मंगलवार, 27 जुलाई 2010

शाह को ‘राम भरोसे’ छोड़ा!

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से
नये  घटनाक्रमों की नजाकत देखते हुए आखिर भाजपा नेतृत्व ने चर्चित अमित शाह को ‘राम भरोसे’ छोड़ने का फैसला कर लिया है। उसने अपनी राजनीतिक जिद छोड़ दी है। अब वह महंगाई के मुद्दे पर पूरे विपक्ष के साथ कदमताल बनाने की कोशिश करेगा। इसके पहले भाजपा नेतृत्व इस बात पर अड़ गया था कि वह पहले अमित शाह के मामले में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेगा।  रातोंरात अपनी प्राथमिकता बदलने का फैसला करने की खास वजह यह रही कि गुजरात सरकार के गृहराज्य मंत्री रहे अमित शाह के बारे में ऐसे कई खुलासे सामने आए हैं, जिनकी तरफदारी उल्टे गले की घंटी बन सकती है। नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन को आतंकवादी के नाम पर एक कथित पुलिस मुठभेड़ में मार गिराने के मामले में कई वरिष्ठ आईपीएस अफसरों के साथ ही मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह का भी नाम आया था। सीबीआई ने कानूनी फंदा  कस दिया तो रविवार को उन्होंने एक नाटकीय घटनाक्रम में  गांधी नगर में समर्पण किया।

अमित शाह के बारे में कई नए खुलासे सामने आ चुके हैं। इनमें सबसे गंभीर मामला केतन पारिक से जुड़ा हुआ है। पारिक शेयर मार्केट के एक चर्चित घोटाले के आरोपी हैं। कई साल पहले 1200 करोड़ रुपये के बैंक के घोटाले का उनका मामला चर्चित हुआ था। पारिक ने गुजरात के माधवपुरा बैंक में बड़े स्तर पर हेराफेरी की थी। इससे हजारों जमाकर्ताओं का पैसा डूबा था। शिकायत हुई थी कि इस बैंक के तत्कालीन निदेशक अमित शाह ने पारिक को राहत दिलाने की भूमिका निभाई थी। इसके एवज में उन्होंने पारिक से ढाई करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। सोहराबुद्दीन मामले में गुजरात के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कुलदीप शर्मा ने जांच कराई थी।  उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इसमें अमित शाह जैसे बड़े नेताओं का नाम आ रहा है। इसलिए जरूरी है कि इस मामले की जांच सीबीआई से करायी जाए। उन्होंने तीन पेज की सिफारिश   सरकार से की थी। यह रिपोर्ट आने के बाद ही कुलदीप शर्मा को एक गैर महत्वपूर्ण पद पर भेज दिया गया था और रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। इस मामले का खुलासा सामने आ गया है।

मीडिया में भी इस मामले की चर्चा के बाद भाजपा ने यही ठीक माना कि अमित शाह की ज्यादा पैरवी की गई तो कहीं बाजी उल्टी न पड़ जाए क्योंकि कांग्रेस  पलटवार कर सकती है कि भाजपा एक बड़े घोटालेबाज के ‘संरक्षक’ नेता को बचाने में जुटी है। भाजपा नेतृत्व के सामने एक मुश्किल यह भी आ गई है कि शाह के मामले में सीबीआई  के हाथ काफी पुख्ता सबूत आ गए हैं। उसने अमीन सहित कई उन पुलिस अधिकारियों को पूर्व गृहराज्य मंत्री के खिलाफ सरकारी गवाह बनाने की तैयारी कर ली है। माना जा रहा है कि अपने बचाव के लालच में आरोपी पुलिस अधिकारी पूरा इल्जाम अमित शाह पर डाल सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक किरकिरी का खतरा काफी है। शायद इन्हीं अंदेशों के चलते पार्टी ने अपना राजनीतिक पैंतरा बदल दिया है।
 
राजनीकि हल्कों में यह माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व ने यह समझ लिया है कि उसने गुजरात के मुद्दे पर जिद की तो कहीं न कहीं कांग्रेस को राहत मिल जाएगी। इसके आसार इसलिए भी बढ़ गए थे कि शाह के मामले में विपक्ष के सेक्यूलर दल भाजपा के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थे। भाजपा नेतृत्व ने तय किया है कि शाह को राहत दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने का विकल्प ही सही है क्योंकि मामला ज्यादा आगे बढ़ा तो इसकी आंच सीधे नरेंद्र मोदी तक पहुंच सकती है। नरेंद्र मोदी भी इस मामले में कोई कोताही नहीं कर रहे। जाने-माने वकील राम जेठमलानी को उन्होंने शाह का वकील बनने के लिए तैयार कर लिया है। अब राम  ही शाह की रक्षा करेंगे।

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