जामा मसजिद के सामने विदेशी पर्यटकों की बस को निशाना बनाकर जो हमला किया गया, उसमें कोई बड़ा नुकसान तो नहीं हुआ पर यह एक चेतावनी है कि जो लोग दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन से प्रसन्न नहीं हैं या जो नहीं चाहते कि दुनिया में भारत का मान-सम्मान बढ़े, वे चुपचाप बैठे नहीं हैं, वे दिन-रात कुछ न कुछ ऐसा सोच रहे हैं, जिससे विदेशियों के मन में घबराहट पैदा की जा सके, उन्हें खेलों में शामिल होने या उन्हें देख्नने के लिए विदेशों से आने की योजना बनाने से रोका जा सके। इसमें उन्हें कितनी कामयाबी मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं, यह निर्भर है हमारी पुलिस और दिल्ली की जनता की सजगता पर।
यह बात बहुत साफ है कि किसी भी हमलावर को अपने काम को अंजाम देने से रोक पाना मुश्किल काम है क्योंकि यह किसी को पता नहीं होता कि हमलावर कहां घात लगाये बैठा है और वह कब किस पर हमला करने वाला है। आतंकवादी हमले अनिश्चित होते हैं। किसी भी देश के पास इतने सुरक्षा बल नहीं होते कि वह हर आदमी के पीछे एक बंदूकधारी लगा दे, यह व्यावहारिक रूप से असंभव है पर जब आम नागरिक भी अपनी जिम्मेदारियां समझता है तब किसी बाहरी या उपद्रवी मानसिकता वाले व्यक्ति के लिए छिपना, सामान खरीदना या बंदूक और विस्फोटकों के साथ सड़कों पर चलना कठिन हो जाता है। हमारे देश की पुलिस और उसके अधिकारी न तो इस तरफ ध्यान देते हैं, न ही सरकारें सुरक्षा और सतर्कता की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी के लिए कभी गंभीर पहल करती हैं। इसके अभाव में आम आदमी भी यह समझे बैठा रहता है कि सुरक्षा तो पुलिस का काम है, आतंकवादियों और अपराधियों से जनता की हिफाजत तो पुलिस का काम है। यह एक बड़ी कमी हमारी व्यवस्था में है। क्या हम स्वयं सुरक्षित रहना चाहते हैं, क्या हम चाहते हैं कि हमारे मित्र, सगे-संबंधी और हमारा समाज सुरक्षित रहे? अगर हम चाहते हैं तो क्या कभी इस बात पर विचार करते हैं कि इसमें हमारी अपनी क्या भूमिका हो सकती है? शायद नहीं, कभी नहीं सोचते, क्यों कि सरकार और पुलिस विभाग की तरफ से इस मामले में कभी जनता को भरोसे में लेने की कोई कोशिश नहीं की जाती है।
इस तरह की कार्यशालाएं व्यापक स्तर पर की जानी चाहिए, जिनमें मुहल्ला स्तर पर लोगों की भागीदारी हो और उन्हें समाज और देश के प्रति, अपने शहर के प्रति, उसकी प्रतिष्ठा के प्रति उनकी जिम्मेदारियों से अवगत कराया जाये, उन्हें बताया जाये कि किसी भी संदिग्ध आदमी को वे कैसे पहचान सकते हैं, बिना अतिरिक्त समय दिये वे किस तरह पुलिस की मदद कर सकते हैं। इससे बहुत सारी अवांछित घटनाएं टाली जा सकती हैं। कोई भी आतंकवादी अकेला अपने बूते पर कुछ भी करने में सफल नहीं हो सकता। वह अपने काम में आने वाली चीजें यहीं के बाजार से खरीदता है, कोई वारदात करने से पहले वह यहीं रुकता है, किसी न किसी की मदद जरूर लेता है। अगर हर नागरिक अपने आस-पास के लोगों के प्रति सजग रहे तो ऐसे लोग बहुत जल्द पहचाने जा सकेंगे|
