बुधवार, 14 जुलाई 2010

खुशखबरी है, चीयर्स वुमेन

अब महिलाएं बिशप भी बन सकेंगी। चर्च आफ इंग्लैंड ने यह फैसला सुनाया है। इस फैसले से ब्रिटेन के परंपरावादी खेमे में निराशा और नाराजगी का माहौल है। दुनिया भर की महिलाओँ के लिए यह सुकून की खबर है। सेवा के सारे काम महिलाओँ द्वारा संपन्न किये जाने के बाद भी चर्च अभी तक उनके साथ भेदभाव करता चला आ रहा था। आखिर क्यों? ईश्वर के दरबार में इस तरह की बातें किसी को भी अच्छी नहीं लगती। केवल चर्च ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में महिलाओं को लंबे समय तक लगातार लैंगिक भेदभाव का शिकार होना पड़ा है। कबीलाई समाजों में सामान्य तौर पर यह माना जाता रहा है कि महिला की जिम्मेदारी बच्चे पैदा करना और उन्हें पालना-पोसना है। ऐसी परंपराएं भारतीय समाज में भी रहीं हैं लेकिन भारत दुनिया के अन्य मुल्कों से काफी पहले जाग उठा। आदिम युग और प्रागैतिहासिक काल के खत्म होने पर भी महिलाओं को ईश्वरीय मानी जाने वाली किताबों को पढ़ने के अधिकार नहीं थे। उनके साथ बर्बर बर्ताव किये जाते थे। इस्लाम के भारत में आने के बाद तो उन पर और कठोर अनुशासन लाद दिये गये। यवनों में पर्दा प्रथा थी और देश की आक्रांत जातियां अपनी महिलाओं को इसलिए पर्दे में रखने लगीं क्योंकि उन्हें उनकी असुरक्षा का भय था। यह प्रथा इतनी रूढ़ हो गयी थी कि कई बार तो पूरे जीवन साथ रहने के बाद भी पति-पत्नी एक दूसरे को पहचान पाने की हालत में नहीं होते थे।

परंतु आजादी की लड़ाई जब छिड़ी तो सामाजिक सुधारों के अभियान भी चले। पर्दा प्रथा के खिलाफ भी कुछ लोग सामने आये। स्वाधीनता संग्राम में कई भारतीय महिलाएं सामने आयीं, जिससे महिलाओँ में देश के साथ अपने स्वत्व और अघिकार की चेतना का भी जागरण हुआ। आजादी के बाद तो यह चेतना द्रुत गति से फैली और अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़कर काम करने के लिए अपने-आप महिलाएँ सामने आयीं। कानूनों में परिवर्तन हुए और महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा आजादी और सुरक्षा मिली। इतना सब होने के बावजूद आज भी यह नहीं कहा जा सकता कि अब भारतीय समाज में कोई भेदभाव नहीं है। महिलाएं आज भी अत्याचार सह रही हैं, उनके साथ बलात्कार की घटनाएं होती हैं, उनकी हत्याएं होती हैं। यहां तक कि भ्रूण में ही बच्चियों को मार देने की भी घटनाएँ सुनने को मिलती रहती हैं। कुछ पुरातनपंथी पोंगा पंडित अभी भी प्रेम विवाह करने वाली लड़कियों की सामाजिक अपमान के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं लेकिन फिर भी भारत में उन्हें अन्य तमाम देशों से ज्यादा सुरक्षा प्राप्त है, देश के विकास में उनकी बड़ी हिस्सेदारी है।

यहां कम से कम पाकिस्तान की तरह सरेआम महिलाओं को कोड़े लगाने की घटनाएं तो नहीं होती, पर्दे से बाहर झांक लेने पर मुंह पर तेजाब तो नहीं फेंके जाते। चर्च ने जो फैसला किया है, उससे महिलाओं में और साहस पैदा होगा, वे बड़ी से बड़ी जिम्मेदारियां उठाने के लिए आगे आने की हिम्मत कर सकेंगी। इसी फैसले की कड़ी में फ्रांस की भी चर्चा की जानी चाहिए. जहां सरकार ने बुर्के पर पाबंदी लगा दी है। इस मामले पर लंबे समय से विचार चल रहा था। फ्रांस के लोग मानते हैं कि बुर्का महिलाओं की प्रतिष्ठा का हनन है। संसद के एक सदन ने देश की इस भावना को समर्थन दे दिया है। अब यह मामला सीनेट में जायेगा और ज्यादा संभावना है कि सीनेट भी इसे मंजूर कर लेगा। अल्पसंख्यक इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह उनका धार्मिक और निजी मामला है और इसमें सरकार को दखल नहीं देना चाहिए। सरकार ने केवल सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का पहनकर जाने पर रोक लगायी है, घरों मे वे अपने ढंग से रहने और जीने को आजाद हैं। बदलते समय के साथ इस सामाजिक रुढ़ि को खत्म  करने की कोशिशों के प्रति अल्पसंख्यक समुदाय को लचीला रुख अपनाना चाहिये क्योंकि लगता नहीं कि किसी विरोध के आगे फ्रांस सरकार झुकने वाली है।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें