखिर कितने दिनों तक उसे ताने रहेगी। उसकी शक्ति का स्रोत सीता या साबित्री नहीं, द्रोपदी होने में ही है। लाचारी,अभागापन और घुटन जितना सम्पन्न सवर्ण औरतों के जीवन में था, उतना खेतों में काम करने वाली मजदूर औरतों में नहीं होता था। जर्जर रूढ़ियों और अमानवीय मर्यादाओं की घातक पहरेदारी वहां नहीं थी। अपनी अनिवार्य दिनचर्या में वे प्रत्यक्षत: श्रम से जुड़ी हुई थीं। अपनी सीमित जरूरतों से ज्यादा कमा लेती थीं। वे किसी भी मायने में परजीवी व परिवार और समाज की दया की मुंहताज नहीं थीं। बेहद आत्मनिर्भर होने के कारण उनकी स्थिति बहुत हद तक भिन्न होती थी। वे लड़ लेती थीं। उनकी हत्याएं होती थीं। वे कुएं में कूद कर आत्महत्याएं नहीं करती थीं। कठोर श्रम से पैदा हुए उनके भीतर के आत्म विश्वास के लात खाकर हमारी गौरवशाली परम्पराएं और पूज्य परिवार उनके साथ लगभग ठीक-ठाक ढंग से ही पेश आते थे। उनकी मुसीबतें भिन्न किस्म की होती थीं। वे दूसरी बातें हैं जिनसे उन्हें रूबरू होना पड़ता था। 


स्त्री स्वतंत्रता के संदर्भ में यह तय है कि उनकी स्थिति सवर्ण मध्यमवर्गीय औरतों से बेहतर थी, जिसे उन्होंने कठोर श्रम से हासिल किया था। स्त्री मुक्ति का प्रश्न जब कभी वास्तविक गम्भीरता और सामाजिक सरोकार का प्रश्न बनेगा तो तय है कि उसकी सैद्धांतिकी और अनुभव के स्रोत वही मजदूर औरतें बनेंगी।


लैंगिक और प्राकृतिक भिन्नताओं के आधार पर लड़कियों और महिलाओं को कुछ ऐसी अनचाही स्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिनसे कभी भी किसी पुरुष को गुजरना नहीं पड़ता है। वास्तव में कभी संवेदनशील होकर पुरुष उन समस्याओं के समाधान में स्त्रियों के साथ शिरकत करेंगे, मुझे यकीन नहीं होता।


विवाह संस्था, यौनशुचिता और संयुक्त परिवार के इसी त्रिकोणीय दुष्चक्र के भीतर मरी हुई परियों के पंख छितराये पड़े हैं। इसी त्रिक ोण में हजारों साल से उनके सपनों की लाशें दफनायी जा रही हैं। इस त्रिकोण की जब तक कोई एक भुजा बची रहेगी, स्त्री मुक्ति का प्रश्न कटी पतंग की तरह अपरिहार्य रूप से बिजली के तारों पर फंसा, बेजान, फड़फड़ता रहेगा। अन्तत: बेनतीजा।


आज संयुक्त परिवार लगभग गुजरे जमाने की चीज हो गया है। लगातार फैलते जा रहे शहरी मध्यवर्ग के जीवन  में उसके लिए कोई ‘स्पेस’ नहीं है। एकल परिवार में स्त्री की भूमिका, शक्ल-सूरत और सीरत काफी हद तक बदल चुकी है। विवाह संस्था सिर्फ इस तर्क पर बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहेगी कि ‘आखिर’ इसका विकल्प क्या है? ‘यौनशुचिता’ के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता कि स्त्री जीवन में यह कितनी बनी और बची हुई है। पुरुष अपने पौरुष के दर्प में इसे हमेशा लतियाता आया है। जैसे-जैसे समाज में रोजगार के अवसर विकसित होंगे, स्त्री आत्मनिर्भर होगी, संयुक्त परिवार के आधार पर खड़ी त्रिकोण की दोनों भुजाएं जगह-जगह से चिटकने लगी हैं।

स्त्री मुक्ति के सामाजिक संघर्ष का नेतृत्व वे औरतें कत्तई नहीं करेंगी जो घूसखोर बाप की नाजायज कमाई खा-खाकर चटोर हो चुकी हैं और पति के घर में निकम्मी पड़ी-पड़ी ऊबती हुई समाज और सरोकारों से नफरत करती हैं। स्त्री मुक्ति की सामाजिक जरूरत और उसकी ऐतिहासिक पहल उनके फैशन का हिस्सा भर है, जिनकी दिनचर्चा सुबह-सवेरे घर में चौका-वर्तन, झाड़ू-पोछा करने आयी नौकरानी के साथ,कांव-कांव करते हुए शुरू होती है। ब्यूटी पार्लर और किटी पार्टी में क्लबों में अपने होने का अर्थ तलाशती इन रीतिकालीन नायिकाओं की बंजर संवेदनाओं में एक घास उगाने भर क्षमता नहीं है। एकल परिवार की इन गृहस्वामिनी को अपनी आजादी से ज्यादा पुरुष को गुलाम बनाये रखने की चिन्ता होती है। वे बराबरी के लिए नहीं वर्चस्व के लिए लालायित है।आत्मनिर्भरता किसी भी तरह की आजादी का सबसे बड़ा नैतिक तर्क होता है। वह यहां सिरे से नदारद है।



