शनिवार, 3 जुलाई 2010

मूढ़मत्युत्पन्न नाम परिवर्तन

नाम अपने आप में महत्वपूर्ण है? हर बच्चे के मां-बाप उसका एक नाम रखते हैं जो उसकी पहचान बन सके, जिससे उसे लोग बुला सकें, पुकार सकें। उसी पहचान के साथ वह जीता है, मर जाता है। कुछ अच्छा करता है तो मरने के बाद भी वह अपने नाम के रूप में जिंदा रहता है अन्यथा लोग उसे भुला देते हैं। इसीलिए लोग अक्सर बच्चों से कहते सुने जाते हैं, ऐसा कुछ करो कि दुनिया में नाम हो। बच्चे का नाम अपने मां-बाप और परिवार का नाम भी साथ लेकर चलता है। कोई बच्चा बड़ा कलाकार, वैज्ञानिक, संगीतकार या साहित्यकार हो जाय, तो वह तो इतिहास में अपनी जगह बनाता ही है, उसके मां-बाप का नाम भी उसके साथ लिया जाता है। वे भी अमर हो जाते हैं।

नाम के साथ व्यक्ति का व्यवहार, उसकी छवि जुड़ जाती है। कई बार नाम एक पूरी परंपरा को ध्वनित करते दिखते हैं । जैसे राम, कृष्ण, बुद्ध या इसी तरह के महामानव पूरे युग को अपना नाम दे देते हैं। जिसको चाहने वाले, जिसके दर्शन का अनुसरण करने वाले जितने ज्यादा होते हैं, वह उतना ही बड़ा नाम होता है। दुनिया भर के तमाम हिस्सों में ऐसे बड़े नाम हैं, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। दर्शन में अरस्तू, प्लेटो, कंफ्यूसियस, रामकृष्ण, विवेकानंद, रमन, डा. राधाकृष्णन और साहित्य में वर्ड्सवर्थ, कीट्स, शेली, तुलसीदास, कबीर, प्रेमचंद, निराला या इस तरह के अनगिनत नाम हैं, जो अपने युग की पहचान बने। इसी तरह जीवन के हर क्षेत्र में अनेक नाम लिये जा सकते हैं। मनुष्य के जीवन को सुधारने, उसका परिष्कार करने, मानवीय मूल्यों को स्थापित करने के सकारात्मक कार्यों में जो अपनी रचनात्मक ऊर्जा लगाते हैं, उन्हें दुनिया आदर से याद करती हैं।

पर उन्हें भी भुलाना मुश्किल होता है जो जीवन के नकारात्मक पक्ष को मजबूत करने में अपना जीवन लगा देते हैं। अगर राम को लोग याद रखते हैं तो रावण को भुलाना कैसे संभव हो सकता है। कृष्ण का महत्व इतना नहीं होता अगर कंस नहीं होता। जनता को पीड़ा, यातना, कष्ट से उबारने के नाते ही कृष्ण को याद किया जाता है। महाभारत में न्याय का पक्ष लेने के कारण ही वे आदर के पात्र बने। परंतु वे याद किये जायेंगे तो दुर्योधन भी नहीं भुलाया जा सकता। वह इतिहास में अन्याय के पर्याय के रूप में जिंदा रहेगा। इसी तरह सुलताना डाकू, राबिनहुड या और भी ऐसे नाम लिये जा सकते हैं, जो अनीति, अन्याय, दमन, शोषण के पर्याय बन गये।

लेकिन एक क्षण के लिए मान लीजिए कि धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र का नाम राम या कृष्ण रख दिया होता तो? तो यही नाम हमारे मन में वैसा भाव जगाते जैसा दुर्योधन का नाम लेते ही जगते हैं। अगर रावण के पिता ने उसका नाम कुछ और रखा होता तो आज जो जुगुप्सा, घृणा, क्रोध और तिरस्कार का भाव रावण के नाम के साथ जुड़ा हुआ है, वह उसके साथ न जुड़ा होता। आशय यह है कि नाम का नहीं व्यक्ति का महत्व है, उसके व्यवहार, उसके चरित्र, उसके जीवन-मूल्य, उसकी सामर्थ्य का महत्व है। ये गुण जिस नाम के साथ जुड़ेंगे, उसे बड़ा बना देंगे। इसी प्रकार जीवन के दुर्दांत अवगुणों से भरा अन्यायी, अधर्मी, क्रूर और लंपट व्यक्ति को जो नाम मिला होगा, वे सारे अवगुण उसी नाम के साथ जुड़ जाते हैं। स्वतंत्र रूप से किसी नाम का कोई मतलब नहीं है, व्यक्ति के कारण ही उसकी सार्थकता या निरर्थकता होती है।

