शनिवार, 20 मार्च 2010

शाहिद नदीम की गज़लें


शाहिद नदीम आगरा में जन्मे. पढाई-लिखाई के बाद उन्होंने अदब और शायरी को अपनी जिंदगी के खास फलसफे की तरह स्वीकार किया और सूरज को भी निगलने की कोशिश में लगे अंधेरों के खिलाफ सच एवं इमान का दिया उठाये निकल पड़े.
वे अदब की हर विधा में लिखते हैं और जो भी लिखते हैं, उसके उम्दा होने में कोई शक नहीं होता. दुनिया भर के तमाम अदबी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ आती रहतीं हैं. शाहिद नदीम साफ और बेबाक गज़लगोई में एक बड़ा नाम है, जिसने आगरा का नाम उर्दू शायरी की दुनिया में रोशन किया है.




१.
चलो मंजर बदल कर देखते हैं.
किसी पत्थर में ढलकर देखते हैं.

कहाँ तक साथ देगी नामुरादी
इसी के साथ चल कर देखते हैं.

यक़ीनन खुद-ब-खुद बदलेंगे चेहरे
बस इक शीशा बदल कर देखते हैं.

सदा कायम रहेंगे  क्या उजाले
अगर यह है तो चलकर देखते हैं.

खुद अपने झूठ की तरदीद करके
इसे सच में बदलकर देखते हैं.

जहाँ अहले-वफा ने सर रखे थे
उन्हीं राहों पे चलकर देखते हैं.

समय की तेज रफ्तारी से आगे
नदीम अब हम निकलकर देखते हैं.

२.
सुनहरी धूप का मंजर सुहाना लगता है.
मगर समझने में इसको जमाना लगता है.

जो हो सके तो नयी रौशनी को अपना लो
तुम्हारी आँख का जुगनू पुराना लगता है.

अब उस जगह पे रुकीं हैं समा अतें मेरी
जहाँ यह  किस्स-ए-गम  शादमाना लगता है.

वह एक धुंधला सा अहसासे-आरजू अब तो
दिलो-नजर के लिए ताजयाना लगता है.

मेरी सजाओं को किस्तों में बांटने वाले
तेरा यह फैसला अब मुनसिफाना लगता है.

मसर्रतों के हवाले से घर के आँगन में
ग़मों की भीड़ का इक कारखाना लगता है.

नदीम मैं नहीं कहता, ये लोग कहते हैं
तेरा यह तर्जे-बयां शायराना लगता है.

३.
नस्ले-आदम के रहनुमाई हो
ख़त्म यह आपसी लड़ाई हो.

इसको कहते हैं गुनाहे-अजीम
पीठ पीछे अगर बुराई हो.

जिन्दा रहती है वह सनद बनकर
बात तहरीर में जो आई हो.

दस्तकें दे के लौट जाती है
जैसे अब नींद भी पराई हो.

हो जो अहसास आदमीअत का
जिंदगी में बड़ी कमाई हो.

नाव कागज की तैर सकती है
शर्त यह है कि रहनुमाई हो.

वह तसव्वुर में ऐसे आये नदीम
जैसे आँगन में धूप आई हो.

४.
उसी फिजां में उसी रंगोबू में ढलना था.
मैं इक दिया था मुझे आँधियों में जलना था.

पुराने लोगों की तहजीब भी बचानी थी
नए ज़माने की तहजीब में भी ढ़लना था.

जहाँ से गुजरी थी मुझ पर कयामते-सुगरा
वहां से जिस्म नहीं जाँ को मेरी जलना था.

मैं जीत लेता हर बाज़ी उससे मगर
अना के पत्तों को अपने जरा बदलना था.

मैं बेअमल था मेरे हर कदम में लगज़िश थी
तू बा अमल था तुझे गिरते ही संभलना था.

मेरे वजूद का हर ज़र्रा जिससे रोशन था
मियां नदीम उसी आदमी से छलना था.

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