बावजूद इन सारी संभावनाओं और दलीलों के आज स्त्री बदलने की तैयारी में हैं। लड़कियां अपनी इच्छाओं को जबान और महत्वाकांक्षाओं का पंख लगाने को तत्पर है। पितृसत्तात्मक सामंती समाज के शील, संकोच और मर्यादा शायद ही अपने आवरण में उन्हें छल सकें। कानून और सरकार के बल पर नहीं बाजार के बल पर स्त्री बदल रही है। बाजार स्त्री को हजारों साल की जलालत से मुक्त कर रहा है किसी ऐतिहासिक और सामाजिक सरोकार को समझ कर नहीं, बस इसलिए कि उसे अपने फायदे के लिए नये किस्म के श्रम, नये किस्म की श्रमिक और एकदम नये किस्म के ‘प्रोडक्ट’ की जरूरत है। खतरे कम नहीं है इस राह में। लेकिन छ: फीटी साड़ी और घूंघट को कफन की तरह लपेटे समाज की टिकठी पर और कितने दिन पड़ी रहे स्त्री। हजारों साल की इस पाशविक गुलामी में आखिर ऐसी कौन दुर्दशा बची रह गयी  जिसका भय दिखाकर आप उसे बाजार के मोहक सपनों की ओर जाने से रोक लेंगे।

रविवार, 26 जून 2011

हरि अनंत हरि कथा अनंता

 हरि अनंत, हरि कथा अनंता। इस देश में जो हरि के गुन गाता है, बाबा कहलाता है, जो हरिमय हो जाता है, बापू कहलाता है। हमारे यहां न तो बाबाओं की कमी है, न ही बापुओं की। । राम देव बाबा, जयगुरुदेव बाबा, पायलट बाबा, ड्राइवर बाबा, आशाराम बापू, तमाशाराम बापू। एक ऐसा भी शख्स इस देश में हुआ, जो एक साथ महात्मा भी था, बाबा भी और बापू भी। बापू केवल अपने बच्चों का नहीं, पूरे देश का। वह था गांधी बाबा। हमारे देश में किसी न किसी बहाने इस बाबा की चर्चा होती ही रहती है। भ्रष्टाचार जितना बढ़ रहा है, रघुपति राघव राजाराम का पारायण भी उतना ही बढ़ रहा है। बलात्कार, अपहरण, लूट की घटनाएं बढ़ेंगी तो गांधी का नाम लेने वाले भी बढ़ेगे। यह गांधी का देश है। यहां हर बुराई को ढंकने के लिए गांधी को चादर की तरह तान दिया जाता है। सचाई यह भी है कि गांधी का नाम ज्यादा लिया जा रहा हो तो समझो कोई बड़ा घपला, घोटाला होने वाला है, बड़ी विपदा आने वाली है।

बाबा की बतकही का मौका मिला है तो लगे हाथ  एक और बाबा की चर्चा कर दूं। नागार्जुन बाबा। उनकी जन्मशती मनायी जा रही है। इसलिए उन पर, उनकी कविता पर बात हो रही है। उन्हीं की एक कविता है, गांधी के तीन बंदर। वैसे तो यह पूरी कविता ही उल्लेखनीय है लेकिन मेरी पसंद की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं..ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के। बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के। गुरुओं के भी गुरू बने हैं तीनों बंदर बापू के। बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के। बापू को उनके तीनों बंदर क्या बना रहे हैं? नागार्जुन बाबा ने गोल कर दिया। सोचा होगा, लोग समझदार हो गये हैं। पढ़ेंगे तो समझ ही जायेंगे। बाबा ने ये कविता बहुत पहले लिखी थी। अब तो गांधी के तीनों बंदर और भी चालाक और शातिर हो गये है। गांधी ने अपने जीवन में तमाम तरह के प्रयोग किये थे। उनके बंदर भी प्रयोगधर्मा हैं। गुरु ने सत्य के साथ प्रयोग किया, उनके बंदर असत्य के साथ प्रयोग कर रहे हैं। सफेद हो या केसरिया या किसी भी रंग की, मत पूछो, टोपी के पीछे क्या है। गांधी के बंदरों ने उनकी जीवनी बार-बार पढ़ी है। अपने जिन प्रयोगों के बारे में गांधी ने खुलकर नहीं लिखा मगर भूले-भटके अपनी चिट्ठियों में यदा-कदा जिक्र किया, बंदरों ने चोरी-चुपके उनका भी स्वाद चखा है। आखिर वे गांधी के बंदर हैं, कोई ऐरे-गैरे नहीं।

