गुरुवार, 1 जुलाई 2010

दिल्ली घूंघट उठायेगी तो पूरी दुनिया के होश उड़ जायेंगे?

दिल्ली हमारे मुल्क का दिल है। इसकी हर धड़कन में पूरा हिंदुस्तान बसता, धड़कता है। इस शहर का लंबा इतिहास है। इसने तमाम शाही सल्तनतों के सूरज को उगते-डूबते देखा है। पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ के रूप में अपनी राजधानी बनाये जाने के बाद लगातार यह शहर हिंदुस्तान के शासकों का केंद्र रहा है। यमुना इस शहर के पांच हजार साल लंबे इतिहास का साक्षी है। राजशाही से लोकशाही तक इसने तमाम परिवर्तन देखे हैं। इसे मिटाने की कोशिशें भी कई बार की गयीं। नादिर शाह, अहमद शाह अब्दाली और तैमूर लंग ने तलवारों के बल पर इसे खत्म कर देने की कोशिश की पर ऐसे हर प्रयास का दिल्ली ने डटकर मुकाबला किया और बाद में और भी जीवंतता के साथ इसका पुनर्जन्म हुआ। शाही मसजिद और लाल किला इसके इतिहास में दबे शाही वैभव की कहानी कहते नजर आते हैं। अंग्रेजों पर भी जब संकट आया तो उन्होंने कोलकाता से अपने बिस्तर समेटकर दिल्ली में ही पनाह लेने की कोशिश की पर आखिरकार वे जम नहीं पाये। आजादी के दीवाने क्रांतिकारियों ने उनके तंबू-डेरे उखाड़ फेंके।

उसी दिल्ली की एक बार फिर सारी दुनिया में चर्चा है। आर्थिक क्षेत्र में एक उभरती ताकत के रूप में, विश्व राजनय में एक शक्तिशाली और प्रामाणिक खिलाड़ी के रूप में और परमाणविक जगत के एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में दुनिया के बड़े नेता दिल्ली की ओर आश्चर्य से देख रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जापान जैसे समर्थ देश भी भारत की प्रगति और आधुनिकता के आगे सिर झुकाने को उद्यत हैं। चीन का नजरिया भी दिल्ली के प्रति बदला है। वैश्विक आर्थिक और सामरिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हालांकि वह भारत को मुख्य प्रतिस्पर्धी की तरह देखता है लेकिन वह भी दिल्ली से खुली दुश्मनी नहीं रखना चाहता। यह सब तब है जब हिंदुस्तान के लोग इस असलियत से वाकिफ हैं कि हमारे देश में राजनीतिज्ञ विश्वसनीय नहीं हैं, भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, अपराध की दुनिया निरंतर अपने पंजे फैला रही है। दिल्ली भी इन रोगों से अछूती नहीं है।

गत दिनों सिंगापुर में आयोजित विश्व सिटीज सम्मिट में दिल्ली के सिर पर एक और ताज रख दिया गया है। वहां दिल्ली को विश्व के उन चार शहरों में शामिल किया गया है, जहां रहन-सहन का स्तर बहुत सुंदर है। इन शहरों में मेलबर्न, क्यूरिटिवा और बिलबाओ भी शामिल किये गये हैं। इस उपलब्धि के लिए मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की प्रशंसा की गयी है। उनके प्रयासों से शहर की संरचना और रहन-सहन में बहुत सुधार हुआ है, हरित क्षेत्र का दायरा काफी बढ़ा है, सीएनजी बसों के संचालन से प्रदूषण में कमी आयी है। चलिये शीला जी के लिए यह प्रशंसा ऐसे वक्त में बहुत काम आने वाली है, जब दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए कमर कस रही है। भले हम खेल में फिसड्डी रहते आये हों पर पूरी दुनिया को दिल्ली इस बार खेलों के अवसर पर अपनी कला, अपना वैभव, अपनी सुविधाएं और अपना सौंदर्य दिखाने की तैयारी में है। कोशिश की जा रही है कि यहां मेलबर्न से भी भव्य आयोजन हो, वहां से ज्यादा दर्शक, प्रशंसक आयें। मेलबर्न में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान विदेशों से 90 हजार पर्यटक आये, 15 लाख टिकट बिके। दिल्ली में खेलों के आयोजकों को उम्मीद है कि यहां एक लाख से ज्यादा पर्यटक आयेंगे। दिल्ली सज-धज रही है। कहा जा रहा है कि वह घूंघट उठायेगी तो पूरी दुनिया के होश उड़ जायेंगे।

