शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

काश, फिर कोई चंडी समाज की आंखें खोल सकती!

बंशीधर मिश्र की कलम से

खता किया, बुरा किया। करके छोड़ा और बुरा किया। कोई अनपढ़ और गंवार ऐसा करे, तो समझ में आता है पर भौतिक चेतना की संगठित रूप मानी जाने वाली सरकारें यदि यह गलती करने लगें, तो तरस आता है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ इसी तरह का काम किया। कई महीने पहले सरकार की तरफ से राजाज्ञा जारी हुई कि स्कूलों में दोपहर का भोजन बनाने का काम दलित वर्ग की महिलाएं ही करेंगी। कुछ महीने ही बीते होंगे कि अब सरकार की तरफ से नए निर्देश जारी कर दिए गए। अब भोजन बनाने में दलितों का आरक्षण नहीं होगा। यह काम जरूरतमंद महिलाओं, विधवा, तलाकशुदा और गरीब महिलाओं यहां तक कि ऐसे ही पुरुषों के हवाले कर देने का आदेश जारी किया गया है। यकीनन यह शासनादेश या तो स्कूलों तक पहुंच गया होगा या पहुंचने वाला होगा। इस तुगलकी बदलाव के पीछे सरकार की क्या मंशा थी और उसने ऐसा क्यों किया, यह विचारणीय प्रश्न है।

दरअसल, यह अदूरदर्शी राजनीति से उपजे भय का परिणाम है। हुआ यूं कि दोनों शासनादेशों के बीच का समय स्कूलों में उठे मौन विद्रोह के घनेरे बादलों ने भर लिया। यह अजीब किस्म का विद्रोह था। इसमें न तो लाठियां थीं, न डंडे। किसी ने न तो किसी को गालियां दीं, न गोलियां मारीं। बस स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों ने यह कहा कि हम नहीं खाएंगे। क्यों नहीं खाएंगे? भूख नहीं है। कुछ दिन बाद पता चला कि ऊंची जाति के इन नन्हें बच्चों की भूख का संबंध स्कूलों के रसोईघरों में हाल ही दाखिल हुईं  दलित महिलाओं से था।

पर भूख और प्यास जाति का भेद नहीं पहचानती। आद्य गुरु शंकर को जब खालिस रेगिस्तान में जोर की प्यास लगी, तो वह बेचैन हो उठे। उसी पगडंडी से सिर पर पानी का घड़ा लिए एक चांडाल कन्या जा रही थी। आद्य गुरु संन्यासी थे। उन्हें प्यास बेचैन कर रही थी। पर सामाजिक मर्यादा के भय से चांडाल कन्या से पानी नहीं मांग पा रहे थे। थोड़ी दूर चलने पर उनकी प्यास और बेचैनी बढ़ने लगी। प्राण हलक में अटक रहे थे। उनका गला सूखने लगा। उन्होंने उससे पानी मांगा। देवि, पानी दे दे। उसने विस्मय से जवाब दिया- ऐ संन्यासी, तू देवता तुल्य, मैं ठहरी चांडाल। तेरा धर्म भ्रष्ट नहीं होगा? आद्य गुरु सहम गए। कुछ दूर चले, तो फिर लगा प्राण निकल जाएंगे। वह याचक बन पानी की भीख मांगने लगे। सारी मर्यादा धरी रह गई। चांडाल कन्या कोई और नहीं साक्षात मां काली थीं। उन्होंने आद्य गुरु को फटकार लगाई कि ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या के दर्शन का प्रतिपादन करने वाला छूत और अछूत का भेद करे, तो दर्शन किस काम का। जो कहा उसको धारण करो। आद्य गुरु की आंखें खुल गर्इं। वह दंडी स्वामी और सनातन धर्म के पुनरुद्धारक थे। पूरे देश में अपने सिद्धांत की प्रतिस्थापना की थी। ब्रह्म सत्य है और माया रूप जगत मिथ्या। यह केवल दीखता है, होता नहीं। पर व्यवहार के धरातल पर वह वर्ण व्यवस्था के जड़ बंधन से बाहर नहीं निकल पाए थे। जब प्यास ने उन्हें बेचैन किया, तो दर्शन और व्यवहार का अंतर मिट गया। यही सत्य है।