बकौल हजारी प्रसाद द्विवेदी, करने वाला इतिहास निर्माता होता है, सिर्फ सोचने वाला इतिहास के भयंकर रथचक्र के नीचे पिस जाता है। इतिहास का रथ वह हांकता है, जो सोचता है और सोचे को करता भी है।
रविवार, 19 सितंबर 2010
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
विज्ञान का भगवान से क्या मतलब
विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग ने ब्रह्मांड के निर्माण की प्रक्रिया में भगवान की किसी भूमिका से इनकार किया है। उनका कहना है कि भौतिक विज्ञान के सिद्धांत यह साबित करते हैं कि प्रारंभ में जब कुछ नहीं था, तब भी गुरुत्व था और वही कारक हो सकता है ब्रह्मांड के निर्माण का। शून्य में से ब्रह्मांड के प्रस्फुटन के लिए लगता नहीं कि किसी भगवान को चाभी घुमाने की जरूरत रही होगी। पर वे ब्रह्मांड की उत्पत्ति शून्य से नथिंगनेस से नहीं मानते। कुछ था और उस कुछ में से बहुत कुछ या सब कुछ निकला। किसी भी वैज्ञानिक ने पहली बार भगवान के वजूद को इस तरह चुनौती दी है। उनकी इस घारणा के बीज उनके प्रारंभिक जीवन में ही पड़ गये थे। उनकी मां इसाबेला 1930 में कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य रही थीं और साम्यवादी चिंतन को लगभग नास्तिक चिंतन माना जाता है पर अपने शुरुआती विचारों में हाकिंग न तो नास्तिक दिखते हैं, न आस्तिक। वे न तो भगवान की संभावना में विश्वास करते हैं, न ही उसकी असंभावना में।
विज्ञान को भगवान से कोई मतलब होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह बहस दर्शन के क्षेत्र की है। मूल्य, चरित्र, धर्म और नैतिकता तय करने का काम दर्शन करता है, विज्ञान नहीं। विज्ञान तो प्रायोगिक सत्यों का उद्घाटन करता है और उन्हें जीवन की उपयोगिता से जोड़ता है। विज्ञान के कदम जहां-जहां पड़ते जाते हैं, भगवान स्वयं ही वह इलाके छोड़कर हट जाता है। कल तक जो बहुत सी चीजें असंभव मानी जाती थीं, विज्ञान ने आज उन्हें संभव कर दिया है। अब वहां भगवान की कोई जरूरत नहीं रह गयी। पर जहां विज्ञान का उजाला अभी तक नहीं पहुंच सका है, उस अंधेरे में टिकने का कोई सहारा तो चाहिए। आदमी ने अपनी निरुपायता में भगवान को गढ़ा है, जब उसकी शक्ति, उसका संकल्प, उसकी मेधा पराजित हो जाती है तब वह भगवान को याद करता है। भगवान उसकी मदद के लिए आये या न आये पर उसकी अमूर्त और काल्पनिक उपस्थिति से मनुष्य को शक्ति मिलती रही है। वैज्ञानिक के जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं। वह कभी यह कह सकने की स्थिति में नहीं हुआ, न ही शायद होगा कि कुछ भी ऐसा नहीं, जो वह न कर पाये। इसीलिए वैज्ञानिकों ने भगवान के होने, न होने पर ज्यादा बहस नहीं की। बल्कि कइयों ने तो यह स्वीकार किया कि कोई न कोई ब्रह्मांड मेधा तो है, जो अगणित ग्रह, तारा, नक्षत्र मंडलों को संतुलित रखती है, जो फूलों को खिलाती है, महकाती है, जो सृजन और ध्वंस का भी नियमन करती है। उसे बेशक भगवान न कहो, कोई भी नाम दे दो क्या फर्क पड़ता है।
