मंगलवार, 29 जून 2010

बाबाजी की खुदकुशी पर इतना बवाल क्यूँ

विवेका बाबाजी ने खुदकुशी क्या कर ली, हंगामा मचा हुआ है। मारीशस से मुंबई आयी एक लड़की देखते-देखते सुपरमाडल बन गयी और कुछ ही वर्षों में अकूत पैसा जमा कर लिया। सारी सुख-सुविधाएं, ठाट-बाट, ऐश्वर्य भोग के बाद भी आखिर क्या करे पैसे का। सो बिजिनेस में लगा दिया। शक की सूई उसके प्रेमी गौतम वोहरा पर है, क्योंकि वही उसके बिजिनेस के मामले देखता था पर उसका कहना है कि वे दोनों सिर्फ दोस्त थे, इससे अधिक कुछ भी नहीं। विवेका की बिसरा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आत्महत्या के पहले उसने नींद की गोलियां खाई थी। पुलिस को शक है कि उसने खुदकुशी नहीं की बल्कि उसकी हत्या हुई है। पुलिस इस पहलू पर भी जांच कर रही है कि बाबाजी को मारने के लिए जहर तो नहीं दिया गया था। बिसरा रिपोर्ट में कुछ ऐसे तत्व मिले हैं जो जहर की तरफ इशारा कर रहे हैं। विवेका के शव पर जख्मों के निशान भी मिले हैं।

गुरुवार रात को विवेका और गौतम के बीच काफी ज्यादा झगड़ा हुआ था और बाद में गौतम उसे छोड़कर चला गया था। इस नजरिए से भी मामले की पड़ताल की जा रही है कि खुदकुशी के पीछे वित्तीय कारण तो नहीं है। उसके फ्लैट से पेनकिलर दवाई की कई स्ट्रिप्स के अलावा बड़ी संख्या में अधजले सिगरेट के टुकड़े भी मिले हैं। उसकी डायरी में एक जगह लिखा मिला है, मेरी बिल्लियों को बचा लेना। मैं किसी दूसरी दुनिया में जा रही हूं। तुम मुझे समझ क्यों नहीं पा रहे हो गौतम। क्या इसके लिए मुझे दूसरा जन्म लेना पड़ेगा। अपनी जिंदगी में क्या तुम मुझे थोड़ी सी जगह भी नहीं दे सकते। मैं तुम्हें कैसे समझाऊं कि इतने कम समय में तुम मेरे कितने करीब आ गए हो। तुम हमारे बिजनेस को क्यों बरबाद करने पर तुले हो, जिसे तुम्हीं ने मेरे लिए खड़ा किया था।

यह सब कुछ ध्यान से देखें तो एक लिजलिजी कहानी की ओर संकेत जाता है। ऐसी कहानियां जिस हाई-फाई अंदाज में शुरू होती हैं, उसी तरह खत्म हो जाती हैं। जहां जीवन का मतलब केवल पैसा कमाना हो, अनहद भोग करना हो, वहां लालची निगाहें पहुंच ही जाती हैं। और पैसे के लिए जिस तरह की छीना-झपटी, बेहयाई और अपराध हमारे समाज में चारों ओर दिखायी पड़ रहा है, उसके खतरे से कोई भी मुक्त नहीं है। राहचलते महिलाओं के गले से चेन खींच लेना, शादी के घर पर धावा बोलकर सब कुछ उठा ले जाना, मामूली पैसों के लिए हत्या कर देना जिस समाज में सामान्य सी बात रह गयी हो, वहां अगर किसी अकेली युवती के पास करोड़ों रुपये हों तो उससे दोस्ती करने वाले सैकड़ों लोग होंगे।

विवेका के भी कई दोस्त थे। पुलिस अब उन सबका इतिहास खंगालने में जुटी है। हो सकता है कल पुलिस सब कुछ पता कर ले और असली हत्यारा पकड़ में भी आ जाय लेकिन जिस तरह सरकार इस मामले को लेकर सक्रिय है, पुलिस मुस्तैद है और मीडिया रोज नयी-नयी सूचनाएं जुटाने में लगा हुआ है, क्या वह एक ऐसे देश में निरर्थक सी बात नहीं  है, जहां हर साल सैकड़ों बच्चे मानसिक दबाव में खुदकुशी कर लेते हैं और हजारों किसान कर्ज में डूबकर अपनी जान दे देते हैं। दरअसल बाबाजी की खुदकुशी भी बिकाऊ माल बन गयी है। बच्चों और किसानों की खुदकुशी में वैसा गलैमर कहां? उसे बेचना भी संभव नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर मानसिक दिवालियेपन का आरोप लग सकता है। परंतु इस गंभीर समस्या की ओर हमारा अगर ध्यान नहीं है तो यह भी तो एक तरह का मानसिक दिवालियापन ही है।