यह हैरान करने वाली बात है कि आद्य गुरु के धार्मिक प्रतिपादन की विरासत ढोने वाला भारतीय सनातन समाज डेढ़ हजार साल बाद भी उनकी व्यावहारिक दीक्षा को मिसाल नहीं बना पाया है। इसीलिए तो सवर्ण बच्चों के बैग में घर के बने स्वादिष्ट व्यंजन होते थे, ताकि उनका मन किसी भी हालत में स्कूल में बनने वाले सरकारी दलिये या खिचड़ी पर न ललचाए क्योंकि बच्चे तो बच्चे ठहरे। उनके लिए कौन दलित, कैसा दलित? मगर उनके माँ-बाप नहीं चाहते थे कि किसी भी कीमत पर बच्चे गांव की अछूत महिला के हाथ बना खाना खाएं। इसलिए उनके कोमल मन में भेद पैदा किया गया। इसी की परिणति थी कि बच्चे, फिर बच्चे नहीं रह गये बल्कि सामाजिक जड़ता को ढोने के वाहक बन गये। उन्हें पहले भेदभाव मिटाने की इस सरकारी कोशिश के खिलाफ तलवार की तरह इस्तेमाल किया गया। मीडिया और प्रबुद्धजनों ने हस्तक्षेप किया, तो उन्हें ढाल बना दिया गया। चिंताजनक यह रहा कि लखनऊ में बैठे अफसरों ने हकीकत जाननी ही नहीं चाही, बस खबरों को पढ़ा और निर्णय लिया। वही निर्णय जो सोलहवीं सदी की पंचायतों में लिये जाते थे। यह अछूत है, इसे गांव के बाहर ही रहना होगा। उस समय तो न शिक्षा की नौटंकी थी, न जागरूकता का भ्रम और न ही इक्कीसवीं सदी में पहुंचने का दंभ, इसलिए उसे नजरअंदाज किया जा सकता है। किताबों में लिखा है कि यह अक्षम्य अपराध है। पर यह ऐसा अपराध है जो मानव समाज में कभी वर्ण के रूप में तो कभी वर्ग के रूप में किया जाता रहा है। यह आज भी बार-बार दोहराया जा रहा है। संविधान महज एक किताब सी हो गयी जो अलमारियों में सजा कर रख दी जाती है। वह निर्जीव वस्तु है इसलिए उसकी भावनाओं से किसी को क्या लेना-देना। यहां तो जीवितों की भावनाओं की परवाह नहीं की जाती फिर निर्जीव की क्या बिसात। इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि यह उस उत्तर प्रदेश में हुआ है जहां की मुख्यमंत्री सवर्णों को कोस-कोसकर उस पद तक पहुंचीं। गांव से बाहर रहने वाली इस कौम को उनसे बहुत उम्मीद थी कि वह गांव में आ जायेगी। शायद ऐसा इसलिए कि उनके लिए ‘वर्ण’ का अंतर मायने नहीं रखता। क्योंकि उनका ‘वर्ग’ बदल गया है। वह अरबों की मिल्कियत वाली राजाओं की श्रेणी में गिनी जाने लगी हैं। और राजाओं की कोई जाति नहीं होती। इसीलिए उनको जातीय भेदभाव का दंश असर नहीं करता।

अब यह कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि स्कूलों में रसोइयों के संबंध में लिए गए दोनों निर्णय जल्दबाजी में थे। पहले समाज को उसके लिए तैयार कर लिया जाता, तो शायद यह सामाजिक फूहड़पन न होता। सरकार इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। पर समाज भी इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। ऐसा समाज कभी श्रेष्ठ नहीं बन सकता जहां मनुष्य में अंतर सिर्फ इस आधार पर किया जाता है कि वह उसका वर्ण नीचा है या वह गरीब वर्ग से संबंध रखता है। समता प्रकृति का चरित्र है। सूरज की रोशनी सब के लिए होती है। हवाएं समूची धरती को सुख देती हैं। बादल कभी ऊंच-नीच का भेद करके नहीं बरसते। यकीनन यही मां काली ने भी आद्य गुरु को समझाया होगा। तभी उनकी आंखें खुली थीं। काश, फिर कोई चंडी भारतीय समाज की आंखें खोल सकती!

1 टिप्पणी:

  1. समाज कभी श्रेष्ठ नहीं बन सकता जहां मनुष्य में अंतर सिर्फ इस आधार पर किया जाता है कि वह उसका वर्ण नीचा है या वह गरीब वर्ग से संबंध रखता है...
    सहमत ..!

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