कविता कोश की स्थापना का चौथा वर्ष पूरा हो गया। हिन्दी काव्य का यह ऑनलाइन कोश इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है सामूहिक प्रयासों द्वारा किसी भी कठिन और विशाल लक्ष्य को पाया जा सकता है। कविता कोश साहित्य के भविष्य का भी दर्पण है। इस कोश में संकलन के द्वारा न केवल दुर्लभ और लुप्त होती कृतियों को बचाया जा रहा है बल्कि ये कृतियाँ सर्व-सुलभ भी हो रही हैं। रचनाकार कविता कोश में अपनी रचनाओं के संकलन के बाद संतुष्टि का अनुभव करते है कि उनकी रचनाएँ समस्त विश्व में पढी़ जा सकती हैं और सुरक्षित व सुसंकलित हैं। इस तीसरे वर्ष में भी कोश तीव्र गति से आगे बढा़। अभी तक कोश में 32000 पन्ने जुड़ चुके हैं.
इस वर्ष कविता कोश टीम में संपादक श्री अनिल जनविजय ने सर्वाधिक योगदान करते हुए कोश में 10,000 पन्नें बनाने का आंकडा पार कर लिया। कोश से नए जुड़े कर्मठ योगदानकर्ता धर्मेंद्र कुमार सिंह ने तेज़ी से योगदान करते हुए 3000 से अधिक पन्नों का निर्माण किया। कविता कोश टीम के सदस्य श्री द्विजेन्द्र 'द्विज' ने ग़ज़ल और नज़्म विधा की रचनाओं को जोड़ने और उर्दू के कठिन शब्दों के अर्थ कोश में शामिल करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। प्रसिद्ध ग़ज़लकारा श्रद्धा जैन अपने पिछले वर्ष के सक्रिय योगदान को आगे बढ़ाते हुए कोश में 1000 पन्नें जोड़ने वाली सातवीं योगदानकर्ता बनीं। अन्य प्रमुख योगदानकर्ताओं में प्रदीप जिलवाने, विभा झलानी, हिमांशु पाण्डेय, राजीव रंजन प्रसाद, अजय यादव, संदीप कौर सेठी, मुकेश मानस, नीरज दइया और वीनस केशरी के नाम शामिल हैं। इन सभी योगदानकर्ताओं के श्रम के कारण ही आज कविता कोश अपने वर्तमान स्वरूप को पा सका है। इस वर्ष कविता कोश टीम ने कोश को और अधिक उन्नत और सुरुचिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से कई नए प्रयास आरंभ किए हैं। प्रादेशिक कविता कोशों का निर्माण कार्य भी आरम्भ कर दिया गया है। सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक पर भी कविता कोश का अकाउंट खोला गया है. इस समय करीब 3900 व्यक्ति फ़ेसबुक के ज़रिये कविता कोश से जुड़े हैं। हिन्दी के अलावा अन्य भाषाओं के काव्य को कविता कोश में समेटने की योजना को पाँचवे वर्ष में अमली जामा पहनाने का प्रयास किया जाएगा। (कविता क़ोश से )
बकौल हजारी प्रसाद द्विवेदी, करने वाला इतिहास निर्माता होता है, सिर्फ सोचने वाला इतिहास के भयंकर रथचक्र के नीचे पिस जाता है। इतिहास का रथ वह हांकता है, जो सोचता है और सोचे को करता भी है।
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
यह कोई नया झूठ तो नहीं?
क्या सचमुच पाकिस्तान को होश आ गया है? वह अपनी लंबी और गहरी नींद से उठ गया है? या यह भी एक चाल है, एक बहाना है सारी दुनिया को दिखाने का कि वह आतंकवाद के खिलाफ कितना सचेष्ट है, कितना आक्रामक है? उसने जमात-उद-दावा समेत 23 आतंकवादी संगठनों पर पाबंदी लगा दी है। जिन संगठनों पर पाबंदी लगायी गयी है, उनमें जैशे-मुहम्मद, लश्करे-जांघवी और तश्करे-तैयबा भी शामिल हैं। जमात के मुखिया हाफिज सईद और अन्य प्रतिबंधित संगठनों के सदस्यों पर पाकिस्तान से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है। इस आदेश की एक विडंबना है कि सईद के पाकिस्तान में आने-जाने पर कोई रोक नहीं है। उनके कुछ खातों को जब्त कर लिया गया है। उन्हें हथियारों के लाइसेंस भी नहीं मिलेंगे। भारत अरसे से जमात पर कार्रवाई करने की मांग कर रहा था। इसी जमात के मुखिया मुंबई में हुए प्राणघातक हमले के मुख्य सूत्रधार माने जाते हैं।
पाकिस्तान की नीयत पर कभी पूरी तरह भरोसा कर पाना मुश्किल होता है क्योंकि वह अक्सर कहता कुछ है और करता कुछ है। भारत के तमाम आग्रहों के बावजूद उसने लंबे अरसे से हाफिज सईद को मुक्त छोड़ रखा था। वह पूरे पाकिस्तान में भारत-विरोधी आग उगलने में जुटा रहता है। जब इन बातों की ओर पाकिस्तान का ध्यान दिलाया जाता है तो या तो वह सईद के खिलाफ सुबूत की मांग करता है या कहता है कि जिस तरह भारत में तमाम लोग तरह-तरह के बयान देते रहते हैं, उसी तरह पाकिस्तान में भी। मुल्क में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और किसी को भी अपनी बात कहने से रोका नहीं जा सकता। इस गलीज तर्क के आगे कोई भी क्या कर सकता है? जहां तक सुबूत की बात है, पाकिस्तानी नेताओँ ने मुंबई हमले के बाद जिस तरह इस हत्याकांड में पहले पाकिस्तान का हाथ होने से इंकार किया और फिर स्वीकार किया, वह किसी से छिपा नहीं है। पहले तो उन्होंने यह भी मानने से इंकार कर दिया था कि कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट का रहने वाला है लेकिन उन्हीं के एक टीवी चैनल द्वारा उसके पिता का साक्षात्कार प्रसारित किये जाने के बाद पाकिस्तान यह मानने को मजबूर हुआ कि कसाब पाकिस्तानी नागरिक है। झूठ बोलने में पाकिस्तानी नेताओं, मंत्रियों का कोई सानी नहीं है।
प्रतिबंध की यह कार्रवाई भी तब अंजाम दी गयी है जब पाकिस्तान की एक मस्जिद में हाल में एक जबरदस्त धमाका हुआ और 40 लोग मारे गये। तर्क दिया गया है कि इस हमले के बाद जनता में बहुत गुस्सा है, बड़ी नाराजगी है, इसलिए सरकार को यह कदम उठाना पड़ा है। पर गौर करें तो पाकिस्तान की जमीन पर किसी मस्जिद में यह कोई पहला हमला नहीं है। इस तरह के हमले तो वहां आम तौर पर होते ही रहते हैं। जनता की नाराजगी का खयाल पाकिस्तान सरकार को इससे पहले तो कभी नहीं आया। यह अचानक जनता के दर्द की समझ पाक हुक्मरान में कहां से पैदा हो गयी। जब स्वात घाटी में पूरी तरह तालिबान का कब्जा हो गया था, जब महिलाओं की सरेआम पिटाई हो रही थी, जब सिखों से जजिया वसूला जा रहा था, तब यह सरकार कहां सो रही थी? तब जनता के दुख-दर्द खई उसे परवाह क्यों नहीं हुई? यह सब झूठी बातें