शुक्रवार, 18 जून 2010

रचना भी एक साधना

रचना चाहे कोई भी हो, आसान नहीं होती। किसी नयी रचना के लिए कुछ पुराना तोड़ना पड़ता है। जब कुछ ध्वस्त होता है तो रचना की जमीन बनती है। इसे दूसरी तरह से भी कह सकते हैं कि जब रचना होती है तो कुछ ध्वस्त होता है। अंकुर बाहर निकले, इसके लिए बीज को नष्ट होना होता है, उसी की ऊर्जा से अंकुर आसमान की ओर उठता है। कई बार नये पौधे को उगने का पथ प्रशस्त करने के लिए पूरा वृक्ष ही नष्ट हो जाता है। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है।

प्रकृति सबसे बड़ी रचनाकार है। उसकी प्रयोगशाला में निरंतर विध्वंस और रचना की प्रक्रिया चलती रहती है। टूटना, बिखरना, गलना अपने चारो ओर आप निरंतर घटित होते देख सकते हैं। परंतु प्रकृति का चरम सौंदर्य इसी में है कि वह हर विनाश पर रचना का नया महल खड़ा करती है। जंगल जब दावानल में भस्म हो जाता है तो पानी पड़ते ही उन्हीं पुरानी जड़ों से नयी कोंपलें फूट पड़ती हैं। चारों ओर हरियाली छा जाती है। नदी जब कभी अपने तटों से बाहर आ जाती है तो तबाही तो मचाती है लेकिन जैसे ही उसका पानी उतरता है, वहां बहकर आयी उपजाऊ मिट्टी में से जीवन फूट निकलता है। यही प्रकृति का नियम है।

शब्द आकाश का गुण है। हमें प्रकृति ने शब्द दिया है, व्यवहार में एक दूसरे से अपनी भावनाएं प्रकट करने के लिए लेकिन शब्द की शक्ति अपरिमित है। शब्दों का शिल्पी उस शक्ति को, उस ऊर्जा को पहचानता है और उसका सही उपयोग करता है। वह शब्दों से एक नयी दुनिया रचता है। जिसको रचना की यह कला मिली होती है, वही उसका प्रयोग कर सकता है। अभ्यास से उसे और प्रखर कर सकता है, मारक और तेजस्वी बना सकता है। रचनाकार इन्हीं अर्थों में जन्म लेता है। अगर जन्म से प्रतिभा नहीं मिली है तो कोशिश करके रचना करना संभव नहीं है।

कोशिश एक साहित्यकार को निखार तो सकती है, मगर केवल कोशिश किसी को साहित्यकार नहीं बना सकती। यह मां के गर्भ में मिला दैवीय वरदान होता है। किसी किसी को यह ताकत मिलती है। इसीलिए तो समाज साहित्यकारों का सम्मान करता है। पर यह सम्मान भी उसे तभी तक मिलता है, जब तक वह अपनी प्रतिभा का जीवन और समाज के परिष्करण में इस्तेमाल करता है। शक्ति अक्सर भटकाव की ओर ले जाती है। यश, धन और सौंदर्य के तमाम आकर्षण रास्ते में खड़े मिलते हैं पर रचनाकार को एक योगी की तरह आगे बढ़ना होता है, एक साधक की तरह मोहावेश से बचकर निकलना होता है। जो ऐसा कर पाते हैं, वे बड़े हो जाते हैं, जो भटक जाते हैं, व्यक्तिगत सुख को समाज के सुख से ऊपर रखकर देखने लगते हैं, वे इस वरदान से वंचित हो जाते हैं, उनकी रचना की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होकर नष्ट हो जाती है।

23 टिप्‍पणियां:

  1. शक्ति अक्सर भटकाव की ओर ले जाती है। यश, धन और सौंदर्य के तमाम आकर्षण रास्ते में खड़े मिलते हैं पर रचनाकार को एक योगी की तरह आगे बढ़ना होता है, एक साधक की तरह मोहावेश से बचकर निकलना होता है। जो ऐसा कर पाते हैं, वे बड़े हो जाते हैं, जो भटक जाते हैं, व्यक्तिगत सुख को समाज के सुख से ऊपर रखकर देखने लगते हैं, वे इस वरदान से वंचित हो जाते हैं, उनकी रचना की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होकर नष्ट हो जाती है।

    ...एक सार्थक पोस्ट !

