सोमवार, 12 मार्च 2018

सुभाष राय की कविताएँ

( सुशील कुमार वरिष्ठ कवि और आलोचक हैं . झारखंड के शिक्षा विभाग में  वे एक ज़िम्मेदार पद पर काम करते हैं . समय की नब्ज़ पर उनकी उँगलियाँ रहतीं हैं . अभिनव क़दम और युगतेवर में प्रकाशित मेरी कविताओं को पढ़कर उन्होंने एक टिप्पणी लिखी, जो यहाँ प्रस्तुत है )


                                         सुशील कुमार 

साहित्य में सुभाष राय एक सुपरिचित 
नाम हैं। लखनऊ में रहते हैं । 'जनसंदेश टाइम्स' को देखते हैं। कवि-पत्रकार-संपादक हैं। लेकिन उनकी कविता की तासीर को कम ही लोग जान पाए हैं। पत्रिका 'अभिनव कदम' के हालिया अंक इनकी सात कविताएँ पढ़ने को मिली। पढ़कर मुझे लगा कि इनकी काव्यसंवेदना जितनी तरल है, शीतल है, उतनी ही प्रभाव उत्पन्न करने में भेदस और तीक्ष्ण भी। इनकी एक छोटी कविता 'जीवन' देखिए -

"जैसे पेड़ मर-मर कर जीवित हो उठता है
जमीन पर गिरे हुए अपने बीजों में
उसी तरह मैं भी बार-बार मरना चाहता हूं
नये सिरे से नयी जमीन में उगने के लिए
मैं बार-बार मृत्यु से टकराता रहता हूं
मैं जानता हूं कि मृत्यु का सामना करके ही
मैं जीवित रह सकता हूं हमेशा"
जिजीविषा की आदिम इच्छा से भरी हुई इन जैसी जीवनधर्मी कविताओं में जीवन के प्रति जो अगाध विश्वास है, उसका इस बुरे-कोफ्त समय में बहुत जरूरत है। उससे भी आगे की तो बात यह है कि इन कविताओं का 'कंटेंट' प्रगतिशील होते हुए भी कहीं से बौद्धिक नहीं हुआ हैं, न कला के हद से आगे जाने की कोशिश करता है, बल्कि बड़े काव्यानुशासन से रायशुमारी करता है-
‌'जो बीत गया
वह मुझमें ही है
जो बीत रहा है
वह भी मुझमें ही है
और जो बीतने को तैयार है
वह भी मुझमें ही है
बंद कोंपल की तरह खुलने को आतुर'/ 
अंश-कविता 'मैं मुझमें' 

- इस कविता को जिस दार्शनिक पृष्ठभूमि में रचा गया है, उसमें जितनी काव्यात्मकता है उतनी ही गीता-संदेश का भास्वर भी । गोकि, कवि जब किसी विचारबोध को कविता में प्रक्षेपित करता है तो कवि को उसकी सम्वेदना के प्रति बहुत सचेत रहना पड़ता है। असावधान कवि बौद्धिकता की प्रवाह में बह जाता है, फलतः उनकी कविता बोझिल गद्य बनकर रह जाती है। पर सुभाष राय का कवि कविता के अंत तक नेपथ्य में ही विचारतत्व को रखता है। यही उनका काव्य सौष्ठव है और कवि की सफलता का रहस्य भी, इस कारण कविता आकार में लम्बी होने के बावजूद पाठक को अंत तक जोड़े रखती है -

"यह जो पर्वत है
उत्तुंग, अनावृत, अछोर
असंख्य उपत्यकाओं पर खड़ा
पिघल कर झरनों में गिरता हुआ
झीलों को अपनी मजबूत
अंजुरी में थामे
बादलों से खेलता हुआ
बर्फ से लदा
सदियां समेटे हुए अपने भीतर
मैं ही खड़ा हूं इसमें, इसके हर रूप में
यह जो नदियां हैं
पृथ्वी की धमनियों की तरह
जीवन को जल से सींचती हुईं
यह जो झीलें हैं
असंख्य जीवन को
अपनी अंकवार में समेटे हुए
यह जो झरने हैं
जीवन का संगीत रचते हुए
यह सब मैं ही हूं
"/ 

वही कविता 'मैं मुझमें'

यह अकेली कविता ही कवि के काव्यगुण के समझने के लिए यथेष्ठ है।
'अभिनव कदम' के ताजा अंक में छपी इनकी कविताओं में पहली कविता का नाम है - 'बच्चे आएंगे '। छोटी पहल की इस कविता में इतिहासबोध से उसके भविष्णु समय की चेतावनी को कितनी संश्लिष्टता, गहनता और कलात्मकता से रखा गया है, यह देखने के लायक है- 

'बच्चों को पढ़ने दो
मत मारो
मार नहीं पाओगे सारे बच्चों को
क्या करोगे जब
तुम्हारी गोलियां
कम पड़ जाएंगी
तुम्हारी बंदूकें जवाब
देने लगेंगी
बच्चे आ रहे होंगे
और तुम्हारे पास
गोलियां नहीं होंगी
बारूद नहीं होगी
फिर बच्चे तय करेंगे
तुम्हारा भविष्य
वे तय करेंगे कि
इस दुनिया में
तुम्हें होना चाहिए या नहीं
बच्चे फिर भी
तुम्हें मारेंगे नहीं
तुम्हें मरने देंगे
खुद-ब-खुद
तुम मिट जाओगे
क्योंकि बच्चे तुम्हारी तरह
बंदूकें नहीं उठायेगे
गोलियां नहीं चलाएंगे' - 

भाषा जितनी सुबोध है, उसकी कला उतनी ही स्वीकृत और समझ के दायरे में। यह कलाहीन कला (आर्टलेस आर्ट ) की बानगी है जैसे कि राजेश जोशी अपनी एक कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं' में आप देखते हैं।
उसी तरह तीसरी कविता 'स्पर्श' की कुछ पंक्तियां देखिए -

स्त्री ही हो जाता हूं
तुम्हारे पास होकर मैं
बहने लगती हो मेरे भीतर
पिघलने लगता हूं मैं
पुरुष की अपेक्षा से परे
समूचे जगत को रचती हुई
अगर योनि हो तो मां हो
योनि हो तो सर्जना हो
योनि हो तो वात्सल्य हो
ब्रह्मांड में बिखरे समस्त
बीजों की धारयित्री हो
मैं पाना चाहता हूं तुम्हें
तुम्हारी अनाहत ऊष्मा में डूबकर
होना चाहता हूं
तुम्हारी हंसी में,
तुम्हारे स्पर्श में
तुममें, हां तुममें (कविता 'स्पर्श'से)

यह प्रेम को 'ब्रह्मांड में बिखरे समस्त बीजों की धारयित्री' के रूप में प्रकट कर उसे अधिक व्यापक और नया अर्थ देता है जो स्त्री-मुक्ति की देहवाद की जाती हुई प्रवृत्ति को मोड़कर उसे मनुष्योन्मुख बनाती दिखती है। यह कहना आसान नहीं कि - 'अगर योनि हो तो मां हो /योनि हो तो सर्जना हो /योनि हो तो वात्सल्य हो' , यह एक कलमकार के प्रेम में केवल आस्था का सवाल नहीं है। प्रेम में सृजन, वात्सल्य और ममता को परखना उसकी व्यापकता के क्षेत्रफल की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार कविता 'देवदूत' समकालीन सत्ता-शासन तंत्र के सच को बड़े नाटकीय संवेग (dramatic momentum) के साथ प्रस्तुत करता है , जनता के स्वप्न-भंग को पूरी जीवंतता से पाठकों के समक्ष रखता है, कविता 'देवदूत' की कुछ पंक्तियां देखिए - 

'ऑंखें बंद करते ही
दिखने लगता है वह
वादों को पूरा करने का
वादा करते हुए
सपनों को हकीकत में बदलने के
सपने दिखाता हुआ
आसमान में उंगली से छेद करने के
मंसूबे से हाथ लहराता हुआ
बदलाव के लिए बार-बार बदलाव
की पुकार लगाता हुआ
आँख खुलते ही बिखर जाती है
उसकी आवाज, उसका साज
एक स्वप्न-नाट्य की तरह'
। 

- यह अंक की बेहतरीन कविताओं में से एक है जो एक नींद, सपना या भ्रम की मानिंद लोकतंत्र के मुखौटे ओढ़े देवदूत के आलोकपूंज की रश्मियों में जल रही जनाकांक्षाओं के सत्य का उजागर करता है।
यह भी सुभाष राय की कविताओं में दीगर है कि वे कविता में ध्वन्यात्मकता और प्रगीतात्मक लय बनाए रखते हैं। उनकी भाषा और उनके मुहावरे बोलचाल की भाषा के बहुत करीब है। यह वाचाल, लच्छेदार शब्दों और बिम्बों से कविता नहीं बनाते। जीवन की अतिसाधारण घटनाक्रमों का शब्दविन्यास बुनते हुए उससे जीवन के उत्कृष्ट अनुभावों को लेते हुए उसी को साधारणीकृत (डायल्यूट)कर कविता के अक्स को पठनीय और सर्वग्राही बनाते हैं। 

इनकी कुछ कविताएँ सुधी पाठकों के लिए मैं अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ जिसका लिंक नीचे है -
http://www.sushilkumar.net/2018/01/blog-post_97.html?m=1

आप स्वयं इस सहज कवि की संश्लिष्ट कविताएं पढ़कर अनुमान लगा सकते हैं कि इनमें जन के द्वंद्व और संघर्ष से लेकर मानवीयता और प्रेम की अभिव्यक्ति जिस अंदाज में हुई है , वह कितनी लोकचेतना और जीवनराग से जुड़ी हुई हैं और पाठक के अंतर्मन को आलोड़ती हैं। ●
सुशील कुमार/मो. 7004353450

शनिवार, 14 मई 2016


फिर मुलाक़ात हो।

मित्रों, सोचता हूँ  एक बार फिर से अपने ब्लॉग पर आऊं। आप सबसे बात हुए अर्सा गुजर गया। मन करता है फिर मुलाक़ात हो।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

समकालीन सरोकार का प्रवेशांक पाठकों के हाथ में

प्रधान संपादक --सुभाष राय
संपादक --हरे प्रकाश उपाध्याय
फोन संपर्क--9455081894, 8756219902

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

लकनऊ से नयी पत्रिका समकालीन सरोकार सितंबर में


मित्रों, प्रसन्नता की बात है कि मेरी पत्रिका के लिए आर एन आई ने एक नाम स्वीकार कर लिया है। लखनऊ से अब समकालीन सरोकार के प्रकाशन का रास्ता साफ हो गया है। सितंबर में इसका प्रवेशांक आप सबके सामने होगा। मेरे साथ इस यात्रा में हरे प्रकाश उपाध्याय भी है। हमारी कोशिश होगी कि शब्दों की दुनिया में एक नया स्वाद पैदा हो, एक नयी राह खुले, एक नयी जमीन उगे। आप सबका स्नेह हमारी शक्ति बनेगा, ऐसा हमारा विश्वास है।

बुधवार, 1 अगस्त 2012

कुछ न समझे खुदा करे कोई

 युवा कवि कुमार अनुपम को उनकी कविता कुछ न समझे खुदा करे कोई के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला है। यह कविता प्रतिलिपि में प्रकाशित हुई थी। वहीं से साभार प्रस्तुत है।

(अवाँगार्द की डायरी से बेतरतीब सतरें)

मेरी मृत्यु
किसी और को
न मिले
भले मिले
मेरे हिस्से का जीवन
पुरखों के पसीने का रंग
संसार के
मुस्कुराते स्वस्थ चेहरों पर
जैसे मिलता ही रहा है
मेरा जीवन
किसी और को
न मिले
कि
निभा न सकूँ
अपना पुश्तैनी धर्म
ऐसा कतई न हो…
1.
मरने के कई ख़याल हैं और
ताज़ादम उनके ऐतराज हैं
सही नाम पूछने के कई ख़तरे हैं
जिन्हें
स्थगित करना
पाप के पहलू में करवट बदलने की गुंजाइश भर धर्म है
भूलन माट्साब के हिज्जे की चूक
का तकियाकलाम है कि तुम
जिसे मेज़ कहते हो उसे SEZ कह सकते हो
SEZ को मेज़ कहते हुए सुनने का स्वांग कर सकते हो
तुम सुरक्षित नागरिकता को
अपनी पैंट की जि़प पर ऐसे टाँक सकते हो जैसे लेवी-स्ट्रॉस का टैग
करने को तुम ऐसा भी कर सकते हो कि कातर किसानों
से बिना सींच उगाही गयी आमदनी
किसी कैलीफोर्निया की अपनी प्रेमिका
के बार-बिल पर लुटा सकते हो
दलित के घर जबरन निमन्त्रित होकर ज़मीनी हो सकते हो
धुरन्धर धर्म की नास्तिकता हो सकते हो
कि सही नाम पूछने के कई ख़तरे हैं
खेतों के घाव की पपड़ी हो सकते हो
जो कि तुम हो
और एक दिन
खेतों की आह से झुलसकर
रफ़्ता रफ़्ता गिर सकते हो
2.
नीमअँधेरा है
नींद के हाथों की चपेट में मच्छर आते हैं
मर जाते हैं मुझमें हत्यारे का विष छोडक़र
जिन पर निशाना साधता हूँ बच बच जाते हैं
मैं मर जाता हूँ एक हत्यारे की मौत
मेरी मौत का फ़ातिहा मत पढऩा अपना तिल तिल क़ातिल हूँ
3.
खेत में
        पहाड़ हैं
        पहाड़ पर
खेत हैं
4.
मैं
नहीं कर सकता किसी की हत्या
अपनी तृष्णा के सिवा
गोकि
हथेली के मंगल पर बैठा एक तिल
लगाए हुए है घात —
5.
सारंडा के जंगलों में बीडिय़ों और ज़ख़्मों और हक़ की रौशनी में
बजट की बही पढ़ी जा रही है
यह मार्च दो हज़ार ग्यारह की तारीख़ी इकाई है
समानान्तर भविष्य
जिसमें अतीत की शक्ति का सन्तुलन तय हो रहा
6.
गन्ने के खेत थे मेरे पास अपने गाँव में
अब
उनकी डिस्टलरी फैक्ट्री है
मेरे पास अब बंजर
                का मुआवज़ा
7.
छुपाए रहा अस्थियों के कवच में अपने निष्कलुष पाप
कत्थई पुश्तैनी पुण्य सुर्ख़रू रहे
अपने ही थे
जिन्होंने छुड़ा दी मिट्टी
मेरी जड़ों से उनके नाख़ून
अब जाने किस हाल होंगे
लड़ाइयाँ छोटी हो या बड़ी
आशंकाएँ बनी ही रहती हैं मृत्यु की
साहस ख़र्च हो जाता है
अपने ही थे
जिहोंने बार बार सिखायी लडऩे की कला और
डाभ की तरह उछाल कर मेरा जीवन
समुद्र के हवाले कर दिया…
8.
अपनी बात कहना चाहता हूँ
आप यदि सुन सकें
हुज़ूर मेरी अस्थियों का अनुनाद
आपकी घिसती हुई त्वचा की आवाज़ है
आपके उसाँस के अन्तिम छोर पर मेरे शब्द
खड़े हैं बहुत शालीनता से अपने को सम्हालते हुए
यह आपके
दयनीय होने का समय है
और मेरी भूमिका यहाँ से शुरू होती है…
9.
दिन बहुत बाद में आता है
और बहुत पहले चुक जाता है अपनी लम्बी छाया छोडक़र
चाहे कोई भी ऋतु हो
कोहरा घिरा रहता है रात की तरह
साँस आख़िरी तारे की तरह टूटती है उस शोर के बीचोबीच
जिसमें ज़ोर देकर
खेतों को ज़मीन कहा जा रहा
हुजूर बिवाई-फटे पुरखों के पाँव हैं हमारे खेत जिन्हें अपने रक्त से सींच उन्होंने नम किया उगाया अन्न कि संसार स्वस्थ रहे
नहीं हुजूर जूते नहीं थे नहीं हैं उन पाँवों में नाल-ठुँके जो अब उन पाँवों को ही रौंद रहे हैं
अनगिन बार खर पतवार धँसे दर्द छलक आया उन्हीं पाँवों में सूरज फफोले सा उगा
आँधी बरखा बाढ़ आयी मगर डिगा नहीं पायी उनकी साध
हुजूर खेत हमारे पुरखे हैं उनकी आस
हम अपने पुरखों को बेचने से करते हैं मना तो आप शोर का अजब समारोह ठान देते हैं जिसमें नाचने के लिए एक विनम्र इनकार को विवश किया जा रहा आँसू गैस छोड़ी जा रही अधनींद जगाकर लाठियाँ बरसाई जा रहीं तलुओं और ललाट पर मारी जा रही हैं गोलियाँ कि हम लहराते हुए दिखें
यह कैसा लोकतन्त्र है जिसमें
हमारे ही शब्द हमारे मुँह में ठूँस
हमें चुप किया जा रहा है
अचानक अवतार की तरह आप दिखाई देते हैं सच्चे हमदर्द की तरह मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ भागे चले आते हुए गमछा लपेटे सफेद गाँधी-टोपी सम्हालते
आपके अपनेपन की धज के भ्रम में बताती है मेरी किशोर बहन कि अपना विरोध और जान समेटकर आपकी फौज से बचकर भाग गये हैं किसी तरह गाँव के सारे के सारे मर्द हमारी रक्षा के लिए यहाँ कोई नहीं है
आप क्या जवाब देंगे हुजूर कौन सी सान्त्वना
उसकी सरलता आपको जख्मी क्यों नहीं करती और आप उसके हाथ की बनी पकौड़ी खाकर मुस्कुराते भर हैं
हुजूर माफ करें कि गाँव में कोई बड़ा बूढ़ा भी नहीं सुजान जो टोक सके इस कमउम्र नागरिक-निवेदन को हाकिम से ऐसा बेजा सवाल करने से कि गाँव में कब लौटेंगे लोग खेत सूख रहे हैं उनकी चिन्ता में
आपके चेहरे का पानी किस कूटनीति में डूबा है हुजूर जिसका विरोधी हमें सिद्ध किया जा रहा
लोहा-लंगड़ प्लांट-श्लांट प्रगति की कब बने नयी परिभाषा किस देश की पाठ्य पुस्तक में पढ़ा यह पाठ कि अन्न और आदमी अपदस्थ हुए विकास की नयी अवधारण से हुजूर हमें बोलने दें हमारा जैविक अधिकार है
हमने आपको महज पाँच सालों के लिए चुना है इसे याद रखें हुजूर यह मुल्क आपके ही पुरखों की मिल्कियत नहीं इसमें हमारा भी हिस्सा है हमारा भी रक्त जिसका रंग लेकर उगेगा दिन और आप रँगे हाथ पहचान लिए जाएँगे
10.
अपने क़स्बे में आया मैं बहुत दिनों बाद
प्राचीन बेरोज़गारी के साथ मित्र
मिलने आये
घर जा जाकर बुज़ुर्गों से पैलगी करता रहा
वे भी मिले वैसे ही
उतना असीसते
जैसे दिल्ली से मिले एक क़स्बा क़दीम
कुछ ने तो कह भी दिया कि चुनाव हैं नगीच
कहीं भैया आप भी…
फिर भी
रहा मित्रों के संगसाथ गलबँहियाँ डाल
कुछ पुराने दिनों में पुन: गया
पटिया पर चाय पी भूजा फाँका
बैठा रहा रेलवे लाइन के पास देर रात तक
जैसे यात्रा हो शेष
कुछ पुरानी प्रेमिकाएँ मेरे गिरते हुए बालों पर हँसती रहीं देर तक
मैं भी उनकी झुर्रियों में हँसा
इस बीच वे माँएँ थीं
मैं भी एक पति और पिता दुनियादार
उनके पति स्टेशन तक मुझे विदा करने आये
आओ ना कभी दिल्ली — हाथ हिलाते हुए रेल की खिडक़ी से
— ईमेल करना अपनी सीवी, कुछ करता हूँ— कहते हुए
आख़िर मैं लौट पड़ा ऑफिस-तन्त्र में
अपनों में रुक गया था दो दिन ही अधिक
और छुट्टी मंजूर न थी…
11.
ललछहूँ चोंचवाली बत्तखें किस लीक पर चलती चली जा रही हैं
किसी क़सम
किसी प्यास
किसी धोख़े
किसी प्रेम
या किसी गर्दिश की गिरफ़्त में
और गज़ब कि यक़ीनन यह भी
किसी शायद की धूसर दुपहर है
बत्तखों की पुतलियाँ हैं कि पपड़ाये पोखरे में तैरने की आतुर आकांक्षा
जिनसे हरे पानी का वाष्प उठता है
हो सकता है उनमें कमल खिले हों
मछलियाँ करती हों उनका तवाफ़
केकड़े जोंक और घोंघे वहीं आरामफ़र्मा हों
धूप वहीं इन्द्रधनुष ताने हो
एक जल-पारिस्थितिकी वहीं विकसित हो
बत्तखों की क्रेंकार में यह पानी की गुंगुवाती आवाज़ का अक्स है
दृश्य पानी पानी एक मुहावरे में डूब रहा है…
12.
यह वक़्त मुफ़ीद नहीं है कि तलाशे जाएँ इतिहास की गर्द में दबे पदचिह्न
विकट वेग से बढ़ रहे हैं टैंक हर ओर से
चीत्कार की पृष्ठभूमि ललकार रही है शान्तिसाधकों का बुद्धत्व
आकाश से गिर रही हैं पट् पट् परकटी उड़ानें लगातार
यह वक़्त मुफ़ीद नहीं है कि प्रलापा जाय पश्चात्ताप का प्रपंच
या किसी सबल मंच को निहोरा जाय
तर्कसम्मत है यही
कि कहीं से भी
पुकारा जाय
अपने ही नाम को
अपनी ही शक्ति को
अपने ही आप को और छिन्न भिन्न किया जाय दुर्वासा-शाप को
यह वक़्त मुफ़ीद मुहूर्त का दिशाशूल…
फिर भी…
13.
घासफूल खिला
सफ़ेद उजला निदाग़
संगमरमर पर लगे काजल टीके सा दीप्त
पिटूनिया की तरह नहीं
ट्यूलिप की तरह नहीं
गुलाब की तरह तो कतई नहीं
घासफूल की तरह घासफूल खिला
फ़रिश्तो
इनकी लघु मुस्कान की उजास में धो लो अपना चरित्र
इनकी सुगन्धि से भर लो नासापुट
महसूस सको तो इनकी नश्वरता स्पर्श कर अमर हो जाओ
ख़ुशामदीद अन्न के बीजो कहते हुए बचे खुचे खेत तैयार हैं
ये रजस्वला धरती के डिम्ब हैं
14.
आप सब जानते ही हैं जानने की रील रिवाइंड करने के लिए कहता हूँ
और आप पाते हैं कि जो दृश्य पर दृश्य आपकी दृष्टि से गुज़रे वापस पाँव खींच रहे हैं जो कुछ देर पहले फैली थीं याचक आशाएँ उनकी हथेलियाँ वापस हो रही हैं और अब उनमें कहीं स्वाभिमान की झलक सी है और जिस करोला का दरवाज़ा एक अकड़ खोलकर उतरी थी अब उन्हीं दरवाज़ों के काले शीशे में दुबक गयी है वापस भाग रही है कार यातायात के भीषण कोहराम के बीच सहसा आप पाते हैं कि आदत आशंका के हवाले हो रही है पृष्ठभूमि से जो आ रही हैं ध्वनियाँ हौलनाक़ और अबूझ हैं
तमाम कारनामे जो आप कर गुज़रे उनसे वापस भागते हुए आप गत कशमकश से साफ़ बरी हो रहे हैं अब एक पवित्र शान्ति आपके भीतर लौट रही है
कुछ हरकतें तो आप जैसे किसी रत्ती भर न्यूज़ को तानने की तरह बार बार दुहराते हुए ख़ुद को पाते हैं और जो खीझ आप में जाग रही है उसकी स्थिरता की राह पर ख़ुद को निरा बच्चा पाने लगते हैं बिलकुल मासूम सा जो सब जानने के लिए अपनी आँखें और कुतूहल की एकाग्रता दृश्य के सही कोण पर कैमरे के लेंस की तरह सेट कर रहा है स्टिल कर रहा है
यूँ तो आप सब जानते ही हैं और मैं उस बच्चे की उतनी ख़ुशी का जि़क्र तक नहीं करूँगा जो आप दोबारा पाते हैं…
15.
मेरी त्वचा की दीवार से तुम्हारे आसरे की पीठ टिकी है
इधर मैं हूँ उधर तुम
इस तरह मैं तुम इधर उधर दो दीवार हैं
दो दीवार के बीच हम नदी की शक्ल बहते हैं
आख़िरश हम दिगम्बर
दिक्        अम्बर की त्वचा है
16.
चीज़ों का बढ़ता ही गया आकार
और जगर-मगर
अपनी पुतलियों-सा
सिमटता
मेरा वजूद और साँवला होता गया
मार्च करता
गुज़रता ही रहा
अश्लील भरा-पूरा बाज़ार
जैविक ज़रूरतों की ओट
मैं बच्चे-सा दुबकता रहा भरसक
एक हाहाकार हौलनाक़
ब्लैकहोल-सा
ऐन मेरी जेब में
चक्कर काटता रहा
जिसमें मैं
परवश अनचाहे
कगार की मिट्टी-सा
कटा
गिरा
गिरता ही रहा
क़तरा क़तरा
अपने सहलग संस्कारों के साथ…
17.
हवा की ज़द में है सारा मौसम
कि मौसमों का रुख़ हैरतअंगेज़
हैं नेज़ा नेज़ा ज़मीं के ज़र्रे
फ़लक की बन्दिश उफुक प’ कसती ही जा रही है
दिशा दिशा अय्यार जैसे हज़ार सूरत बदल रही है
ये कैसी कोशिश
बुलन्द ताबिश
कि ख़ाब तक है जहाँ की हालत
मसाफ़तों के हुजूम रिश्तों के दरम्याँ तक उतर गये हैं
तमाम रिश्ते बिखर गये हैं
दिलोनज़र का भरम ये कैसा
ये कैसी काविश
कि जैसे ऐसी
ही सूरतों की ऐहतरामी
को जाने कब से तरस रहे थे
तेज़ रौ कारवाँ ये वहशत का
हरेक दिल के
अजान गोशों में ज़लज़ले सा
उतरता जाए है रफ़्ता रफ़्ता
कि भरता जाए है रफ़्ता रफ़्ता…
18.
सुनामी की तीस फुट ऊँची लहरों के सामने भौचक एक स्त्री अपनी तीन साल की बिटिया और असहायता के साथ घुटने के बल बैठ गयी है एक दूसरी तस्वीर में विमान और कारें खिलौनों की तरह ढेर की ढेर पड़ी हैं आँसुओं के तमाम ज़ार ज़ार घर हैं
दुख ख़फ़ीफ़ हर्फ़ है जैसे कि आँसू में प्रार्थना का भार जिससे देवता दबे कराह रहे
देवता तुम्हारी चप्पलें टूट गयी हैं और हवा और पानी में तुम्हारी साँसों की झझक है
बच्चों की आँखों में सपनों से डबडबाया पानी है जिसमें पत्थर एक दूसरे से टकरा रहे हैं चिन्गियाँ लपक लपक उठती हैं
टूट जाएँ नट बोल्ट तो रुक जाती हैं मशीनें जि़न्दगियाँ नहीं
कि जापान आवारा नहीं…
19.
जापान जापान में नहीं है जहाँ था वहाँ लाशें हैं मलबा है ख़ून है असहायता है सुनामी है आग है जापान दुनिया की आँखों में भर गया है निचली पलक के ऊपर टिका है पुतलियों के बहुत करीब काँप रहा है
पलकें नहीं झपकाएगी दुनिया जापान भरोसे का नाम है
जहाँ जापान है वहाँ हाथ लिख दो
जहाँ जापान है वहाँ हाथ रख दो
जहाँ जापान है वहाँ जापान लिख दो
20.
जहाँ फ़िलहाल
जापान है
वहाँ भारत हो सकता है पाकिस्तान हो सकता है ईरान हो सकता है अमेरिका हो सकता है रूस चीन दुनिया का कोई भी मुल्क़ हो सकता है और नहीं होना चाहिए लिखना चाहता हूँ प्रार्थना के शिल्प में ही
कि जापान फ़िलहाल बहुत दुख का नाम है
कि जापान आज जैसा है वैसा नहीं होना चाहिए वैसा नहीं होगा जापान कहता है उसे दुनिया का सम्बल भर चाहिए
जापान महाकरुणा का देश है…
21.
‘सुना सुना इश्क़ करो’ फ़कीर हुआ तो वारिस शाह की तरह कहता
अभी फ़कत जापान से
जकात नहीं पसीने की आग दो
                प्यार दो
22.
पाक़दामानी का ख़ामख़ाह ख़याल बरतते हुए दामन सिलवटों के सुपुर्द हुआ और वहीं से उठी चर्ख़ आवाज़