लगती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जिस अमेरिका को भारत अपना सहयोगी देश मानता है, वह अमेरिका भी आतंकवादियों के मामले में दोगली भूमिका में दिखायी पड़ता रहा है। भारत ने तमाम प्रयास कर लिये लेकिन अमेरिका ने तालिबान की तरह उन आतंकवादी संगठनों की नकेल कसने की बात कभी पाकिस्तान से नहीं की, जो कश्मीर में अस्थिरता फैलाने के षड्यंत्र करते रहते हैं। शायद अमेरिका को ये लगता रहा हो कि ये आतंकवादी संगठन पाकिस्तान सरकार की सरपरस्ती में काम करते हैं, पाक सरकार के दोस्त की तरह केवल भारत का सरदर्द हैं, अमेरिका को इससे क्या लेना-देना। लेकिन लगता है कि अमेरिका की इस सोच में थोड़ी तबदीली आयी है। हाल के दिनों में कुछ आतंकवादी विदेशी जमीनों पर पकड़े गये, जो लश्कर से संबद्ध मिले। इसी क्रम में अमेरिका में आतंकवाद के शीर्ष विशेषज्ञ और काउंसिल आॅन फॉरेन रिलेशंस के डेनियल मार्की ने जो चेतावनी दी है, उसे एक गंभीर घटनाक्रम के रूप में लिया जाना चाहिए।
मुंबई हमले के बाद भी लश्कर और जैश पर पाबंदी लगायी गयी थी लेकिन तब लश्कर ने अपना चेहरा बदल लिया। लश्कर का सैनिक संगठन अपने ढंग से आतंकवादी कार्रवाइयों में लगा रहा लेकिन उसके शीर्ष नेताओँ ने जमात-उद-दावा के नये चेहरे के साथ अपने को खुलेआम घूमने और कश्मीर की तथाकथित आजादी की लड़ाई के लिए भाषण देने एवं वसूली जारी रखने को आजाद कर लिया। धीरे-धीरे वह पाबंदी निरर्थक हो गयी। अब जब मार्की ने 26/11 के मुंबई हमले के लिए कसूरवार आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा को 'टिक टिक करता टाइम बम' बताने का साहस किया है तब अमेरिका की नींद टूटी है। मार्की ने ओबामा प्रशासन से कहा है कि वह इस पर अपना ध्यान केंद्रित करे, क्योंकि पाकिस्तान इसके खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम रहा है। उन्होंने लश्कर को पाकिस्तानी तालिबान से ज्यादा खतरनाक बताया है। असल सच यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम भी अमेरिका के दबाव में ही उठाया है। यह अच्छी बात है कि अमेरिका का एक ऐसे बड़े खतरे पर ध्यान गया है, जिसे वह केवल भारत की समस्या मानकर नजरंदाज कर रहा था। लेकिन पाकिस्तान सरकार इस मामले में कुछ कदम उठाये, इसके लिए उसकी नकेल कसे रहनी पड़ेगी।
अगर सचमुच पाकिस्तान इस फैसले पर अमल के लिए मजबूर होता है तो इससे भारत को राहत मिलेगी। पहले से ही कश्मीर में सुरक्षा बलों के अभियान से आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन के कर्ता-धर्ता मुश्किल में हैं। बौखलाहट में उन्होंने पाक अधिकृत कश्मीर में मौजूद अपने नेताओं से कहा है कि भारत में जल्द घुसो और कुछ बड़ा करो। आतंकवादियों ने भारी दबाव के कारण अपनी रणनीति भी बदली है। अब वे किसी एक जगह तीन घंटे से ज्यादा नहीं रुकते। वे स्थानीय जनता पर विश्वास भी नहीं करते, चाहे वह मुसलमान ही क्यों न हो। 2009 में लश्कर, जैश और हरकत के 53 आतंकवादी कमांडर मुठभेड़ में मार गिराए गए थे जबकि इस साल 15 मई तक 37 आतंकवादी ढेर कर दिये गये हैं। अगर पाकिस्तान को सद्बुद्धि आ जाय तो कश्मीर में शांति बहाल करने में मदद मिल सकती है। पर एक झूठे पर तुरंत यकीन कर लेना थोड़ा कठिन लगता है।
पाकिस्तान की नीयत पर कभी पूरी तरह भरोसा कर पाना मुश्किल होता है क्योंकि वह अक्सर कहता कुछ है और करता कुछ है। भारत के तमाम आग्रहों के बावजूद उसने लंबे अरसे से हाफिज सईद को मुक्त छोड़ रखा था। वह पूरे पाकिस्तान में भारत-विरोधी आग उगलने में जुटा रहता है। जब इन बातों की ओर पाकिस्तान का ध्यान दिलाया जाता है तो या तो वह सईद के खिलाफ सुबूत की मांग करता है या कहता है कि जिस तरह भारत में तमाम लोग तरह-तरह के बयान देते रहते हैं, उसी तरह पाकिस्तान में भी। मुल्क में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और किसी को भी अपनी बात कहने से रोका नहीं जा सकता। इस गलीज तर्क के आगे कोई भी क्या कर सकता है? जहां तक सुबूत की बात है, पाकिस्तानी नेताओँ ने मुंबई हमले के बाद जिस तरह इस हत्याकांड में पहले पाकिस्तान का हाथ होने से इंकार किया और फिर स्वीकार किया, वह किसी से छिपा नहीं है। पहले तो उन्होंने यह भी मानने से इंकार कर दिया था कि कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट का रहने वाला है लेकिन उन्हीं के एक टीवी चैनल द्वारा उसके पिता का साक्षात्कार प्रसारित किये जाने के बाद पाकिस्तान यह मानने को मजबूर हुआ कि कसाब पाकिस्तानी नागरिक है। झूठ बोलने में पाकिस्तानी नेताओं, मंत्रियों का कोई सानी नहीं है।
प्रतिबंध की यह कार्रवाई भी तब अंजाम दी गयी है जब पाकिस्तान की एक मस्जिद में हाल में एक जबरदस्त धमाका हुआ और 40 लोग मारे गये। तर्क दिया गया है कि इस हमले के बाद जनता में बहुत गुस्सा है, बड़ी नाराजगी है, इसलिए सरकार को यह कदम उठाना पड़ा है। पर गौर करें तो पाकिस्तान की जमीन पर किसी मस्जिद में यह कोई पहला हमला नहीं है। इस तरह के हमले तो वहां आम तौर पर होते ही रहते हैं। जनता की नाराजगी का खयाल पाकिस्तान सरकार को इससे पहले तो कभी नहीं आया। यह अचानक जनता के दर्द की समझ पाक हुक्मरान में कहां से पैदा हो गयी। जब स्वात घाटी में पूरी तरह तालिबान का कब्जा हो गया था, जब महिलाओं की सरेआम पिटाई हो रही थी, जब सिखों से जजिया वसूला जा रहा था, तब यह सरकार कहां सो रही थी? तब जनता के दुख-दर्द खई उसे परवाह क्यों नहीं हुई? यह सब झूठी बातें लगती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जिस अमेरिका को भारत अपना सहयोगी देश मानता है, वह अमेरिका भी आतंकवादियों के मामले में दोगली भूमिका में दिखायी पड़ता रहा है। भारत ने तमाम प्रयास कर लिये लेकिन अमेरिका ने तालिबान की तरह उन आतंकवादी संगठनों की नकेल कसने की बात कभी पाकिस्तान से नहीं की, जो कश्मीर में अस्थिरता फैलाने के षड्यंत्र करते रहते हैं। शायद अमेरिका को ये लगता रहा हो कि ये आतंकवादी संगठन पाकिस्तान सरकार की सरपरस्ती में काम करते हैं, पाक सरकार के दोस्त की तरह केवल भारत का सरदर्द हैं, अमेरिका को इससे क्या लेना-देना। लेकिन लगता है कि अमेरिका की इस सोच में थोड़ी तबदीली आयी है। हाल के दिनों में कुछ आतंकवादी विदेशी जमीनों पर पकड़े गये, जो लश्कर से संबद्ध मिले। इसी क्रम में अमेरिका में आतंकवाद के शीर्ष विशेषज्ञ और काउंसिल आॅन फॉरेन रिलेशंस के डेनियल मार्की ने जो चेतावनी दी है, उसे एक गंभीर घटनाक्रम के रूप में लिया जाना चाहिए।
