शनिवार, 6 मार्च 2010

सहज होना

कभी आप ने बच्चे को ध्यान से देखा है। वह स्वयं से खेलता रहता है। कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी हाथ हिलाता है। ऊँगली मुंह mein dal लेता है, चूसता है। कोई चुटकी बजाये तो हंसने लगता है, कोई जोर से आवाज करे तो रोने लगता है। मां को ठीक से पहचानता है। पर जिसे नहीं भी पहचानता है, उसकी गोंदमें जाने में उसे कोई परेशानी नहीं होती, बशर्ते वह सहज ढंग से मिले। किसी को मित्र नहीं मानता और किसी को शत्रु नहीं। जब भूख लगती है मां का दूध पीना चाहता है। कपडे पहनने की जिद नहीं करता। पेशाब लगती है तो कोई सुरक्षित जगह नहीं ढूंढता, जहाँ होता है, वहीँ कर देता है। मन में कोई भेदभाव नहीं। केवल सहजवृत्तियां ही उसे प्रभावित करती हैं। यह सहजता मानवीय है। पशुओं को भी सहजवृत्तियां ही संचालित करती हैं पर भूख नग्न पर या जीवन के लिए खतरा होने पर वे हमला कर देते हैं। बच्चा ऐसा नहीं करता है, भूख लगने पर वह केवल रोता है या माँ को ढूंढता है। लेकिन वह जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, इस सहजता से मुक्त होता जाता है। माँ-बाप से, आस-पास के परिवेश से सीखता है। और बड़ा होता है तो मित्रों से सीखता है। वह जितनी नयी चीजें सीखता है, उतना ही असहज होता चला जाता है। अगर यह शिक्षण प्रकृति के नियमों, सिधान्तों के अनुकूल होता तो वह शायद सहज बावा रहता पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता है। आज के समाज और परिवार में नकारात्मक शैली में जीवन जीने की आदत बढती जा रही है। कई बार यह तरीका जल्दी लाभ पहुँचाता है। झूठ, फरेब, मक्कारी, बेईमानी, षड्यंत्र आज कम से कम समय में बड़ा बनाने के उपकरण बन गए हैं। धन आज के समाज की दशा और दिशा तय करने लगा है और धन अगर जल्द हासिल करना हो तो यही माध्यम कारगर साबित होते हैं। बचा आखिर धन क्यों न हासिल करना चाहे? इसीलिए उसकी अपनी सहजता कायम नहीं रह पाती। एक बार दूरदर्शन पर एक साक्षात्कार में रविशंकर जी से उनकी उम्र पूछी गयी। उन्होंने बहुत सुंदर जवाब दिया। कहा, मैं एक ऐसा बच्चा हूँ जो कभी बड़ा नहीं हुआ। बड़ा होकर भी बच्चा बने रहना बहुत ही मुश्किल काम है पर यह है बड़ी चीज। जब कबीर जीवन में सहजता की बात करते हैं तो उनका आशय भी यही होता है।

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