        कि उसाँस सा पराया नहीं कोई
        नहीं कोई
        नहीं कोई
हसीं पाप कोई हुआ चाहिए दुआ चाहिए
महब्बतों की दवा चाहिए
फिर फिर जापान हुआ चाहिए
23.
जापान में कम बचा है जापान उस तरह नहीं जैसे लखनऊ में कम बचा है लखनऊ जैसे बनारस में कम बचा है बनारस जैसे भोपाल में कम बचा है भोपाल
यह एक अकेली ख़ुशी का वक़्फा है
24.
पहली पीढ़ी को मौत मिलती है
दूसरी को सहनी पड़ती हैं त्रासदियाँ
तब
तीसरी पीढ़ी को रोटी और सम्मान मिलता है
भूला नहीं होगा जापान अपनी कही गयी सूक्ति
में ली गयी साँस…
25.
भाषा में क्या आयौ
बोली-बानी सानी-पानी लाग-लंठई करतेव
कनपट्टी पर कट्टा धरतेव गदर-गुंडई करतेव
पुरस्कार के दल्लों औंढ़े सम्पादक का—
चरण चाँपते दारू देते सपनों में तो डरतेव
गैरत गोड़ेव कविता छपवावै की खातिर जै हो
कबिजी
मउगा होइगेव आलोचक के मुख से केवल आपन नाम सुनइकेव
        वाह वाह कबिजी क्या कबिता
        वाह वाह कबिजी क्या वबिता
खूब अघायौ
25.
शब्द अच्छे होते हैं न बुरे केवल सार्थक होते हैं या निरर्थक ऐसा विचार उलीचते हुए श्रीमान बुद्धिजीवीजी ने आख़िरी अक्षर चुभलाया और पाया कि उनकी जीभ रात में भक्षे गये किसी शब्द के रेशे से उलझ रही है तब उन्होंने आवश्यक कार्यवाई के अन्दाज़ में ऐसा किया कि बाएँ हाथ की छोटी उँगली के नाख़ून को दाएँ तरफ के रदनक दाँत की मदद से थोड़ा नोचा थोड़ा छोड़ दिया और उसकी ख़ुफ़िया भूमिका तय कर दी जैसे कि तीली और उससे दाँतों के दरम्यान फँसे रेशे को आज़ाद कराने में ऐसे तल्लीनभाव से संघर्षरत हुए जैसे कि देश आज़ाद करा रहे हों और काफी ज़द्दोजहद के बाद अन्तत: सफलता उनके बाएँ हाथ की छोटी उँगली के अधनुचे नाख़ून पर नमूदार हुई जैसे कि इज़्ज़त और राहत के साथ मुझे दिखाते हुए बोले कि यार अक्सर खाया हुआ ही अटक जाता है और तो और जीना ही हराम कर देता है जैसे कि ज्ञान फिर बाएँ हाथ की छोटी उँगली के अधनुचे नाख़ून पर लगे रेशे को अपनी नाक के क़रीब लाये कुछ अजीब सी भंगिमा बनायी जिसमें नाक के सिकुड़ जाने की भी एक क्रिया शामिल थी फिर बाएँ हाथ की छोटी उँगली के अधनुचे नाख़ून पर टिके रेशे को हवा में अपने सिर के बाएँ क़रीब से ऊपर इस तरह उठाया जैसे कि चक्र सुदर्शन या गोवर्धन धारण किये हुए हों
26.
दूसरा जो जीता न जा सका
इसीलिए हुआ मैं पराजित
— मेरा हारना और उससे हारना
एक ही बात नहीं है
हारा उससे
कि मैं सहमत न था
फिर भी रहता आया
जैसे आकाश का (अ)-तल छोड़
रहते आते तारे
हारा उससे
कि मैं अपनी रूह से मजबूर
क़बूल न सका जड़ता
नदी की तरह
मैं बह चला
हारा उससे
कि अपनों के बहुत सारे दुख
पर फ़िदा ख़ुद ही
हार बैठा सब कुछ
                —निरीह हुआ
—मेरा हारना और उससे हारना
एक ही बात नहीं है
जीत नहीं सका एक उसे
                —त्याग से
यही मेरी मात है
27.
‘हिन्दी साहित्य में प्रशस्ति लेखक का महत्त्व’ या ‘हिन्दी साहित्य में फ्लैप लेखक का योगदान’ जैसे विषय पर जब शोध होगा तो श्रीमान बुद्धिजीवीजी का नाम प्रमुखता से सन्दर्भित होगा ऐसा बुद्धिजीवीजी ने सोचा यह उनका पराक्रम ही है कि जिसके लिए तरसते हैं तमाम साहित्यकार फाहित्यकार वह पुरस्कार बुद्धिजीवी जी ने दो-दो तीन-तीन बार झपटा इस सबके बावजूद बुद्धिजीवीजी में एक बचकानी ईष्र्या घर कर गयी जिसका मौलिक पाठ अमरीका जिस तरह आतंकवाद के ख़िलाफ़ करता है कुछ उसी तरह हल्के अन्दाज़ में रह रह कर करते हैं कि उन पर मास्टरी की हैवी सेलरी का दाब न दिखे ऐसे विगलित क्षणों में बुद्धिजीवीजी रचना में आँख मूँद समीक्षा लिखने में जुट जाते हैं अफ़सर-दोस्त और दारू महत्त्वपूर्ण रचना की कसौटी हैं उन्हें याद रहता है बाक़ी भीड़ है जिसे लोहिया भी लोक आदि कहते थे बुद्धिजीवीजी जीवन के लिए बुद्धि को इनपुट मानते हैं और विज्ञापन को आउटपुट जिसका कमीशन उनकी साहित्यिक उपलब्धि है इस सन्तोष के साथ सिर झुकाकर चरने में मशगूल हो जाते हैं…
28.
अलाने को ईनाम फलाने को सम्मान ढिकाने को पुरस्कार मेरे अरे मेरे ही कारण की धौंस और कृतार्थों-धन्यों के दरबार में तुम निहत्थे हो अपनी भाषा की हया का हाथ थामे
वे तुम्हें आमन्त्रित करेंगे और कटघरे में खड़ा कर देंगे बहुत सादगी से पूछेंगे कि तुम्हारी पेन की स्याही का रंग आख़िर नीला क्यों है और दयार्द्र हो तुम्हें लाल स्याही वाली पेन गिफ़्ट करते हुए कहेंगे कि लो इससे लिखो और स्वीकृत भाषा में बेखटके चले आओ
वे तुम्हें सरल करेंगे लम्पट-लतीफे सुनाते हुए दिखाएँगे धन्याओं की फेहरिश्त जिनको कृतार्थ कर उन्होंने भाषा में शोहरत बख़्शी फिर तुम्हारे ऐन सामने सजा देंगे बलवर्धक दवाओं की शीशियाँ और अपनी दशा से तुम्हें शर्मिन्दा करेंगे
साँस रोक प्रतीक्षा करेंगे कि तुम कुछ कहो वे बहुत शान्त स्वर में कहेंगे बोलो बोलो चेतनक्रान्ति यूँ चुप्पी में मत घुटो यहाँ भाषा में तो दिग-दिगन्त तक हमारी ही रंगदारी हमारा ही राज कहो निर्भर हो कहो सान्त्वना की एक आँख दाब तुम्हारे धैर्य का धर्म परखेंगे तुम्हें परास्त करने की प्रतीक्षा में मर-मिटेंगे और अन्त तक एक मुर्दे की तरह बहुत शालीनता से पेश आएँगे और तुम्हें याद दिलाएँगे कि आज तुम्हारे जन्म का दिन है।
29.1.
(पिछले पहर पुरखों ने भाषा में एक घोंसला बनाया कुछ वनस्पतियों पर भरोसा किया परिन्दों की तरह सूफ़ी हुए यह चूक आनुवंशिक मुझे उनको हमें— दरअसल जो अपने ही थे— कुछ जम गयी किन्तु कमानें तन गयीं और काल रिस रिस कर बरसता रहा)
        दिन देखा है हमने
                देखा है दिन
                सालिग्राम बिके
                लेकिन चुका न ऋण
                देखा है दिन…
29.2
(समय धीरे धीरे नसों में दाख़िल होता रहा और रक्त में पहली दफ़ा महसूस हुआ लोहा)
        इनकी फ़रियाद है गूँगे की सदाओं की तरह, उनका दरबार है बहरों की सभाओं की तरह
        ज़ख़्म कितने ही दो अब कुछ भी नहीं बोलेंगे, दर्द से सुन्न है अहसास शिलाओं की तरह
        शस्त्र के ज़ख़्म तो भर जाते हैं वर्षों में मगर, शब्द के ज़ख़्म हैं मधुमेह के घावों की तरह
        जाने क्यों लोग यही चाह रहे हैं हमसे, हम भी हो जाएँ ज़माने की हवाओं की तरह
        दिल को धोख़ों ने ही चालाक बनाया वरना, पहले यह शहर भी मासूम था गाँवों की तरह
29.3
(समर्पण के मुहूर्त पर मन मार हमने भी सौंप दिया अपनी चादरिया का तार तार तनिक सतर्क भी तो रहे क्या ख़ता की!)
        समय की आँधियाँ हैं और मैं हूँ, नफ़स की धज्जियाँ हैं और मैं हूँ
        मगर जीने की कोशिश पेशतर है, भले पाबन्दियाँ हैं और मैं हूँ
        कहाँ लायी मेरी काफ़िर-मिज़ाजी, जिहादी बस्तियाँ हैं और मैं हूँ
        समर्पित ख़ूबियाँ भी ख़ामियाँ भी, ये मेरी अर्जियाँ हैं और मैं हूँ
29.4
(वे दिन दीवार में चिन दिये गये जिन्हें हमने अपने रक्त से रँगा)
        हलचल मची हुई है उसी के बयान से, जिस आदमी का रिश्ता नहीं है ज़बान से
        उनका ही हाथ पाँव दबाते रहे हैं हम, मतलब नहीं है जिनको हमारी थकान से
29.5
(इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई भी देख ली यूँ ही…)
        जितने इज़्ज़तदार देश के हैं सब के सब आये हैं, शिरकतफ़र्मा है पूरा का पूरा चम्बल संसद में
        यार तमाशा अक़्सर ऐसा तो होता ही रहता है, हर अगले पल बनते रहते हैं दल में दल संसद में
        सरकस के सब अनुपम करतब तुझको भी तो आते हैं, तू भी अपना करतब दिखला तू भी अब चल संसद में
29.6
(आप मानो या न मानो, मगर सच है कि हमारे रक्त में पानी धरती और समुद्र के अनुपात में है)
घिन आती है आचमन से
क्योंकि राजनीति
अब ‘पाँडे ताल’ की तरह है
जहाँ नहाते हैं सिर्फ
अन्तिम संस्कार करके लौटे लोग
या घोसियों की भैंसें
या दीर्घशंका से निवृत्त जनों के लोटे
29.7
(विश्व की जो इकाई है—घर—उसकी अपनी विपदाएँ हैं उनका शुमार किस स्वायत्तता का शिकार)
        दसियों सालों से पापा को खोने से पहले ही बार बार होश खो रही है माँ
        दसियों सालों से आँखों की नदी दिन रात बही है अब रेत निचुड़ रही है
        दसियों सालों से इंजेक्शन की शैया पर पड़े हैं पापा भीष्म की तरह और असमर्थ है अर्जुन कि पिला सके कोई मोक्ष-प्रदाता गंगाजल
        दसियों सालों से उस नक्षत्र की अनचाही प्रतीक्षा है सबको जो किश्तवार मौत से मुक्ति दे
        पापा के पसर गये फेफड़ों में भरी हवा निकलकर बन जाए
        नव-जीवन-स्वाँस
        (आमीन! मगर कहने से क्या
        जबकि पुनर्जन्म पर ही भरोसा नहीं मुझे अब तक)
        किन्तु अब सब प्रस्तुत करना चाह रहे हैं अनचाहा वक्तव्य—
        ‘अलविदा!’
        यह मध्यम जीवन और स्मृति के ब्लाइंड स्पॉट्स स्वप्न और जेब में एक साथ खलल डालते हैं बार बार… निरुपाय की उसाँस-सा भर जाते हैं
        ईश्वर जो नहीं है कहीं
        करता ही रहता है अट्टहास…
29.8
(रात और दिन ने बाँट रखा है समय इन्हीं के दरम्यान हवा बहती है मौसम बदलते हैं नैसर्गिक भ्रम होता तो उतना ग़म न होता)
        पेड़ पर पतझरों के दल आये, तब कहीं उस पे फूल फल आये
        रात का अन्धकार था बेहद, जाने हम कितनी दूर चल आये
        उसको ओहदा मिला तो नगरी में, कितने रिश्ते नये निकल आये
        वे सफ़ीने भँवर में उलझे हैं, जो हवाओं के साथ चल आये
        भावना आस्था वफ़ादारी— सारे फूलों को हम कुचल आये
29.9
(बीत चुके बहुत में और बहुत कुछ बचा है दुरभिसन्धियों में ही यात्रा का रोमांच भुगतना है)
        जब से वह नामवर हो गया है, ऐब उसका हुनर हो गया है
        किस सियासत से पहलू बदलकर, राहज़न राहबर हो गया है
        एक ही ईंट निकली है लेकिन, यूँ लगे घर खँडर हो गया है
29.10
(कोहरे में आज का अख़बार आता है और आज का लडक़ा आता है कल वह जवान होकर पिघलेगा)
        एक माचिस की तीली जली है, अब अँधेरों के घर खलबली है
        सौ बवालों में भी शायरी है, हिंस्र पशुओं में ज्यों ‘मोगली’ है
        इस हवा के असर में न आये, अब भी बच्चों की दुनिया भली है
29.11
(अतीत की पतंग नये हाथों में बहुत रंगीन होकर धडक़ती उड़ रही है)
        सडक़ पर है मगर ईमान का तेवर सुरक्षित है, अभी गुदड़ी में उसके आख़िरी ज़ेवर सुरक्षित है
        जहाँ पर कैकयी है और अनगिन मन्थराएँ हैं, वहाँ पर राम के वनवास का भी डर सुरक्षित है
        सृजन की रागिनी अब भी फ़िज़ाओं में महकती है, तिरोहित हो गये हैं शब्द लेकिन स्वर सुरक्षित है
29.12
(सचाई कौर में करकती है रह रह कुछ रोमांटिक कल्पनाओं के एवज हाँफना पड़ता है)
        दुनिया की कचकच तिस पर पत्नी का नखरा
        पाँव पसिनियाया        स्लेट का ख़ैबर दर्रा
        रस्ते की सुलझन पर        दिखता है घर अपना
लकदक एक हक़ीकत        फिर भी सपना
        पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन
        सभी दिशा से आती है पिन
        बिंधा हुआ इच्छा का भीष्म
        समय तीव्रतम        साँसें धीम
        जेबी शोर        और सन्नाटा
इसने हूँसा        उसने डाँटा
        हाथ हमारा नीमहकीम
        लाएगा ही सुख की ‘थीम’
        मन का आँसू गुटुक गुटुक
        ढूँढ़ रहा जीवन का तुक…
29.13
(गुत्थियाँ हरेक की कई बार मौलिक होती हैं इतनी कि व्यक्तिगत लगती हैं लेकिन यह भूलना एक नयी गुत्थी को जन्म देना है; फिर जनाब, उसकी पुरानी चूकों के बाबत उसे यूँ क़ाफ़िर ठहराना, कैसा फ़ैसला! आप जानें या आपका ख़ुदा।)
        जीवन के कई अर्थवान क्षण
                                विस्तार चाहते रहे
        जबकि
        छोटी न हो सकी उसाँस
                                खुलती फैलती रही
        एक फाँस
        आँतों की सुलझना चाहती रही
        और अर्थ
        जीवन से
        देह-सा जुडऩा चाहता रहा
        अतृप्ति का एक शोकगीत तक
        गाया न जा सका कि रही
        जीवन में ऐसी मृत्यु की उपस्थिति
        भ्रम की दिशाएँ तो सभी पुकारती रहीं चकर-मकर
        जबकि भागना चाहना तक उनकी ओर
        कभी रास नहीं आया
        सँभाला
                अन्तर के रंगों
                        और शब्दों के गुरुत्व
        ने ही थाम लिया मुझे बारम्बार और मुक्त किया…
(उपसंहार लिखते हुए कतराता हूँ ‘संहार’ की बू आती है)

