बुधवार, 8 सितंबर 2010

ऐसी हड़ताल का औचित्य क्या?

 बढ़ती महंगाई, श्रम कानूनों का उल्लंघन और सरकारी कंपनियों से विनिवेश जैसे मुद्दों को लेकर देश भर में आठ ट्रेड यूनियनों की हड़ताल का व्यापक असर देखा गया। खबर है कि कई इलाकों में हड़्ताल की वजह से 50 से भी ज्यादा मरीजों की सही समय पर इलाज न मिलने की वजह से मौत हो गयी। वामपंथी गढ़ों में सरकारें भी  एक तरह से हड़ताल में शामिल रही। जाहिर है जैसा कि होता आया है, इस हड़ताल से भी बहुत नुकसान हुआ। बैंकों में काम-काज लगभग ठप हो जाने से अरबों के लेन-देन पर असर पड़ा। ट्रेनों के परिचालन और उड़ानों पर भी प्रभाव पड़ा। यह ठीक बात है कि हड़ताल किसी भी नीतिगत गलती के विरोध का एक मान्य तरीका है और संविधान ने भी मजदूरों को हड़ताल करने का अधिकार दे रखा है लेकिन क्या कोई अपने अधिकार  के प्रयोग में दूसरों के अधिकार का अतिक्रमण करे, इसकी छूट भी कानून और संविधान ने दे रखी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार की उदासीनता से महंगाई बहुत बढ़ गयी है, गरीब जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके लिए सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह जनता की परेशानियां कम करेगी, उसकी दिक्कतें सुलझायेगी, बढ़ायेगी नहीं। इसका विरोध होना ही चाहिए पर क्या ऐसे विरोध की इजाजत होनी चाहिए जो लोगों को कठिनाइयों में डाल दे, जो लोगों की परेशानियां और बढ़ा दे, जो देश को नुकसान पहुंचाये। यह मुद्दा कई बार जेरे-बहस रहा है। काम-काज बंद कराने वाली हड़तालों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने रोक भी लगायी है। जिससे दूसरों के हक बाधित होते हों, उस रास्ते का समर्थन कोई भी नहीं कर सकता। किसी को पैसे की जरूरत है, नितांत संकट की स्थिति है, पैसा नहीं मिलने पर उसको बड़ी क्षति हो सकती है, पर हड़ताल हो गयी है, बैंक बंद हैं, वह क्या करे। किसी के परिवार का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार है, अगर वह समय से अस्पताल नहीं पहुंचा तो उसकी जान जा सकती है, परिजन बेचैन हैं, बसें रुकी पड़ीं हैं, ट्रेनें भी प्रभावित हैं, कैसे ले जायें, क्या करें, हड़ताल के कारण वे विवश हैं।

हड़ताल करने वालों को ऐसे लोगों की पीड़ा से क्या कोई मतलब नहीं है? यह हड़ताल अगर उनके दुख को  बढ़ाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या नैतिक रूप से हड़ताली संगठनों और उनके नेताओं को इन बातों पर भी गौर करने का दायित्व नहीं आ जाता है? अगर आता है तो उन्हें विरोध का ऐसा वैकल्पिक रास्ता तलाशना चाहिए, जो उनकी आवाज तो बुलंद तरीके से सरकार तक पहुंचाये लेकिन किसी भी दूसरे नागरिक के लिए परेशानी का सबब न बने। इन बातों पर गहराई से गौर किया जाना चाहिए।  हड़ताल का असर सबसे ज्यादा वामपंथियों के गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल में देखा गया। कर्नाटक और तमिलनाडु में कोई असर नहीं दिखा। बैंकिंग सेक्टर में कामकाज नहीं हुआ।  हड़ताल में करीब 6 करोड़ कर्मचारी शामिल हुए। यह नुकसान कौन भरे?