 गांधी ने पहले लंगोटी पहनी फिर प्रयोग शुरू किये। उनके बंदरों को पता है कि इसका उल्टा भी हो सकता है। अगर गांधी की तरह प्रयोग शुरू किया तो केवल लंगोटी ही बच जायेगी। असत्य के बिना सत्य का अस्तित्व नहीं। सत्य की चर्चा इसीलिए होती है, क्योंकि असत्य की सत्ता कायम है। कई बार सत्य की सत्ता की स्थापना अर्धसत्य या असत्य की ताकत से होती है। नागार्जुन बाबा की मानो तो गांधी के बंदर बड़े ज्ञानी हैं। उन्हें वाल्मीकि की कथा भी मालूम है। राम, राम नहीं आता तो मरा, मरा कहो। असत्य के साथ प्रयोग करो, सत्य का संधान अपने आप संभव हो जायेगा। जीवन में सुख हो, समृद्धि हो, ऐश्वर्य हो, यही तो चाहिए। क्या यह सत्य से मिलेगा? त्याग तो तभी संभव होगा, जब त्यागने लायक कुछ हो। इसलिए पहले अपना घर ठीक करो। छल से, कपट से, गबन से, अपहरण से, जैसे भी हो सके। बड़ी-बड़ी योजनाएं डकारनी हैं, यहां वन जी, टू जी क्या कई हंड्रेड जी लाइन में खड़े हैं।

मौका मिला नहीं कि कोयले की खदान तक निगल जायेंगे, जनता का करोड़ों रूपया अपने घर की सजावट में लगा देंगे, बचा तो रोज एक नया जूता पहनने का अरमान भी तो पूरा होना चाहिए। कीमती 365 जोड़ी तो होने ही चाहिए। प्रयोग वे अच्छे हैं जो गांधी को याद रखने लायक बनाये। खुद गांधी बनने से क्या मिलेगा। जीतेजी सत्य का नरक भोगें तो मरने के बाद कुछ चौराहों पर मूर्तियां लगने से क्या मिलने वाला। ऐसा बनो यार कि जीतेजी मूर्तियां तन जायें, उधर से गुजरो तो लगे कि तुम्हारी भी कोई सत्ता है। अहिंसा भी क्या देगी। किसी को दुखी न करें तो सुखी कैसे हो पायेंगे। जमीनें कब्जानी हैं, आलीशान घर बनाने हैं, बड़ी गाड़ियां खरीदनी हैं और कुछ स्विस बैंक में भी तो होना चाहिए। यह सब दूसरों को पीड़ित किये बिना आखिर कैसे संभव है। इसलिए गांधी के बंदर हिंसा को एक नयी प्रयोगभूमि की तरह स्वीकार कर चुके हैं। भूल जाइए कि गांधी की कांग्रेस में ही उनके बंदर मिलेंगे। गांधी की कांग्रेस भी अब रही कहां। बापू के बंदर बापू के ताऊ बन गये हैं। वे अब हर जगह हैं। उनका ब्रांड सर्वदलीय है, वे सर्वसमाज में व्याप्त हैं। जिधर जाइयेगा, उधर पाइयेगा। वे गांधी को तो बना ही रहे, सबको उल्लू बना रहे हैं, खूब खा रहे हैं और गा रहे हैं, रघुपति राघव राजाराम, सबको सन्मति दे भगवान।        

रविवार, 19 जून 2011

कासी गुरू की आत्मा

ओम तद्भवाय  नमः|   अखिलेशाय नमः |  शब्ददंडधारी स्वामी अखिलेश जी की कृपा से मेरी मुलाकात कासी गुरू की आत्मा से हुई। हालांकि वे स्वयं ई ससुरी आत्मा से बहुत परेशान दिखे। उनका अनुभव है कि यह सहृदय, दयावान, करुण, कातर सी चीज न होती तो वे अपनी मोटरबाइक से हाथ न धो बैठते। हुआ कुछ यूं कि बड़े जुगाड़ से उन्होंने बाइक खरीदी। बड़े जतन से उसे धो-पोंछ कर रखते, संभाल के चलाते। हरदम चमाचम रहती। पर एक दिन वे एक साइकिलवाले से टकरा गये। एक चला रहा था और दूसरा डंडे पर बैठा था। गुरू को पता ही नहीं चला क्या हुआ पर वे दोनों सड़क पर पसर कर खामोश हो गये। गुरू ने पहले तो भागने में ही भलाई समझी पर कुछ दूर जाकर उनकी आत्मा जग गयी। वे लौटे, सोचा बच्चों की मदद कर दें, बेचारे घायल हो गये हैं। वे बच्चों को नादान समझ रहे थे पर जैसे ही बाइक से उतरकर उनके पास आये, समूची करुणा के साथ एक को हिलाने-डुलाने की कोशिश की, दूसरा उनकी बाइक ले उड़ा। वे दौड़े मगर कुछ दूर जाकर मुंह बाकर खड़े हो गये। बाइक गयी सो गयी, यह गुरुआ की बड़ी चिंता नहीं थी, चिंता यह थी कि अगर आत्मा ऐसे ही जगी रही तो न जाने क्या-क्या अनर्थ होगा।