अनेक वैज्ञानिकों को हाकिंग की घोषणा पर आपत्ति है। उनका कहना है कि विज्ञान को सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए। उसे आने वाली नस्लों को यह मौका नहीं देना चाहिए कि वह विज्ञान का सहारा लेकर अपने नास्तिवाद को मजबूत कर सके। यह विज्ञान का न तो धर्म है, न ही उसके काम करने का तरीका। इससे विज्ञान की प्रामाणिकता पर भी लोग ऊंगलियां उठायेंगे क्योंकि विज्ञान कभी भी कोई ऐसी बात नहीं कहता, जिसे वह प्रमाणित न कर सके। यह सच है कि विज्ञान के पास कोई ऐसा साधन नहीं है, जिसके माध्यम से वह यह साबित कर सके कि भगवान है। इसी तरह वह यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि भगवान नहीं है। फिर तो किसी भी वैज्ञानिक का यह कहना नितांत अवैज्ञानिक होगा कि भगवान की ब्रह्मांड में कोई भूमिका नहीं है।
विज्ञान को भगवान से कोई मतलब होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह बहस दर्शन के क्षेत्र की है। मूल्य, चरित्र, धर्म और नैतिकता तय करने का काम दर्शन करता है, विज्ञान नहीं। विज्ञान तो प्रायोगिक सत्यों का उद्घाटन करता है और उन्हें जीवन की उपयोगिता से जोड़ता है। विज्ञान के कदम जहां-जहां पड़ते जाते हैं, भगवान स्वयं ही वह इलाके छोड़कर हट जाता है। कल तक जो बहुत सी चीजें असंभव मानी जाती थीं, विज्ञान ने आज उन्हें संभव कर दिया है। अब वहां भगवान की कोई जरूरत नहीं रह गयी। पर जहां विज्ञान का उजाला अभी तक नहीं पहुंच सका है, उस अंधेरे में टिकने का कोई सहारा तो चाहिए। आदमी ने अपनी निरुपायता में भगवान को गढ़ा है, जब उसकी शक्ति, उसका संकल्प, उसकी मेधा पराजित हो जाती है तब वह भगवान को याद करता है। भगवान उसकी मदद के लिए आये या न आये पर उसकी अमूर्त और काल्पनिक उपस्थिति से मनुष्य को शक्ति मिलती रही है। वैज्ञानिक के जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं। वह कभी यह कह सकने की स्थिति में नहीं हुआ, न ही शायद होगा कि कुछ भी ऐसा नहीं, जो वह न कर पाये। इसीलिए वैज्ञानिकों ने भगवान के होने, न होने पर ज्यादा बहस नहीं की। बल्कि कइयों ने तो यह स्वीकार किया कि कोई न कोई ब्रह्मांड मेधा तो है, जो अगणित ग्रह, तारा, नक्षत्र मंडलों को संतुलित रखती है, जो फूलों को खिलाती है, महकाती है, जो सृजन और ध्वंस का भी नियमन करती है। उसे बेशक भगवान न कहो, कोई भी नाम दे दो क्या फर्क पड़ता है।
अनेक वैज्ञानिकों को हाकिंग की घोषणा पर आपत्ति है। उनका कहना है कि विज्ञान को सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए। उसे आने वाली नस्लों को यह मौका नहीं देना चाहिए कि वह विज्ञान का सहारा लेकर अपने नास्तिवाद को मजबूत कर सके। यह विज्ञान का न तो धर्म है, न ही उसके काम करने का तरीका। इससे विज्ञान की प्रामाणिकता पर भी लोग ऊंगलियां उठायेंगे क्योंकि विज्ञान कभी भी कोई ऐसी बात नहीं कहता, जिसे वह प्रमाणित न कर सके। यह सच है कि विज्ञान के पास कोई ऐसा साधन नहीं है, जिसके माध्यम से वह यह साबित कर सके कि भगवान है। इसी तरह वह यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि भगवान नहीं है। फिर तो किसी भी वैज्ञानिक का यह कहना नितांत अवैज्ञानिक होगा कि भगवान की ब्रह्मांड में कोई भूमिका नहीं है।
लेबल:
vishesh
रविवार, 12 सितंबर 2010
ये कहां का धर्म है जनाब?