रविवार, 5 सितंबर 2010

‘ग्रीन हंट’ के बजाए डेवलपमेंट की तोप

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से नक्सली हिंसा केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। इस चुनौती से मुकाबले के लिए ‘ग्रीन हंट’ जैसे आपरेशन जरूरी हैं या पिछड़े और आदिवासी बाहुल्य इलाकों में डेवलमेंट की ‘डोज’? इस मुद्दे पर उच्चस्तर पर सरकार में मंथन तेज हो गया है। इसी राजनीतिक ऊहापोह में पांच राज्यों में चल रहा नक्सल विरोधी आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ भी आधे अधूरे मन से चलाया जा रहा है। ऐसे में जाहिर है इसके परिणाम बहुत कारगर नहीं हुए। सरकार ने भी मान लिया है कि गोली का जवाब, गोली से देने के बजाए नक्सलियों की मजबूत जड़ें कमजोर करना ज्यादा जरूरी है। इसीलिए सरकार 35 जिलों के लिए 13,742 करोड़ रुपये का विशेष आर्थिक विकास पैकेज लाने जा रही है।
केंद्रीय योजना आयोग ने नक्सल प्रभावित राज्यों के चुनिंदा 35 जिलों में खास विकास की योजना तैयार कर ली है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी है। उम्मीद की जा रही है कि 15 सितंबर के आसपास इस पर कैबिनेट की मुहर लग जाएगी। अभी यह तय नहीं हो पाया कि इस योजना के लिए 35 जिलों का चुनाव किस आधार पर हो? आयोग ने इसके लिए एक गाइडलाइन बनाकर दी है। लेकिन, मुश्किल यह है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दबाव बढ़ाए हुए हैं कि उनके राज्यों के ज्यादा से ज्यादा अदिवासी बाहुल्य जिले आईएपी (एकीकृत कार्ययोजना) के तहत ले लिए जाएं।

केंद्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस योजना के लिए खास दिलचस्पी ले रहे हैं। उन्हीं की पहल के चलते योजना आयोग की एक विशेष समिति ने आईएपी की पूरी रूपरेखा तैयार की है। इसके तहत योजना में शामिल किए गए जिलों में सड़क, बिजली, स्कूल व अस्पतालों जैसी योजनाओं में विशेष ध्यान दिया जाएगा। मोंटेक सिंह ने यह सिफारिश की है कि इस कार्ययोजना की निगरानी दो स्तरों पर हो। राज्य भी निगरानी करें और केंद्र की एक अधिकार प्राप्त संस्था भी, इस पर खास नजर रखे। इसी के साथ व्यवस्था बनाई जाए कि ब्लाक और ग्राम स्तर पर चुने हुए प्रतिनिधि भी इसमें हिस्सेदारी करें।

योजना आयोग के सूत्रों के अनुसार, यह योजना चार सालों के लिए होगी। पहले दो सालों में जोर इस बात पर रहेगा कि कई स्तरों पर जन जागरूकता और विश्वास बहाली का अभियान चले। आदिवासी इलाकों में स्कूल और अस्पताल खोले जाएं। यह भी ध्यान रहे कि अस्पतालों में दवाएं भी पहुंचे और कर्मचारी भी तैनात रहें। रणनीति यह रहे कि हर स्तर पर स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री, कपिल सिब्बल ने यहां शनिवार को कहा है कि उनका मंत्रालय सुदूर पिछड़े इलाकों में 100 केंद्रीय विद्यालय खोलने की योजना बना रहा है। उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में कहा है कि इस बारे में वे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से विस्तृत चर्चा करने वाले हैं।

पिछले दिनों यहां राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने आर्थिक पैकेज पर खास जोर दिया था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि एकीकृत कार्य योजना के तहत केंद्र की भी निगरानी रहे, इसमें कोई ऐतराज नहीं हो सकता है। लेकिन, इतना जरूर हो कि कहीं राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ में राज्य सरकारों की भूमिका को नकार न दिया जाए। ऐसी कोशिश की गई, तो योजना की सफलता पर कई शंकाएं खड़ी जा जाएंगी।

आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ में तमाम आधुनिक सशस्त्र संसाधन झोंक देने के बाद भी नक्सली गुट पस्त नहीं हुए हैं। ऐसे में यह बहस तेज हुई है कि नक्सली हिंसा से निपटने का तरीका क्या गोली-बारूद और फौज ही है? कांग्रेस नेतृत्व में भी शीर्ष स्तर पर इस मुद्दे पर मतभेद गहराए हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने चिदंबरम की रणनीति की खिलाफत शुरू कर दी है। ऐसे नेताओं में सबसे अग्रणी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, दिग्विजय सिंह हैं। उन्होंने तो मीडिया में एक लेख लिखकर चिदंबरम के आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ की तीखी आलोचना कर डाली थी। इसके बाद मणिशंकर अय्यर से लेकर जयराम रमेश जैसे कई चर्चित नेताओं ने गृहमंत्री की रणनीति पर शंकाएं जाहिर कीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने हाल में कहा है कि नक्सली भी हमारे भाई-बहन हैं। सरकार उनसे हर तरह का संवाद करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री की इस ताजा टिप्पणी के बाद चिदंबरम ने भी अपने रुख में नरमी के संकेत दिए हैं। यहां राजनीतिक हल्कों में जाना जा रहा है कि आदिवासियों को विश्वास में लेने के लिए केंद्र ने अब वाकई में रणनीति बदल दी है।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

जन्माष्ट्मी शाम पांच बजे तक मना लीजिये

 बांग्लादेश का बेतुका फरमान
बांग्लादेश भी अब सयाना होता दिखने लगा है। कुछ-कुछ पाकिस्तान की तरह। हालांकि अभी वहां हिंदुओं की वैसी दुर्दशा नहीं है, जैसी पाकिस्तान में है लेकिन वह भी उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। उसे तनिक भी इस बात का खयाल नहीं है कि अगर हिंदुस्तान ने मदद न की होती तो उसका वजूद भी नहीं होता। इस छोटे से देश में कुल आबादी का दस फीसदी हिंदू है। यह बहुत ही प्रसन्नता की बात रही है कि अब तक बांग्लादेशी हिंदू अपने त्योहार भारी उल्लास से मनाते आ रहे हैं। कोई रोक-टोक नहीं, कोई व्यवधान नहीं। वहां हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बांग्ला भाषा एक मजबूत पुल का काम करती आयी है। बातचीत और व्यवहार से कोई इन दोनों को अलग-अलग पहचान नहीं सकता। मुसलमान हिंदुओं के त्योहारों में और हिंदू मुसलमानों के पर्वों में पूरे उत्साह से शिरकत करते रहे हैं। इस सांप्रदायिक सौमनस्य को पलीता लगाने की कई बार कोशिशें की गयीं, मगर कामयाब नहीं हुईं।

पर पहली बार बांग्लादेश के हिंदुओं के दिल को ठेस पहुंचायी गयी है। यह काम किसी कट्टरवादी तंजीम ने किया होता तो ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि तब हिंदू-मुस्लिम दोनों मिलकर उसका मुकाबला कर लेते पर दुर्भाग्य यह है कि यह काम सरकार के बड़े ओहदे पर बैठी एक महिला मंत्री ने किया है।  बांग्लादेश की गृह मंत्री सहारा खातून ने देश के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से कहा है कि वे भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को 'शांतिपूर्वक' मनायें और रोजा खुलने के समय, यानी शाम पांच बजे तक जन्माष्टमी मना लें। अब बताइये, जब भगवान का जन्म ही 12 बजे रात को होता है तो पांच बजे शाम तक हिंदू अपना उत्सव कैसे मना लेंगे। क्या ये तथ्य मोहतरमा खातून को नहीं मालूम है। कोई पहली बार तो बांग्लादेश में जन्माष्टमी मनायी नहीं जा रही है और ऐसा भी नहीं है कि रमजान के महीने में यह त्योहार पहली बार पड़ा हो।

पहले भी कई बार रोजे के दिनों में कृष्ण जनमोत्सव मनाया जा चुका है। वह भी पूरे उत्साह से, गाजे-बाजे के साथ। वहां के किसी नागरिक को कभी बुरा नहीं लगा, किसी ने कभी  किसी तरह का एतराज नहीं किया। फिर अचानक इस बार क्या हो गया, कौन सी आफत आ पड़ी कि सरकार को निहायत बेतुका फरमान जारी करना पड़ा। इस आदेश पर भारत में नाराजगी है, बांग्लादेश में भी लोग खुश नहीं हैं।  गृह मंत्री की सलाह मानना हिंदुओं के लिए आसान नहीं होगा। गृह मंत्री के बयान की हर ओर आलोचना हो रही है। बांग्ला मीडिया ने इसे भेदभाव भरा बयान कहा है। 'न्यू एज' अखबार ने भी इस मुद्दे पर सहारा खातून की खिंचाई की है। अख़बार के मुताबिक बांग्लादेश में हिंदुओं पर यह पाबंदी भेदभावपूर्ण कार्रवाई है। इसे रद्द किया जाना चाहिए।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