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

उत्तेजक चर्चा के दबाव में प्रयाग शुक्ल

रीता भदौरिया के दूसरे काव्य संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर वीरेन डंगवाल, प्रयाग शुक्ल, कवयित्री स्वयं, अशोक चक्रधर और असगर वजाहत
पानी पर गांठ के बहाने कविता और समाज पर गहन चर्चा

शेष नारायण सिंह की कलम से 
 हिन्दी की कवयित्री रीता भदौरिया के दूसरे काव्य संग्रह 'पानी में गाँठ' के लोकार्पण का अवसर। दिल्ली में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के सभागार में राजधानी की नामचीन अदबी और शहाफी शख्सीयतों की मौजदगी में रीता की कविताओं पर चर्चा हुई और कविता और समाज पर भी। रीता के संवेदन और उनकी रचना प्रतिभा में वक्ताओं को प्रचुर संभावना दिखी। सदारत कर रहे थे हिन्दी के बड़े कवि प्रयाग शुक्ल। अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने समय की कमी और विमर्श से उपजे उत्तेजनात्मक तनाव के बीच से निकलने की सधी हुई कोशिश की पर समय पर तनाव भारी रहा। संक्षिप्ति की वकालत के बावजूद विस्तार से बचना उन जैसे बड़े साहित्यकार के लिए भी संभव नहीं हो सका और सच तो यह है कि यही श्रोताओं के लिए आनंददायक रहा। वे चिंतित थे कि खराब और अच्छी कविता की बात की गयी, वे चिंतित थे कि कलावाद पर आक्षेप किया गया। उन्होंने जवाब भी दिया, बहुत स्पष्ट और साफ सुथरा, कलावाद कोई बुरी चीज नहीं है, मैं स्वयं कलावादी हूँ। कला लोक से ही जन्मती है, लोक के साथ ही आगे बढ़ती है। न तो कविता के पाठक कम हुए हैं, न ही अच्छी कविताएं। सारे देश में घूमा हूँ मैं, हर जगह कविता लिखने वाले, उसके प्रशंसक मिले हैं। मैं कविता को अच्छी या बुरी कविता के रूप में नहीं देखता हूँ, मेरे लिए कविता सिर्फ अच्छी होती है, कोई ज्यादा अच्छी, कोई कम अच्छी।
इस मौके पर प्रयाग शुक्ल के अलावा असगर वजाहत, वीरेन डंगवाल, अशोक चक्रधर, आलोक पुराणिक, कमर वहीद नकवी, राम कृपाल सिंह, प्रभात कुमार राय, प्रो. जय प्रकाश द्विवेदी, कुलदीप तलवार, कुलदीप कुमार, राम बहादुर राय, सुभाष राय, वंशीधर मिश्र, मिथिलेश कुमार सिंह, मधु जोशी आदि मौजूद थे। दिल्ली के  हिन्दी पत्रकारों का भी बड़ा जमावड़ा था। असगर वजाहत ने कविता के महत्व का प्रतिपादन करते हुए उसे जीवन और समाज के परिष्कार का सबसे बड़ा औजार कहा। उन्होंने कहा कि जब आप को सभी छोड़ दें, कोई भी आप की मदद करने वाला न हो, तब भी कविता अपनी समूची ताकत और संभावना के साथ आप के साथ होगी। असगर साहब ने कहा कि कविता समानांतर समाज बनाती है, वह समाज को दिशा देने, उसे विकसित करने का काम करती है। वीरेन डंगवाल ने कहा कि बीते सालों में कविता का जनतांत्रीकरण हुआ है और बहुत से नए कवि सामने आये हैं। सुभाष राय और बंधीधर मिश्र ने कुछ खतरों की ओर संकेत किया और कविताप्रेमियों और आलोचकों को आगाह करने की कोशिश की। राय का मानना था कि बहुत सारे नकली या अखबारी अनुभवों पर कविताएं लिखी जा रहीं हैं। कवि वहां उपस्थित नहीं है, जहाँ से वह रचना का कथ्य उठाता है। अनुभव की प्रामाणिकता के अभाव में कविता भी संदेह के घेरे में है। कवि सम्मान, पुरस्कार के पीछे भाग रहा है, अच्छी कविताएं भी आ रहीं हैं लेकिन खराब कविताएं ज्यादा आ रहीं हैं। मिश्र ने धूमिल के उद्घरण देते हुए कहा कि कविताएं सार्थक वक्तव्य होने की जगह केवल वक्तव्य हो जाएँ तो वे अपना प्रभाव खो देंगी। उन्होंने दृष्टिसम्पन्नता के अभाव की ओर संकेत किया।
मधु जोशी ने विस्तार से रीता भदौरिया के संघर्ष और संवेदनात्मक विकास की चर्चा की और उनकी कविताओं को सराहा। जोशी ने कहा कि रीता की कविताओं में विचारों की निरंतरता है। अशोक चक्रधर ने रीता के संग्रह से कुछ कविताओं का पाठ किया और उनमें  एक वृहत्तर संभावना की चर्चा करते हुए कहा कि पुस्तक पर अलग से बात होनी चाहिए। इस मौके पर कवयित्री रीता ने स्वयं की रचना प्रकिया के बारे में बताया और कहा कि उन्होंने जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। अपने विभाग के कामकाज के सिलसिले में ऐसे लोग भी देखे हैं जिनके पास दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं है और ऐसे लोग भी, जिनके पास अपनी संपत्ति को ठिकाने लगाने का तरीका नहीं सूझ रहा। उन्होंने विकास का भ्रम और अंतिम पड़ाव, अपने कविता संग्रह से दो कविताएं पढ़कर सुनाई। गोष्ठी का संचालन जाने-माने रंगकर्मी और पत्रकार अनिल शुक्ल ने किया।

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

सरकार और सरोकार नहीं बाजार बदल रहा है स्त्री को


देवेन्द्र
कथाकार 

गांव में रहते हुए बचपन से ही हमने जिस समाज को देखा है उसमें स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक कहना लहीम-शहीम नागरिकता पर गोबर करना होगा। मनुष्य की योनि में जन्म लेकर परम्पराओं के नाम पर स्त्री के साथ जिस बर्बर सामाजिक आचरण को व्यवहार की तरह अपनाया जाता है, उसे देखते हुए ‘नागरिक’ शब्द जैसा कोई सम्बोधन मुझे उपयुक्त नहीं लगता। हमारी भाभियां जब ब्याह कर आयी थीं, तब उनकी उम्र बमुश्किल चौदह-पन्द्रह साल रही होगी। उन्हें अहरिहार्य प्राकृतिक जरूरतों के निबटान हेतु सुबह से पहले और शाम के देर बाद मुंहअंधेरे में तय समय के लिए बिना खिड़कियों और बिना झरोखों वाले सीलबंद कमरों की घुटन से बाहर निकलने दिया जाता था।

चाहे कैसी भी तबीयत हो, हजारों साल से वे एक ऐसी व्यवस्था की अभ्यस्त थीं कि पूरे दिन पेट में मैला ढोती रहती थीं। सेक्स तथा सहवास की कामना के कारण ही नहीं,दिन-दोपहर प्राकृतिक निबटान की अपरिहार्य जरूरतों के कारण भी वे चरित्रहीन समझी जा सकती थीं। हमारा घर बनिस्बत गांव का सम्पन्न घर था फिर भी ऐसी कोई व्यवस्था हमने नहीं देखी सुनी थी। पच्चीस-तीस साल तक एक पर एक चार-पांच बच्चों को पैदा कर चुकने के बाद उनकी सांसों में पायरिया भर जाता था, दांत हिलने लगते थे। चालीस साल औरतों के बूढ़ी होने की उम्र होती थी। धूमिल की एक कविता है-


‘प्रजातंत्र का वह कौन सा  नुस्खा है कि
 जिस उम्र में मेरी मां का चेहरा चकत्तियों की थैली है
 उसी उम्र की मेरी पड़ोसन के चेहरे पर
 मेरी प्रेमिका जैसा लोच है।’ 


सम्पन्न माने जाने वाले हमारे गांव में ढेर सारे जानवर थे, जिनके बीमार होने से हमारी खेती लड़खड़ा जाती। आर्थिक ढांचा गड़बड़ा जाता है। उनका समय से इलाज कराया जाता। उनके डाक्टर गांवों में आते थे। लड़कियों के लिए कहा जाता था-बिन ब्याहे बेटी मरे, ठाढ़ी ऊख बिकाय, बिन मारे वैरी मरे, ई सुख कहां समाय।


पूरे परिवार की मुसीबत यही लड़कियां ब्याह कर ससुराल भेजी जाती थीं। उन्हें बाकायदा विवाह नामक संस्था में बांधकर लाया जाता था। वे पिता, भाई और मां की जिम्मेदारियों से बेदखल कर दी जाती थीं। परम्परागत जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं होता था। मां, बाप, भाई, बहन, सहेलियां, गांव के पेड़, तालाब और दूर-दूर तक फैले-फू ले सरसों के खेत, बेलों और बकरियों से होकर जो रिश्ते उनके जीवन में घुस आये थे, उनकी महक, उनकी स्मृतियों को ससुर के घर में खुरच-खुरच कर बेरहमी से मिटा दिया जाता था।

हजारों साल से वे इसे यातना की तरह नहीं उत्सव की तरह स्वीकार करती थीं। सिर्फ स्थूल और थोड़ी प्रताड़नाओं से ही नहीं, जबकि यह भी उनकी दिनचर्चा के अभिन्न अंग थे, उन्हें किस्सों, कहानियों से बहला-फुसलाकर पालतू बनाया जाता था। उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक या दास कहना दासों की स्थिति का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करना होगा क्योंकि दासों को अपने मालिक, जिसने उन्हें गुलाम बना रखा है,से नफरत करने, लड़ने का नैतिक हक प्राप्त होता है लेकिन उन लड़कियों के जेहन में यह पाप की तरह होता था।

उनकी मुक्ति का पथ कब्रगाह के डरावने और सुनसान अंधेरे में जाता था। चूल्हे और चौके की धीमी आंच में सींझती उन औरतों के जीवन में कोई सपना नहीं उगता था। हर महीने कई-कई कठोर व्रतों से गुजरते हुए वे अगले सात जन्मों के लिए उसी परिवेश और पति की कल्पना करतीथीं जो रोज रात को उन्हें सहवास सुख देता था और  बदले में वे बच्चा पैदा करती थीं। आंगन की  भर धूप और हवा में ही उन्हें जीना होता था।


अप्राकृतिक स्थितियों में पड़ी-पड़ी जब अक्सर वे मर जातीं तो उनके मरने को शोक और संवेदना की तरह नहीं, एक निर्जीव सूचना की तरह लिया जाता था। आज भी भारत की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और कमोबेश स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं।  सम्पन्न परिवार धीरे-धीरे शहरी मध्य वर्ग में रूपांतरित होने लगा है। जो विपन्न थे, उनकी बदहाली बेइंतहां बढ़ी है। संयुक्त परिवार का आर्थिक आधार छितरा गया है। संयुक्त परिवार और विवाह संस्था, इन दोनों की मजबूत चार दीवारी में स्त्रियों के प्रति जानवरों से भी कई गुना ज्यादा बर्बर आचरण हमारी दिनचर्या और व्यवहार में इस कदर शामिल था कि हमें अपनी क्रूरताओं का आभास तक नहीं होता था। हमारी महान संस्कृति और सभ्यता का हिस्सा था यह सब। उनकी सुरक्षा, शील और मर्यादित आचरण की दुहाई देकर हम निर्विघ्न और निर्विवाद रूप से जायज काम में शिरकत करते थे। जैसे जेल के पुराने कैदी नये कैदियों के प्रति क्रूर आचरण को अपना नैतिक और भौतिक अधिकार मानते हैं, उसी तरह  घर की बूढ़ी औरतें सास या दादी के रूप में इन औरतों के लिए होती थीं। हजारों साल से उनके साथ यही होता चला आ रहा है।


इस भयानक सच्चाई के साथ-साथ एक और दिलचस्प तथ्य उस परिवेश का अनिवार्य हिस्सा था। अक्सर सुनाई पड़ ही जाता कि फ लां की बहू अपने नौकर से फंसी है। कोई देवर से तो कोई ससुर से। दो-तीन पीढ़ियों को मिलाकर किसी कुटुम्ब का इतिहास बनाया जाय तो यह लगभग हर घर की कहानी थी। परम्पराओं की लाख पहरेदारी और उन बिना झरोखों वाले बन्द कमरों के किसी सुराख से आती रोशनी में तैरते धूलकणों पर संवेदनाएं   अपने लिए रास्ता बना ही लेती थीं। असूयपश्या और योनिशुचिता के आदर्श अक्सर अपने जख्मों को छिपाकर ही बड़बोलापन करते रहते। यह असम्भव है कि जीवन हो और उसके चिन्ह पूरी तरह मिटाये जा सकें। रोशनी में तैरते धूलकणों पर वे झिलमिला ही जाते।


स्त्रीयातना का इतिहास संयुक्त परिवार की कठोर भित्ति पर अंकित था। जब कभी संयुक्त परिवार टूटता तो निर्विवाद तथ्य की तरह उसका जिम्मा औरतों पर डाल दिया जाता। संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर जाती सामाजिक संरचना स्त्री मुक्ति का सबसे निर्णायक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है। वासना के अंधेरे एकांत में रिरियाते और तड़पते पति की कायरता को क्षण-प्रतिक्षण धिक्कारते हुए चतुर सेनापति की तरह स्त्री ने अत्यन्त धैर्य पूर्वक, समय का इंतजार करते हुए कुशल रणनीतिकार  की भूमिका में यह युद्ध जीता है। वह जानती है कि अकेला होते ही मर्द कितना कमजोर और केंचुआ होता है।