इसी संदर्भ में परंपरा से चले आ रहे शहरों के नाम भी अपना अर्थ रखते हैं। इतिहास और लोक की स्मृति उनके अर्थ को और गहरा करती है। अगर अचानक किसी शहर का नाम बदल दिया जाय तो लोग उसे स्वीकार नहीं कर पाते। यह वैसे ही है, जैसे किसी व्यक्ति का प्रौढ़ावस्था में अचानक एक दिन नाम बदल दिया जाय और उससे कहा जाय कि वह नये नाम के साथ जिये। उसके लिए बहुत मुश्किल होगी। उसे लगेगा जैसे जितने वर्ष पहले नाम के साथ जिया, वे बेकार चले गये। इसीलिए जब तक कोई सांस्कृतिक, राष्ट्रीय जरूरत न आ पड़े, नाम परिवर्तन समाज और देश की स्मृति के साथ एक मजाक लगता है। यह मजाक उत्तर प्रदेश में खूब हो रहा है। मायावती की सरकार ने अमेठी को जिला बना दिया है और उसका नाम छत्रपति साहूजी नगर कर दिया है। इसमें सुल्तानपुर की तीन और रायबरेली की दो तहसीलें शामिल होंगी और इसका मुख्यालय गौरीगंज होगा।

इसके कुछ राजनीतिक कारण हैं, जो सभी जानते हैं परंतु राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए खेले जा रहे इस नाटक के कुपरिणामों पर गौर करने की किसी के पास फुरसत नहीं है। पहले भी इस तरह के प्रयास हो चुके हैं और सभी लोग जानते हैं कि सरकारी कागजों में भले नये नाम चल रहे हों लेकिन जनता ने लगभग सभी ऐसे नाम ठुकरा दिये। अभी तक हाथरस को महामायानगर के रूप में लोक में मान्यता नहीं मिली। नोयडा को कौन गौतम बुद्ध नगर के रूप में पचा पाया? इसी तरह अकबरपुर को अंबेडकरनगर, कासगंज को कांशीरामनगर, अमरोहा को ज्योतिबा फूले नगर, डुमरियागंज को सिद्धार्थनगर, बस्ती को संत कबीर नगर या  भदोही को संत रविदासनगर के रूप में कहां लोग पुकारते हैं? और यह भी समझ में नहीं आता कि बुद्ध, कबीर, रैदास, अंबेडकर को इस तरह छोटा करके किसी भी सत्तारूढ़ दल को आखिर क्या मिल रहा है? इन नामों को अमर करने का यह तरीका बहुत ही मूढ़मत्युत्पन्न लगता है।  

4 टिप्‍पणियां:

  1. अगर शेक्सपियर भारत आया होता तो वह बेचारा कभी न कहता what is there in a name...

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  2. सुभाष भाई अपन तो केवल एक ही बात जानते हैं। भोपाल का मूल नाम भोजपालपुर था। घिसते घिसते भोपाल रह गया। और वहीं एक बड़ा मोहल्‍ला है,जिसका मूल नाम तात्‍याटोपे नगर है लेकिन किसी आटो वाले या बच्‍चे से पूछेंगे तो कहेगा ऐसा कोई नगर नहीं है यहां। हां आप टीटीनगर कहिए न। वही हाल वहां के महाराणाप्रतापनगर का है। एमपी नगर सब समझते हैं। और हमारे हर बड़े शहर में एमजी रोड क्‍या है हम सब जानते हैं। तो मेरा मानना तो यह है कि जो अपने काम से अमर हैं वे हैं। उनके बारे में जिनको जानना है वे जान ही लेते हैं। उनके नाम पर सड़क और शहरों के नाम रखने का यह सम्‍मान दिखावा मात्र है।

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  3. बेहद सटीक और उम्दा आलेख !
    यह सच है कि जनता को इन सब राजनीती से कुछ लेना देना नहीं है यह तो इन नेताओ की नाटक बाज़ी है !

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  4. आदरणीय,
    विचारोत्तेजक आलेख के लिए बधाई. आज कल के निकम्मे राजनीतिज्ञों से नाम बदलने के खेल के आलावा और अपेक्षा भी क्या की जा सकती है. शायद इन्होने बाबा तुलसी दास जी की बात गांठ बांध ली है- 'कलियुग केवल नाम अधारा'

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