मैंने कैसे रची कामायनी-उत्तमा






उत्तमा की रचना श्रृंखला, कामायनी की एक पेंटिंग मैंने पिछली बार लगायी थी। बहुत से लोग जानना चाहते थे कि ऐसी नग्नता क्या कला में आवश्यक है? यह असहज नहीं लगता, जानबूझकर ज्यादा दर्शक जुटाने या विवाद बढ़ाकर चर्चा में आने के लिये तो कलाकार ऐसा नहीं करते। इन प्रश्नों पर मैंने कामायनी की रचनाकार से ही जानना चाहा कि वास्तव में सच क्या है? यहां कामायनी श्रृंखला की कुछ और रचनायें और उत्तमा के विचार भी दिये जा रहे हैं। आप इस बहस को आगे बढ़ाने के लिये आमंत्रित हैं।
कला में न्यूडिटी और हम: उत्तमा
कला में न्यूडिटी पर चर्चा जितनी दिलचस्प है, उतनी  ही गंभीर। सामाजिक सरोकारों की ही तरह  न्यूड रचना भी एक रोचक विषय है। कलाकार प्रकृति की हर रचना को अपनी नजर से देखता और उसका चित्रांकन करता है। मानव शरीर भी  प्रकृति की ही एक कृति है। यह कला का विषय क्यों नहीं हो सकता ? आब्जेक्ट न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। प्रसव के समय छटपटाती स्त्री को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका डॉक्टर पुरुष है या स्त्री। अर्द्धनग्न अवस्था में उसे तमाम लोग देखते हैं, यह नए सृजन के लिए होता है इसलिये उसमें कहीं अश्लीलता नहीं मानी जाती। लेकिन जब यही सृजन एक आर्टिस्ट करता है तो विवाद शुरू हो जाता है।  कोई समझना नहीं चाहता की कैनवस पर कब, क्या और कैसे पेंट करना है, यह आर्टिस्टिक मूड डिसाइड करता है। कैनवस सामने आने पर कलाकार सोच-समझकर काम नहीं करता, वो तो होने लगता है। कला दिल से निकलती है न कि दिमाग से।

स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा महसूस नहीं कर रहे। पढ़ाई के दौरान ही मैंने न्यूड पेंटिंग बनानी शुरू कर दी थीं। बीएफए द्वितीय वर्ष में मेरी ऐसी पहली पेंटिंग में युवती को एक अजगर ने जकड़ रखा था।  हर मामले में मेरा हौसला बढ़ाने वाली मम्मी ने ही पूछ लिया कि तुम्हारी ऐसी पेंटिंग्स का तुम्हारे छोटे भाइयों पर कैसा असर पड़ेगा।लोग तुम्हारे बारे में कैसा सोचेंगे। ग्वालियर में एक प्रदर्शनी के दौरान कुछ लोगों ने  मेरी पेंटिंग्स का जमकर विरोध किया। मैं बहुत डर गई थी। न्यूड पेंटिंग किए जाने की वजहें हैं। हर आर्टिस्ट के लिए यह जरूरी है कि वह शरीर के हर अंग की बनावट को जाने। फ्रंट, बैक, साइड पोश्चर, बैठे, खड़े और लेटे की पोजीशन की डीप स्टडी किए बिना फिगरेटिव पेंटिंग की
कल्पना मेरी समझ से परे है। एनाटॉमी स्टडी करने के लिए स्टूडेंट्स को किताबों का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि न्यूड मॉडल उपलब्ध नहीं हो पाते। हर सीखने वाले के साथ ऐसा ही होता है। यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं।

 जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने का फैसला मैंने जितनी आसानी से ले लिया, पुस्तक पढ़ने के बाद उतनी ही देरी हुई। मुझे लगा, जैसे मेरे भीतर का कलाकार कुछ करना चाहता है। प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम प्रेरक लगा। कामायनी पढ़ी, लगा प्रसाद ने विवादों से बचने का कहीं रास्ता तो नहीं तलाशा है। मनु और श्रद्धा को न्यूड बता पाने से हिचके क्यों वो? बताइये प्रलय के पश्चात कहां से आ गए वस्त्र? श्रद्धा और मनु को कैनवस पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया। एक साथ छह कैनवस पर काम करना शुरू किया। विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में मुझे खूब मेहनत करनी पड़ी। 
प्रसाद कहते हैं, मनु विचारों में लीन थे कि तभी किसी ने आकर पूछा कि इस जनहीन प्रदेश को अपनी रूप-छटा से आलोकित करने वाले तुम कौन हो? मनु ने दृष्टि उठाई तो देखा कि दीर्घ आकार की एक विलक्षण सौंदर्य संपन्न बालिका उनके सामने खड़ी है। नीले रोओं वाली भेड़ों के चिकने चर्म खंडों से ढंका उसका अर्द्धनग्न शरीर ऐसा लगता था कि जैसे काले बादलों के वन में बिजली के फूल खिल उठे हों और उसकी मुस्कान तो इतनी मधुर थी कि मनु देखते ही रह गए। चुनौती सामने थी, प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण था। समस्याएं भी कम नहीं। हमारे यहां न्यूड पेंटिंग्स जितनी भी बन जाएं लेकिन बिकती नहीं।
कामायनी बनाते समय मैंने तो सोचा ही नहीं था कि यह बेचने के लिए बना रही हूं, कुछ बिक गईं तो बात अलग है। भारतीय बाजार में न्यूडिटी नहीं बिकती।  चुनौतियां हैं और परेशानियां भी, माहौल भी बिल्कुल अनुकूल नहीं, फिर भी हमारे कलाकार इस तरह का काम कर रहे हैं। शायद उन्हें कला पर पहरे के यह दिन और बेवजह
आलोचनाएं करने वाले लोगों के दिल बदलने की उम्मीद है। मैं तो अपनी रिसर्च स्कालर्स और अन्य छात्राओं को सीख देने से नहीं हिचकती कि जो मन आए वो बनाओ। किसी से डरने की जरूरत नहीं। हम कलाकार हैं, दिल की बात ही तो सुनेंगे।
 असिस्टेंट प्रोफेसर, चित्रकला विभाग, दृश्य कला संकाय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी

शनिवार, 28 अगस्त 2010

उत्तमा की कामायनी

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 कामायनी: रचनाकार-उत्तमा दीक्षित (असिस्टेंट प्रोफेसर,  बी एच यू)
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परम्परा के घेरे में कोई रचना जन्म  नहीं लेती। जब पुराना टूटता है, तो कुछ नया बनता है। ध्वंस के ऊपर ही निर्माण खड़ा होता है। कलाकार या रचनाकार यथास्थिति को स्वीकार नहीं करता है, वह परम्पराजीवी नहीं होता है। वह पूरी ताकत से सड़ा-गला ध्वस्त करना चाहता है क्योंकि यही बदलाव की जमीन तैयार करने का एकमात्र रास्ता है। जो बदलाव का आकांक्षी  नहीं है, वह रचनाकार नहीं हो सकता। देश में या समूची दुनिया में परम्परा के मोह से ग्रस्त अतीतजीवियों की जमातें हैं। जब भी उनकी दुनिया को  कोई झटका लगता है, वे पूरी ताकत से प्रतिरोध के लिये उठ खड़े होते हैं। ये रचना और परिवर्तन विरोधी लोग हैं।  एम एफ़ हुसैन को इनका कितना विरोध झेलना पड़ा, यह किसी से छिपा नहीं है।

मैंने  यह बात एक खास कारण से छेड़ी है। दर असल साखी पर गिरीश पंकज की गज़लों के साथ मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर उत्तमा दीक्षित की एक पेंटिंग लगायी थी। वह एक कलाकार के नाते मुझे बहुत प्रिय है। उसने महाकवि जय शंकर प्रसाद की कामायनी पर आधारित पेंटिंग्स की श्रृंखला बनायी है, उसी में से एक मैंने चुनी थी। मुझे पहले से यह डर था कि इस पर लोग एतराज कर सकते हैं, इसमें लोगों को अश्लीलता नजर आ  सकती है। यह डर सहज था क्योंकि अपनी तमाम प्रगतिशील सोच के बावजूद मन के किसी बहुत गहरे  कोने में एक परम्परावादी व्यक्ति सिकुड़कर बैठा हुआ है, यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होता।