मुंबई हमले के बाद भी लश्कर और जैश पर पाबंदी लगायी गयी थी लेकिन तब लश्कर ने अपना चेहरा बदल लिया। लश्कर का सैनिक संगठन अपने ढंग से आतंकवादी कार्रवाइयों में लगा रहा लेकिन उसके शीर्ष नेताओँ ने जमात-उद-दावा के नये चेहरे के साथ अपने को खुलेआम घूमने और कश्मीर की तथाकथित आजादी की लड़ाई के लिए भाषण देने एवं वसूली जारी रखने को आजाद कर लिया। धीरे-धीरे वह पाबंदी निरर्थक हो गयी। अब जब मार्की ने 26/11 के मुंबई हमले के लिए कसूरवार आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा को 'टिक टिक करता टाइम बम' बताने का साहस किया है तब अमेरिका की नींद टूटी है। मार्की ने ओबामा प्रशासन से कहा है कि वह इस पर अपना ध्यान केंद्रित करे, क्योंकि पाकिस्तान इसके खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम रहा है। उन्होंने लश्कर को पाकिस्तानी तालिबान से ज्यादा खतरनाक बताया है। असल सच यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम भी अमेरिका के दबाव में ही उठाया है। यह अच्छी बात है कि अमेरिका का एक ऐसे बड़े खतरे पर ध्यान गया है, जिसे वह केवल भारत की समस्या मानकर नजरंदाज कर रहा था। लेकिन पाकिस्तान सरकार इस मामले में कुछ कदम उठाये, इसके लिए उसकी नकेल कसे रहनी पड़ेगी।
अगर सचमुच पाकिस्तान इस फैसले पर अमल के लिए मजबूर होता है तो इससे भारत को राहत मिलेगी। पहले से ही कश्मीर में सुरक्षा बलों के अभियान से आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन के कर्ता-धर्ता मुश्किल में हैं। बौखलाहट में उन्होंने पाक अधिकृत कश्मीर में मौजूद अपने नेताओं से कहा है कि भारत में जल्द घुसो और कुछ बड़ा करो। आतंकवादियों ने भारी दबाव के कारण अपनी रणनीति भी बदली है। अब वे किसी एक जगह तीन घंटे से ज्यादा नहीं रुकते। वे स्थानीय जनता पर विश्वास भी नहीं करते, चाहे वह मुसलमान ही क्यों न हो। 2009 में लश्कर, जैश और हरकत के 53 आतंकवादी कमांडर मुठभेड़ में मार गिराए गए थे जबकि इस साल 15 मई तक 37 आतंकवादी ढेर कर दिये गये हैं। अगर पाकिस्तान को सद्बुद्धि आ जाय तो कश्मीर में शांति बहाल करने में मदद मिल सकती है। पर एक झूठे पर तुरंत यकीन कर लेना थोड़ा कठिन लगता है।
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सोमवार, 5 जुलाई 2010
नक्सलियों की हताशा
नक्सलवादियों में बड़ी बेचैनी है। उनके दूसरे नंबर के नेता आजाद के एक मुठभेड़ में मारे जाने के बाद नक्सल नेतृत्व में खलबली मची हुई है। वे पुलिस पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने आजाद को मुठभेड़ में नहीं मारा, बल्कि उनकी हत्या की गयी है। नक्सलवादियों की एक शीर्ष बैठक में भाग लेने जाते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में उन्हें शहर से दूर ले जाकर मार दिया गया। इसके विरोध में वे बुधवार से देशव्यापी बंद का आह्वान भी कर रहे हैं। नक्सलियों की सैनिक विंग के नेता किशनजी ने इस घटना पर क्षोभ और गुस्सा व्यक्त किया है। परंतु क्या उनके इस गुस्से का कोई मतलब है? क्या उनके आह्वान पर देश ध्यान देगा? क्या उनके आरोपों पर किंचित भी गौर करने की जरूरत है? किसी से भी ये सवाल किये जायें तो वह नहीं में जवाब देगा।
जब नक्सली गरीबों के नाम पर लोगों को डराने, दहशतजदा करने और निर्दोष लोगों की हत्याएं करने में जुटे हैं, तब यह माना जाना चाहिए कि उन्होंने इस तरह की बात कहने का अधिकार खो दिया है। जिन लोगों ने सैकड़ों सिपाहियों को धोखे से मार डाला हो, वे इस तरह सुरक्षा बलों पर आरोप लगायें, यह उचित नहीं जान पड़ता। बंदूक की भाषा में बात करने वालोंं को आखिर किस तरह जवाब दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से कई बार यह प्रस्ताव भेजा जा चुका है कि हथियार डालिए और बात करिये। यह कोई नहीं कहता कि सरकारों से गलतियां नहीं हुईं हैं पर उन गलतियों को दुरुस्त किया जाना चाहिए।
अगर सचमुच नक्सलियों को अपने इलाकों में जन समर्थन हासिल है तो वे उसके सहारे ऐसी परिस्थिति पैदा कर सकते हैं कि सरकार अपनी गलतियों को ठीक करने के लिए मजबूर हो जाय। सारा देश चाहता है कि जिन लोगों की आजादी के बाद से लगातार उपेक्षा हुई है, उन्हें भी अपनी खुशी का थोड़ा ही सही, आकाश मिले पर अगर कुछ लोग बंदूकें लिए खड़े रहेंगे और किसी को उन तक पहुंचने ही नहीं देंगे तो परिणाम क्या होगा। तब तो यही कहा जायेगा कि पहले सरकारों ने गरीबों को पीड़ा पहुंचाई और अब नक्सली वही काम कर रहे हैं। कितनी विडंबना है कि किशनजी भारतीय वायुसेना से भावुक अपील कर रहे हैं कि वे गरीब नागरिकों पर गोलियां चलाने से मना कर दें। हालांकि अभी इस बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है कि नक्सल ताकतों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल किया जाय या नहीं लेकिन अगर नक्सली इसी तरह नरसंहार की कुटिल और वीभत्स नीति पर चलते रहे तो सरकार के सामने अपने नागरिकों, जवानों को मरने देने या हत्यारों से कठोरता से निपटने के अलावा क्या विकल्प रह जायेगा।