असल समस्या यह है कि हम इतने स्वार्थी और वंचक हो गये हैं कि ज्यादातर पैसों के बारे में सोचते हैं, अपने सुख के बारे में सोचते हैं। अगर इसके लिए हमें समाज का, देश का नुकसान भी करना पड़े तो कोई बात नहीं। यह राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है। नेता, व्यापारी, अफसर, पत्रकार सभी इस रोग से ग्रस्त हैं। यह ऐसी बीमारी है जो चिंतन की शक्ति को मार देती है। आदमी सोचना बंद कर देता है। वह सोचता भी है तो केवल इस बारे में कि उसका फायदा कैसे हो सकता है। हेरा-फेरी से, रिश्वत से, मिलावट से या ब्लैकमेलिंग से। समाज, देश और दुनिया जाय भाड़ में। इसी सोच से अपराध जन्म लेता है। अब आप समझ सकते हैं कि अपराध क्यों बढ़ रहे हैं। जो लोग इस दशा-दिशा को समझ रहे हैं, जो इसे बदलना चाहते हैं, उन पर बड़ी जिम्मेदारी है। कैसे लोगों को सही रास्ते पर ले जायें, कैसे इस तरह की परिस्थिति बने कि हम सब एक दूसरे की चिंता करें। अगर आज इस पर विचार नहीं किया गया, कोई रास्ता नहीं निकाला गया तो कल का चेहरा और भी भयानक होने वाला है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. Dr maharaj singh parihar29 जून 2010 को 2:03 am

    babajee ki sandehaspad maut par media ka anargal plap jari hai. is tarah ke unmukt jeevan ki keemat to chukani hi padti hai. afsos is bat ka hai ki dish desh men hazaron log bhookh, beemari aur hinsa se mar rahe hain unke liye electronic media ke pas samay nahin hai. is aalekh ke liye dhanybad

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  2. आज हर कोई कामयाबी की ओर बेसुध दौड़ रहा है | कामयाबी केवल पैसे की| उसके एबज में, चरित्र जाए ,चाहे देश-प्रेम जाए, चाहे शुकून जाए, सामजिक-प्रतिष्ठा का तो कोई मोल ही नहीं; क्यों कि यदि पैसा है तो सामाजिक-प्रतिष्ठा तो आ ही जाएगी | ये पैसे की ही ताकत है कि विवेका का मरना भी हाई-प्रोफाइल हो सका | आपने ठीक लिखा है और सच भी है ;'रोज कितने लोग इन्हीं हालातों में मर जाते हैं ,लेकिन चर्चा भी नहीं होती ,
    उन सब के साथ माँ की ममता भी होती है ,बहिन-भी का प्यार भी होता है ,जिस्म भी होता है,जान भी होती है, यदि कुछ नहीं होता है ,तो वो है पैसा | जब तक पैसे के लिए अँधा-धुंध भाग -दौड़ कम नहीं होगी तब तक यूं ही अपराधों में इजाफा होता रहेगा | यूं ही विवेकाएं मरतीं रहेंगीं | ऐसे हालातों में सब से दुर्भाग्य-पूर्ण ये है कि
    चाहे लड़का हो या लडकी जैसे ही कमाई शुरू हुई, कि माँ-बाप उसकी तरफ से मार्ग-दर्शन और चिंता वाला हाथ पूरी तरह खींच लेते हैं ;यदि कमाई मोटी हो तो बेफिक्री और भी कई गुनी हो जाती है, जब कि माँ-बाप के मार्ग-दर्शन की सब से ज्यादा जरूरत इन्हीं पलों में होती है ; क्योंकि जब पहली बार पैसा आता तो वो पल मानव-जिन्दगी के काफी कमजोर पल होते हैं | यहाँ बहकने की सम्भावना
    कई गुना ज्यादा होती है | यहाँ सबसे खास बात ये कि यहाँ का लडखडाई जिन्दगी यदि असरकारक तरीके
    से न सम्हाली गई तो फिर कभी नहीं सम्हल पाती |
    सामाजिक परिवेश पर काफी अच्छा लेख ;बधाई
    | धन्यवाद

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