गुरुवार, 26 अगस्त 2010

आल इज नाट वेल

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह राष्ट्रीय मीडिया से रूबरू हुए। जमकर सवालों की बौछार हुई। पीएम ने हर सवाल का जवाब तो दिया, लेकिन बचते-बचाते। उन्होंने पूरी सावधानी रखी कि  कहीं बात का बतंगड़ न बने। अपनी इस कोशिश में वे पूरी तौर पर सफल कहे जा सकते हैं लेकिन, पीएम अपनी ही छवि के अनुरूप कई सवालों पर सहज नहीं देखे गए। कुछ सवालों के उत्तरों में तो साफ-साफ गठबंधन सरकार की मजबूरी झलकी। यूपीए-टू सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा हुआ है। हर सवाल के जवाब में पीएम ने ‘आल इज वेल’ के अंदाज में टिप्पणियां जरूर कीं लेकिन उनके कई बयान बहुत भरोसे लायक नहीं लगे।

डाक्टर मनमोहन सिंह की छवि एक खांटी साफ-सुथरे नेता की है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री से देश कुछ ज्यादा उम्मीद बांधकर चलता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे दूसरे नेताओ की तरह सरासर झूठ की बैसाखियों पर अपनी सरकार न चलाएं। कम से कम अपनी सरकार के कुछ चर्चित दागदार चेहरों के कवच तो न बन जाएं। चार सालों में पहली बार मीडिया के सामने वे सवा घंटे तक तमाम सवालों का जवाब देते रहे। कुछ अहम सवालों पर उन्होंने साफगोई का परिचय नहीं दिखाया।  महंगाई के मुद्दे पर मनमोहन सिंह ने घुमा फिराकर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थितियों को जिम्मेदार ठहराया। कहा कि पिछले वर्ष कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ की वजह से खाद्य उत्पादन कम हुआ। उन्होंने देश को यह भरोसा जरूर दिलाया है कि आगामी दिसंबर तक बढ़ती महंगाई काबू में आ जाएगी। वे उम्मीद कर रहे हैं कि इस अवधि तक महंगाई की दर 5-6 प्रतिशत के बीच आ जाएगी। हालांकि, डाक्टर मनमोहन सिंह ने यह नहीं बताया कि आखिर किस ‘जादू’ से वे महंगाई पर 6 महीने के अंदर काबू पाने की उम्मीद कर रहे हैं। जबकि, उनके कृषि मंत्री शरद पवार लगातार अगाह करते आ रहे हैं कि लोग सस्ती चीनी और सस्ते अनाज की ज्यादा उम्मीद न करें।

 एक सवाल था कि सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए बार-बार सीबीआई को हथियार क्यों बनाती है? पीएम ने यही कहा कि सरकार सीबीआई के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करती। संसद में ‘कट मोशन’ के दौरान मायावती व मुलायम से कोई ‘डील’ नहीं हुई। प्रधानमंत्री जब यह सफाई दे रहे थे, तो उनके चेहरे पर सच बोलने का दर्प नहीं दिखाई पड़ रहा था। यहां राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि ‘कट मोशन’ के दौरान की स्थितियां बहुत पुरानी नहीं हैं। लोगों की याददाश्त कमजोर होती है, लेकिन इतनी भी नहीं। ऐसे में ऐसी टिप्पणियों ने विश्वसनीयता का संकट काफी गहरा दिया। तेलंगाना पर पीएम ने यही कहना पर्याप्त समझा कि इस मामले में जांच समिति की रिपोर्ट का इंतजार है। यहां राजनीतिक समीक्षक यह मान रहे हैं कि राहुल गांधी से जुडे  सवाल पर पीएम ने जरूर काफी साफगोई से टिप्पणी की। उन्होंने कहा था कि पार्टी का नेतृत्व जब भी राहुल गांधी को पीएम बनाने का फैसला करेगा, तो वे कुर्सी छोड़ देंगे। ‘युवराज’ राहुल की सराहना भी पीएम ने लगे हाथ जमकर कर डाली।

 एटमी जवाबदेही विधेयक के मामले में भी संसद में काफी विवाद रहा है। पिछले सत्र में सरकार ने आखिरी दिन तमाम हंगामे के बीच लोकसभा में इसे पेश जरूर कर दिया था, लेकिन इसे पास कराने की चुनौती बनी हुई है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने भरोसा जताया कि अगले सत्र में इस जरूरी विधेयक को सभी की सहमति से पास करा लिया जाएगा। ए राजा के मामले में एक सीधा सवाल था। हैरान करने की बात यह रही कि डाक्टर मनमोहन सिंह ने जो उत्तर दिया उससे यही संदेश गया कि राजा को सरकार में बचाया जाएगा। पीएम ने यही कहा था कि स्पेक्ट्रम के मामले में उनकी ए राजा से बात हुई है। उन्होंने बताया है कि इस मामले में सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ था। इस जवाब से पीएम ने भले ए राजा को ‘क्लीन चिट’ न दी हो, लेकिन इससे इस मंशा के संकेत तो मिल ही गए कि राजनीतिक कारणों से ए राजा को बचाना जरूरी हो गया है। कई अहम सवालों के जवाब में विश्वसनीयता का बिंदु सवालों के घेरे में ही बना रहा!

4 टिप्‍पणियां:

  1. सीटी बजा के बोल........... आअल इज वेळ ...........

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  2. प्रधानमंत्री ने तो आल इज वेल कर दिया अब जनता की बारी है कि कांग्रेस का आल इज वेल करे|

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  3. बड़ा दुरूह काम है इस लेख पर टिप्पणी दे पाना.. क्या कहूं, कुछ कहते ही नहीं बनता.

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  4. आपने सही चीरा-फाड़ी की है
    ऐसा चीरा तो लगता ही रहना चाहिए
    पर पी एम क्‍या
    सब ही बेसुध पड़े हैं
    मानो ऐनस्‍थेसिया हो गया है इन्‍हें
    इसी में खुशी मिलती है
    पब्लिक तो पब्लिकली ही मूर्ख बनती है।

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