शुक्रवार, 25 जून 2010

मुनव्वर राणा की एक गजल

साथियों मुनव्वर राणा की एक गजल आप सबके लिए. मुझे नहीं लगता की शायर की पहचान  कराने की जरूरत है. इसलिए सीधे ग़ज़ल पर आते हैं....

इस पेड़ में एक बार तो आ जाये समर भी
जो आग इधर है कभी लग जाय उधर भी

कुछ मेरी अना भी मुझे झुकने नहीं देती
कुछ इसकी इजाजत नहीं देती है कमर भी

पहले मुझे बाजार में मिल जाती थी अक्सर
रुसवाई ने अब देख लिया है मेरा घर भी

इस वास्ते जी भर के उसे देख न पाए
सुनते हैं कि लग जाती है अपनों की नजर भी

कुछ उसकी तवज्जो भी नहीं होती है मुझ पर
इस खेल से कुछ लगने लगा   है मुझे डर भी

उस शहर में जीने   की सजा काट रहा हूँ
महफूज नहीं है जहाँ अल्लाह का घर भी

6 टिप्‍पणियां:

  1. vaah! achchhi ghazal padhvai aapne. munavvar ji to munavvar hain hi.

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  2. और मेरे लिये भी ये मुश्किल है कि इस गज़ल की तारीफ मे कुछ कहूँ ।ाल्फाज़ कम पड रहे हैं लाजवाब गज़ल पढवाने के लिये शुक्रिया।

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  3. Munnavvar Rana ji ke sheroN ko sunna, gahre aanand ki praapti. Is prastuti ke liye aapka shukriya!

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  4. सुभाष भाई मुन्‍नवर राणा की एक और गज़ल की ये पंक्तियां मुझे बहुत प्रिय हैं-

    मियाँ ! मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती,
    मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती ।

    किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था,
    मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती ।।

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