जब नक्सली गरीबों के नाम पर लोगों को डराने, दहशतजदा करने और निर्दोष लोगों की हत्याएं करने में जुटे हैं, तब यह माना जाना चाहिए कि उन्होंने इस तरह की बात कहने का अधिकार खो दिया है। जिन लोगों ने सैकड़ों सिपाहियों को धोखे से मार डाला हो, वे इस तरह सुरक्षा बलों पर आरोप लगायें, यह उचित नहीं जान पड़ता। बंदूक की भाषा में बात करने वालोंं को आखिर किस तरह जवाब दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से कई बार यह प्रस्ताव भेजा जा चुका है कि हथियार डालिए और बात करिये। यह कोई नहीं कहता कि सरकारों से गलतियां नहीं हुईं हैं पर उन गलतियों को दुरुस्त किया जाना चाहिए।
अगर सचमुच नक्सलियों को अपने इलाकों में जन समर्थन हासिल है तो वे उसके सहारे ऐसी परिस्थिति पैदा कर सकते हैं कि सरकार अपनी गलतियों को ठीक करने के लिए मजबूर हो जाय। सारा देश चाहता है कि जिन लोगों की आजादी के बाद से लगातार उपेक्षा हुई है, उन्हें भी अपनी खुशी का थोड़ा ही सही, आकाश मिले पर अगर कुछ लोग बंदूकें लिए खड़े रहेंगे और किसी को उन तक पहुंचने ही नहीं देंगे तो परिणाम क्या होगा। तब तो यही कहा जायेगा कि पहले सरकारों ने गरीबों को पीड़ा पहुंचाई और अब नक्सली वही काम कर रहे हैं। कितनी विडंबना है कि किशनजी भारतीय वायुसेना से भावुक अपील कर रहे हैं कि वे गरीब नागरिकों पर गोलियां चलाने से मना कर दें। हालांकि अभी इस बारे में कोई फैसला नहीं हुआ है कि नक्सल ताकतों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल किया जाय या नहीं लेकिन अगर नक्सली इसी तरह नरसंहार की कुटिल और वीभत्स नीति पर चलते रहे तो सरकार के सामने अपने नागरिकों, जवानों को मरने देने या हत्यारों से कठोरता से निपटने के अलावा क्या विकल्प रह जायेगा।
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शनिवार, 3 जुलाई 2010
मूढ़मत्युत्पन्न नाम परिवर्तन
नाम अपने आप में महत्वपूर्ण है? हर बच्चे के मां-बाप उसका एक नाम रखते हैं जो उसकी पहचान बन सके, जिससे उसे लोग बुला सकें, पुकार सकें। उसी पहचान के साथ वह जीता है, मर जाता है। कुछ अच्छा करता है तो मरने के बाद भी वह अपने नाम के रूप में जिंदा रहता है अन्यथा लोग उसे भुला देते हैं। इसीलिए लोग अक्सर बच्चों से कहते सुने जाते हैं, ऐसा कुछ करो कि दुनिया में नाम हो। बच्चे का नाम अपने मां-बाप और परिवार का नाम भी साथ लेकर चलता है। कोई बच्चा बड़ा कलाकार, वैज्ञानिक, संगीतकार या साहित्यकार हो जाय, तो वह तो इतिहास में अपनी जगह बनाता ही है, उसके मां-बाप का नाम भी उसके साथ लिया जाता है। वे भी अमर हो जाते हैं।
नाम के साथ व्यक्ति का व्यवहार, उसकी छवि जुड़ जाती है। कई बार नाम एक पूरी परंपरा को ध्वनित करते दिखते हैं । जैसे राम, कृष्ण, बुद्ध या इसी तरह के महामानव पूरे युग को अपना नाम दे देते हैं। जिसको चाहने वाले, जिसके दर्शन का अनुसरण करने वाले जितने ज्यादा होते हैं, वह उतना ही बड़ा नाम होता है। दुनिया भर के तमाम हिस्सों में ऐसे बड़े नाम हैं, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। दर्शन में अरस्तू, प्लेटो, कंफ्यूसियस, रामकृष्ण, विवेकानंद, रमन, डा. राधाकृष्णन और साहित्य में वर्ड्सवर्थ, कीट्स, शेली, तुलसीदास, कबीर, प्रेमचंद, निराला या इस तरह के अनगिनत नाम हैं, जो अपने युग की पहचान बने। इसी तरह जीवन के हर क्षेत्र में अनेक नाम लिये जा सकते हैं। मनुष्य के जीवन को सुधारने, उसका परिष्कार करने, मानवीय मूल्यों को स्थापित करने के सकारात्मक कार्यों में जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा लगाते हैं, उन्हें दुनिया आदर से याद करती हैं।
पर उन्हें भी भुलाना मुश्किल होता है जो जीवन के नकारात्मक पक्ष को मजबूत करने में अपना जीवन लगा देते हैं। अगर राम को लोग याद रखते हैं तो रावण को भुलाना कैसे संभव हो सकता है। कृष्ण का महत्व इतना नहीं होता अगर कंस नहीं होता। जनता को पीड़ा, यातना, कष्ट से उबारने के नाते ही कृष्ण को याद किया जाता है। महाभारत में न्याय का पक्ष लेने के कारण ही वे आदर के पात्र बने। परंतु वे याद किये जायेंगे तो दुर्योधन भी नहीं भुलाया जा सकता। वह इतिहास में अन्याय के पर्याय के रूप में जिंदा रहेगा। इसी तरह सुलताना डाकू, राबिनहुड या और भी ऐसे नाम लिये जा सकते हैं, जो अनीति, अन्याय, दमन, शोषण के पर्याय बन गये।
लेकिन एक क्षण के लिए मान लीजिए कि धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र का नाम राम या कृष्ण रख दिया होता तो? तो यही नाम हमारे मन में वैसा भाव जगाते जैसा दुर्योधन का नाम लेते ही जगते हैं। अगर रावण के पिता ने उसका नाम कुछ और रखा होता तो आज जो जुगुप्सा, घृणा, क्रोध और तिरस्कार का भाव रावण के नाम के साथ जुड़ा हुआ है, वह उसके साथ न जुड़ा होता। आशय यह है कि नाम का नहीं व्यक्ति का महत्व है, उसके व्यवहार, उसके चरित्र, उसके जीवन-मूल्य, उसकी सामर्थ्य का महत्व है। ये गुण जिस नाम के साथ जुड़ेंगे, उसे बड़ा बना देंगे। इसी प्रकार जीवन के दुर्दांत अवगुणों से भरा अन्यायी, अधर्मी, क्रूर और लंपट व्यक्ति को जो नाम मिला होगा, वे सारे अवगुण उसी नाम के साथ जुड़ जाते हैं। स्वतंत्र रूप से किसी नाम का कोई मतलब नहीं है, व्यक्ति के कारण ही उसकी सार्थकता या निरर्थकता होती है।
इसी संदर्भ में परंपरा से चले आ रहे शहरों के नाम भी अपना अर्थ रखते हैं। इतिहास और लोक की स्मृति उनके अर्थ को और गहरा करती है। अगर अचानक किसी शहर का नाम बदल दिया जाय तो लोग उसे स्वीकार नहीं कर पाते। यह वैसे ही है, जैसे किसी व्यक्ति का प्रौढ़ावस्था में अचानक एक दिन नाम बदल दिया जाय और उससे कहा जाय कि वह नये नाम के साथ जिये। उसके लिए बहुत मुश्किल होगी। उसे लगेगा जैसे जितने वर्ष पहले नाम के साथ जिया, वे बेकार चले गये। इसीलिए जब तक कोई सांस्कृतिक, राष्ट्रीय जरूरत न आ पड़े, नाम परिवर्तन समाज और देश की स्मृति के साथ एक मजाक लगता है। यह मजाक उत्तर प्रदेश में खूब हो रहा है। मायावती की सरकार ने अमेठी को जिला बना दिया है और उसका नाम छत्रपति साहूजी नगर कर दिया है। इसमें सुल्तानपुर की तीन और रायबरेली की दो तहसीलें शामिल होंगी और इसका मुख्यालय गौरीगंज होगा।