परम्पराओं और दंभ की बैसाखी आखिर कितने दिनों तक उसे ताने रहेगी। उसकी शक्ति का स्रोत सीता या साबित्री नहीं, द्रोपदी होने में ही है। लाचारी,अभागापन और घुटन जितना सम्पन्न सवर्ण औरतों के जीवन में था, उतना खेतों में काम करने वाली मजदूर औरतों में नहीं होता था। जर्जर रूढ़ियों और अमानवीय मर्यादाओं की घातक पहरेदारी वहां नहीं थी। अपनी अनिवार्य दिनचर्या में वे प्रत्यक्षत: श्रम से जुड़ी हुई थीं। अपनी सीमित जरूरतों से ज्यादा कमा लेती थीं। वे किसी भी मायने में परजीवी व परिवार और समाज की दया की मुंहताज नहीं थीं। बेहद आत्मनिर्भर होने के कारण उनकी स्थिति बहुत हद तक भिन्न होती थी। वे लड़ लेती थीं। उनकी हत्याएं होती थीं। वे कुएं में कूद कर आत्महत्याएं नहीं करती थीं। कठोर श्रम से पैदा हुए उनके भीतर के आत्म विश्वास के लात खाकर हमारी गौरवशाली परम्पराएं और पूज्य परिवार उनके साथ लगभग ठीक-ठाक ढंग से ही पेश आते थे। उनकी मुसीबतें भिन्न किस्म की होती थीं। वे दूसरी बातें हैं जिनसे उन्हें रूबरू होना पड़ता था। 


स्त्री स्वतंत्रता के संदर्भ में यह तय है कि उनकी स्थिति सवर्ण मध्यमवर्गीय औरतों से बेहतर थी, जिसे उन्होंने कठोर श्रम से हासिल किया था। स्त्री मुक्ति का प्रश्न जब कभी वास्तविक गम्भीरता और सामाजिक सरोकार का प्रश्न बनेगा तो तय है कि उसकी सैद्धांतिकी और अनुभव के स्रोत वही मजदूर औरतें बनेंगी।


लैंगिक और प्राकृतिक भिन्नताओं के आधार पर लड़कियों और महिलाओं को कुछ ऐसी अनचाही स्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिनसे कभी भी किसी पुरुष को गुजरना नहीं पड़ता है। वास्तव में कभी संवेदनशील होकर पुरुष उन समस्याओं के समाधान में स्त्रियों के साथ शिरकत करेंगे, मुझे यकीन नहीं होता।


विवाह संस्था, यौनशुचिता और संयुक्त परिवार के इसी त्रिकोणीय दुष्चक्र के भीतर मरी हुई परियों के पंख छितराये पड़े हैं। इसी त्रिक ोण में हजारों साल से उनके सपनों की लाशें दफनायी जा रही हैं। इस त्रिकोण की जब तक कोई एक भुजा बची रहेगी, स्त्री मुक्ति का प्रश्न कटी पतंग की तरह अपरिहार्य रूप से बिजली के तारों पर फंसा, बेजान, फड़फड़ता रहेगा। अन्तत: बेनतीजा।


आज संयुक्त परिवार लगभग गुजरे जमाने की चीज हो गया है। लगातार फैलते जा रहे शहरी मध्यवर्ग के जीवन  में उसके लिए कोई ‘स्पेस’ नहीं है। एकल परिवार में स्त्री की भूमिका, शक्ल-सूरत और सीरत काफी हद तक बदल चुकी है। विवाह संस्था सिर्फ इस तर्क पर बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहेगी कि ‘आखिर’ इसका विकल्प क्या है? ‘यौनशुचिता’ के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता कि स्त्री जीवन में यह कितनी बनी और बची हुई है। पुरुष अपने पौरुष के दर्प में इसे हमेशा लतियाता आया है। जैसे-जैसे समाज में रोजगार के अवसर विकसित होंगे, स्त्री आत्मनिर्भर होगी, संयुक्त परिवार के आधार पर खड़ी त्रिकोण की दोनों भुजाएं जगह-जगह से चिटकने लगी हैं।

स्त्री मुक्ति के सामाजिक संघर्ष का नेतृत्व वे औरतें कत्तई नहीं करेंगी जो घूसखोर बाप की नाजायज कमाई खा-खाकर चटोर हो चुकी हैं और पति के घर में निकम्मी पड़ी-पड़ी ऊबती हुई समाज और सरोकारों से नफरत करती हैं। स्त्री मुक्ति की सामाजिक जरूरत और उसकी ऐतिहासिक पहल उनके फैशन का हिस्सा भर है, जिनकी दिनचर्चा सुबह-सवेरे घर में चौका-वर्तन, झाड़ू-पोछा करने आयी नौकरानी के साथ,कांव-कांव करते हुए शुरू होती है। ब्यूटी पार्लर और किटी पार्टी में क्लबों में अपने होने का अर्थ तलाशती इन रीतिकालीन नायिकाओं की बंजर संवेदनाओं में एक घास उगाने भर क्षमता नहीं है। एकल परिवार की इन गृहस्वामिनी को अपनी आजादी से ज्यादा पुरुष को गुलाम बनाये रखने की चिन्ता होती है। वे बराबरी के लिए नहीं वर्चस्व के लिए लालायित है।आत्मनिर्भरता किसी भी तरह की आजादी का सबसे बड़ा नैतिक तर्क होता है। वह यहां सिरे से नदारद है।



बावजूद इन सारी संभावनाओं और दलीलों के आज स्त्री बदलने की तैयारी में हैं। लड़कियां अपनी इच्छाओं को जबान और महत्वाकांक्षाओं का पंख लगाने को तत्पर है। पितृसत्तात्मक सामंती समाज के शील, संकोच और मर्यादा शायद ही अपने आवरण में उन्हें छल सकें। कानून और सरकार के बल पर नहीं बाजार के बल पर स्त्री बदल रही है। बाजार स्त्री को हजारों साल की जलालत से मुक्त कर रहा है किसी ऐतिहासिक और सामाजिक सरोकार को समझ कर नहीं, बस इसलिए कि उसे अपने फायदे के लिए नये किस्म के श्रम, नये किस्म की श्रमिक और एकदम नये किस्म के ‘प्रोडक्ट’ की जरूरत है। खतरे कम नहीं है इस राह में। लेकिन छ: फीटी साड़ी और घूंघट को कफन की तरह लपेटे समाज की टिकठी पर और कितने दिन पड़ी रहे स्त्री। हजारों साल की इस पाशविक गुलामी में आखिर ऐसी कौन दुर्दशा बची रह गयी  जिसका भय दिखाकर आप उसे बाजार के मोहक सपनों की ओर जाने से रोक लेंगे।

रविवार, 26 जून 2011

हरि अनंत हरि कथा अनंता

 हरि अनंत, हरि कथा अनंता। इस देश में जो हरि के गुन गाता है, बाबा कहलाता है, जो हरिमय हो जाता है, बापू कहलाता है। हमारे यहां न तो बाबाओं की कमी है, न ही बापुओं की। । राम देव बाबा, जयगुरुदेव बाबा, पायलट बाबा, ड्राइवर बाबा, आशाराम बापू, तमाशाराम बापू। एक ऐसा भी शख्स इस देश में हुआ, जो एक साथ महात्मा भी था, बाबा भी और बापू भी। बापू केवल अपने बच्चों का नहीं, पूरे देश का। वह था गांधी बाबा। हमारे देश में किसी न किसी बहाने इस बाबा की चर्चा होती ही रहती है। भ्रष्टाचार जितना बढ़ रहा है, रघुपति राघव राजाराम का पारायण भी उतना ही बढ़ रहा है। बलात्कार, अपहरण, लूट की घटनाएं बढ़ेंगी तो गांधी का नाम लेने वाले भी बढ़ेगे। यह गांधी का देश है। यहां हर बुराई को ढंकने के लिए गांधी को चादर की तरह तान दिया जाता है। सचाई यह भी है कि गांधी का नाम ज्यादा लिया जा रहा हो तो समझो कोई बड़ा घपला, घोटाला होने वाला है, बड़ी विपदा आने वाली है।

बाबा की बतकही का मौका मिला है तो लगे हाथ  एक और बाबा की चर्चा कर दूं। नागार्जुन बाबा। उनकी जन्मशती मनायी जा रही है। इसलिए उन पर, उनकी कविता पर बात हो रही है। उन्हीं की एक कविता है, गांधी के तीन बंदर। वैसे तो यह पूरी कविता ही उल्लेखनीय है लेकिन मेरी पसंद की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं..ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के। बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के। गुरुओं के भी गुरू बने हैं तीनों बंदर बापू के। बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के। बापू को उनके तीनों बंदर क्या बना रहे हैं? नागार्जुन बाबा ने गोल कर दिया। सोचा होगा, लोग समझदार हो गये हैं। पढ़ेंगे तो समझ ही जायेंगे। बाबा ने ये कविता बहुत पहले लिखी थी। अब तो गांधी के तीनों बंदर और भी चालाक और शातिर हो गये है। गांधी ने अपने जीवन में तमाम तरह के प्रयोग किये थे। उनके बंदर भी प्रयोगधर्मा हैं। गुरु ने सत्य के साथ प्रयोग किया, उनके बंदर असत्य के साथ प्रयोग कर रहे हैं। सफेद हो या केसरिया या किसी भी रंग की, मत पूछो, टोपी के पीछे क्या है। गांधी के बंदरों ने उनकी जीवनी बार-बार पढ़ी है। अपने जिन प्रयोगों के बारे में गांधी ने खुलकर नहीं लिखा मगर भूले-भटके अपनी चिट्ठियों में यदा-कदा जिक्र किया, बंदरों ने चोरी-चुपके उनका भी स्वाद चखा है। आखिर वे गांधी के बंदर हैं, कोई ऐरे-गैरे नहीं।

 गांधी ने पहले लंगोटी पहनी फिर प्रयोग शुरू किये। उनके बंदरों को पता है कि इसका उल्टा भी हो सकता है। अगर गांधी की तरह प्रयोग शुरू किया तो केवल लंगोटी ही बच जायेगी। असत्य के बिना सत्य का अस्तित्व नहीं। सत्य की चर्चा इसीलिए होती है, क्योंकि असत्य की सत्ता कायम है। कई बार सत्य की सत्ता की स्थापना अर्धसत्य या असत्य की ताकत से होती है। नागार्जुन बाबा की मानो तो गांधी के बंदर बड़े ज्ञानी हैं। उन्हें वाल्मीकि की कथा भी मालूम है। राम, राम नहीं आता तो मरा, मरा कहो। असत्य के साथ प्रयोग करो, सत्य का संधान अपने आप संभव हो जायेगा। जीवन में सुख हो, समृद्धि हो, ऐश्वर्य हो, यही तो चाहिए। क्या यह सत्य से मिलेगा? त्याग तो तभी संभव होगा, जब त्यागने लायक कुछ हो। इसलिए पहले अपना घर ठीक करो। छल से, कपट से, गबन से, अपहरण से, जैसे भी हो सके। बड़ी-बड़ी योजनाएं डकारनी हैं, यहां वन जी, टू जी क्या कई हंड्रेड जी लाइन में खड़े हैं।

मौका मिला नहीं कि कोयले की खदान तक निगल जायेंगे, जनता का करोड़ों रूपया अपने घर की सजावट में लगा देंगे, बचा तो रोज एक नया जूता पहनने का अरमान भी तो पूरा होना चाहिए। कीमती 365 जोड़ी तो होने ही चाहिए। प्रयोग वे अच्छे हैं जो गांधी को याद रखने लायक बनाये। खुद गांधी बनने से क्या मिलेगा। जीतेजी सत्य का नरक भोगें तो मरने के बाद कुछ चौराहों पर मूर्तियां लगने से क्या मिलने वाला। ऐसा बनो यार कि जीतेजी मूर्तियां तन जायें, उधर से गुजरो तो लगे कि तुम्हारी भी कोई सत्ता है। अहिंसा भी क्या देगी। किसी को दुखी न करें तो सुखी कैसे हो पायेंगे। जमीनें कब्जानी हैं, आलीशान घर बनाने हैं, बड़ी गाड़ियां खरीदनी हैं और कुछ स्विस बैंक में भी तो होना चाहिए। यह सब दूसरों को पीड़ित किये बिना आखिर कैसे संभव है। इसलिए गांधी के बंदर हिंसा को एक नयी प्रयोगभूमि की तरह स्वीकार कर चुके हैं। भूल जाइए कि गांधी की कांग्रेस में ही उनके बंदर मिलेंगे। गांधी की कांग्रेस भी अब रही कहां। बापू के बंदर बापू के ताऊ बन गये हैं। वे अब हर जगह हैं। उनका ब्रांड सर्वदलीय है, वे सर्वसमाज में व्याप्त हैं। जिधर जाइयेगा, उधर पाइयेगा। वे गांधी को तो बना ही रहे, सबको उल्लू बना रहे हैं, खूब खा रहे हैं और गा रहे हैं, रघुपति राघव राजाराम, सबको सन्मति दे भगवान।        

रविवार, 19 जून 2011

कासी गुरू की आत्मा

ओम तद्भवाय  नमः|   अखिलेशाय नमः |  शब्ददंडधारी स्वामी अखिलेश जी की कृपा से मेरी मुलाकात कासी गुरू की आत्मा से हुई। हालांकि वे स्वयं ई ससुरी आत्मा से बहुत परेशान दिखे। उनका अनुभव है कि यह सहृदय, दयावान, करुण, कातर सी चीज न होती तो वे अपनी मोटरबाइक से हाथ न धो बैठते। हुआ कुछ यूं कि बड़े जुगाड़ से उन्होंने बाइक खरीदी। बड़े जतन से उसे धो-पोंछ कर रखते, संभाल के चलाते। हरदम चमाचम रहती। पर एक दिन वे एक साइकिलवाले से टकरा गये। एक चला रहा था और दूसरा डंडे पर बैठा था। गुरू को पता ही नहीं चला क्या हुआ पर वे दोनों सड़क पर पसर कर खामोश हो गये। गुरू ने पहले तो भागने में ही भलाई समझी पर कुछ दूर जाकर उनकी आत्मा जग गयी। वे लौटे, सोचा बच्चों की मदद कर दें, बेचारे घायल हो गये हैं। वे बच्चों को नादान समझ रहे थे पर जैसे ही बाइक से उतरकर उनके पास आये, समूची करुणा के साथ एक को हिलाने-डुलाने की कोशिश की, दूसरा उनकी बाइक ले उड़ा। वे दौड़े मगर कुछ दूर जाकर मुंह बाकर खड़े हो गये। बाइक गयी सो गयी, यह गुरुआ की बड़ी चिंता नहीं थी, चिंता यह थी कि अगर आत्मा ऐसे ही जगी रही तो न जाने क्या-क्या अनर्थ होगा।