कासी गुरू कोई झूठ नहीं बोल रहे। एक बार मैं भी इसी आत्मा के चक्कर में जेल जाते-जाते बचा, पत्रकार न होता और पुलिस थोड़ा फेवर न करती तो या तो मेरी जमकर कुटाई हुई होती या फिर जेल की यात्रा करनी पड़ती। यह आत्मा सचमुच बहुत अनर्थकारी है। अगर आप को महान और निरापद आसन चाहिए, आप की समाज में अपना डंका पिटवाने की सदिच्छा है, सरस सुख-संपदा अर्जित करनी है, ऐश और परमभोग की आकांक्षा है तो अपनी आत्मा से तत्काल तौबा कर लीजिए, उसे दबाये रहिये या कोई खास तकलीफ न हो तो उसे मार ही दीजिए। थोड़ा कष्ट होगा क्योकि सहजावस्था में आत्मा जगी ही रहती है और किसी को जागते में मारना श्रमसाध्य ही नहीं बहुत दुखदायी भी है। परंतु शास्त्र कहते हैं कि बड़े पुण्य के लिए किंचित पाप भी करना पड़े तो बुरा नहीं है, साधारण दुख से असाधारण सुख की प्राप्ति हो सके, तो किसी भी तरह अस्वीकार्य नहीं है। सभी मानते हैं,इसलिए आप भी यह मान लें कि हर दुख अपने परिणाम में सुख ही होता है। आत्मा के चक्कर में हमारी कई पीढ़ियों ने बहुत समय नष्ट किया है, अपना तो कबाड़ा किया ही, पूरे समाज का, देश का भी कबाड़ा किया।

 यह दिखती नहीं, यह अगम्य है। नयमात्मा प्रवचनेन लभ्य, नहिं बहुश्रुतेन। न प्रवचन से मिलती है, न बहुत सुन कर कंठस्थ कर लेने से, न हठ से मिलती है, न योग से, न बलहीन को मिलती है, न बलशाली को। इतना जानकर भी कुछ लोग आत्मा को पाने के व्यर्थ प्रयास में लगे रहते हैं और कुछ कासी गुरू जैसे कभी-कभी इस दयनीय भ्रम के शिकार हो जाते हैं कि भीतर से आत्मा बोल रही है, उसकी आवाज सुनो। उसकी आवाज सुन ली तो समझो ठगे गये। आजकल जो सबसे ज्यादा आत्मा-परमात्मा की बात करते हैं, वे भीतर से समझ चुके होते हैं कि आत्मा-वात्मा जैसी कोई चीज नहीं है, पर इसे स्वार्थपूर्ति के परमधर्म की प्राप्ति के लिए विकट विराट अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। वे आत्मसाक्षात्कारसंपन्न जीव इस जगत में सबसे सुखी प्राणी हैं। वे सम्मान से बाबा कहे जाते हैं, भले ही वे अवसरानुकूल वाम-दक्षिण हो सकते हों, कभी पुरुष, कभी नारी या किन्नर का वेश धरने में किंचित संकोच न करते हों।

 उनकी योगकाया का आसनाभ्यास और उनकी रोमांच भरी रुदनाल्हादमयी नाट्य प्रस्तुति से लाखों लोगों की जड़ आत्मा थोड़ी देर के लिए जग उठती है। ऐसे बाबाओं के लिए करोड़ क्या, अरब क्या, नौ-दो-ग्यारह अरब क्या। वे निरंतर ठगात्मवत ही रहते हैं इसलिए वे अगर महिलाओं के साथ कोई अभद्रता भी करें तो भी उसे कल्याणकारी मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। आप ने अपनी आत्मा मार दी तो किसी को भी मार देना आप के लिए बहुत सहज होगा। फिर आप चोरी, ठगी, बलात्कार, हत्या से भी परे चले जायेंगे। किसी कर्म का परिणाम भुगतने की विवशता से मुक्त हो जायेंगे। हर आदमी की आत्मा अलग-अलग व्यवहार करती है, इसीलिए बड़े राजनीतिकार अक्सर अंतरात्मा की आवाज पर चुनाव की बात करते हैं। कोई जरूरी नहीं कि सबकी अंतरात्मा से एक ही आवाज उठे। अगर आत्मा एक होती तो ऐसा क्यों होता या फिर जिसने आत्मा मार डाली है या जो आत्मा के होने को स्वीकार नहीं करते, क्या वे ऐसे वक्त में निर्णय नहीं करते? इससे यह अनुमान सहज ही सही लगने लगता है कि आत्मा भी अपने अर्थ का, अपने लाभ का ध्यान रखती है। जो आत्मार्थ है, वही स्वार्थ है। अगर कासी गुरू यह अर्थ लगाते तो उनकी बाइक बच गयी होती। आप भी अगर निपट संन्यासी नहीं हैं तो जीवन में कुछ लाभ-लोभ रखना ठीक रहेगा। आत्मा के अर्थ को यानि उसकी व्यर्थता को जितना जल्दी समझ लेंगे, परमात्मा आप की उतनी ही मदद करेगा। शुभमस्तु।

रविवार, 12 जून 2011

मैं नाच्यो बहुत गुपाल

सुषमा जी नाची तो मेरा मन भी नाचने को हुआ। पता नहीं वे जानती कि नहीं पर मैं जानता हूं कि सबहिं नचावत राम गुसाई। समूचा जगत एक विशाल रंग-मंच की तरह है। हम सभी नाच रहे हैं। एक अदृश्य धागे में बंधे हुए, जिसका सूत्र किसी और के हाथ में है। एक झीने पर्दे के पीछे खड़ा वह सबको नचा रहा है। अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हमें कोई नचा रहा है। अलग-अलग हर कोई सोचता है कि वह अपने ताल पर नाच रहा है, कभी-कभी कई लोगों के मन में यह भी गुमान होता है कि वे औरों को भी नचा रहे हैं। हर कोई दूसरों को अपने इशारे पर नचाना चाहता है। यह सहज नहीं है, पर इसमें खुशी मिलती है। अगर आप लोगों को अपनी उंगली पर नचा सकें तो आप बड़े होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं। कभी-कभी लोग अपना काम निकालने के लिए भी प्रभावशाली लोगों के लय-ताल पर नाचते रहते हैं। जब अनायास बहुत खुशी मिल जाये तब भी आदमी नाच उठता है। इसके विपरीत कई बार गुस्से में भी, किसी की कड़वी बात से भी आदमी नाच उठता है।