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  2. सर, प्रणाम। कविता लिखना ओर पतंग उड़ाना एक जैसा ही होता है। जिसको आता है उसको आता है जिसको नहीं आता उसको नहीं आता। यह पैदाइशी लक्षण होता है। बाद में नहीं सीखा जा सकता। बहुत अच्छी और सार्थक पोस्ट है। बहुत सी जानकारी प्राप्त होती है।

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  3. बढ़िया है... मैं तो 'रचना' नाम सुनते ही चौंक गया था!

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  6. सही है रचना की प्रतिभा जन्मजात नहीं होती इसके लिये साधना तो करनी ही होती है । सही रचनाकार भी वही होता है जो सार्थक परिश्रम करता है ।

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  7. बहुत बढ़िया आलेख ! आपने बेहद सुन्दर तरीके से हम सब का मार्गदर्शन किया है ..........यही सच है कि आज कल हम सब अपनी अपनी उर्जा रचना में नहीं बल्कि विध्वंस की और ज्यादा लगा रहे है ! इस आदत को बदलना होगा !

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  8. रचना की प्रतिभा जन्मजात ही होती है ...हाँ , अभ्यास और प्रयास से इसे निखारा जा सकता है ...!!

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  9. बढ़िया आलेख, बेहद सुन्दर बधाई।

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  10. बहुत अच्छा लेख. इसे पढ़ कर बहुत सी बाते सीखने को भी मिली. रचना की प्रतिभा को निखारना ज़रूरी है. और आपने ठीक कहा की इसके लिए साधना करनी होगी.

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  11. @pankaj mishra-
    "कविता लिखना ओर पतंग उड़ाना एक जैसा ही होता है। जिसको आता है उसको आता है जिसको नहीं आता उसको नहीं आता। यह पैदाइशी लक्षण होता है। बाद में नहीं सीखा जा सकता। "

    Mai aapki baato se bilkul shahamat hu.

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  12. साधना के बिना भी कभी कुछ हासिल हुआ है क्‍या...जय हो

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  13. बिना साधना के कुछ हासिल नहीं होता |बहुत सही लिखा है |अच्छी रचना के लिए बधाई |
    आशा

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  14. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  15. Sadhana safalta ke liye jaroori hai parantu ek baat hame to samajh nahi padti hai ji, hamne to suna hai :
    Ajgar kare na chakari, panchi kare na kaam |
    Sant maluka kah gaye, sab ke data raam ||

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  16. प्रकृति सबसे बड़ी रचनाकार है। उसकी प्रयोगशाला में निरंतर विध्वंस और रचना की प्रक्रिया चलती रहती है। टूटना, बिखरना, गलना अपने चारो ओर आप निरंतर घटित होते देख सकते हैं।
    यही कुछ तो हमारे मन में भी चलता रहता है , एक रचनाकार हर टूटन से कुछ नया गढ़ लेता है ...बहुत अच्छा सटीक लिखा है ...

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  17. प्रकृति सबसे बड़ी रचनाकार है। उसकी प्रयोगशाला में निरंतर विध्वंस और रचना की प्रक्रिया चलती रहती है। टूटना, बिखरना, गलना अपने चारो ओर आप निरंतर घटित होते देख सकते हैं। परंतु प्रकृति का चरम सौंदर्य इसी में है कि वह हर विनाश पर रचना का नया महल खड़ा करती है।
    ..सच प्रकृति से बड़ा रचनाकार कोई नहीं.. रचनाकार भी निरंतर साधना के बल पर ही सार्थक रचना करने में सक्षम होता है...
    बहुत बढ़िया आलेख....आभार

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  18. बहुत ही अच्छा और सुन्दर लेख लिखा आप ने, बधाई........

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