कासी गुरू कोई झूठ नहीं बोल रहे। एक बार मैं भी इसी आत्मा के चक्कर में जेल जाते-जाते बचा, पत्रकार न होता और पुलिस थोड़ा फेवर न करती तो या तो मेरी जमकर कुटाई हुई होती या फिर जेल की यात्रा करनी पड़ती। यह आत्मा सचमुच बहुत अनर्थकारी है। अगर आप को महान और निरापद आसन चाहिए, आप की समाज में अपना डंका पिटवाने की सदिच्छा है, सरस सुख-संपदा अर्जित करनी है, ऐश और परमभोग की आकांक्षा है तो अपनी आत्मा से तत्काल तौबा कर लीजिए, उसे दबाये रहिये या कोई खास तकलीफ न हो तो उसे मार ही दीजिए। थोड़ा कष्ट होगा क्योकि सहजावस्था में आत्मा जगी ही रहती है और किसी को जागते में मारना श्रमसाध्य ही नहीं बहुत दुखदायी भी है। परंतु शास्त्र कहते हैं कि बड़े पुण्य के लिए किंचित पाप भी करना पड़े तो बुरा नहीं है, साधारण दुख से असाधारण सुख की प्राप्ति हो सके, तो किसी भी तरह अस्वीकार्य नहीं है। सभी मानते हैं,इसलिए आप भी यह मान लें कि हर दुख अपने परिणाम में सुख ही होता है। आत्मा के चक्कर में हमारी कई पीढ़ियों ने बहुत समय नष्ट किया है, अपना तो कबाड़ा किया ही, पूरे समाज का, देश का भी कबाड़ा किया।

 यह दिखती नहीं, यह अगम्य है। नयमात्मा प्रवचनेन लभ्य, नहिं बहुश्रुतेन। न प्रवचन से मिलती है, न बहुत सुन कर कंठस्थ कर लेने से, न हठ से मिलती है, न योग से, न बलहीन को मिलती है, न बलशाली को। इतना जानकर भी कुछ लोग आत्मा को पाने के व्यर्थ प्रयास में लगे रहते हैं और कुछ कासी गुरू जैसे कभी-कभी इस दयनीय भ्रम के शिकार हो जाते हैं कि भीतर से आत्मा बोल रही है, उसकी आवाज सुनो। उसकी आवाज सुन ली तो समझो ठगे गये। आजकल जो सबसे ज्यादा आत्मा-परमात्मा की बात करते हैं, वे भीतर से समझ चुके होते हैं कि आत्मा-वात्मा जैसी कोई चीज नहीं है, पर इसे स्वार्थपूर्ति के परमधर्म की प्राप्ति के लिए विकट विराट अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। वे आत्मसाक्षात्कारसंपन्न जीव इस जगत में सबसे सुखी प्राणी हैं। वे सम्मान से बाबा कहे जाते हैं, भले ही वे अवसरानुकूल वाम-दक्षिण हो सकते हों, कभी पुरुष, कभी नारी या किन्नर का वेश धरने में किंचित संकोच न करते हों।

 उनकी योगकाया का आसनाभ्यास और उनकी रोमांच भरी रुदनाल्हादमयी नाट्य प्रस्तुति से लाखों लोगों की जड़ आत्मा थोड़ी देर के लिए जग उठती है। ऐसे बाबाओं के लिए करोड़ क्या, अरब क्या, नौ-दो-ग्यारह अरब क्या। वे निरंतर ठगात्मवत ही रहते हैं इसलिए वे अगर महिलाओं के साथ कोई अभद्रता भी करें तो भी उसे कल्याणकारी मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। आप ने अपनी आत्मा मार दी तो किसी को भी मार देना आप के लिए बहुत सहज होगा। फिर आप चोरी, ठगी, बलात्कार, हत्या से भी परे चले जायेंगे। किसी कर्म का परिणाम भुगतने की विवशता से मुक्त हो जायेंगे। हर आदमी की आत्मा अलग-अलग व्यवहार करती है, इसीलिए बड़े राजनीतिकार अक्सर अंतरात्मा की आवाज पर चुनाव की बात करते हैं। कोई जरूरी नहीं कि सबकी अंतरात्मा से एक ही आवाज उठे। अगर आत्मा एक होती तो ऐसा क्यों होता या फिर जिसने आत्मा मार डाली है या जो आत्मा के होने को स्वीकार नहीं करते, क्या वे ऐसे वक्त में निर्णय नहीं करते? इससे यह अनुमान सहज ही सही लगने लगता है कि आत्मा भी अपने अर्थ का, अपने लाभ का ध्यान रखती है। जो आत्मार्थ है, वही स्वार्थ है। अगर कासी गुरू यह अर्थ लगाते तो उनकी बाइक बच गयी होती। आप भी अगर निपट संन्यासी नहीं हैं तो जीवन में कुछ लाभ-लोभ रखना ठीक रहेगा। आत्मा के अर्थ को यानि उसकी व्यर्थता को जितना जल्दी समझ लेंगे, परमात्मा आप की उतनी ही मदद करेगा। शुभमस्तु।

रविवार, 12 जून 2011

मैं नाच्यो बहुत गुपाल

सुषमा जी नाची तो मेरा मन भी नाचने को हुआ। पता नहीं वे जानती कि नहीं पर मैं जानता हूं कि सबहिं नचावत राम गुसाई। समूचा जगत एक विशाल रंग-मंच की तरह है। हम सभी नाच रहे हैं। एक अदृश्य धागे में बंधे हुए, जिसका सूत्र किसी और के हाथ में है। एक झीने पर्दे के पीछे खड़ा वह सबको नचा रहा है। अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हमें कोई नचा रहा है। अलग-अलग हर कोई सोचता है कि वह अपने ताल पर नाच रहा है, कभी-कभी कई लोगों के मन में यह भी गुमान होता है कि वे औरों को भी नचा रहे हैं। हर कोई दूसरों को अपने इशारे पर नचाना चाहता है। यह सहज नहीं है, पर इसमें खुशी मिलती है। अगर आप लोगों को अपनी उंगली पर नचा सकें तो आप बड़े होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं। कभी-कभी लोग अपना काम निकालने के लिए भी प्रभावशाली लोगों के लय-ताल पर नाचते रहते हैं। जब अनायास बहुत खुशी मिल जाये तब भी आदमी नाच उठता है। इसके विपरीत कई बार गुस्से में भी, किसी की कड़वी बात से भी आदमी नाच उठता है।

आदिम काल से सौंदर्य पर रीझकर आदमी नाचता रहा है, सुंदरता किसी को भी नचा सकती है। इसीलिए हर काल में सुंदर स्त्रियां सबको नचाती रही हैं। इसी गुण के कारण वे बहुत आसानी से न केवल सत्ता के पास  बने रहने में कामयाब रही हैं, बल्कि सत्ता का पहिया घुमा देने में भी। आज भी दुनिया में अनेक मजबूत इरादों वाली चालाक, बुद्धिमान या खूबसूरत महिलाएं हैं, जिनके इशारे पर तमाम बड़े-बड़े लोग नाच रहे हैं। नाच के मूल में जायें तो यह नाट्य का ही रूपांतर है। भगवान शंकर आदि नट माने जाते हैं। वे जगत के कल्याण में लगे रहते हैं। वे आसानी से नहीं नाचते। पर वे जब नाचते हैं तो समूचा ब्रह्मांड नाच उठता है, धरती, सूर्य, तारे नाच उठते हैं, समुद्र अपनी फेनिल लहरों पर सवार होकर नाचने लगता है। शिव के इस नृत्य से तांडव मच जाता है।

भरत के नाट्यशस्त्र के अनुसार नाट्य शब्द में संगीत, नाटक, नृत्य, वाद्य सब कुछ शामिल है। नौटंकी भी नाट्य का ही एक रूप है। पर नाच केवल नाच है। जिसे नाचना आता है, वह भाग्यशली है। वह सबको लुभा सकता है, सम्मोहित कर सकता है। जिसे नहीं आता है, उसके लिए तो आंगन टेढ़ा है। कोई तो बहाना चाहिए। हिंदी के संत काव्य में नाच का बड़ा महत्व है। मीरा हों या सूरदास या कोई और भक्त कवि, वे अपने आराध्य के सामने नाचने में कतई संकोच नहीं करते पर वे इस तरह नाचते-नाचते अपने प्रिय को नचाने भी लगते हैं। मीरा कहती हैं, वृन्दावन में रास रचायो, नाचत बाल मुकुन्दा। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटे जम का फन्दा। भक्त नाचता है तो भगवान भी नाचने लगते हैं। रास है क्या? एक ही समय में सबके साथ कृष्ण का नाचना। असल में भक्त खुद को मिटाना नहीं चाहता। उसे भगवान का सामने होना रोमांचित करता है। इस रोमांच को वह बनाये रखना चाहता है। वह अपना कृष्ण खुद ही बन जाता है और अपने ही साथ नाचने लगता है। वही कृष्ण होता है, वही राधा। उसे समझ में नहीं आता है कि यह सब कैसे हुआ लेकिन उत्कट प्रेम में वह अपनी संपूर्ण संभावना के साथ अपने ही शरीर से बाहर खड़ा हो जाता है, खुद को ही कृष्ण के रूप में रच लेता है, अपनी कल्पना के साथ नाच उठता है।

लेकिन इस नाच के पहले भी एक नाच देखना पड़ता है। जब तक वह अपनी सत्ता से अपरिचित रहता है, कुछ पाने की होड़ में नाचता रहता है। काम-क्रोध का चोला पहनकर, विषयों की माला से लदा हुआ, निंदा की रसमयता में निमग्न, मोह के घुंघरू बांधे वह एक अलग तरह के नृत्य में मगन रहता है। लालच के ताल पर, माया का वसन पहने, लोभ का तिलक लगाये वह एक ऐसी दुनिया में नाचता रहता है, जो होती ही नहीं। भ्रम की दुनिया, अज्ञान की दुनिया। जब कभी खुद पर अपनी कृपा होती है, वह इस अंधकार से बाहर आ पाता है। जब सच समझ में आता है, वह चिल्ला पड़ता है, बहुत नाच लिया भगवान, अब इस अज्ञान से बाहर करो। जैसे ही भावात्मक गहराई से ऐसा निवेदन उभरता है, वह महारास में शामिल हो जाता है। कृष्ण के साथ नाचने लगता है, कृष्णमय हो जाता है।

यह नाचना बड़ा ही अद्भुत है। जिसे अपने ताल पर, अपने लय पर नाचना आ जाता है, जिसे अपनी सत्ता का बोध हो जाता है, जो अपने ही आईने के सामने खड़ा होकर खुद को देखने का साहस कर लेता है, उसे और नाचने की जरूरत नहीं रह जाती। जो दुनिया की सुख-सुविधाएं हासिल करने के लिए नाचते-नाचते थक गया, जिसे अहसास हो गया कि अब सिर्फ नाचना है, इस तरह नाचना है कि जीवन नृत्य में ही बदल जाये, वही इस रंग-मंच का असली नट साबित होता है, वही नटवर की शरण हासिल कर पाता है। नाचते-नाचते जब हृदय बेचैन हो जाय, मन थक जाय और बोल पड़े, अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल तो समझो काम बन गया।

मंगलवार, 31 मई 2011

ढाई आखर प्रेम का

जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी। फुटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कहे गियानी। कबीर के अनेक रूप हैं। कभी बाहर, कभी भीतर, कभी बाहर-भीतर दोनों ही जगह। वे सबमें खुद को ढूढते हैं, सबको अपने जैसा बनाना चाहते हैं। कभी कूता राम का तो कभी जस की तस धर दीनी चदरिया वाले व्यक्तित्व में, कभी ढाई आखर की वकालत करते हुए तो कभी बांग देने वालों और पाहन पूजने वालों, गंगा नहाने वालों को एक साथ लताड़ते हुए। कभी ज्ञानी के रूप में तो कभी अदने बुनकर के रूप में। पर हर रूप में वे कबीर ही बने रहते हैं। कबीर यानी एक समूचा आदमी। आदमी होना बहुत ही कठिन है। कबीर के जमाने में भी कठिन था। उन्होंने पहले खुद को ठीक किया। बहुत पापड़ बेले। गुरु भी किया। नाम नहीं बताते हैं। शायद गुरु की तलाश में उनकी भेंट तमाम गुरु-घंटालों से हुई, इसलिए सजग भी किया। गुरु करना मगर ठोंक-बजाकर, कहीं अंधा मिल गया तो बड़ी दुर्गति होगी। अंधे अंधा ठेलिया दुन्यू कूप पड़ंत। तुम तो अंधे-अज्ञानी हो ही, तभी तो भीतर कोई दीप जलाने वाला ढूढ रहे हो। वह भी अंधा हुआ तो? बहुत सारे अंधे मिले होंगे कबीर को भी लेकिन वे सजग थे, उनकी आंखें खुली हुई थीं, वे अपनी प्रारंभिक यात्रा में ही इतना समझ गये थे कि उजाला बंद आंखों से नहीं मिलेगा, जागते रहना होगा। जो जागेगा सो पावेगा, जो सोवेगा, सो खोवेगा।

उनका यह जागना ही उन्हें रास्ता दिखाता गया। उन्होंने अपने भीतर खुद जागना सीख लिया था। यही समझ उनकी गुरु बनी। वे अपने गुरु,अपने दीप खुद ही बने। कबीर का जागना केवल आंखें खोले रहने भर तक नहीं था। बहुत से लोग खुली आंखों में सोये रहते हैं। कुछ अपने दिवास्वप्न में मग्न तो कुछ अपने स्वार्थस्वप्न को साकार करने में निमग्न। कुछ देख कर भी नहीं देखते तो कुछ उतना ही देखते हैं, जितना देखना चाहते हैं। कुछ प्रतिरोधहीनता से ग्रस्त, मरे हुए तो कुछ हर हाल में अनीतिकारी और पाखंडी ताकतों के आगे बिछ जाने को तत्पर। धूमिल ठीक ही कहते हैं, जिसकी पूंछ उठाकर देखो, मादा ही निकलता है। ऐसे लोगों का जागना क्या और सोना क्या। जो अपने से कमजोर पर हमेशा गुर्राता हो, उसकी हथेली में आते उसके हक को भी छीन लेना चाहता हो और अपने से ताकतवर को देखते ही पूंछ दबाकर निकल जाता हो, वह जगा हुआ कैसे हो सकता है। वह तो ऐसी गहरी नींद में है कि उसने मनुष्यता ही त्याग दी है। उसने अपना एक जंगल रच लिया है और उसी में खुश है। उसे जानवर या जंगली तो कह सकते हैं, पर आदमी नहीं।

