बुधवार, 4 अगस्त 2010

साहित्य का देह-विमर्श

हिंदी को इस बात का गर्व हो सकता है कि उसने तमाम बड़े ऊर्जासंपन्न रचनाकार दिये। निराला, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रेणु, दिनकर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, दुष्यंत जैसे सैकड़ों नाम गिनाये जा सकते हैं, जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध किया, उसे नयी ऊंचाइयां दीं। पर आज हालात बिल्कुल अलग हैं। रचनाकार नेपथ्य में है, आलोचक और संपादक मुखर हैं। वे चाहें जिसे बड़ा कहानीकार, कवि, साहित्यकार बना दें। सबके अपने खेमे हैं, अपनी शिष्यमंडली है। हर गुरु का अपना अखाड़ा है, अपने पहलवान हैं और अपने दांव भी। हर खेमा अपने लोगों का चेहरा चमकाने में लगा हुआ है, चेले अपने गुरु के महिमागान में मस्त हैं। सभी एक दूसरे से डरे हुए भी हैं, इसीलिए मौका मिलने पर विरोधियों को ठिकाने लगाने में कोई चूकता नहीं।

साहित्य भी अब साहित्य नहीं रह गया, वह दलित और स्त्री विमर्श से चलकर अब देह-विमर्श तक आ गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि साहित्य के नाम पर प्रेम और बेवफाई के लिफाफे में शरीर की उत्तेजना ठीक उसी तरह बेचने की कोशिश की जा रही है, जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां मूर्ख ग्राहकों को खूबसूरत लड़कियों के विज्ञापनों की आड़ में अपना सुपर माल बेच रही हैं। ज्ञान की प्रचंड पीठ से बाहर आ रहा हैं सुपर प्रेम का, सुपर बेवफाई का साहित्य। ढूँढ-ढूँढ कर ऐसी कविताएं, कहानियां, लेख छापे जा रहे हैं, जो सार्वजनिक स्थल पर भी बेडरूम की तरह गुदगुदी पैदा कर सकें। जाहिर है वे खूब बिकेंगे और जब वे बिकेंगे तो पाठकों के हृदय में इस नूतन ज्ञानोदय के लिए ऐसे माल के अन्वेषी संपादक को सब लोग महान समझेंगे। साहित्य के नाम पर शरीर-विमर्श के इसी महायज्ञ की चपेट में वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय भी आ गये हैं। कुछ लेखिकाओं के लिए छिनाल शब्द का प्रयोग करके वे घिर गये।

साहित्य में यह कोई नयी बात नहीं है और ऐसे मसलों पर स्वीकार और अस्वीकार की खेमेबाजी से ऊपर उठकर बहस होनी चाहिए। इसके पहले भी कई साहित्यिक पत्रिकाओं में खुलेपन के नाम पर विशुद्ध गालियां छप चुकीं हैं। शब्द नैतिक या अनैतिक कहां होते हैं, उनके प्रयोग के संदर्भ नैतिक या अनैतिक होते हैं। एक ही शब्द एक खास परिवेश में सहज अभिव्यक्ति के नाम पर अपने समूचे भदेसपन के साथ स्वस्थ मन से स्वीकार किया जाता है जबकि वही शब्द दूसरे संदर्भ में गाली लगने लगता है। यह तर्क साहित्य के नाम पर गालियां और नंगपन परोसने का आधार भी मुहैया कराता है। ऐसे में अगर छिनाल शब्द की प्रेत छाया वी एन राय पर पड़ रही है तो उसे छापने वाले उससे कैसे मुक्त हो सकते हैं।

साहित्य और साहित्यकार किसी सत्ता के अनुशासन से नहीं बंधते, न ही साहित्य के इलाके में छिड़ी बहस के निर्णय का अधिकार किसी हुकूमत को मिलना चाहिए। किसी दृष्टिकोण पर किसी को एतराज है तो बोलने या लिखने के अपने सबसे ताकतवर विकल्प का प्रयोग न करके किसी तीसरे से दखल का आग्रह समझ में नहीं आता। आप लेखक हैं, अपना काम कीजिये, सरकार को अपना काम करने दीजिये। एक लेखक के नाते वी एन राय ने जो बातें कहीं हैं, उनका जवाब देने, उन पर एतराज करने या उन्हें खारिज करने से किसी को कोई कैसे रोक सकता है। राय से असहमत सभी चिंतकों, लेखकों को इसका पूरा अधिकार है और यह उनका लेखकीय दायित्व भी है। राय को ज्ञानपीठ की पुरस्कार चयन समिति से हटना पड़ा है| उन्होंने जिस तरह दूरदर्शन पर अपने मंतव्य का औचित्य प्रतिपादित किया था, लगता नहीं कि वे उसे बहस में और आगे ले जाना चाहते हैं|   अब राय के कुलपतित्व के बारे क्या निर्णय करना है, यह सरकार पर छोड़ देना चाहिए।