धर्म वह नहीं है, जो हम जानते हैं। वह भी नहीं, जो हम मानते हैं। वह इस जानने और मानने से बहुत दूर है। हम समझते हैं कि थोड़ा पूजा-पाठ कर लिया, मंदिर हो आये, किसी भिखारी के हाथ पर एक रुपये का सिक्का डाल दिया, बस हो गया धर्म। मिल गयी जीवन में कुछ भी करने की छूट, बेईमानी की रियायत। हम मानते हैं कि महीने में एक बार राम चरित मानस का पाठ करा दिया, सुबह उठे तो गीता का एक श्लोक बांच लिया और हो गया धर्म, सारे पाप हो गये माफ और नये सिरे से पाप करने का रास्ता खुल गया। अब महीने भर चाहे जितने पीड़ितों को सताओ, चाहे जितने लोगों से पैसा वसूलो। हम जानते हैं कि भगवान बड़ा दयालु है और कुछ पत्र-पुष्प से या मामूली लड्डुओं से खुश हो जाता है, वह बहुत सीधा है, चाहे जितनी उल्टी-सीधी करते रहो पर जैसे ही उसके चरणों में नतमस्तक हो जाओगे, जैसे ही उसके सामने जाकर गिरोगे, वह अपनी बांहों में उठा लेगा और सारे अधम कर्मों से मुक्त कर देगा।
यह हमारी गलती नहीं है, यही हमें जन्म से बताया गया है, सिखाया गया है। यही हमारे धार्मिक कहे जाने वाले अग्रजों ने भी हमें सिखाया है। वे खुद इसी रास्ते पर चलते आये हैं। इतना ही करके वे मानते हैं कि वे मुक्त हो गये हैं। भगवान ने उन्हें माफ कर दिया है। माफ ही नहीं किया है बल्कि कुछ भी करने का अभयदान भी दे दिया है। अब उनको न पाप छू सकेगा, न अपराध और न ही देश का कानून। यह हमारी भी नासमझी है और उनकी भी जो खुद को धर्म का ठेकेदार समझते आ रहे हैं। इसी नासमझी का वे फायदा भी उठा रहे हैं। उनके प्रवचनों में लाखों लोग जुटते हैं, इसे वे अपने ऊ पर भगवान की कृपा और अपनी ताकत मानने लगे हैं। इसी भ्रम में वे कुछ भी करने लगे हैं। इसी भ्रम में वे खुद को कानून और संविधान से भी परे मानने लगे हैं। धार्मिक अड्डों पर अब वह सब कुछ होने लगा है, जिसे आम, अदना और अनपढ़ आदमी भी कभी धर्म मानने को तैयार नहीं होगा।
क्या किसी साधु-संत को अपने आश्रम में किसी अपराधी को शरण देने का आश्वासन देना चाहिए? क्या रोज लोगों को नेकी और ईमानदारी का उपदेश देने वाले धर्मज्ञ को काले धन को सफेद करने का किसी को भी भरोसा देना चाहिए? क्या खुद को ईश्वर का प्रतिनिधि कहने वाले किसी भी व्यक्ति को ठगी, धूर्तता और हत्या के प्रयास में कहीं से भी संलग्न होना चाहिए? पर यह सब वे लोग कर रहे हैं, जिन्हें इस देश के लोग साधु कह कर पुकारते हैं। वे दूसरों को धर्म की क्या शिक्षा देंगे, जो खुद ही धर्म से च्युत हैं। वे गलत नहीं हैं क्योंकि वे जिस इरादे से इस क्षेत्र में आये थे, सिर्फ वही कर रहे हैं। भूल तो वे कर रहे हैं जो अपनी मेहनत, अपनी लगन और अपनी सामर्थ्य के बूते अपना रास्ता तय करने की जगह भगवान, भाग्य और भगवान के तथाकथित प्रतिनिधियों के सहारे पर बैठे रहते हैं। कहते हैं कि भगवान अगर है तो वह भी उन्हीं की मदद करता है, जो खुद की मदद करते हैं। वह नहीं चाहता कि कोई उस तक पहुंचने के लिए बिचौलिया पकड़े और उसे कमीशन खिलाये। कानून के राज्य में किसी को भी चाहे वह कितना भी जनास्था का पात्र क्यों न हो, अपराध करके भी बचे रहने की छूट नहीं मिल सकती।