आदिम काल से सौंदर्य पर रीझकर आदमी नाचता रहा है, सुंदरता किसी को भी नचा सकती है। इसीलिए हर काल में सुंदर स्त्रियां सबको नचाती रही हैं। इसी गुण के कारण वे बहुत आसानी से न केवल सत्ता के पास  बने रहने में कामयाब रही हैं, बल्कि सत्ता का पहिया घुमा देने में भी। आज भी दुनिया में अनेक मजबूत इरादों वाली चालाक, बुद्धिमान या खूबसूरत महिलाएं हैं, जिनके इशारे पर तमाम बड़े-बड़े लोग नाच रहे हैं। नाच के मूल में जायें तो यह नाट्य का ही रूपांतर है। भगवान शंकर आदि नट माने जाते हैं। वे जगत के कल्याण में लगे रहते हैं। वे आसानी से नहीं नाचते। पर वे जब नाचते हैं तो समूचा ब्रह्मांड नाच उठता है, धरती, सूर्य, तारे नाच उठते हैं, समुद्र अपनी फेनिल लहरों पर सवार होकर नाचने लगता है। शिव के इस नृत्य से तांडव मच जाता है।

भरत के नाट्यशस्त्र के अनुसार नाट्य शब्द में संगीत, नाटक, नृत्य, वाद्य सब कुछ शामिल है। नौटंकी भी नाट्य का ही एक रूप है। पर नाच केवल नाच है। जिसे नाचना आता है, वह भाग्यशली है। वह सबको लुभा सकता है, सम्मोहित कर सकता है। जिसे नहीं आता है, उसके लिए तो आंगन टेढ़ा है। कोई तो बहाना चाहिए। हिंदी के संत काव्य में नाच का बड़ा महत्व है। मीरा हों या सूरदास या कोई और भक्त कवि, वे अपने आराध्य के सामने नाचने में कतई संकोच नहीं करते पर वे इस तरह नाचते-नाचते अपने प्रिय को नचाने भी लगते हैं। मीरा कहती हैं, वृन्दावन में रास रचायो, नाचत बाल मुकुन्दा। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटे जम का फन्दा। भक्त नाचता है तो भगवान भी नाचने लगते हैं। रास है क्या? एक ही समय में सबके साथ कृष्ण का नाचना। असल में भक्त खुद को मिटाना नहीं चाहता। उसे भगवान का सामने होना रोमांचित करता है। इस रोमांच को वह बनाये रखना चाहता है। वह अपना कृष्ण खुद ही बन जाता है और अपने ही साथ नाचने लगता है। वही कृष्ण होता है, वही राधा। उसे समझ में नहीं आता है कि यह सब कैसे हुआ लेकिन उत्कट प्रेम में वह अपनी संपूर्ण संभावना के साथ अपने ही शरीर से बाहर खड़ा हो जाता है, खुद को ही कृष्ण के रूप में रच लेता है, अपनी कल्पना के साथ नाच उठता है।

लेकिन इस नाच के पहले भी एक नाच देखना पड़ता है। जब तक वह अपनी सत्ता से अपरिचित रहता है, कुछ पाने की होड़ में नाचता रहता है। काम-क्रोध का चोला पहनकर, विषयों की माला से लदा हुआ, निंदा की रसमयता में निमग्न, मोह के घुंघरू बांधे वह एक अलग तरह के नृत्य में मगन रहता है। लालच के ताल पर, माया का वसन पहने, लोभ का तिलक लगाये वह एक ऐसी दुनिया में नाचता रहता है, जो होती ही नहीं। भ्रम की दुनिया, अज्ञान की दुनिया। जब कभी खुद पर अपनी कृपा होती है, वह इस अंधकार से बाहर आ पाता है। जब सच समझ में आता है, वह चिल्ला पड़ता है, बहुत नाच लिया भगवान, अब इस अज्ञान से बाहर करो। जैसे ही भावात्मक गहराई से ऐसा निवेदन उभरता है, वह महारास में शामिल हो जाता है। कृष्ण के साथ नाचने लगता है, कृष्णमय हो जाता है।

यह नाचना बड़ा ही अद्भुत है। जिसे अपने ताल पर, अपने लय पर नाचना आ जाता है, जिसे अपनी सत्ता का बोध हो जाता है, जो अपने ही आईने के सामने खड़ा होकर खुद को देखने का साहस कर लेता है, उसे और नाचने की जरूरत नहीं रह जाती। जो दुनिया की सुख-सुविधाएं हासिल करने के लिए नाचते-नाचते थक गया, जिसे अहसास हो गया कि अब सिर्फ नाचना है, इस तरह नाचना है कि जीवन नृत्य में ही बदल जाये, वही इस रंग-मंच का असली नट साबित होता है, वही नटवर की शरण हासिल कर पाता है। नाचते-नाचते जब हृदय बेचैन हो जाय, मन थक जाय और बोल पड़े, अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल तो समझो काम बन गया।

