सोमवार, 30 अगस्त 2010

मैंने कैसे रची कामायनी-उत्तमा






उत्तमा की रचना श्रृंखला, कामायनी की एक पेंटिंग मैंने पिछली बार लगायी थी। बहुत से लोग जानना चाहते थे कि ऐसी नग्नता क्या कला में आवश्यक है? यह असहज नहीं लगता, जानबूझकर ज्यादा दर्शक जुटाने या विवाद बढ़ाकर चर्चा में आने के लिये तो कलाकार ऐसा नहीं करते। इन प्रश्नों पर मैंने कामायनी की रचनाकार से ही जानना चाहा कि वास्तव में सच क्या है? यहां कामायनी श्रृंखला की कुछ और रचनायें और उत्तमा के विचार भी दिये जा रहे हैं। आप इस बहस को आगे बढ़ाने के लिये आमंत्रित हैं।
कला में न्यूडिटी और हम: उत्तमा
कला में न्यूडिटी पर चर्चा जितनी दिलचस्प है, उतनी  ही गंभीर। सामाजिक सरोकारों की ही तरह  न्यूड रचना भी एक रोचक विषय है। कलाकार प्रकृति की हर रचना को अपनी नजर से देखता और उसका चित्रांकन करता है। मानव शरीर भी  प्रकृति की ही एक कृति है। यह कला का विषय क्यों नहीं हो सकता ? आब्जेक्ट न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। प्रसव के समय छटपटाती स्त्री को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका डॉक्टर पुरुष है या स्त्री। अर्द्धनग्न अवस्था में उसे तमाम लोग देखते हैं, यह नए सृजन के लिए होता है इसलिये उसमें कहीं अश्लीलता नहीं मानी जाती। लेकिन जब यही सृजन एक आर्टिस्ट करता है तो विवाद शुरू हो जाता है।  कोई समझना नहीं चाहता की कैनवस पर कब, क्या और कैसे पेंट करना है, यह आर्टिस्टिक मूड डिसाइड करता है। कैनवस सामने आने पर कलाकार सोच-समझकर काम नहीं करता, वो तो होने लगता है। कला दिल से निकलती है न कि दिमाग से।

स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा महसूस नहीं कर रहे। पढ़ाई के दौरान ही मैंने न्यूड पेंटिंग बनानी शुरू कर दी थीं। बीएफए द्वितीय वर्ष में मेरी ऐसी पहली पेंटिंग में युवती को एक अजगर ने जकड़ रखा था।  हर मामले में मेरा हौसला बढ़ाने वाली मम्मी ने ही पूछ लिया कि तुम्हारी ऐसी पेंटिंग्स का तुम्हारे छोटे भाइयों पर कैसा असर पड़ेगा।लोग तुम्हारे बारे में कैसा सोचेंगे। ग्वालियर में एक प्रदर्शनी के दौरान कुछ लोगों ने  मेरी पेंटिंग्स का जमकर विरोध किया। मैं बहुत डर गई थी। न्यूड पेंटिंग किए जाने की वजहें हैं। हर आर्टिस्ट के लिए यह जरूरी है कि वह शरीर के हर अंग की बनावट को जाने। फ्रंट, बैक, साइड पोश्चर, बैठे, खड़े और लेटे की पोजीशन की डीप स्टडी किए बिना फिगरेटिव पेंटिंग की
कल्पना मेरी समझ से परे है। एनाटॉमी स्टडी करने के लिए स्टूडेंट्स को किताबों का सहारा लेना पड़ता है क्योंकि न्यूड मॉडल उपलब्ध नहीं हो पाते। हर सीखने वाले के साथ ऐसा ही होता है। यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं।

 जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने का फैसला मैंने जितनी आसानी से ले लिया, पुस्तक पढ़ने के बाद उतनी ही देरी हुई। मुझे लगा, जैसे मेरे भीतर का कलाकार कुछ करना चाहता है। प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम प्रेरक लगा। कामायनी पढ़ी, लगा प्रसाद ने विवादों से बचने का कहीं रास्ता तो नहीं तलाशा है। मनु और श्रद्धा को न्यूड बता पाने से हिचके क्यों वो? बताइये प्रलय के पश्चात कहां से आ गए वस्त्र? श्रद्धा और मनु को कैनवस पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया। एक साथ छह कैनवस पर काम करना शुरू किया। विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में मुझे खूब मेहनत करनी पड़ी। 
प्रसाद कहते हैं, मनु विचारों में लीन थे कि तभी किसी ने आकर पूछा कि इस जनहीन प्रदेश को अपनी रूप-छटा से आलोकित करने वाले तुम कौन हो? मनु ने दृष्टि उठाई तो देखा कि दीर्घ आकार की एक विलक्षण सौंदर्य संपन्न बालिका उनके सामने खड़ी है। नीले रोओं वाली भेड़ों के चिकने चर्म खंडों से ढंका उसका अर्द्धनग्न शरीर ऐसा लगता था कि जैसे काले बादलों के वन में बिजली के फूल खिल उठे हों और उसकी मुस्कान तो इतनी मधुर थी कि मनु देखते ही रह गए। चुनौती सामने थी, प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण था। समस्याएं भी कम नहीं। हमारे यहां न्यूड पेंटिंग्स जितनी भी बन जाएं लेकिन बिकती नहीं।
कामायनी बनाते समय मैंने तो सोचा ही नहीं था कि यह बेचने के लिए बना रही हूं, कुछ बिक गईं तो बात अलग है। भारतीय बाजार में न्यूडिटी नहीं बिकती।  चुनौतियां हैं और परेशानियां भी, माहौल भी बिल्कुल अनुकूल नहीं, फिर भी हमारे कलाकार इस तरह का काम कर रहे हैं। शायद उन्हें कला पर पहरे के यह दिन और बेवजह
आलोचनाएं करने वाले लोगों के दिल बदलने की उम्मीद है। मैं तो अपनी रिसर्च स्कालर्स और अन्य छात्राओं को सीख देने से नहीं हिचकती कि जो मन आए वो बनाओ। किसी से डरने की जरूरत नहीं। हम कलाकार हैं, दिल की बात ही तो सुनेंगे।
 असिस्टेंट प्रोफेसर, चित्रकला विभाग, दृश्य कला संकाय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी

14 टिप्‍पणियां:

  1. Uttamaa ji kaa chitraankan aur unke vichaar srishti ke mahaan rahasya ki garimaa par aadhaarit hain.isiliye prashanshaniya bhi.

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  2. सुभाष जी
    अभिवादन मेरा विरोध उत्तमा जी को संसूचित कीजिये वैसे http://blog4varta.blogspot.com/ पर मेरे विचार रख दिये हैं
    सादर
    आपका स्नेही गिरीश बिल्लोरे मुकुल

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  3. उत्तमा जी ये कोई तय नहीं करेगा कि कलाकार क्या रचे। किसी को कोई अधिकार नहीं है। हां ये तो है कि न्यूड पेंटिंग्स का बच्चों के सामने देखने में कुछ अजीब महसूस होगा, लेकिन वो भी एक दिन बड़े होंगे वे तब देख लेंगे। कला की तो सराहना ही होनी चाहिए। कामायनी सीरीज क्रम से पूरी देखने को मिले तो अच्छा लगेगा। अब तक देखे चित्र लाजवाब हैं। बधाई

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  4. uttama ji ek baehatreen artist hai aur wo art aur sahitya dono ko jaanti hai. kis khoobsurati se unhone itne acche tarah se kaamayani ko ubhaara hai ....

    meri badhayi aapko is prastuthi ke liye..aur badhayi uttama ji ko is series ke liye ..

    vijay
    09849746500

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  5. उत्‍तमा जी सारी पेंटिंग कामायनी के संदर्भ में देखने पर एक अलग ही नजरिया पेश करती हैं। पर इनमें से किसी भी पेंटिंग को बिना संदर्भ के देखना हमेशा न्‍यूड की बहस में ले जाएगा। एक कलाकार और कला शिक्षिका के नाते उत्‍तमा जी ने जो कहा वह बिलकुल सच है। उत्‍तमा जी को बधाई इस रचनात्‍मकता के लिए और शुभकामनाएं कि वे और उत्‍तमाओं को भी विकसित करने में सफल हो सकें।