यह हमारी गलती नहीं है, यही हमें जन्म से बताया गया है, सिखाया गया है। यही हमारे धार्मिक कहे जाने वाले अग्रजों ने भी हमें सिखाया है। वे खुद इसी रास्ते पर चलते आये हैं। इतना ही करके वे मानते हैं कि वे मुक्त हो गये हैं। भगवान ने उन्हें माफ कर दिया है। माफ ही नहीं किया है बल्कि कुछ भी करने का अभयदान भी दे दिया है। अब उनको न पाप छू सकेगा, न अपराध और न ही देश का कानून। यह हमारी भी नासमझी है और उनकी भी जो खुद को धर्म का ठेकेदार समझते आ रहे हैं। इसी नासमझी का वे फायदा भी उठा रहे हैं। उनके प्रवचनों में लाखों लोग जुटते हैं, इसे वे अपने ऊ पर भगवान की कृपा और अपनी ताकत मानने लगे हैं। इसी भ्रम में वे कुछ भी करने लगे हैं। इसी भ्रम में वे खुद को कानून और संविधान से भी परे मानने लगे हैं। धार्मिक अड्डों पर अब वह सब कुछ होने लगा है, जिसे आम, अदना और अनपढ़ आदमी भी कभी धर्म मानने को तैयार नहीं होगा।
क्या किसी साधु-संत को अपने आश्रम में किसी अपराधी को शरण देने का आश्वासन देना चाहिए? क्या रोज लोगों को नेकी और ईमानदारी का उपदेश देने वाले धर्मज्ञ को काले धन को सफेद करने का किसी को भी भरोसा देना चाहिए? क्या खुद को ईश्वर का प्रतिनिधि कहने वाले किसी भी व्यक्ति को ठगी, धूर्तता और हत्या के प्रयास में कहीं से भी संलग्न होना चाहिए? पर यह सब वे लोग कर रहे हैं, जिन्हें इस देश के लोग साधु कह कर पुकारते हैं। वे दूसरों को धर्म की क्या शिक्षा देंगे, जो खुद ही धर्म से च्युत हैं। वे गलत नहीं हैं क्योंकि वे जिस इरादे से इस क्षेत्र में आये थे, सिर्फ वही कर रहे हैं। भूल तो वे कर रहे हैं जो अपनी मेहनत, अपनी लगन और अपनी सामर्थ्य के बूते अपना रास्ता तय करने की जगह भगवान, भाग्य और भगवान के तथाकथित प्रतिनिधियों के सहारे पर बैठे रहते हैं। कहते हैं कि भगवान अगर है तो वह भी उन्हीं की मदद करता है, जो खुद की मदद करते हैं। वह नहीं चाहता कि कोई उस तक पहुंचने के लिए बिचौलिया पकड़े और उसे कमीशन खिलाये। कानून के राज्य में किसी को भी चाहे वह कितना भी जनास्था का पात्र क्यों न हो, अपराध करके भी बचे रहने की छूट नहीं मिल सकती।
लेबल:
samayiki
बुधवार, 8 सितंबर 2010
गद्यकाव्य के आचार्य रावी जी की याद में
यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आगरा की एक विशिष्ट विभूति, एक प्रखर रचनाकार और एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व से मुलाकात का अवसर मिला है। रावी जी को आगरा भले ही भुला चुका हो पर हिंदी साहित्य उन्हें और उनके योगदान को कभी विस्मृत नहीं कर पायेगा। मैं तब आज अखबार में था। उन्होंने मुझे फोन किया और पूछा कि अगर आप चाहें तो मैं आप के समाचारपत्र के लिये कुछ रोचक कथायें लिख सकता हूं। मैंने तत्काल हां कर दी और वे दो दिन