कबीर को इसी जंगल में आदमी की तलाश थी, वे जंगलपन के खिलाफ लड़ रहे थे, आज भी  लड़ रहे हैं। कबीर ने कहा, सारा ज्ञान ढाई आखर में है। यह किताबें पढ़कर नहीं समझ में आयेगा, योग करने से भी नहीं समझ में आयेगा, इसके लिए खुद को मिटाना पड़ेगा। प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहिं। प्रेम तभी कर सकोगे, जब हरि के लिए खुद को मिटा दो। तुम बने रहोगे तो हरि नहीं होगा और हरि होगा तो तुम्हारा बने रहना संभव नहीं है। यह हरि ही जल सरीखा है। भीतर भी, बाहर भी। प्रेम कर नहीं पाते हो क्योंकि तुम्हारी समझ में आता ही नहीं कि तुम्हारे भीतर, कुंभ में जो जल है, बाहर भी वही जल है। बस कुंभ को फोड़ देना है, आत्ममोह, आत्मरति और अपने लिए खुद के होने से मुक्त हो जाना है। तभी सच में दूसरों की पीड़ा समझने की सामर्थ्य जन्मेगी, तभी दूसरों का दुख समझ में आयेगा, तभी अन्याय, दमन, अत्याचार के अर्थ भी खुलेंगे और उनके प्रतिकार का भाव पैदा होगा। यही दूसरों के लिए जीना है, यही मनुष्य होना है। केवल अपने लिए तो कीड़े-मकोड़े भी जी लेते हैं, अगर कोई मनुज भी ऐसा ही करता है तो वह कीचड़ में बिलबिलाते कीड़ों से बेहतर जिंदगी कहां जी रहा है।

दूसरों के लिए जीना ही प्रेम है, दूसरों के लिए मिट जाना ही ढाई आखर की समझ है। पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंड़ित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय। जिसने दुनिया भर का दर्शन पढ़ लिया, मोटे-मोटे ग्रंथ रट लिये, अच्छा प्रवचन करना सीख लिया, वही पंडित है, यह समझ थोथी है। जिसने प्रेम का अर्थ जान लिया, प्रेम करना सीख लिया, जिसे ढाई अक्षर की समझ आ गयी, वह पंडित है। कबीर को समझना इसी प्रेम को समझना है। प्रेम का उनसे बड़ा मर्मज्ञ कोई और नहीं दिखता। वे लोगों को ललकारते हैं, डांटते-डपटते हैं तो केवल इसीलिए कि वे शर्म से ही सही अपने भीतर झांके तो सही। शायद अपने ही अनेक चेहरे एक साथ देख सकें। कबीर को इसमें कितनी सफलता मिली, इसका मूल्यांकन होता रहा है, आगे भी होता रहेगा लेकिन इतना सच तो कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता कि वे जिंदा हैं, उनका प्रेम भी जिंदा है।         

रविवार, 29 मई 2011

मलिन मीडिया में संजीवनी जैसे सहाय साहब

 निरंजन परिहार की कलम से
अम्बिकानंद सहाय
प्रभु चावला, वीर संघवी, बरखा दत्त और ऐसे ही कुछ और दलाल दोषित हो चुके दोहरे चेहरों की वजह से मीडिया की छवि भले मलीन हुई हो। लेकिन इस घनघोर और घटाटोप परिदृश्य में अंबिकानंद सहाय नाम का  एक आदमी ऐसा भी निकला, जो मलीन होते मीडिया की भीड़ में हम सबके बीच रहते हुए भी बहुत अलग और बाकियों से आज कई गुना ज्यादा ऊंचा खड़ा दिखाई दे रहा है। प्रभु चावला मीडिया में अपने आपको बहुत तुर्रमखां के रूप में पेश करते नहीं थकते थे। लेकिन रसूखदार, रंगीन और रसीले अमरसिंह के उनके सामने गें-गैं, फैं-फैं करते, लाचार, बेबस और दीन-हीन स्वरूप में करीब-करीब पूंछ हिलाते हुए नजर आते हैं। अमरसिंह धमकाते हैं, और प्रभु चावला अमरसिंह से करबद्ध स्वरूप में दंडवत होकर माफ करने की प्रार्थना करते नजर आते हैं। वही अमर सिंह अपने इन्हीं टेप में सहारा समय के तत्कालीन मुखिया अंबिकानंद सहाय और सुधीर कुमार श्रीवास्तव के नाम पर खुद को बेबस और लाचार महसूस करते नजर आते हैं। वह भी उन दिनों जब अमर सिंह की सहारा परिवीर में तूती बोलती थी।

हर सुबह मीडिया के किसी आदमी के दलाल हो जाने की खबरों के माहौल बीच यह एक बेहद अच्छी और सुकून भरी खबर है। यह साफ लगता है कि माहौल भले ही ऐसा बन गया हो कि मीडिया सिर्फ दलालों की मंड़ी बन कर रह गया है। लेकिन अंबिकानंद सहाय के रूप में दूर कहीं कोई एक मशाल अब भी जल रही है, जिसे मीडिया में मर्दानगी की बाकी बची मिसाल के तौर पर पेश किया जा सकता है।
अमर सिंह के टेप से टपकती बातों और नीरा राडिया के नजरानों के राज खुलने के बाद कइयों की भरपूर मट्टी पलीद हुई है। प्रभु चावला, वीर संघवी, बरखा दत्त और ऐसे ही कुछ और नाम इसके सबसे बड़े सबूत हैं। इन टेप के सार्वजनिक हो जाने के बाद अमरसिंह और राड़िया ने मीड़िया की इन मरी हुई ‘महान’ आत्माओं को सबके सामने नंगा करके खड़ा होने को मजबूर कर दिया है। लेकिन कोई जब औरों को नंगा करता है, तो उसके अपने शरीर पर भी कपड़े कहां बचे रहते हैं ! इसीलिए प्रभु चावला को गिड़गिड़ाने पर मजबूर करनेवाले और रजत शर्मा को अपना बुलडॉग कहनेवाले अमरसिंह सहारा समय के तत्कालीन मुखिया अंबिकानंद सहाय और सुधीर कुमार श्रीवास्तव के बारे में बात करते हुए खुद लाचारी और बेबसी के साथ हांफते हुए नजर आते हैं।

अंबिकानंद सहाय की पत्रकारीय क्षमताओं और सुधीर कुमार श्रीवास्तव की प्रबंधकीय ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सहारा समय के ये दोनों कर्ताधर्ता अमरसिंह के सामने बिल्कुल नहीं झुके। वह भी ऐसे में जब अमरसिंह सहारा इंडिया परिवार के डायरेक्टर हुआ करते थे।
आज की तारीख में तो अंबिकानंद सहाय संभवतया एकमात्र ऐसे पत्रकार हैं, जिनके बारे में बात करते हुए अमर सिंह अपने ही टेप में मान रहे हैं कि ‘सहाय साहब’ को मैनेज नहीं किया जा सकता। पूरी बातचीत में यह संकेत साफ है कि सहारा समय के संचालन और खबरों के सहित अपने कामकाज के मामले में अंबिकानंद सहाय अपनी कंपनी के डायरेक्टर अमर सिंह को किसी भी तरह के हस्तक्षेप की कोई इजाजत नहीं दे रहे थे। अंबिकानंद सहाय ने कभी भी अमरसिंह को कतई नहीं गांठा। अमरसिंह सहारा मीडिया में अपनी एक ना चल पाने की वजह से कितने परेशान थे, इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि सबके सामने सहाय साहब कहनेवाले अमरसिंह शिकायती लहजे में अभिजीत सरकार के साथ बातचीत में झुझलाहट में अंबिका सहाय कहकर अपनी भड़ास निकालते नजर आते हैं। जबकि सभी जानते हैं कि सहारा इंडिया परिवार के मुखिया सहाराश्री सुब्रता रॉय सहारा तक अंबिकानंद सहाय को सम्मान के साथ अकेले में भी सहाय साहब कहकर बुलाते हैं।

बाद में तो खैर, यह विवाद बहुत आगे बढ़ गया। अमरसिंह खुद इस टेप में कह रहे हैं कि अगर हमारी इतनी भी नहीं चलती है तो, मैंने तो चिट्ठी भेज दी है और अब मैं रहूंगा भी नहीं। इस पूरे वाकये के अपन चश्मदीद हैं। अपन अच्छी तरह जानते है कि, सहाय साहब ने सहारा से अचानक अपने आपको अलग कर लिया। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि सहाराश्री और अमरसिंह के साथ संबंधों में खराबी की वजह उनको नहीं माना जाएं। वैसे संबंधों के समीकरण का भी अपनी अलग संसार हुआ करता है। सहारा मीडिया के मुखिया से हटने के बाद भी अंबिकानंद सहाय आज भी सहाराश्री के बहुत अंतरंग लोगों में हैं। और अमरसिंह की आज सहारा परिवार में क्या औकात हैं, यह पूरी दुनिया को पता है।
सहाय साहब, आपको हजारों हजार सलाम। इसलिए कि आप दलालों के सामने कतई झुके नहीं। लेकिन मीडिया की मंडी में अंबिकानंद सहाय जैसे और कितने लोग हैं, उनको भी ढूंढ़ – ढूंढकर सामने लाने की जरूरत है। ताकि यह साबित किया जा सके कि मीडिया में अब भी मजबूत लोगों की एक पूरी पीढ़ी मौजूद है। वरना प्रभु चावला, वीर संघवी, बरखा दत्त और ऐसे ही कुछ और दलाल साबित हो चुके लोगों ने तो मीडिया की इज्जत का दिवाला निकाल ही दिया है। बात गलत तो नहीं?

पेश है सहाराश्री सुब्रत राय के करीबी रिश्तेदार अभिजीत सरकार से फोन पर हुई अमर सिंह की शिकायती बातचीत के अंश.....

अभिजीत---हलो..
अमर सिंह—हां अभिजीत..
अभिजीत—जी जी जी सर, सर...
अमर सिंह—वो असल में ...वो दूसरे लाइन पर कोई आ गया था। (ये सब कहते हुए अमर सिंह जोर जोर से हांफ रहे हैं)
अभिजीत—जी सर जी सर
अमर सिंह---हां क्या पूछ रहे थे तुम
अभिजीत—मैं बोल रहा था, कोई प्रॉब्लम हो गया था क्या शैलेन्द्र वगैरह के साथ
अमर सिंह—नहीं शैलेन्द्र वगैरह से ज्यादा प्रॉब्लम अंबिका (नंद) सहाय के साथ है और सुधीर श्रीवास्तव के साथ है।
अभिजीत—क्या हुआ है सर
अमर सिंह--- प्रोब्लम ही प्रोब्लम है। बात ये है कि कोई ......नहीं है। मने कोई कुछ भी करना चाहे करे, उसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन, अगर दादा ने बोला है तो ये लोग कुछ भी करें बता दें। हमारी जानकारी में रहे।
अभिजीत--- डू यू वॉण्ट मी टू इनिसिएट समथिंग।
अमर सिंह—नहीं नहीं कुछ नहीं। मैंने तो चिट्ठी भेज दी कि मैं रहूंगा नहीं इसमें और मैं रहने वाला भी नहीं हूं। इनिसिएशन क्या करना है।
अभिजीत—नहीं, फिर उनलोग को बोलें जा के कि आपसे मिलें और क्या।
अमर सिंह--- नहीं नहीं मुझे जरूरत नहीं है। हलो।
अभिजीत—जी सर।
अमर सिंह—मेरा काम तो चल जाएगा।
अभिजीत—नहीं, आपका तो चल ही जाएगा सर। उनलोगों को तो मिलना चाहिए न। दे शुड पे रेस्पेक्ट टू यू न सर।

अमर सिंह—नहीं नहीं, वो नहीं करेंगे। अंबिका (नंद) सहाय वगैरह नहीं करेंगे। उनकी ज्यादा जरूरत है परिवार (सहारा परिवार) को।


रविवार, 22 मई 2011

अविश्वास के साये में

कभी-कभी सोचता हूं क्या कुछ लोग ऐसे मिल सकते हैं, जिन पर भरोसा कर सकूं, पूरा भरोसा कि वे जो कह रहे हैं, वैसा कर दिखायेंगे, कि वे विश्वास पर खरा न उतरने की जगह मिट जाना पसंद करेंगे, कि वे कभी अविश्वास का कोई मौका नहीं आने देंगे, कि वे ऐसी किसी भी परीक्षा में धैर्य नहीं खोयेंगे और अंतिम दम तक लड़ेंगे अपनी पहचान के लिए, अपने वादे के लिए, अपने संकल्प के लिए। कई बार यह सवाल मैं खुद से भी करता हूं कि क्या मैं स्वयं ऐसा हो पाया हूं, क्या मैं दूसरों के विश्वास पर खरा उतरने लायक बन सका हूं, क्या मुझमें इतना दम है कि मैं लड़ सकूं दूसरों के विश्वास को सच साबित करने के लिए? इन सवालों के उत्तर दे पाना इतना आसान नहीं है।

विश्वास का संकट इस सदी के सबसे बड़े संकट के रूप में उभरा है। लालच ने आदमी को धूर्त और पाखंडी बना दिया है। अक्सर लोग दूसरों के सामने पहेलियों की तरह प्रस्तुत होते हैं। बूझ सको तो बूझ। जिसकी वाणी से मानस के उपदेश झर रहे हों, मर्यादा और मानवता के मंत्रों से जिसके शब्द दीप्त लगते हों, जो रावणी ताकतों के विनाश का संकल्प घोष कर रहा हो, जरूरी नहीं कि वह अपने असली रूप में वैसा ही हो। हो सकता है कि इस तरह वह अपने विरोधियों की पहचान करने की कोशिश कर रहा हो, ताकि उनसे सजग रह सके, बच सके। हो सकता है, इस तरह वह मनुष्यता के समर्थक, उसे धारण करने वालों से छल कर उनका इस्तेमाल करना चाह रहा हो, उनका शोषण करने को उद्यत हो। किसी आदमी के भाल पर टंगे त्रिपुंड, जिह्वा से निसृत होते परमार्थ छंद और शरीर पर धवल वस्त्रों की सादगी से यह समझना भूल होगी कि  वह समाज का, देश का भला करना चाहता है, वह धोखा नहीं देगा या वह ठग नहीं होगा। हाल के कुछ महीनों में सवा अरब जनता को ठगने वाले कुछ बड़े वंचक लोगों के सामने आये हैं, सबने देखा कि वे अपने हाव-भाव से, अपनी वेश-भूषा से, अपने बात-व्यवहार से कितने महान तपस्वी दिख रहे थे लेकिन अपने कर्म से कितने छली, कितने थेथर, कितने उचक्के-बदमाश।

कबीर ने अपने जमाने में ऐसे लोगों की जमकर धज्जियां उड़ायी, अति समर्थ ढोंगियों के चेहरे से नकाब खींचने में तनिक संकोच नहीं किया, शक्तिशाली साम्प्रदायिक रुढ़ियों और प्रवंचनाओं को भी अपने मजबूत, सतर्क और कठोर प्रहार से ढहा देने की कोशिश की पर जब वे नहीं रहे तो उन्हीं के नाम पर वही सब होने लगा, जिसका उन्होंने जीवन भर विरोध किया। कबीर आज भी वैसे ही चमकते दिखायी पड़ते हैं,वैसे ही बोलते, चीखते नजर आते हैं पर कौन सुनता है। सैकड़ों वर्षों से जिन लोगों को वे ललकारते रहे हैं, आज वही लोग बिना खुद को बदले उनकी आवाज में आवाज मिला रहे हैं। क्या करें कबीर? अक्सर आप भी देखते होंगे, बेईमान और भ्रष्ट नेताओं को जनता के सामने अपने प्रवचनों में दुष्यंत के चमकदार शेर उछालते हुए। सिर्फ हंगामा ख़ड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए या कौन कहता है कि आसमां में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों या इसी तरह का कुछ और। वे थोड़ी देर के लिए अपने मरे और सड़ते हुए इरादों को बदलाव की चमकीली गूंज से ढंक लेना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनका अपना चेहरा विश्वसनीय नहीं है, गंदा है, उसके पहचाने जाने का डर है। कभी-कभी यह ओढ़ी हुई चमक भी काम आ जाती है। 