इसके कुछ राजनीतिक कारण हैं, जो सभी जानते हैं परंतु राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खेले जा रहे इस नाटक के कुपरिणामों पर गौर करने की किसी के पास फुरसत नहीं है। पहले भी इस तरह के प्रयास हो चुके हैं और सभी लोग जानते हैं कि सरकारी कागजों में भले नये नाम चल रहे हों लेकिन जनता ने लगभग सभी ऐसे नाम ठुकरा दिये। अभी तक हाथरस को महामायानगर के रूप में लोक में मान्यता नहीं मिली। नोयडा को कौन गौतम बुद्ध नगर के रूप में पचा पाया? इसी तरह अकबरपुर को अंबेडकरनगर, कासगंज को कांशीरामनगर, अमरोहा को ज्योतिबा फूले नगर, डुमरियागंज को सिद्धार्थनगर, बस्ती को संत कबीर नगर या भदोही को संत रविदासनगर के रूप में कहां लोग पुकारते हैं? और यह भी समझ में नहीं आता कि बुद्ध, कबीर, रैदास, अंबेडकर को इस तरह छोटा करके किसी भी सत्तारूढ़ दल को आखिर क्या मिल रहा है? इन नामों को अमर करने का यह तरीका बहुत ही मूढ़मत्युत्पन्न लगता है।
नाम के साथ व्यक्ति का व्यवहार, उसकी छवि जुड़ जाती है। कई बार नाम एक पूरी परंपरा को ध्वनित करते दिखते हैं । जैसे राम, कृष्ण, बुद्ध या इसी तरह के महामानव पूरे युग को अपना नाम दे देते हैं। जिसको चाहने वाले, जिसके दर्शन का अनुसरण करने वाले जितने ज्यादा होते हैं, वह उतना ही बड़ा नाम होता है। दुनिया भर के तमाम हिस्सों में ऐसे बड़े नाम हैं, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। दर्शन में अरस्तू, प्लेटो, कंफ्यूसियस, रामकृष्ण, विवेकानंद, रमन, डा. राधाकृष्णन और साहित्य में वर्ड्सवर्थ, कीट्स, शेली, तुलसीदास, कबीर, प्रेमचंद, निराला या इस तरह के अनगिनत नाम हैं, जो अपने युग की पहचान बने। इसी तरह जीवन के हर क्षेत्र में अनेक नाम लिये जा सकते हैं। मनुष्य के जीवन को सुधारने, उसका परिष्कार करने, मानवीय मूल्यों को स्थापित करने के सकारात्मक कार्यों में जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा लगाते हैं, उन्हें दुनिया आदर से याद करती हैं।
पर उन्हें भी भुलाना मुश्किल होता है जो जीवन के नकारात्मक पक्ष को मजबूत करने में अपना जीवन लगा देते हैं। अगर राम को लोग याद रखते हैं तो रावण को भुलाना कैसे संभव हो सकता है। कृष्ण का महत्व इतना नहीं होता अगर कंस नहीं होता। जनता को पीड़ा, यातना, कष्ट से उबारने के नाते ही कृष्ण को याद किया जाता है। महाभारत में न्याय का पक्ष लेने के कारण ही वे आदर के पात्र बने। परंतु वे याद किये जायेंगे तो दुर्योधन भी नहीं भुलाया जा सकता। वह इतिहास में अन्याय के पर्याय के रूप में जिंदा रहेगा। इसी तरह सुलताना डाकू, राबिनहुड या और भी ऐसे नाम लिये जा सकते हैं, जो अनीति, अन्याय, दमन, शोषण के पर्याय बन गये।
लेकिन एक क्षण के लिए मान लीजिए कि धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र का नाम राम या कृष्ण रख दिया होता तो? तो यही नाम हमारे मन में वैसा भाव जगाते जैसा दुर्योधन का नाम लेते ही जगते हैं। अगर रावण के पिता ने उसका नाम कुछ और रखा होता तो आज जो जुगुप्सा, घृणा, क्रोध और तिरस्कार का भाव रावण के नाम के साथ जुड़ा हुआ है, वह उसके साथ न जुड़ा होता। आशय यह है कि नाम का नहीं व्यक्ति का महत्व है, उसके व्यवहार, उसके चरित्र, उसके जीवन-मूल्य, उसकी सामर्थ्य का महत्व है। ये गुण जिस नाम के साथ जुड़ेंगे, उसे बड़ा बना देंगे। इसी प्रकार जीवन के दुर्दांत अवगुणों से भरा अन्यायी, अधर्मी, क्रूर और लंपट व्यक्ति को जो नाम मिला होगा, वे सारे अवगुण उसी नाम के साथ जुड़ जाते हैं। स्वतंत्र रूप से किसी नाम का कोई मतलब नहीं है, व्यक्ति के कारण ही उसकी सार्थकता या निरर्थकता होती है।
इसी संदर्भ में परंपरा से चले आ रहे शहरों के नाम भी अपना अर्थ रखते हैं। इतिहास और लोक की स्मृति उनके अर्थ को और गहरा करती है। अगर अचानक किसी शहर का नाम बदल दिया जाय तो लोग उसे स्वीकार नहीं कर पाते। यह वैसे ही है, जैसे किसी व्यक्ति का प्रौढ़ावस्था में अचानक एक दिन नाम बदल दिया जाय और उससे कहा जाय कि वह नये नाम के साथ जिये। उसके लिए बहुत मुश्किल होगी। उसे लगेगा जैसे जितने वर्ष पहले नाम के साथ जिया, वे बेकार चले गये। इसीलिए जब तक कोई सांस्कृतिक, राष्ट्रीय जरूरत न आ पड़े, नाम परिवर्तन समाज और देश की स्मृति के साथ एक मजाक लगता है। यह मजाक उत्तर प्रदेश में खूब हो रहा है। मायावती की सरकार ने अमेठी को जिला बना दिया है और उसका नाम छत्रपति साहूजी नगर कर दिया है। इसमें सुल्तानपुर की तीन और रायबरेली की दो तहसीलें शामिल होंगी और इसका मुख्यालय गौरीगंज होगा।
इसके कुछ राजनीतिक कारण हैं, जो सभी जानते हैं परंतु राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खेले जा रहे इस नाटक के कुपरिणामों पर गौर करने की किसी के पास फुरसत नहीं है। पहले भी इस तरह के प्रयास हो चुके हैं और सभी लोग जानते हैं कि सरकारी कागजों में भले नये नाम चल रहे हों लेकिन जनता ने लगभग सभी ऐसे नाम ठुकरा दिये। अभी तक हाथरस को महामायानगर के रूप में लोक में मान्यता नहीं मिली। नोयडा को कौन गौतम बुद्ध नगर के रूप में पचा पाया? इसी तरह अकबरपुर को अंबेडकरनगर, कासगंज को कांशीरामनगर, अमरोहा को ज्योतिबा फूले नगर, डुमरियागंज को सिद्धार्थनगर, बस्ती को संत कबीर नगर या भदोही को संत रविदासनगर के रूप में कहां लोग पुकारते हैं? और यह भी समझ में नहीं आता कि बुद्ध, कबीर, रैदास, अंबेडकर को इस तरह छोटा करके किसी भी सत्तारूढ़ दल को आखिर क्या मिल रहा है? इन नामों को अमर करने का यह तरीका बहुत ही मूढ़मत्युत्पन्न लगता है।
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vishesh
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
पिंजड़े में बूढ़े ‘शेर’ की सूनी आंखें !