पर क्या शीलाजी इतने भर से गदगद हैं? क्या उनकी पार्टी की केंद्र सरकार के दिग्गज दिल्ली के हालात से संतुष्ट हैं? क्या वे यह कह सकने की स्थिति में हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है? क्या वे ठीक से देख पा रहे हैं कि दिल्ली में क्या-क्या हो रहा है? अभी इसी दिल्ली में एक मकान मालिक ने अपने यहां किराये पर रह रही एक ब्राजीली युवती को नशे की गोली खिलाकर उसके साथ कई बार बलात्कार किया। बहुत दिन नहीं बीते राहुल गांधी का मोबाइल फोन हवाई अड्डे से चोरी हो गया। हालांकि राहुल का फोन बाद में मिल गया और वह बलात्कारी मकान मालिक भी गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन इससे इन अपराधों की गंभीरता कम नहीं हो जाती। कौन नहीं जानता कि सी एन जी बसें कब कहाँ आग पकड़ लें, इसका कोई भरोसा नहीं. यमुना कितनी गन्दी और प्रदूषित है, यह किससे छिपा है. अपराधों का तो दिल्ली जैसे अड्डा ही बन गयी है. इतनी आधुनिक और प्रगतिशील दिल्ली के मुंह पर उस समय कालिख पुत गयी, जब झूठी पारिवारिक प्रतिष्ठा के नाम पर आदिमयुगीन जंगलीपन का परिचय देते हुए कुछ लोगों ने तीन बच्चों की यह आरोप लगाकर हत्या कर दी, कि वे जाति और गोत्र की परंपरा का उल्लंघन कर रहे हैं। क्या इसी चेहरे के साथ दिल्ली दुनिया का स्वागत करने जा रही है? क्या इसका श्रेय शीला दीक्षित को नहीं जाना चाहिए?

7 टिप्‍पणियां:

  1. किसी भी क्षेत्र का विकास हमेशा चौतरफा होना चाहिए .. बहुत सुंदर लेख !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुभाष भाई दिल्‍ली जब तक घूंघट में है तब तक ही ठीक है। सही कहा आपने चेहरा दिखाएगी तो कुछ लोगों के होश तो उड़ने वाले ही हैं। कुछ के दिल्‍ली के चकाचौंध से कुछ के इस रोशनी के नीचे पसरे अंधेरे से। मुश्किल यह है कि यह हमारी शाश्‍वत कथा है। आप भले ही मुझे निराशवादी कहें पर हमारे जीते जी तो इसमें बदलाव होने वाला नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पोस्ट के पहले पैरे पढ़ने पर लगा कि ' शायद आगरा से (दूरी की वजह से) दिल्ली चाँद की तरह बेदाग दिख रही है ;' लेकिन अंत में असलियत सामने आ ही गयी | रही दूसरे देशों के प्रमाणपत्र देने की तो हमें तो ये लगता है कि या तो
    प्रमाणपत्र देने वालों ने दिल्ली के हाल-ए-दिल को देखा-सुना ही नहीं या फिर 'तूं मेरी पीठ खुजा ,मैं तेरी खुजाऊं' वाली कहावत चरितार्थ हुई है | खैर !
    आज दिल्ली की कानून-व्यवस्था बिलकुल चरमराई हुई है, ये सब कुछ एक पूर्व- सुन्योजित षड्यंत्र के तहद हो
    रहा है और इसका अंदेसा उसी दिन हो गया था जब वरीयता-क्रम में अगली सम्भाबित पुलिस कमिश्नर माननीया किरण वेदी की जगह एक भ्रष्ट-पुलिस-अधिकारी दंदवाल को मनोनीत किया गया था | आज दिल्ली से गरीब के उखाड़-फैंकने की पूरी तैयारी चल रही है | हालत को देख कर मध्यम-वर्ग भी डांवाडोल है | उच्च-मध्यम
    और उच्च-वर्ग की गर्दन पर कांग्रेस के वोट-बटोरू गुंडों ने पिस्तोलें और तमंचे टिका रखे हैं | जब जरूरत समझते हैं ,
    पांच-सात-दस-बीस लाख की उगाही कर के बड़ी आसानी से निकल जाते हैं ,जरूरत समझते हैं तो एक-दो को टपका भी देते हैं | मामला दो-चार-दिन सरगर्मी में रहता है | जब देखते हैं कि किसी मामले को ज्यादा तबज्जो दी जा
    रही है ,तो अगले दिन उससे भी ज्यादा सनसनीखेज मामला सामने आ जाता है ,और सब उस तरफ भाग पड़ते हैं |
    इस हाल में जी रहे हम दिल्ली वाले | कुछ तो खबर ली ,किसी ने तो खबर ली | किसी को तो हमारे दर्द का इल्म है |
    धन्यबाद |

    उत्तर देंहटाएं
  4. शीला जी सी एम है तो क्या चुहल भी नही कर सकती है ?

    उत्तर देंहटाएं
  5. और किसी के चाहे उड़ें या न उड़ें पर दिल्‍ली के नज़दीक वालों के होश तो उन्‍होंने उड़ा ही दिए।

    उत्तर देंहटाएं
  6. अविनाश्जी, संगीता जी, राजेश जी और नरेश जी, त्वरित टिप्पडियों के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद. मैं कभी-कभी देर कर देता हूं देखने में.

    उत्तर देंहटाएं
  7. डा साहब,मैं सौ रुपये रोज कमाने वाले मजदूर की सोच रहा था कि उसे क्या हासिल हुआ...
    उस बेचारे की स्थिति तो वहीं की वहीं है...
    रोटी भी नहीं खा सकता. सब को महाराणा प्रताप बनवा देंगे ये राजनीतिबाज.. घास खाने की नौबत आने जा रही है... शोक

    उत्तर देंहटाएं