मेरे प्रिय मित्र राजेश उत्साही ने सुबह-सुबह ही सचेत किया, इन रचनाऑं के साथ यह पेंटिंग लोग पसन्द नहीं करेंगे, कोई दूसरी लगा दो। मैंने  उनकी बात मान तो ली पर मन में एक सवाल बार-बार उठता रहा, एक लड़की अगर ऐसी पेंटिंग बना सकती है तो  हम उसे स्वीकार करने में इतने संकोच का परिचय क्यों देते हैं।  हम उसकी कलात्मक गहराई तक जाने की जगह, उसके बाहरी देह में क्यों  अपना रास्ता भूल जाते हैं। मैने राजेश से फिर पूछा,  मैंने तस्वीर तो बदल दी लेकिन ऐसा तुम्हें क्यों लगा कि यह तस्वीर ठीक नहीं है। राजेश ने कहा, पे‍टिंग सुंदर है, हम उसे कला के नजरिए से अगर देखेंगे तो। लेकिन यहां बात साहित्‍य की हो रही है। ब्‍लाग पर तो सब तरह के लोग आ रहे हैं। जरूरी नहीं है कि उनकी समझ भी इतनी ही साफ हो, जितनी हमारी है। बेवजह एक विवाद होगा। मैंने  गिरीश पंकज से भी उनका नजरिया जानना चाहा। उनका कहना था कि  वो पेंटिंग मुझे पसंद आई थी,  रहने देना था,  रस-परिवर्तन भी ज़रूरी है। पाखंड-पर्व के चलते कई बार हमें मज़बूर होना पड़ता है.. पेंटिंग बुरी नहीं थी, उसे कलाके नज़रिए से ही देखना चाहिए। मैंने उत्तमा से भी यह जानने की कोशिश की है कि उसने किस मनस्थिति में, किस नजरिये से इन पेंटिंग्स की रचना की। उसके विचार मिलते ही मैं आप सबके सामने रखूंगा। अभी मैं इस पेंटिंग को आप सबके विचारार्थ यहां रख रहा हूं।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

दिल्ली का यह ‘सुपर सिपाही'

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से कांग्रेस का बहुरूपियापन गजब का है। इसके रणनीतिकारों ने भले बाकायदा ‘पटकथा’ न लिखी हो लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने लोक लुभावन राजनीतिक ‘सोप-आपरा’ दिखाने में महारत हासिल कर ली है। जिसमें भरपूर रोमांच है। भावुकता है। गरीबों और आदिवासियों के लिए ममता भरी झप्पी भी है। एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश में कारपोरेट कल्चर बढ़ाने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ ‘युवराज’ राहुल गांधी का दिल दलितों और आदिवासियों के लिए जब-तब जोर-जोर से धड़कने लगता है। अपनी बात कहने का उनका अंदाज भी इतना सूफियाना होता है कि ‘जादू’ कईगुना हो जाता है। ऐसा ही करिश्मा दिखा, उनके उड़ीसा दौरे में। वे गुरुवार को कालाहांडी इलाके के नियमागिरी हिल्स में पहुंचे थे। यहां लांजीगढ़ में उनकी एक बड़ी रैली हुई। महज नौ मिनट के भाषण में उन्होंने आदिवासियों का दिल जीतने की पूरी कोशिश कर डाली। एकदम, आदिवासी मसीहा वाला निरपेक्ष अंदाज। बोले, आपने अपनी धरती बचा ली। आपने, संघर्ष करके अपने भगवान को बचा लिया। इसी की बधाई देने दिल्ली से आया हूं।

हल्की-हल्की दाढ़ी। कुछ-कुछ तुड़ा-मुड़ा झकाझक सफेद कुर्ता-पायजामा। छोटे-छोटे वाक्यों में बात कहने का सहज अंदाज। टीवी न्यूज चैनलों ने देश-दुनिया को उनके इस अंदाज-ए बयां की पूरी लाइव कवरेज दिखाई। यह भी देखने को मिला कि कैसे हजारों-हजार आदिवासी ‘युवराज’ को देखकर ही मदमस्त होते रहे। राहुल ने कहा भी,‘ मैं दिल्ली में आपका सिपाही हूं... आपकी एक आवाज पर कहीं से आपके पास हाजिर हो जाऊंगा|’ वे बताते गए कि कैसे अपने वायदे के पक्के हैं। कह दिया 2004 में यह वायदा करके गया था कि इस बार दिल्ली में गरीबों और आदिवासियों की सुध लेने वाली सरकार आएगी। आ भी गई। उन्हें बताया गया था कि नियमागिरी पहाड़ को वे लोग अपना भगवान मानते हैं। जबकि, राज्य सरकार इसमें खनन के लिए आमादा है। आपकी आवाज दिल्ली ने सुनी। आपकी धरती और भगवान दोनों सुरक्षित हो गए।