(मित्रों ये वही वीरेंद्र सेंगर जी हैं, जिनकी तस्वीर माननीय अविनाशजी ने नुक्कड़ पर लगाई थी. वह तस्वीर आगरा में खींची गयी थी. उसमें मैं यानी सुभाष राय और अविनाशजी भी थे. वह तस्वीर मैं फिर से यहाँ दे रहा हूँ )
(वीरेंद्र सेंगर की रिपोर्ट)
कई बार वक्त ऐसा त्रासद मोड़ लेता है कि दहाड़ लगाने वाला शेर भी ‘म्याऊं-म्याऊं’ बोलने के लिए मजबूर हो जाता है। जब कभी ऐसे मुहावरे किसी की जिंदगी के यथार्थ बनने लगते हैं, तो उलट-फेर होते हुए देर नहीं लगती। शायद ऐसा ही बहुत कुछ स्वनाम धन्य जार्ज फर्नांडीस की जिंदगी में इन दिनों घट रहा है। इमरजेंसी के दौर में शेर कहे जाने वाले इस शख्स को लेकर ‘अपने’ ही फूहड़ खींचतान में जुट गए हैं। अल्जाइमर्स और पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे जार्ज एकदम लाचार हालत में हैं। जो कुछ उनके आसपास हो रहा है, उसका कुछ-कुछ अहसास उन्हें जरूर है। इसका दर्द उनकी सूनी-सूनी आंखों में अच्छी तरह पढ़ा भी जा सकता है। समाजवादी जार्ज इन दिनों एक तरह से ‘अभिशप्त’ जीवन जीने के लिए मजबूर दिखाई पड़ते हैं। कहने को तो वे अपनी पत्नी और इकलौते बेटे के पास रह रहे हैं, फिर भी उनके तमाम साथी-संगी मान रहे हैं कि उन्हें जानबूझकर तनहाई में रखा जा रहा है। 80 वर्षीय जार्ज दिल्ली में अपनी ‘परित्यक्ता’ पत्नी लैला कबीर और बेटे रेअन के साथ पंचशील एन्कलेव में रह रहे हैं। वे पिछले कई सालों से बीमार चल रहे हैं। उनकी बीमारी ने उन्हें उतना लाचार नहीं बनाया, जितना की घर के लोगों ने विरासत हड़पने के चक्कर में बना दिया है। जो जार्ज अपनी जवानी में ‘धन और धरती बंट के रहेगी’ जैसे खांटी समाजवादी नारों के प्रेरणास्रोत्र होते थे, अब खुद करोड़ों की संपत्ति की बंदरबांट में तमाशा बना दिए गए हैं।
बुधवार को तो यहां उनके 3 कृष्णा मेनन मार्ग के सरकारी निवास में तमाशा ही लग गया था। तीन घंटे तक गेट खोलने को लेकर हंगामा चला। यहां पर जार्ज की खास करीबी जया जेटली डटी हुईं थीं। वे गेट खोलने के लिए जिद कर रही थीं, जबकि पत्नी लैला कबीर के आदेश से जया के लिए ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा था। पुलिस भी थी, चीख-चिल्लाहट के चलते तमाशबीनों की भीड़ भी जुटी थी। जया की भावनाएं जोर मार रही थीं। वे भावुक होकर रो भी रहीं थीं और अधिकारों की याद करके दहाड़ भी रहीं थीं। वे यही कह रही थीं कि बंगले में मेरा कुछ सामान है, लौटा दो...! लेकिन, गेट पर तैनात वर्दी वाले कहते रहे ‘सॉरी मैडम...!’ जया के साथ जार्ज के दो सगे भाई भी आए थे। ये थे माइकल और रिचर्ड। इन लोगों का यही कहना था कि वे बंगले से कुछ अपनी किताबें लेने आए हैं। घंटों जद्दोजहद कर ये लोग लौट गए। जाते-जाते जया बोल गई थीं कि वे गुरुवार को आकर यहीं पर धरने पर बैठेंगी। वो तो जार्ज के शुभचिंतकों ने उन्हें समझा लिया कि धरना देकर वे बूढ़े शेर का और तमाशा न बनने दें। कोई नहीं जानता कि जार्ज के घर अब कौन तमाशा कब हो जाए? यह अलग बात है कि जार्ज के भाइयों ने अपने भाई को ‘मुक्त’ कराने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इस पर गुरुवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने लैला को 5 जुलाई को जार्ज को अदालत में पेश करने के लिए कहा है।
जरा जार्ज की पत्नी के बारे में जान लीजिए। ये हैं लैला कबीर। लैला एक जमाने के चर्चित वकील और शिक्षाविद् हुंमायू कबीर की बेटी हैं। करीब 30 साल पहले वे जार्ज के जीवन से चली गई थीं। इसके पीछे वास्तविक कारण क्या थे, यह तो लैला ही जानें क्योंकि जार्ज जानते भी होंगे तो ज्यादा कुछ कहने-सुनने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि जया जेटली पिछले तीन दशकों से जार्ज के साथ ‘छाया’ की तरह छाई रही हैं। वे एक प्रबुद्ध महिला हैं। जार्ज की छत्रछाया में उन्होंने राजनीति की एबीसीडी सीखी थी। जया से जार्ज की करीबी कई बड़े विवादों का कारण भी बन चुकी है। लैला के करीबी तो यह भी कहते हैं कि जार्ज की जिंदगी में जया के आने के बाद ही लैला की ‘विदाई’ हो गई थी। हालांकि, अभी तक लैला ने औपचारिक रूप से इसका कोई खुलासा नहीं किया है। बिडंबना यह है कि जो जार्ज पूरी जिंदगी अक्खड़ समाजवादी जीवन मूल्यों के लिए जाने जाते रहे, अब संपत्ति को लेकर उनके अपने आपस में जूझने लगे हैं। वह भी जार्ज के जीते जी।
जार्ज एक जमाने में प्रखर समाजवादी योद्धाओं में एक माने जाते थे। दबंग ट्रेड यूनियन नेता के रूप में उनकी पहचान देशभर में बनी थी। वर्ष 1974 में ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल की अगुवाई उन्होंने ही की थी। जून 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी थी, तो इसको सबसे मुखर चुनौती जिन लोगों ने दी थी, उनमें जार्ज भी प्रमुख थे। इमरजेंसी के दौर में तमाम बड़े नेता तो सहज गिरफ्तार हो गए थे, लेकिन जार्ज ने इंदिरा गांधी के प्रशासन को चुनौती दे दी थी। वे पूरे एक साल तक इमरजेंसी के खिलाफ देशभर में घूम-घूमकर गोपनीय ढंग से अलख जगाते रहे। बाद में उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो उन पर चर्चित बड़ौदा डायनामाइड कांड का आरोप लगाया गया। इमरजेंसी खत्म होने के बाद, जार्ज नायक बनकर उभरे थे। उन्हें इमरजेंसी के ‘शेर’ के रूप में याद किया गया था। जेल से ही उन्होंने मुजफ्फरपुर (बिहार) से चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में बेड़ियों में जकड़े जार्ज के पोस्टरों ने पूरे देश में तहलका मचा दिया था। वोटिंग के बाद जार्ज रिकार्ड मतों से जीते थे। चुनाव के बाद मोरार जी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी, तो उसमें जार्ज उद्योग मंत्री बने थे। हमेशा राज व्यवस्था के खिलाफ जूझने वाले जार्ज जब ‘सरकार’ बन गए, तो भी उन्होंने अपनी ‘फितरत’ नहीं छोड़ी। मंत्री बनते ही बहुराष्ट्रीय कंपनी- आईबीएन और कोको कोला को देश छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। वीपी सिंह की सरकार में वे कुछ समय के लिए रेल मंत्री भी बने थे। इस दौर में उन्होंने रेलवे के ड्रीम प्रोजेक्ट कोंकण रेलवे को आगे बढ़ा दिया था। बाद में जनता दल से अलग होने के बाद 1994 में उन्होंने समता पार्टी बना ली थी, जोकि बाद में जद (यू) के रूप में अवतरित हुई। इस तरह से जार्ज जद (यू) के संस्थापकों में एक थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे प्रतिरक्षा मंत्री थे। इस कार्यकाल में उन्होंने सेना के जवानों के कल्याण के लिए कई ऐतिहासिक फैसले कराए थे।