मंगलवार, 31 मई 2011

ढाई आखर प्रेम का

जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फुटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कहे गियानी। कबीर के अनेक रूप हैं। कभी बाहर, कभी भीतर, कभी बाहर-भीतर दोनों ही जगह। वे सबमें खुद को ढूढते हैं, सबको अपने जैसा बनाना चाहते हैं। कभी कूता राम का तो कभी जस की तस धर दीनी चदरिया वाले व्यक्तित्व में, कभी ढाई आखर की वकालत करते हुए तो कभी बांग देने वालों और पाहन पूजने वालों, गंगा नहाने वालों को एक साथ लताड़ते हुए। कभी ज्ञानी के रूप में तो कभी अदने बुनकर के रूप में। पर हर रूप में वे कबीर ही बने रहते हैं। कबीर यानी एक समूचा आदमी। आदमी होना बहुत ही कठिन है। कबीर के जमाने में भी कठिन था। उन्होंने पहले खुद को ठीक किया। बहुत पापड़ बेले। गुरु भी किया। नाम नहीं बताते हैं। शायद गुरु की तलाश में उनकी भेंट तमाम गुरु-घंटालों से हुई, इसलिए सजग भी किया। गुरु करना मगर ठोंक-बजाकर, कहीं अंधा मिल गया तो बड़ी दुर्गति होगी। अंधे अंधा ठेलिया दुन्यू कूप पड़ंत। तुम तो अंधे-अज्ञानी हो ही, तभी तो भीतर कोई दीप जलाने वाला ढूढ रहे हो। वह भी अंधा हुआ तो? बहुत सारे अंधे मिले होंगे कबीर को भी लेकिन वे सजग थे, उनकी आंखें खुली हुई थीं, वे अपनी प्रारंभिक यात्रा में ही इतना समझ गये थे कि उजाला बंद आंखों से नहीं मिलेगा, जागते रहना होगा। जो जागेगा सो पावेगा, जो सोवेगा, सो खोवेगा।

उनका यह जागना ही उन्हें रास्ता दिखाता गया। उन्होंने अपने भीतर खुद जागना सीख लिया था। यही समझ उनकी गुरु बनी। वे अपने गुरु,अपने दीप खुद ही बने। कबीर का जागना केवल आंखें खोले रहने भर तक नहीं था। बहुत से लोग खुली आंखों में सोये रहते हैं। कुछ अपने दिवास्वप्न में मग्न तो कुछ अपने स्वार्थस्वप्न को साकार करने में निमग्न। कुछ देख कर भी नहीं देखते तो कुछ उतना ही देखते हैं, जितना देखना चाहते हैं। कुछ प्रतिरोधहीनता से ग्रस्त, मरे हुए तो कुछ हर हाल में अनीतिकारी और पाखंडी ताकतों के आगे बिछ जाने को तत्पर। धूमिल ठीक ही कहते हैं, जिसकी पूंछ उठाकर देखो, मादा ही निकलता है। ऐसे लोगों का जागना क्या और सोना क्या। जो अपने से कमजोर पर हमेशा गुर्राता हो, उसकी हथेली में आते उसके हक को भी छीन लेना चाहता हो और अपने से ताकतवर को देखते ही पूंछ दबाकर निकल जाता हो, वह जगा हुआ कैसे हो सकता है। वह तो ऐसी गहरी नींद में है कि उसने मनुष्यता ही त्याग दी है। उसने अपना एक जंगल रच लिया है और उसी में खुश है। उसे जानवर या जंगली तो कह सकते हैं, पर आदमी नहीं।

कबीर को इसी जंगल में आदमी की तलाश थी, वे जंगलपन के खिलाफ लड़ रहे थे, आज भी  लड़ रहे हैं। कबीर ने कहा, सारा ज्ञान ढाई आखर में है। यह किताबें पढ़कर नहीं समझ में आयेगा, योग करने से भी नहीं समझ में आयेगा, इसके लिए खुद को मिटाना पड़ेगा। प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहिं। प्रेम तभी कर सकोगे, जब हरि के लिए खुद को मिटा दो। तुम बने रहोगे तो हरि नहीं होगा और हरि होगा तो तुम्हारा बने रहना संभव नहीं है। यह हरि ही जल सरीखा है। भीतर भी, बाहर भी। प्रेम कर नहीं पाते हो क्योंकि तुम्हारी समझ में आता ही नहीं कि तुम्हारे भीतर, कुंभ में जो जल है, बाहर भी वही जल है। बस कुंभ को फोड़ देना है, आत्ममोह, आत्मरति और अपने लिए खुद के होने से मुक्त हो जाना है। तभी सच में दूसरों की पीड़ा समझने की सामर्थ्य जन्मेगी, तभी दूसरों का दुख समझ में आयेगा, तभी अन्याय, दमन, अत्याचार के अर्थ भी खुलेंगे और उनके प्रतिकार का भाव पैदा होगा। यही दूसरों के लिए जीना है, यही मनुष्य होना है। केवल अपने लिए तो कीड़े-मकोड़े भी जी लेते हैं, अगर कोई मनुज भी ऐसा ही करता है तो वह कीचड़ में बिलबिलाते कीड़ों से बेहतर जिंदगी कहां जी रहा है।