ध्यान से देखें तो बुरा और बेईमान भी भला, नेक और ईमानदार दिखना चाहता है। इसलिए कि अभी भी जनता ऐसे चेहरे पसंद करती है। आमतौर पर कोई भी आदमी सही रास्ता छोड़ना नहीं चाहता, जब तक कोई बड़ी मजबूरी न हो। घटिया तरीकों से समाज में समर्थ हैसियत बना चुके लोग और गिनती के लोगों के स्वार्थसाधन में जुटी व्यवस्था आमजन को मजबूर करती है, बेईमान बनाती है। और एक बार इसका लाभ मिल गया तो लोभ बढ़ता जाता है। आदमी भटकता है और फिर भ्रष्टाचार के गहरे दलदल में डूबता चला जाता है। विश्वास अब भी अमूल्य है। आप अगर लोगों को इस बात का विश्वास दिला सकें कि आप भरोसे लायक हैं, तो आप अकेले नहीं होंगे। अपने-आप कारवां बनता जायेगा। परंतु यह एक दिन का काम नहीं है, यह लंबी लड़ाई है, इसमें बार-बार परीक्षाएं देनी पड़ सकती हैं, संदेह की सूली पर चढ़ना पड़ सकता है। आप में धैर्य होगा, साहस होगा, ऊर्जा होगी, सहज और सकारात्मक सोच होगी तो कामयाबी जरूर मिलेगी। देश के, समाज के, साथियों के भरोसे पर खरे उतरने के लिए अग्निपरीक्षाएं तो देनी ही पड़ेंगी। कोई ममता सहज ही नहीं पैदा होती, कोई बदलाव आसानी से नहीं आता। पहले विश्वास दिलाना होता है, खुद को मिटाना होता है तब लोग आप के लिए मिटने को तैयार होते हैं।           

सोमवार, 16 मई 2011

भविष्य की भाषा

  हिंदी का भाषा के रूप में भविष्य क्या है? कहीं कुछ दशकों में यह केवल कुलीन लेखकों और साहित्यकारों की भाषा भर तो नहीं रह जायेगी? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक हो गया है कि इंटरनेट के तीव्र प्रसार और अंग्रेजी के बिना रोजगार न मिलने की लाचारी के चलते धीरे-धीरे हमारे बीच एक ऐसे समुदाय का जन्म हो रहा है, जो न ठीक से हिंदी बोल पाता है, न ही अंग्रेजी। वह अंग्रेजियत का दीवाना तो है पर उसे अंग्रेजी आती नहीं। पिछले कुछ दशकों से बच्चों में अंग्रेजी स्कूलों का आकर्षण तेजी से बढ़ा है। उन लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है, जो अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिए उन्हें अंग्रेजी की कैद में डाल कर घर के भीतर और कई बार घर के बाहर भी हाऊ आर यू, वेल डन, बाय-बाय, गुडनाइट और गुड मार्निंग बोलने में अपना मस्तक ऊंचा हुआ सा देख रहे हैं।

दरअसल हम एक ऐसे अहमन्य और दिखावापरस्त समाज में रह रहे हैं, जहां अपनी भाषा, अपनी संस्कृति पर गर्व करना बेवकूफी समझा जाने लगा है। अंग्रेजी नहीं आती लेकिन ड्राइंग रूम में एक अंग्रेजी अखबार या पत्रिका पड़ी रहनी चाहिए। घर में दोनों वक्त भर पेट खाने का इंतजाम भले न हो, बच्चों की फीस भरने के लिए पैसा भले न हो, रोज पेट्रोल खरीदने की औकात भले न हो, लेकिन लोग बैंक से कर्ज लेकर एक चौपहिया खड़ी करने में पीछे नहीं रहते। वह रोज घर से बाहर निकालकर पानी में नहलायी जायेगी और फिर भीतर खड़ी कर दी जायेगी। बर्थडे, पार्टी में शान दिखाना और नामचीन लोगों के साथ बैठकर दारू उड़ाना भी इसी दिखावे के हिस्से हैं।

मध्यवर्गीय  समाज को यह रोग घुन की तरह लग चुका है। यही लोग हैं जो लंगड़ी अंग्रेजी बोलकर अपना रुतबा जताने में भी पीछे नहीं रहते। एबीसीडी और कखगघ की मिक्स चटनी इनकी जुबान पर अकसर देखी जा सकती है। यह धीरे-धीरे फैशन और दिखावे के साथ ही एक मजबूरी भी बनती जा रही है। मजाक-मजाक में ही इन लोगों ने आपसी संवाद की एक नयी भाषा गढ़नी शुरू कर दी है। ऐसे लोगों को खुशी होगी कि तंज में ही सही उसे हिंगलिश कहा जाने लगा है। जल्दबाजी में हिंदी मीडिया का एक तबका, जो अपने को शायद भविष्यद्रष्टा मानता है, इस सुचिंतन के वशीभूत हो गया कि अगर वह हिंगलिश का प्रयोग करता है तो मिश्रित भाषा के प्रयोग की तरफ बढ़ रहे युवा और उनके अभिभावक उन्हें हाथों-हाथ लेंगे। इस तरह के हिंगलिशवादियों को यद्यपि कामयाबी नहीं मिली लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि लोग  भाषा में मिलावट के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।

संचार के नये साधनों के प्रसार और समय के अभाव के चलते मोबाइल, मेल और इंटरनेट पर संवाद का एक नया माध्यम विकसित हो रहा है, जिसमें प्रयुक्त होने वाले शब्द या वर्ण उच्चारण में तो मूल शब्दों की ध्वनि देते हैं परंतु अपनी संक्षिप्ति के कारण भिन्न वर्तनी में प्रस्तुत होते हैं। यू के लिए वाई ओ यू की जगह सिर्फ यू या सी के लिए एस ई ई की जगह सिर्फ सी। इंटरनेट ने बेशक ज्ञान-विज्ञान के नये दरवाजे खोले हैं लेकिन वह दुनिया भर कें महान कचरा चिंतन का डंपिंग ग्राउंड भी बन गया है। ऐसे में जो लोग साहित्य, संस्कृति और रचनात्मक अनुशासनों से संबंधित सामग्री के लिए इंटरनेट से उम्मीद लगाये बैठे  हैं, वे निराश हो रहे होंगे।

आदमी की रफ्तार जैसै-जैसे तेज होगी, संवाद और संचार के और कारगर, तीव्र माध्यम ईजाद होंगे। जाहिर है इन माध्यमों की भाषा अंग्रेजी होगी और जिनमें इस होड़ में बने रहने की लालसा होगी, वे अंग्रेजी का सहारा लेने को विवश होंगे। ऐसे में 50 साल बाद जब लंदन, न्यूयार्क, मास्को, बीजिंग या टोकियो जाना हमारे लिए दिल्ली के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने जैसा होगा, दुनिया बहुत छोटी हो जायेगी, अलग-अलग भाषाभाषियों के बीच बातचीत की जरूरत और बढ़ेगी, तब अंग्रेजी के साथ विभिन्न भाषाओं के शब्द मिश्रित होते जायेंगे और अंग्रेजी के शब्द अपनी मूल वर्तनी से कटकर अपने संक्षिप्त और इंटरनेटी रूप में प्रयोग होने लगेंगे। भविष्य में शायद ऐसी ही कोई एक भाषा दुनिया भर में व्यापक संवाद का माध्यम बने। यह तकनीकी ज्ञान-विज्ञान की भाषा होगी।

चूंकि धन, संपदा, ऐश्वर्य और बड़ी-बड़ी नौकरियों की संभावनाएं तकनीकी क्षेत्रों में ही दिख रही हैं और लंबे समय से अंग्रेजी भौतिक विज्ञानों की भाषा रही है, इसलिए यही नयी भाषा सारी दुनिया को जोड़ने में कारगर होगी। नहीं कहा जा सकता कि गैर-आंग्ल भाषाओं में तब साहित्य और चिंतन के लिए कितना अवकाश होगा और भविष्य के विश्व समाज के लिए इसकी कितनी जरूरत होगी लेकिन इतना तो साफ है कि कला, भाषा, संस्कृति और साहित्य पर संकट कुछ ज्यादा ही होगा।       

रविवार, 8 मई 2011

समय की शिला पर

  समय की शिला पर मधुर चित्र कितने, किसी ने बनाये, किसी ने बिगाड़े। कवि और चिंतक कई तरह से समय की सत्ता को समझते रहे हैं, उसे व्याख्यायित करते रहे हैं। समय एक अखंड और अनंत सत्ता है। इसका आरंभ कल्पनातीत है। पृथ्वी के भीतर खोजा-अनखोजा जितना इतिहास दबा हुआ है, उसका बहुत कम हिस्सा हम जान सके हैं। पृथ्वी पर जीवन के प्रादुर्भाव की कहानी करोड़ों वर्ष पुरानी है। जीवन उगने से पहले भी पृथ्वी रही होगी। एक ग्रह के रूप में पृथ्वी के उत्पन्न होने से पहले भी अनेक ग्रह, तारे रहे होंगे। इनमें से सबसे प्राचीन भी अगर खोज लिया जाय तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि सुदूर अतीत में वह समय का प्रस्थान बिंदु है। ब्रह्मांड के भीतर पहली घटना अगर स्वयं ब्रह्मांड के उत्पन्न होने को ही मान लिया जाय तो भी अतीत में समय का कोई छोर पक़ ड़ पाना संभव नहीं होगा क्योंकि हमारे ब्रह्मांड से बाहर इससे भी पुराने अनेक  ब्रह्मांडों का पता लगाया जा चुका है। इनमें से कोई सबसे पुराना है, यह घोषणा कर पाना विज्ञान के वश में नहीं है क्योंकि किसी भी क्षण विशाल अंतरिक्ष में और गहराई तक देखने की कियी नयी तकनीक के आविष्कार की संभावना बनी हुई है, इसलिए इस बात की संभावना कभी खत्म नहीं होगी कि कल कोई और नया तारामंडल या ब्रह्मांड खोज लिया जाय। ऐसी हर खोज के बाद समय में और भी पीछे जाने की संभावना बनी रहेगी।

अगर कल्पना से समय के आरंभ के छोर को पकड़ने की कोशिश करें तो वह पकड़ में आकर भी शायद पकड़ में नहीं होगा। स्मृति भी इतिहास, पुरातत्व से होकर मिथकीय कल्पनाओं में खो जाती है। उससे आगे कोई रास्ता नहीं मिलता, कोई ऐसी मजबूत डोर नहीं होती, जिसे थामकर अतीत के गहन गह्वर में उतरा जाय। इसी तरह भविष्य के बारे में भी कहा जा सकता है। समूची भौतिक-अभौतिक सत्ता विनष्ट हो जाने पर भी भविष्य अशेंष नहीं होगा। जब कुछ नहीं होगा, तब भी उस कुछ नहीं से कुछ या बहुत कुछ के प्रकट होने की संभावना बची रहेगी। आधुनिक विज्ञान जो तर्क ब्रह्मांड के पैदा होने के बारे में देता है, अगर वह सही है तो नथिंगनेस पूरी तरह निष्क्रिय शून्य नहीं है, वहां भी गुरुत्व है। जैसे असित छिद्र, ब्लैकहोल के प्रबल आकर्षण से खिंचकर उसमें असंख्य तारे समाते रहते हैं, उसी तरह नथिंगनेस से भी असंख्य तारों, ब्रह्मांडों के पैदा होने की संभावना बनी रहती है। हर संभावना भविष्य की रचना करती है, समय में आगे कभी, कुछ भी घटित होने का अवकाश रचती है। इस तरह भविष्य में भी समय का कोई तट देख पाना नामुमकिन है।

अगर कहें कि समय ब्रह्मांड की ही तरह प्रकाश की गति से लगातार फैल रहा है तो भी समय के ओर-छोर को छू पाना तभी संभव हो सकेगा, जब हम प्रकाश की गति से यानि तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से उड़ने की सामर्थ्य हासिल कर लें। अगर आदमी ऐसा कर पाया तो वह समय से तेज भी उड़ने की सोच सकता है। तो शायद वह समय के बाहर घटित होती कुछ अकल्पनीय घटनाओं से रू-ब-रू हो सके या फिर समय के आरंभ पर जाकर खड़ा हो सके। अभी यह बातें कल्पनातिरेक के अलावा कुछ और नहीं लगतीं पर विज्ञान इस दिशा में काम कर रहा है। एक रचनाकार समय को स्मृति के गत्यात्मक विकास के रूप में देखता है। वह विज्ञान की तरह किसी नयी भौतिक प्रमेय को हल करने में यकीन नहीं करता बल्कि अतीत से संश्लिष्ट वर्तमान को  अपनी कल्पना से सजाने-संवारने का प्रयास करता है। वह अतीत की समीक्षा करता है, वर्तमान में पड़े उसके अपशिष्ट को हटाकर एक ऐसे नूतन भविष्य की ओर देखता है, जिसमें अतीत और वर्तमान के सकारात्मक संस्कारों के साथ उसके आदर्श भी झिलमिला रहे हों।

इस प्रक्रिया में वह वर्तमान के अस्वीकार्य हिस्सों को दर्ज करता है और अपनी स्वीकृतियों से उन्हें विस्थापित करने की कोशिश करता है। वह न अतीतजीवी होकर रहना चाहता है, न स्वप्नजीवी। वह ऐसे सपने रचना चाहता है, जो सच हो सकें। कई बार इस तरह वह अनायास भविष्य में झांकने की कोशिश भी करता है और कई बार वह भविष्य को शब्दों और रेखाओं में हू-ब-हू दर्ज करने में भी कामयाब हो जाता है। इन्हीं अर्थों में साहित्य कई बार अनायास विज्ञान का मार्गदर्शक बन कर खड़ा हो जाता है। सबने देखा है, कल की फंतासियों को सच होते हुए। आज की फंतासियां भी कल सच हो सकती हैं। यह अनायास नहीं है कि विज्ञान भी कल्पना के पंखों पर उड़कर ही अपने असल पंख विकसित करता रहा है। वह पहले एक परिकल्पना रचता है और फिर उसे सच करने में जुट जाता है। कई बार प्रकृति के स्फुलिंग उसे रास्ता देते हैं तो कई बार मिथ और साहित्य। इस मायने  में साहित्य और विज्ञान दोनों ही जीवन को बेहतर बनाने की प्रक्रिया में एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।