पहली बार किसी रक्षा मंत्री ने फाइटर विमानों में उड़ान भरके सेना का हौसला बढ़ाया था। लेकिन इसी कार्यकाल में उनकी करीबी जया जेटली ‘तहलका’ के एक चर्चित स्टिंग में फंस गई थीं। वे चंदे के नाम पर रक्षा मंत्रालय से कोई काम कराने का ‘सौदा’ कर रहीं थीं। इस विवाद में जार्ज को मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था। इसके साथ ही जार्ज को अपने खांटी राजनीतिक तेवरों से बहुत समझौता करना पड़ा था। जार्ज का राजनीतिक जीवन एक तरफ जुझारू तेवरों वाला रहा, तो दूसरी तरफ धुर अंतरविरोधों से भी भरा रहा। जनता सरकार के दौर में जार्ज ने अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के मामले में यह आपत्ति की थी कि ये लोग संघ के भी सदस्य हैं और सरकार में भी हैं। यह ठीक नहीं है। इसी विवाद को लेकर मोरार जी की सरकार भी डूब गई थी। संघ की राजनीति से इतना परहेज करने वाले जार्ज, वाजपेयी की सरकार में भागीदार ही नहीं थे, बल्कि उन्हें संघ लॉबी का चहेता माना जाता था।
इस स्थिति को लेकर जार्ज के तमाम समाजवादी साथी दुखी रहे हैं। अक्सर जार्ज इस मामले में सफाई देते-देते परेशान हो जाते थे। ऐसे एक दो अनुभव इस प्रतिनिधि को भी जार्ज के साथ संवाद के दौरों में हो चुके हैं। तरह-तरह के आरोपों से दुखी होकर जार्ज तो एक बार रो भी पड़े थे। मैंने सवाल किया था कि आखिर संघ की विचारधारा के साथ उनका तालमेल कैसे हो गया? अनौपचारिक बातचीत में वे बोले थे कि उनके दिल में इंदिरा गांधी के दौर से कांग्रेस के लिए नफरत भर गई है। ऐसे में तो वे संघ क्या, कांग्रेस के खिलाफ ‘शैतान’ से भी हाथ मिला सकते हैं। रक्षा मंत्री जैसे संवेदनशील पद पर रहते हुए भी जार्ज के सरकारी निवास 3 कृष्णा मेनन मार्ग के दरवाजे हर किसी के लिए खुले रहते थे। जिद में आकर उन्होंने अपने निवास में गेट तक नहीं लगने दिया था। अक्सर वे तुड़े-मुड़े कुर्ते-पैजामे में देखे जाते थे। शहर में वे अपनी पुरानी फियट कार से चलते थे। लंबे समय तक उनके घर में एसी तक नहीं थे। हालांकि, विरोधी जार्ज की इस सादगी को ढोंग बताते थे लेकिन ढोंग बताने वाले ज्यादा ऐसे लोग थे, जो राजनीति में अय्याशी और विलासिता भरे जीवन के लिए जाने जाते रहे हैं। जार्ज कभी उनकी परवाह भी नहीं करते थे।
हाल के वर्षों में जद (यू) की राजनीति में वे शिखर पुरुष नहीं रहे थे। इसकी खास वजह उनका बीमार रहना ही था। इन दिनों वे राज्य सभा के सदस्य हैं। वास्तविक अर्थों में उनकी सुध-बुध कम हो गई है। मुलाकात के समय वे बहुत कम बोलते हैं लेकिन अखबारों के जरिए वे देश के घटनाक्रमों से अवगत रहते हैं। शायद इसी वजह से वे ज्यादा लाचारी महसूस करते हैं क्योंकि खुद कुछ न कर पाने के लिए अपने को ‘अभिशप्त’ पाते हैं। उनकी करीब 25 करोड़ रुपये की संपत्ति है। इसी पर कई परिजनों की नजरे हैं। उनके जो दो सगे भाई इन दिनों जार्ज की ‘शुभचिंता’ ज्यादा जता रहे हैं, वे पहले कभी जार्ज के पास नहीं आते थे। बेटा और पत्नी तो दूर ही थे। 3 कृष्णा मेनन मार्ग में दो दशकों से जिन जया जेटली का ‘राज’ चलता था, अब वही गेट पर खड़ी होकर अंदर आने के लिए गुहार लगा रही हैं। तीन दशकों से दूर रहीं लैला को अपने बूढ़े पति की सेहत की चिंता हो गई है। वे उन्हें हरिद्वार से लेकर ऋषिकेश के तमाम मठों तक घुमाकर लाई हैं ताकि किसी के ‘आशीर्वाद’ से वे कुछ ठीक हो सकें।
शायद यह भी जार्ज के जीवन की एक बिडंबना ही है कि जो व्यक्ति पूरी जिंदगी अनीश्वरवादी रहा, उसी को संतों-महात्माओं के चमत्कार से ठीक कराने की कोशिश हो रही है। यह अलग बात है कि बचपन में मंगलौर (कर्नाटक) में उनके पिता ने अपने इस बेटे को चर्च का ‘पुजारी’ बनाने के लिए भेज दिया था लेकिन उस चर्च के तमाम ‘पाखंड’ देखकर जार्ज का बाल मन विद्रोह कर बैठा था और वे वहां से भाग निकले थे। फिर पूरी जिंदगी सामाजिक पाखंडों के खिलाफ वे लड़ते रहे। अब त्रासदी यह है कि उनके करीबी संपदा के लिए झगड़ रहे हैं और मजबूर जार्ज सब कुछ टकटकी लगाकर देख रहे हैं। पिछले दिनों जार्ज के कुछ खास करीबी मित्रों फारुख अब्दुल्ला, जस्टिस वेंकेटचलैया, जसवंत सिंह व उद्योगपति राहुल बजाज ने एक खुली चिठ्ठी लिखकर लैला कबीर से अपील की थी कि वे उनके साथी जार्ज को पंचशील एन्कलेव जैसी अनजानी जगह से 3 कृष्णा मार्ग में ले आएं। क्योंकि, जार्ज यहां दो दशकों से रह रहे हैं और यही घर वह जगह हो सकता है, जहां उन्हें ‘कैद’ न महसूस हो।
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गुरुवार, 1 जुलाई 2010
दिल्ली घूंघट उठायेगी तो पूरी दुनिया के होश उड़ जायेंगे?
दिल्ली हमारे मुल्क का दिल है। इसकी हर धड़कन में पूरा हिंदुस्तान बसता, धड़कता है। इस शहर का लंबा इतिहास है। इसने तमाम शाही सल्तनतों के सूरज को उगते-डूबते देखा है। पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ के रूप में अपनी राजधानी बनाये जाने के बाद लगातार यह शहर हिंदुस्तान के शासकों का केंद्र रहा है। यमुना इस शहर के पांच हजार साल लंबे इतिहास का साक्षी है। राजशाही से लोकशाही तक इसने तमाम परिवर्तन देखे हैं। इसे मिटाने की कोशिशें भी कई बार की गयीं। नादिर शाह, अहमद शाह अब्दाली और तैमूर लंग ने तलवारों के बल पर इसे खत्म कर देने की कोशिश की पर ऐसे हर प्रयास का दिल्ली ने डटकर मुकाबला किया और बाद में और भी जीवंतता के साथ इसका पुनर्जन्म हुआ। शाही मसजिद और लाल किला इसके इतिहास में दबे शाही वैभव की कहानी कहते नजर आते हैं। अंग्रेजों पर भी जब संकट आया तो उन्होंने कोलकाता से अपने बिस्तर समेटकर दिल्ली में ही पनाह लेने की कोशिश की पर आखिरकार वे जम नहीं पाये। आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों ने उनके तंबू-डेरे उखाड़ फेंके।
उसी दिल्ली की एक बार फिर सारी दुनिया में चर्चा है। आर्थिक क्षेत्र में एक उभरती ताकत के रूप में, विश्व राजनय में एक शक्तिशाली और प्रामाणिक खिलाड़ी के रूप में और परमाणविक जगत के एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में दुनिया के बड़े नेता दिल्ली की ओर आश्चर्य से देख रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जापान जैसे समर्थ देश भी भारत की प्रगति और आधुनिकता के आगे सिर झुकाने को उद्यत हैं। चीन का नजरिया भी दिल्ली के प्रति बदला है। वैश्विक आर्थिक और सामरिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हालांकि वह भारत को मुख्य प्रतिस्पर्धी की तरह देखता है लेकिन वह भी दिल्ली से खुली दुश्मनी नहीं रखना चाहता। यह सब तब है जब हिंदुस्तान के लोग इस असलियत से वाकिफ हैं कि हमारे देश में राजनीतिज्ञ विश्वसनीय नहीं हैं, भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, अपराध की दुनिया निरंतर अपने पंजे फैला रही है। दिल्ली भी इन रोगों से अछूती नहीं है।