दूसरों के लिए जीना ही प्रेम है, दूसरों के लिए मिट जाना ही ढाई आखर की समझ है। पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंड़ित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय। जिसने दुनिया भर का दर्शन पढ़ लिया, मोटे-मोटे ग्रंथ रट लिये, अच्छा प्रवचन करना सीख लिया, वही पंडित है, यह समझ थोथी है। जिसने प्रेम का अर्थ जान लिया, प्रेम करना सीख लिया, जिसे ढाई अक्षर की समझ आ गयी, वह पंडित है। कबीर को समझना इसी प्रेम को समझना है। प्रेम का उनसे बड़ा मर्मज्ञ कोई और नहीं दिखता। वे लोगों को ललकारते हैं, डांटते-डपटते हैं तो केवल इसीलिए कि वे शर्म से ही सही अपने भीतर झांके तो सही। शायद अपने ही अनेक चेहरे एक साथ देख सकें। कबीर को इसमें कितनी सफलता मिली, इसका मूल्यांकन होता रहा है, आगे भी होता रहेगा लेकिन इतना सच तो कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता कि वे जिंदा हैं, उनका प्रेम भी जिंदा है।         

रविवार, 29 मई 2011

मलिन मीडिया में संजीवनी जैसे सहाय साहब

 निरंजन परिहार की कलम से
अम्बिकानंद सहाय
प्रभु चावला, वीर संघवी, बरखा दत्त और ऐसे ही कुछ और दलाल दोषित हो चुके दोहरे चेहरों की वजह से मीडिया की छवि भले मलीन हुई हो। लेकिन इस घनघोर और घटाटोप परिदृश्य में अंबिकानंद सहाय नाम का  एक आदमी ऐसा भी निकला, जो मलीन होते मीडिया की भीड़ में हम सबके बीच रहते हुए भी बहुत अलग और बाकियों से आज कई गुना ज्यादा ऊंचा खड़ा दिखाई दे रहा है। प्रभु चावला मीडिया में अपने आपको बहुत तुर्रमखां के रूप में पेश करते नहीं थकते थे। लेकिन रसूखदार, रंगीन और रसीले अमरसिंह के उनके सामने गें-गैं, फैं-फैं करते, लाचार, बेबस और दीन-हीन स्वरूप में करीब-करीब पूंछ हिलाते हुए नजर आते हैं। अमरसिंह धमकाते हैं, और प्रभु चावला अमरसिंह से करबद्ध स्वरूप में दंडवत होकर माफ करने की प्रार्थना करते नजर आते हैं। वही अमर सिंह अपने इन्हीं टेप में सहारा समय के तत्कालीन मुखिया अंबिकानंद सहाय और सुधीर कुमार श्रीवास्तव के नाम पर खुद को बेबस और लाचार महसूस करते नजर आते हैं। वह भी उन दिनों जब अमर सिंह की सहारा परिवीर में तूती बोलती थी।

हर सुबह मीडिया के किसी आदमी के दलाल हो जाने की खबरों के माहौल बीच यह एक बेहद अच्छी और सुकून भरी खबर है। यह साफ लगता है कि माहौल भले ही ऐसा बन गया हो कि मीडिया सिर्फ दलालों की मंड़ी बन कर रह गया है। लेकिन अंबिकानंद सहाय के रूप में दूर कहीं कोई एक मशाल अब भी जल रही है, जिसे मीडिया में मर्दानगी की बाकी बची मिसाल के तौर पर पेश किया जा सकता है।
अमर सिंह के टेप से टपकती बातों और नीरा राडिया के नजरानों के राज खुलने के बाद कइयों की भरपूर मट्टी पलीद हुई है। प्रभु चावला, वीर संघवी, बरखा दत्त और ऐसे ही कुछ और नाम इसके सबसे बड़े सबूत हैं। इन टेप के सार्वजनिक हो जाने के बाद अमरसिंह और राड़िया ने मीड़िया की इन मरी हुई ‘महान’ आत्माओं को सबके सामने नंगा करके खड़ा होने को मजबूर कर दिया है। लेकिन कोई जब औरों को नंगा करता है, तो उसके अपने शरीर पर भी कपड़े कहां बचे रहते हैं ! इसीलिए प्रभु चावला को गिड़गिड़ाने पर मजबूर करनेवाले और रजत शर्मा को अपना बुलडॉग कहनेवाले अमरसिंह सहारा समय के तत्कालीन मुखिया अंबिकानंद सहाय और सुधीर कुमार श्रीवास्तव के बारे में बात करते हुए खुद लाचारी और बेबसी के साथ हांफते हुए नजर आते हैं।