के भीतर ही मेरे दफ्तर में प्रकट हो गये, अपनी कहानियों के साथ। चमत्कृत कर देने वाली भाषा, अद्भुत कल्पना शक्ति। मैंने उनकी कुछ कहानियां छापीं। तब मैं नहीं जानता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, यह पूरे कथाजगत में अपने प्रयोगों के लिये विख्यात साहित्यकार रावी जी हैं। धीरे-धीरे उनके बारे में और जानकारियां हुईं। वे साहित्य में तो प्रयोग कर ही रहे थे, उन्होंने जीवन में भी कई प्रयोग किये। वे कैलास के पास जंगलों में नयानगर नाम से एक मुक्तग्राम बसाना चाहते थे, जिसकी शुरुआत भी उन्होंने अपने जीवनकाल में कर दी थी, पर उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। नयानगर है तो मगर रावी की कल्पना वाला नहीं। वे कुछ समय और रह पाते तो शायद अपना सोचा कर पाते।
सोलह वर्ष बीत गये लेकिन उनकी आत्मा उनके साहित्य-शरीर में आज भी है। लघुकथा को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने का श्रेय रावी जी को ही है। गद्यकाव्य को वे अलग विधा मानते थे और इस दिशा में उन्होंने बहुत ही उल्लेखनीय काम किया। उन्होंने गद्य की हर विधा में लिखा और बेजोड़ लिखा। उन जैसा सुगठित गद्य लिखने वाला दिखता नहीं, शायद कोई है भी नहीं। उनके किसी पैराग्राफ में एक शब्द भी कम करना किसी कुशल संपादक के लिए भी असंभव सी बात है। आगरा के लेखक सत्य प्रकाश गोस्वामी बताते हैं कि एक बार उन्हें गद्यकाव्य की परिभाषा लिखने की जरूरत पड़ी। कई बड़े-बड़े गद्य काव्यकारों से सम्पर्क किया गया। किसी ने एक पृष्ठ तो किसी ने एक पैराग्राफ की परिभाषा लिखकर दी। रावी जी ने जो परिभाषा लिखकर दी, वह अद्भुत थी। इससे उनके रचनाकार की सामर्थ्य समझी जा सकती है। उन्होंने लिखा....पद्य की गतिमयता से मुक्त ओर उसकी रसमयता से युक्त शब्दीकरण गद्यकाव्य है।
रावी ने गद्य की एक नई विधा गोष्ठी को भी जन्म दिया है। उनकी पुस्तक वीरभद्र की गोष्ठी भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित की है। शुभ्रा उनका उत्कृष्ट गद्यकाव्य है। ज्ञान मंडल काशी से प्रकाशित साहित्य कोश में भी रावीजी का परिचय छपा है। उनके लिखे नाटक प्रबुद्ध सिद्धार्थ के संवादों में देशकाल का विशेष ध्यान रखा गया है। इस नाटक का एक पात्र आंखों पर पट्टी बांधने के लिए परकीय शब्द रूमाल की जगह करचीर शब्द का प्रयोग करता है। सिर के नीचे तकिया न लगाकर शिरोधान लगाता है। बलात्कार की तरह नया शब्द छलात्कार रावी जी ने दिया है। इसी तरह प्रतीतिका शब्द भी रावीजी ने दिया है। वे साहित्यिक शब्दों के निर्माता भी थे। रावी जी का लिखा नाटक प्रबुद्ध सिद्धार्थ 16-17 वर्ष तक यूपी बोर्ड इलाहाबाद की इंटरमीडिएट कक्षाओं में पढ़ाया जाता रहा। विडम्बना यह कि इस नाटक की पाण्डुलिपि उन्होंने मात्र 500 रुपये में बेची थी।
