शनिवार, 10 जुलाई 2010

वोट बैंक ‘किलिंग’ के डर से खापों को राहत

वीरेंद्र सेंगर की कलम से
जाति, धर्म व खापों की संकीर्ण लक्ष्मण रेखाएं तोड़ने वाले युवा जोड़ों को इधर लगातार मौत के घाट उतारा जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में भी खापों का खौफ दस्तक दे चुका है। हाल के महीनों में दर्जनों खापों की दरिंदगी की दास्तानें सामने आ चुकी हैं। झूठी शान के नाम पर इन मदमस्त जाति समूहों ने उकसावा देकर कई भाइयों के हाथों से ही बहनों का खून करा दिया। कई जगह आदिम युग की बर्बरता को मात देते हुए दिन दहाड़े पत्थरों से युवा जोड़े को तिल-तिलकर मरवा डाला गया। कसूर, यही कि उन्होंने खाप की ‘मर्यादाओं’ को तोड़ा था। और प्रेम करने की जुर्रत की थी। मौजूदा कानूनी प्रावधानों में इसकी पूरी गुंजाइश है कि जातीय स्वाभिमान के नाम पर मौत का खेल रचाने वाले बच जाएं। ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में व्यापक संशोधनों का प्रस्ताव गृह मंत्रालय ने तैयार किया है लेकिन कैबिनेट के अंदर कुछ मंत्रियों ने इतने कड़े कानूनी प्रावधानों पर तरह-तरह के सवाल उठाए।

नए कानूनी प्रावधानों को लेकर मानव संसाधन मंत्री, कपिल सिब्बल ने सबसे पहले सवाल खड़े किए।  उनका कहना था कि ‘आनर किलिंग’ जैसे जघन्य अपराध सामाजिक अपराधों के दायरे में आते हैं। ऐसे में कारगर तरीका यही होगा कि सामान्य कानून में छेड़छाड़ न करके, विशेष कानून बना दिया जाए। उन्होंने यह सवाल भी किया था कि कानून व व्यवस्था से जुड़े इस कानूनी संशोधनों में राज्य सरकारों से मशविरा क्यों नहीं हुआ? युवा मामलों के  मंत्री, एमएस गिल ने सवाल किया  कि प्रस्तावित संशोधन से वह पूरी खाप पंचायत ‘हत्यारी’ मान ली जाएगी, जिसके फरमान पर कोई ‘आनर किलिंग’ हो जाएगी। ऐसे में क्या पूरे गांव को फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा?  कहीं ऐसा न हो कि सख्त कानून बनाने के चक्कर में सरकार सामाजिक पंचायती व्यवस्था में ‘विलेन’ की भूमिका में आ जाए।  सड़क परिवहन मंत्री, कमलनाथ ने भी गिल की आशंका का समर्थन कर दिया। इस तरह कई मंत्रियों ने इशारे-इशारे में बता दिया कि खापों को बड़ी चुनौती देने का मतलब है कि मजबूत वोट बैंक   से राजनीतिक खिलवाड़।

बात आगे बढ़ी, तो सरकार के ‘संकट मोचक’ प्रणव मुखर्जी ने कह दिया कि इस मामले में भी ‘जीओएम’ गठित करना ठीक रहेगा। इस सुझाव पर प्रधानमंत्री ने अपनी सहमति दे दी। 26 जुलाई से संसद का सत्र शुरू होने जा रहा है। यह करीब एक महीने तक चलेगा। क्या, राज्यों से विमर्श की प्रकिया ‘जीओएम’ दो-तीन सप्ताह में ही पूरा कर लेगा? इस सवाल पर कई मंत्री अनौपचारिक तौर पर मानते हैं कि पैनल को इस मामले में देर लगने के पूरे आसार हैं। क्योंकि, हरियाणा और पंजाब के कई प्रभावशाली सांसद दबाव बनाए हुए हैं कि खाप पंचायतों के खिलाफ इतना बड़ा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए।हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा खुले तौर पर खाप पंचायतों की तरफदारी करते रहे हैं।पिछले दिनों हरियाणा के चर्चित उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल ने तो करनाल की एक खाप रैली में शिरकत भी की थी।
 
गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित संशोधन मान लिया गया तो, ‘आनर किलिंग’ के मामले में वे सभी हत्या के दोषी माने जाएंगे, जो फैसले के वक्त पंचायत में रहे होंगे। यह कानून बन जाने से खापों की मनमानी पर प्रभावी अंकुश लग सकता है। प्रस्ताव है कि अपनी बेगुनाही भी खापों को ही सिद्ध करनी पड़ेगी। सीपीएम की वरिष्ठ सांसद, वृंदा करात कहती हैं कि वोट बैंक खिसकने के डर से सरकार ने जरूरी कानूनी संशोधन का फैसला नहीं लिया। ‘जीओएम’ तो फैसला टालने का एक राजनीतिक हथियार जैसा बन गया। पिछले महीनों में 50 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। फिर भी सरकार ने ‘विमर्श’ के लिए आगे बढ़े कदम रोक लिए हैं।

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