बुधवार, 30 जून 2010

कश्मीर में आग भड़काने की कोशिश

 कश्मीर में आग लगाने का कोई भी मौका हुर्रियत के नेता गंवाते नहीं। उन्हें अब अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है। सुरक्षा बलों की मुस्तैदी से राज्य में घुसपैठ थोड़ी मुश्किल हो गयी है। हाल के महीनों में आतंकवादी घटनाएं कम हुईं हैं। ऐसे माहौल में हुर्रियत की प्रासंगिकता खत्म होती नजर आ रही है। चूंकि हुर्रियत के नेता चुनावों में भी भाग लेने के खिलाफ रहे हैं और उनके सारे विरोध के बावजूद राज्य में लोकप्रिय सरकार का गठन हो गया, इसलिए उनकी भूमिका ही लगभग खत्म सी हो गयी हैं। इस सूरत में उनकी कोशिश रहती है कि छोटे-छोटे मामलों पर जनता को भड़काकर सरकार को परेशानी में डाला जाये। सोपोर और उसके समीपवर्ती इलाकों में कई हफ्ते से स्थिति गंभीर बनी हुई है। जो माहौल बन रहा है, उसमें राज्य सरकार की मुश्किल बढ़ती जा रही है।  
गिलानी और उमर फारुक लगातार इस कोशिश में हैं कि जो आग उन्होंने लगायी है, वह ठंडी न पड़े। इसके लिए वे जनता को भड़काने में जुटे हैं। अलगाववादी ताकतें इस तरह जनता में अपनी प्रासंगिकता साबित करने में जुटी हुईं हैं। इस सारे मामले की जड़ में अर्धसैनिक बल हैं, उनकी तैनाती को लेकर लोगों में नाराजगी है। अलगाववादियों ने जनता के दिमाग में यह बात भरने में कामयाबी हासिल कर ली है कि इन सैनिकों की वजह से उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी इन बलों की तैनाती के खिलाफ रहे हैं। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को वापस लेने की मांग अरसे से चल रही है। अलगाववादियों का कहना है कि इस कानून की आड़ में अर्धसैनिक बल मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
 
इस बार सीआरपीएफ की फायरिंग में दो युवाओं की मौत ने उन्हें और मौका दे दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आश्वासन के बावजूद ऐसी परिस्थितियां कई बार बन ही जाती हैं, जब हालात पर नियंत्रण के लिए बल प्रयोग करना पड़ता है। ऐसे मामलों को मानवाधिकार उल्लंघन के नाम पर तूल देकर अलगाववादी जनता के मन में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते रहते हैं। वे इन मामलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब होते रहे हैं। केंद्र को बहुत सावधानी से काम लेने की जरूरत है। सशस्त्र बल कानून हटने से अराजकता बढ़ सकती है। राजनीतिक दलों की इसे हटाने की मांग राज्य के हालात देखकर की जा रही मांग कम, सियासी मांग ज्यादा लगती है। और इसका अलगाववादी पूरा लाभ उठायेंगे, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मौका कैसा भी हो, जिसने रोटियां सेंकनी हैं, वे तो रोटियां ही सेकेंगे।

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