गत दिनों सिंगापुर में आयोजित विश्व सिटीज सम्मिट में दिल्ली के सिर पर एक और ताज रख दिया गया है। वहां दिल्ली को विश्व के उन चार शहरों में शामिल किया गया है, जहां रहन-सहन का स्तर बहुत सुंदर है। इन शहरों में मेलबर्न, क्यूरिटिवा और बिलबाओ भी शामिल किये गये हैं। इस उपलब्धि के लिए मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की प्रशंसा की गयी है। उनके प्रयासों से शहर की संरचना और रहन-सहन में बहुत सुधार हुआ है, हरित क्षेत्र का दायरा काफी बढ़ा है, सीएनजी बसों के संचालन से प्रदूषण में कमी आयी है। चलिये शीला जी के लिए यह प्रशंसा ऐसे वक्त में बहुत काम आने वाली है, जब दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए कमर कस रही है। भले हम खेल में फिसड्डी रहते आये हों पर पूरी दुनिया को दिल्ली इस बार खेलों के अवसर पर अपनी कला, अपना वैभव, अपनी सुविधाएं और अपना सौंदर्य दिखाने की तैयारी में है। कोशिश की जा रही है कि यहां मेलबर्न से भी भव्य आयोजन हो, वहां से ज्यादा दर्शक, प्रशंसक आयें। मेलबर्न में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान विदेशों से 90 हजार पर्यटक आये, 15 लाख टिकट बिके। दिल्ली में खेलों के आयोजकों को उम्मीद है कि यहां एक लाख से ज्यादा पर्यटक आयेंगे। दिल्ली सज-धज रही है। कहा जा रहा है कि वह घूंघट उठायेगी तो पूरी दुनिया के होश उड़ जायेंगे।
पर क्या शीलाजी इतने भर से गदगद हैं? क्या उनकी पार्टी की केंद्र सरकार के दिग्गज दिल्ली के हालात से संतुष्ट हैं? क्या वे यह कह सकने की स्थिति में हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है? क्या वे ठीक से देख पा रहे हैं कि दिल्ली में क्या-क्या हो रहा है? अभी इसी दिल्ली में एक मकान मालिक ने अपने यहां किराये पर रह रही एक ब्राजीली युवती को नशे की गोली खिलाकर उसके साथ कई बार बलात्कार किया। बहुत दिन नहीं बीते राहुल गांधी का मोबाइल फोन हवाई अड्डे से चोरी हो गया। हालांकि राहुल का फोन बाद में मिल गया और वह बलात्कारी मकान मालिक भी गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन इससे इन अपराधों की गंभीरता कम नहीं हो जाती। कौन नहीं जानता कि सी एन जी बसें कब कहाँ आग पकड़ लें, इसका कोई भरोसा नहीं. यमुना कितनी गन्दी और प्रदूषित है, यह किससे छिपा है. अपराधों का तो दिल्ली जैसे अड्डा ही बन गयी है. इतनी आधुनिक और प्रगतिशील दिल्ली के मुंह पर उस समय कालिख पुत गयी, जब झूठी पारिवारिक प्रतिष्ठा के नाम पर आदिमयुगीन जंगलीपन का परिचय देते हुए कुछ लोगों ने तीन बच्चों की यह आरोप लगाकर हत्या कर दी, कि वे जाति और गोत्र की परंपरा का उल्लंघन कर रहे हैं। क्या इसी चेहरे के साथ दिल्ली दुनिया का स्वागत करने जा रही है? क्या इसका श्रेय शीला दीक्षित को नहीं जाना चाहिए?
उसी दिल्ली की एक बार फिर सारी दुनिया में चर्चा है। आर्थिक क्षेत्र में एक उभरती ताकत के रूप में, विश्व राजनय में एक शक्तिशाली और प्रामाणिक खिलाड़ी के रूप में और परमाणविक जगत के एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में दुनिया के बड़े नेता दिल्ली की ओर आश्चर्य से देख रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जापान जैसे समर्थ देश भी भारत की प्रगति और आधुनिकता के आगे सिर झुकाने को उद्यत हैं। चीन का नजरिया भी दिल्ली के प्रति बदला है। वैश्विक आर्थिक और सामरिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हालांकि वह भारत को मुख्य प्रतिस्पर्धी की तरह देखता है लेकिन वह भी दिल्ली से खुली दुश्मनी नहीं रखना चाहता। यह सब तब है जब हिंदुस्तान के लोग इस असलियत से वाकिफ हैं कि हमारे देश में राजनीतिज्ञ विश्वसनीय नहीं हैं, भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, अपराध की दुनिया निरंतर अपने पंजे फैला रही है। दिल्ली भी इन रोगों से अछूती नहीं है।
गत दिनों सिंगापुर में आयोजित विश्व सिटीज सम्मिट में दिल्ली के सिर पर एक और ताज रख दिया गया है। वहां दिल्ली को विश्व के उन चार शहरों में शामिल किया गया है, जहां रहन-सहन का स्तर बहुत सुंदर है। इन शहरों में मेलबर्न, क्यूरिटिवा और बिलबाओ भी शामिल किये गये हैं। इस उपलब्धि के लिए मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की प्रशंसा की गयी है। उनके प्रयासों से शहर की संरचना और रहन-सहन में बहुत सुधार हुआ है, हरित क्षेत्र का दायरा काफी बढ़ा है, सीएनजी बसों के संचालन से प्रदूषण में कमी आयी है। चलिये शीला जी के लिए यह प्रशंसा ऐसे वक्त में बहुत काम आने वाली है, जब दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए कमर कस रही है। भले हम खेल में फिसड्डी रहते आये हों पर पूरी दुनिया को दिल्ली इस बार खेलों के अवसर पर अपनी कला, अपना वैभव, अपनी सुविधाएं और अपना सौंदर्य दिखाने की तैयारी में है। कोशिश की जा रही है कि यहां मेलबर्न से भी भव्य आयोजन हो, वहां से ज्यादा दर्शक, प्रशंसक आयें। मेलबर्न में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान विदेशों से 90 हजार पर्यटक आये, 15 लाख टिकट बिके। दिल्ली में खेलों के आयोजकों को उम्मीद है कि यहां एक लाख से ज्यादा पर्यटक आयेंगे। दिल्ली सज-धज रही है। कहा जा रहा है कि वह घूंघट उठायेगी तो पूरी दुनिया के होश उड़ जायेंगे।
पर क्या शीलाजी इतने भर से गदगद हैं? क्या उनकी पार्टी की केंद्र सरकार के दिग्गज दिल्ली के हालात से संतुष्ट हैं? क्या वे यह कह सकने की स्थिति में हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है? क्या वे ठीक से देख पा रहे हैं कि दिल्ली में क्या-क्या हो रहा है? अभी इसी दिल्ली में एक मकान मालिक ने अपने यहां किराये पर रह रही एक ब्राजीली युवती को नशे की गोली खिलाकर उसके साथ कई बार बलात्कार किया। बहुत दिन नहीं बीते राहुल गांधी का मोबाइल फोन हवाई अड्डे से चोरी हो गया। हालांकि राहुल का फोन बाद में मिल गया और वह बलात्कारी मकान मालिक भी गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन इससे इन अपराधों की गंभीरता कम नहीं हो जाती। कौन नहीं जानता कि सी एन जी बसें कब कहाँ आग पकड़ लें, इसका कोई भरोसा नहीं. यमुना कितनी गन्दी और प्रदूषित है, यह किससे छिपा है. अपराधों का तो दिल्ली जैसे अड्डा ही बन गयी है. इतनी आधुनिक और प्रगतिशील दिल्ली के मुंह पर उस समय कालिख पुत गयी, जब झूठी पारिवारिक प्रतिष्ठा के नाम पर आदिमयुगीन जंगलीपन का परिचय देते हुए कुछ लोगों ने तीन बच्चों की यह आरोप लगाकर हत्या कर दी, कि वे जाति और गोत्र की परंपरा का उल्लंघन कर रहे हैं। क्या इसी चेहरे के साथ दिल्ली दुनिया का स्वागत करने जा रही है? क्या इसका श्रेय शीला दीक्षित को नहीं जाना चाहिए?
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