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  6. क्या हम कभी अपने आप को बदल पाएंगे? अपनी सोच को बदल पाएंगे. मैं केवल उत्तमा जी की पेंटिंग की बात नहीं कहता. एक घटना मुझे याद है, किसी अच्छे व्यवसायिक घराने को नववर्ष का कलेंडर बनवाते समय एक ऐसा ही पृष्ठ लगाने की सूझी, जिसमें एक बच्चा अपनी माँ का स्तनपान करता दिखाया गया था, सारा मैनेजमेंट बैठा, एक मित्र की हैसियत से मैं भी वहां मौजूद था, चित्र के पक्ष में मेरे तर्क सबने स्वीकार किये पर चित्र को कलेंडर में शामिल नहीं किया गया. मुझे आश्चर्य होता है, कैसी हैं हमारी ऑंखें जो माँ की ममता में भी केवल नग्नता को ही देख पाती हैं? केवल और केवल वासना की दृष्टि से देखेंगे तो वस्त्रावृत छवि में भी नग्नता ही दिखाई देगी. उत्तमा जी के चित्र अद्वितीय हैं, प्रशंसनीय हैं और दर्शनीय भी, उन्हें देखने के लिए वैसी ही दृष्टि चाहिए. उनका एक चित्र मेरी कविताओं ( विद्वानों के अनुसार ग़ज़लें नहीं) के साथ भी प्रकाशित हुआ था, इतना सुन्दर कि के लिए मेरे पास शब्द नहीं. मैं उत्तमा जी की कला मर्मज्ञता को नमन करता हूँ.

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  7. जो इस कलात्‍मक चित्र सीरीज के विरोध में हैं, वे अपनी आंखों पर पलक का अवरोध प्रयोग करें और मानस की गहराई में जाकर खंगालें तो पायेंगे कि देह से ऊपर उठकर सोचने के लिए देह को जानना नितांत जरूरी है। इन चित्रों में कहीं कुछ ऐसा नहीं है जिसे अश्‍लील कहा जा सके।

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  8. सुंदर प्रस्तुति और सही समझ के साथ कलाकृतियों को पेश करने के लिए बधाई। एक ही बात कहना चाहता हूँ कला में सेक्स या कामुकता नहीं होती।

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  9. उत्तमा ने सही कहा कि अश्लीलता आंखों में होती है। कलाकार को आजादी मिलनी ही चाहिये। हम मकबूल फिदा हुसैन की बात आती है तो धर्मनिरपेक्ष होकर उनकी वकालत करने लगते हैं। साहित्य से जुड़े हैं तो संस्कृति संरक्षण जैसे भारी-भरकम शब्दों पर जोर डालते हैं लेकिन हिंदू कलाकार की आलोचनाओं से नहीं हिचकते। कलाकार महिला हो तो मुंह ज्यादा खुलने लगते हैं। घर में दबी-ढंकी रखी अपनी पत्नी को सामने देखकर कलाकार की आलोचना करते हैं। पत्नी को आजादी देकर देखिए, सारी महिलाएं अच्छा करेंगी तो आपको अच्छी लगनी लगेंगी। आलोचकों में से कुछ को मैं जानती हूं, मिली भी हूं उनसे और उनकी पत्नियों से इसलिये यह बोल रही हूं।

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  10. उत्तमा जी ,आप की कामायनी पर आधारित चित्रकला को देखा |किसी भी दृष्टि से अश्लीलता नहीं है |किसी भी चित्र में कला यदि ईमानदारी से विद्यमान है तो अश्लीलता के लिए कोई स्थान नहीं है | इसे कामायनी से जोड़ा भी जा सकता है और नहीं भी |जोड़ देने से इसे और भी गंभीरता मिल जाती है ,विवाद के लिए कोई स्थान नहीं |आप को बधाई और सुभाष राय को इस कलात्मक साहस के लिए धन्यवाद.|

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  11. जि‍न लोगों के दि‍माग ने बचपन की दहलीजें पार नहीं की हैं उन्‍हें कला दीर्घाओं में जाने का ख्‍याल भी रखने की क्‍या आवश्‍यकता है।

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  12. उत्तमा जी ने अपना पक्ष सुंदर ढंग से रखा है। इसके बाद तो विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं।

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  13. कामायनी चित्र ऋंखला ने तो चकित ही कर दिया । । बहुत सुंदर रचना है। कला अश्लील कभी नहीं होती वह तो देखने वाले के मन और उसकी सोच में होती है।

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  14. उत्तमा जी -कामायनी और आपकी कला,कामायनी को दृश्य के माध्यम से आपने जो अभिव्यक्ति की वह प्रसंसा की पात्र है। चित्रांकन में जहाँ आपने जिन रंगों का प्रयोग किया है वह सर्वथा उसी तरह से उचित है जिस तरह से जय शंकर प्रसाद जी द्वारा रचित कामायनी में सभी सर्गों का चित्रण किया है। ठीक उसी प्रकार आपने उसको अभिव्यक्त करने का प्रयाश किया है। अच्छी कृति के लिए आपको बधाई

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