5 टिप्‍पणियां:

  1. देह विमर्श को तो देर सवेर इंगित साहित्य के प्रायोजित विवेचन का मुद्दा बनना ही था यद्यपि यह कोई नया विषय नहीं है ...
    नारी लेखन में देह दो तरीके से प्रस्तुत होती है -एक में तो उसे मक्का मदीना जैसा मुकद्दस मुकाम फोकस किया जाता है और दूसरी ओर उन्मुक्त जीवन शैली , यौन स्वातन्त्र्य के नाम पर बिस्तर बिस्तर बिछा दिया जाता है -दोनों ही प्रवृत्तियाँ संभवतः अतिवादिता की शिकार है .....नारी या पुरुष की देह उनकी अपनी है- वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर कोई इसका जो कुछ करे -किसी को क्या हानि हो सकती है -मगर बिकाऊ माल के नाम पर यौन व्यभिचार से नव युवा पीढी सम्वेदित हो सकती है -शायद एक शुद्धतावादी नजरिये के आवेश में राय साहब वह सब कह गए या साक्षात्कार लेने वाले वैसा समझ गए .....
    लेखक विभूति ने क्या कहा ,लानत मलामत इस पर होनी चाहिए -इससे वी सी पद का क्या लेना देना ?

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  2. सुभाष भाई मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वीएनरायजी मेरे भी प्रिय रहे हैं। केवल संबंधों के कारण नहीं,वरन उनके लिखे हुए के कारण भी।
    पर यह समय ऐसा है कि हमें अपना कर्त्‍तव्‍य निभाना ही होगा। भले ही हमारा कोई प्रिय हमारे सामने क्‍यों न हो। उन्‍होंने जो कहा है और जो छपा है उसकी व्‍याख्‍या तरह तरह से हो रही है और हो भी सकती है। लेकिन जो पहली ही नजर में सामने आता है वह तो यही दर्शाता है कि उचित नहीं है।
    यह किसी एक व्‍यक्ति के विचार हो सकते हैं। अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता है। लेकिन संपादक का दायित्‍व निभा रहे व्‍यक्ति को सोचना चाहिए कि वह सार्वजनिक हित को ध्‍यान में रखते हुए क्‍या छापे और क्‍या न छापे। हां अब जैसा कि आपने ही कहा कि अगर वहां भी आज का बाजारवाद हावी है तो वह उसका फायदा वैसे ही उठाएगा।
    बहरहाल इस मुद्दे पर आपकी यह बेहद संतुलित टिप्‍पणी देखकर बहुत सुकून मिला। शुभकामनाएं कि हम सब इस अप्रिय प्रसंग से जल्‍द ही बाहर आ जाएं।

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  3. प्रिय भाई सुभाष जी की संतुलित प्रतिक्रिया सहज ही लिखी गई प्रतीत होती है। यही साहित्‍य का धर्म भी है। सुभाष भाई का रचनाकार सहज ही अपनी बात कह जाता है। यह रचे हुए को, साहित्‍य बनाता है, अर्थात् जो समाज के हित के लिए रचा जा रहा है। अनर्गल से समाज को बचाया तभी जा सकेगा, जब उसे पहचाना जाएगा और जब सामने नहीं आएगा तो फिर कैसे चीन्‍हेंगे। इसलिए यह सब होना-घटना तय है। इस घटने के बाद सब संभल जाएं, बात तो तभी बनती है।

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  4. ..शब्द नैतिक या अनैतिक कहां होते हैं, उनके प्रयोग के संदर्भ नैतिक या अनैतिक होते हैं। एक ही शब्द एक खास परिवेश में सहज अभिव्यक्ति के नाम पर अपने समूचे भदेसपन के साथ स्वस्थ मन से स्वीकार किया जाता है जबकि वही शब्द दूसरे संदर्भ में गाली लगने लगता है।यह तर्क साहित्य के नाम पर गालियां और नंगपन परोसने का आधार भी मुहैया कराता है।..
    ..एक संतुलित पोस्ट.

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  5. अपने महत्त्व पूर्ण मुद्दा उठाया है, खेमेबाजी जोरों पर है, चरित्र हनन की प्रवृत्ति भी पनप रही है. राजनीतिज्ञ और अन्य स्वार्थी तत्व इसका लाभ उठा रहे हैं.

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