मंगलवार को ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने फरमान सुनाया था कि ब्रिटेन की कंपनी वेदांत को नियमागिरी हिल्स में खनन नहीं करने दिया जाएगा। दरअसल, हाल में पर्यावरण मंत्रालय की एक चार सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने वेदांत के बाक्साइट खनन को खतरनाक करार किया था। इस प्रोजेक्ट को बंद कराने की सिफारिश की थी। जबकि, वेदांत औद्योगिक घराना उड़ीसा में रिफाइनरी और पावर सेक्टर में ही करीब एक लाख करोड़ रुपये निवेश करने का एलान कर चुका है। राहुल गांधी की रैली जिस स्थान पर हुई थी, वहां से महज दो किलोमीटर दूर ही वेदांत अल्युमीनियम लिमिटेड अपनी एक रिफाइनरी तैयार कर रहा है। वेदांत की ही  तरह इस्पात निर्माण की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘पास्को’ के भविष्य पर आशंका के बादल गहरा गए हैं। दक्षिण कोरिया की यह कंपनी कालाहांडी क्षेत्र में एक इस्पात की बड़ी परियोजना लगा रही है। केंद्रीय वन और आदिवासी मामलों के मंत्रालयों ने इस पर आपत्ति की है। मुख्यमंत्री नवीन  पटनायक का कहना है कि राजनीतिक कारणों से केंद्र सरकार राज्य की बड़ी निवेश परियोजनाओं में बाधा डाल रही है। जबकि, सालों की मेहनत के बाद उन्होंने इन घरानों को इस पिछड़े राज्य में निवेश करने के लिए तैयार किया था|

उडीसा में  दशकों से कांग्रेस सत्ता से वंचित है। जमीनी राजनीति में पटनायक का सिक्का चलता है। पहले बीजेडी एवं भाजपा के गठबंधन के चलते कांग्रेस यहां मुंह की खाती रही। लेकिन, पिछले लोकसभा के चुनाव में पटनायक ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया था। उसने अकेले ही कांग्रेस का मुकाबला कर डाला। इसके बाद भी जीत हासिल कर ली। कांग्रेस को यही कसक है। वह किसी तरह इस अति पिछडे राज्य को अपनी राजनीतिक झोली में डालने को बेचैन है। राहुल गांधी नियमागिरी हिल्स इलाके में दो साल पहले भी आए थे। उस समय भी उन्होंने वेदांत की खनन परियोजना के विरोध में अपना झंडा फहराया था। इस बार तो वे इसका ‘श्रेय’ लूटने आए थे। सो, जमकर इसे लूटा भी। कांग्रेस के रणनीतिकार जानते हैं कि देश की जतना बहुत भावुक मिजाज है। वह इस बात से ही गदगद हो सकती है कि नेहरू-गांधी परिवार का वारिस गरीबों की आवाज को अपना ‘धर्म’ करार करता है।

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

आल इज नाट वेल

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह राष्ट्रीय मीडिया से रूबरू हुए। जमकर सवालों की बौछार हुई। पीएम ने हर सवाल का जवाब तो दिया, लेकिन बचते-बचाते। उन्होंने पूरी सावधानी रखी कि  कहीं बात का बतंगड़ न बने। अपनी इस कोशिश में वे पूरी तौर पर सफल कहे जा सकते हैं लेकिन, पीएम अपनी ही छवि के अनुरूप कई सवालों पर सहज नहीं देखे गए। कुछ सवालों के उत्तरों में तो साफ-साफ गठबंधन सरकार की मजबूरी झलकी। यूपीए-टू सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा हुआ है। हर सवाल के जवाब में पीएम ने ‘आल इज वेल’ के अंदाज में टिप्पणियां जरूर कीं लेकिन उनके कई बयान बहुत भरोसे लायक नहीं लगे।