अंबिकानंद सहाय की पत्रकारीय क्षमताओं और सुधीर कुमार श्रीवास्तव की प्रबंधकीय ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सहारा समय के ये दोनों कर्ताधर्ता अमरसिंह के सामने बिल्कुल नहीं झुके। वह भी ऐसे में जब अमरसिंह सहारा इंडिया परिवार के डायरेक्टर हुआ करते थे।
आज की तारीख में तो अंबिकानंद सहाय संभवतया एकमात्र ऐसे पत्रकार हैं, जिनके बारे में बात करते हुए अमर सिंह अपने ही टेप में मान रहे हैं कि ‘सहाय साहब’ को मैनेज नहीं किया जा सकता। पूरी बातचीत में यह संकेत साफ है कि सहारा समय के संचालन और खबरों के सहित अपने कामकाज के मामले में अंबिकानंद सहाय अपनी कंपनी के डायरेक्टर अमर सिंह को किसी भी तरह के हस्तक्षेप की कोई इजाजत नहीं दे रहे थे। अंबिकानंद सहाय ने कभी भी अमरसिंह को कतई नहीं गांठा। अमरसिंह सहारा मीडिया में अपनी एक ना चल पाने की वजह से कितने परेशान थे, इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि सबके सामने सहाय साहब कहनेवाले अमरसिंह शिकायती लहजे में अभिजीत सरकार के साथ बातचीत में झुझलाहट में अंबिका सहाय कहकर अपनी भड़ास निकालते नजर आते हैं। जबकि सभी जानते हैं कि सहारा इंडिया परिवार के मुखिया सहाराश्री सुब्रता रॉय सहारा तक अंबिकानंद सहाय को सम्मान के साथ अकेले में भी सहाय साहब कहकर बुलाते हैं।

बाद में तो खैर, यह विवाद बहुत आगे बढ़ गया। अमरसिंह खुद इस टेप में कह रहे हैं कि अगर हमारी इतनी भी नहीं चलती है तो, मैंने तो चिट्ठी भेज दी है और अब मैं रहूंगा भी नहीं। इस पूरे वाकये के अपन चश्मदीद हैं। अपन अच्छी तरह जानते है कि, सहाय साहब ने सहारा से अचानक अपने आपको अलग कर लिया। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि सहाराश्री और अमरसिंह के साथ संबंधों में खराबी की वजह उनको नहीं माना जाएं। वैसे संबंधों के समीकरण का भी अपनी अलग संसार हुआ करता है। सहारा मीडिया के मुखिया से हटने के बाद भी अंबिकानंद सहाय आज भी सहाराश्री के बहुत अंतरंग लोगों में हैं। और अमरसिंह की आज सहारा परिवार में क्या औकात हैं, यह पूरी दुनिया को पता है।
सहाय साहब, आपको हजारों हजार सलाम। इसलिए कि आप दलालों के सामने कतई झुके नहीं। लेकिन मीडिया की मंडी में अंबिकानंद सहाय जैसे और कितने लोग हैं, उनको भी ढूंढ़ – ढूंढकर सामने लाने की जरूरत है। ताकि यह साबित किया जा सके कि मीडिया में अब भी मजबूत लोगों की एक पूरी पीढ़ी मौजूद है। वरना प्रभु चावला, वीर संघवी, बरखा दत्त और ऐसे ही कुछ और दलाल साबित हो चुके लोगों ने तो मीडिया की इज्जत का दिवाला निकाल ही दिया है। बात गलत तो नहीं?

पेश है सहाराश्री सुब्रत राय के करीबी रिश्तेदार अभिजीत सरकार से फोन पर हुई अमर सिंह की शिकायती बातचीत के अंश.....

अभिजीत---हलो..
अमर सिंह—हां अभिजीत..
अभिजीत—जी जी जी सर, सर...
अमर सिंह—वो असल में ...वो दूसरे लाइन पर कोई आ गया था। (ये सब कहते हुए अमर सिंह जोर जोर से हांफ रहे हैं)
अभिजीत—जी सर जी सर
अमर सिंह---हां क्या पूछ रहे थे तुम
अभिजीत—मैं बोल रहा था, कोई प्रॉब्लम हो गया था क्या शैलेन्द्र वगैरह के साथ
अमर सिंह—नहीं शैलेन्द्र वगैरह से ज्यादा प्रॉब्लम अंबिका (नंद) सहाय के साथ है और सुधीर श्रीवास्तव के साथ है।
अभिजीत—क्या हुआ है सर
अमर सिंह--- प्रोब्लम ही प्रोब्लम है। बात ये है कि कोई ......नहीं है। मने कोई कुछ भी करना चाहे करे, उसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन, अगर दादा ने बोला है तो ये लोग कुछ भी करें बता दें। हमारी जानकारी में रहे।
अभिजीत--- डू यू वॉण्ट मी टू इनिसिएट समथिंग।
अमर सिंह—नहीं नहीं कुछ नहीं। मैंने तो चिट्ठी भेज दी कि मैं रहूंगा नहीं इसमें और मैं रहने वाला भी नहीं हूं। इनिसिएशन क्या करना है।
अभिजीत—नहीं, फिर उनलोग को बोलें जा के कि आपसे मिलें और क्या।
अमर सिंह--- नहीं नहीं मुझे जरूरत नहीं है। हलो।
अभिजीत—जी सर।
अमर सिंह—मेरा काम तो चल जाएगा।
अभिजीत—नहीं, आपका तो चल ही जाएगा सर। उनलोगों को तो मिलना चाहिए न। दे शुड पे रेस्पेक्ट टू यू न सर।

अमर सिंह—नहीं नहीं, वो नहीं करेंगे। अंबिका (नंद) सहाय वगैरह नहीं करेंगे। उनकी ज्यादा जरूरत है परिवार (सहारा परिवार) को।