डाक्टर मनमोहन सिंह की छवि एक खांटी साफ-सुथरे नेता की है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री से देश कुछ ज्यादा उम्मीद बांधकर चलता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे दूसरे नेताओ की तरह सरासर झूठ की बैसाखियों पर अपनी सरकार न चलाएं। कम से कम अपनी सरकार के कुछ चर्चित दागदार चेहरों के कवच तो न बन जाएं। चार सालों में पहली बार मीडिया के सामने वे सवा घंटे तक तमाम सवालों का जवाब देते रहे। कुछ अहम सवालों पर उन्होंने साफगोई का परिचय नहीं दिखाया।  महंगाई के मुद्दे पर मनमोहन सिंह ने घुमा फिराकर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थितियों को जिम्मेदार ठहराया। कहा कि पिछले वर्ष कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ की वजह से खाद्य उत्पादन कम हुआ। उन्होंने देश को यह भरोसा जरूर दिलाया है कि आगामी दिसंबर तक बढ़ती महंगाई काबू में आ जाएगी। वे उम्मीद कर रहे हैं कि इस अवधि तक महंगाई की दर 5-6 प्रतिशत के बीच आ जाएगी। हालांकि, डाक्टर मनमोहन सिंह ने यह नहीं बताया कि आखिर किस ‘जादू’ से वे महंगाई पर 6 महीने के अंदर काबू पाने की उम्मीद कर रहे हैं। जबकि, उनके कृषि मंत्री शरद पवार लगातार अगाह करते आ रहे हैं कि लोग सस्ती चीनी और सस्ते अनाज की ज्यादा उम्मीद न करें।

 एक सवाल था कि सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए बार-बार सीबीआई को हथियार क्यों बनाती है? पीएम ने यही कहा कि सरकार सीबीआई के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करती। संसद में ‘कट मोशन’ के दौरान मायावती व मुलायम से कोई ‘डील’ नहीं हुई। प्रधानमंत्री जब यह सफाई दे रहे थे, तो उनके चेहरे पर सच बोलने का दर्प नहीं दिखाई पड़ रहा था। यहां राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि ‘कट मोशन’ के दौरान की स्थितियां बहुत पुरानी नहीं हैं। लोगों की याददाश्त कमजोर होती है, लेकिन इतनी भी नहीं। ऐसे में ऐसी टिप्पणियों ने विश्वसनीयता का संकट काफी गहरा दिया। तेलंगाना पर पीएम ने यही कहना पर्याप्त समझा कि इस मामले में जांच समिति की रिपोर्ट का इंतजार है। यहां राजनीतिक समीक्षक यह मान रहे हैं कि राहुल गांधी से जुडे  सवाल पर पीएम ने जरूर काफी साफगोई से टिप्पणी की। उन्होंने कहा था कि पार्टी का नेतृत्व जब भी राहुल गांधी को पीएम बनाने का फैसला करेगा, तो वे कुर्सी छोड़ देंगे। ‘युवराज’ राहुल की सराहना भी पीएम ने लगे हाथ जमकर कर डाली।

 एटमी जवाबदेही विधेयक के मामले में भी संसद में काफी विवाद रहा है। पिछले सत्र में सरकार ने आखिरी दिन तमाम हंगामे के बीच लोकसभा में इसे पेश जरूर कर दिया था, लेकिन इसे पास कराने की चुनौती बनी हुई है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने भरोसा जताया कि अगले सत्र में इस जरूरी विधेयक को सभी की सहमति से पास करा लिया जाएगा। ए राजा के मामले में एक सीधा सवाल था। हैरान करने की बात यह रही कि डाक्टर मनमोहन सिंह ने जो उत्तर दिया उससे यही संदेश गया कि राजा को सरकार में बचाया जाएगा। पीएम ने यही कहा था कि स्पेक्ट्रम के मामले में उनकी ए राजा से बात हुई है। उन्होंने बताया है कि इस मामले में सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ था। इस जवाब से पीएम ने भले ए राजा को ‘क्लीन चिट’ न दी हो, लेकिन इससे इस मंशा के संकेत तो मिल ही गए कि राजनीतिक कारणों से ए राजा को बचाना जरूरी हो गया है। कई अहम सवालों के जवाब में विश्वसनीयता का बिंदु सवालों के घेरे में ही बना रहा!