रावीजी साहित्यिक संत थे। उनके जीवन में पैसे का उपयोग था, पर उसका मूल्य नहीं था। उन जैसा संतोषी साहित्यकार मुश्किल से ही मिलेगा। उनके जीवन में बाहर विकट अभाव और भीतर आनन्द ही आनन्द था। उनमें ऊपर तक इतना प्रेम भरा था कि उनके विरोधी को भी उनसे मिले बिना चैन नहीं पड़ता था। रावीजी लघुकथाओं के पितामह हैं। कहानी का बाना पहनाकर वे अपनी लघुकथाओं में एक विशिष्ट जीवन संदेश देते हैं। मेरे कथागुरु का कहना है- इस शीर्षक से उनकी लघुकथाएं भारतीय ज्ञान पीठ ने दो भागों में प्रकाशित की हैं। रावीजी सन् 47 से ही कैलास में रहने लगे थे। उन्हीं के कारण विख्यात साहित्यकार केएम मुंशी, गवर्नर सत्य नारायण रेड्डी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, विष्णु प्रभाकर आदि कई लोग कैलास आये थे। रावीजी कैलास में कुछ दिन श्यामकुटी में रहे थे, फिर स्वनिर्मित आवास नया नगर कैलास में। वहीं रहते हुए हिन्दी जगत को अपना साहित्य शरीर सौंप कर 1994 में उन्होंने अपना भौतिक शरीर छोड़ा।
मैत्रीक्लब के माध्यम से उन्होंने भारत भर के साहित्यकारों और सामान्य जनों का एक वृहत परिवार बनाया। इतना ही नहीं, हृदयों की हाट वार्ता के द्वारा उन्होंने भारत की यात्रा की और टूटे हृदयों को जोड़ा। नये विज्ञापन मासिक पत्र द्वारा मन के विज्ञापनों को प्रकाशित कर रावीजी ने पत्रकारिता जगत को भी एक अनूठी देन सौंपी है। इतना ही नहीं, पूर्णत: अशुद्ध नाम कैलाश का बहिष्कार कर उन्होंने शुद्ध नाम कैलास का बोध पढ़े-लिखों को भी कराया।
(सत्यप्रकाश गोस्वामी, 31/69 कटघर, आगरा द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी को समाहित करते हुए, गोस्वामी जी का फोन नम्बर है.08006386473)
सोलह वर्ष बीत गये लेकिन उनकी आत्मा उनके साहित्य-शरीर में आज भी है। लघुकथा को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने का श्रेय रावी जी को ही है। गद्यकाव्य को वे अलग विधा मानते थे और इस दिशा में उन्होंने बहुत ही उल्लेखनीय काम किया। उन्होंने गद्य की हर विधा में लिखा और बेजोड़ लिखा। उन जैसा सुगठित गद्य लिखने वाला दिखता नहीं, शायद कोई है भी नहीं। उनके किसी पैराग्राफ में एक शब्द भी कम करना किसी कुशल संपादक के लिए भी असंभव सी बात है। आगरा के लेखक सत्य प्रकाश गोस्वामी बताते हैं कि एक बार उन्हें गद्यकाव्य की परिभाषा लिखने की जरूरत पड़ी। कई बड़े-बड़े गद्य काव्यकारों से सम्पर्क किया गया। किसी ने एक पृष्ठ तो किसी ने एक पैराग्राफ की परिभाषा लिखकर दी। रावी जी ने जो परिभाषा लिखकर दी, वह अद्भुत थी। इससे उनके रचनाकार की सामर्थ्य समझी जा सकती है। उन्होंने लिखा....पद्य की गतिमयता से मुक्त ओर उसकी रसमयता से युक्त शब्दीकरण गद्यकाव्य है।
रावी ने गद्य की एक नई विधा गोष्ठी को भी जन्म दिया है। उनकी पुस्तक वीरभद्र की गोष्ठी भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित की है। शुभ्रा उनका उत्कृष्ट गद्यकाव्य है। ज्ञान मंडल काशी से प्रकाशित साहित्य कोश में भी रावीजी का परिचय छपा है। उनके लिखे नाटक प्रबुद्ध सिद्धार्थ के संवादों में देशकाल का विशेष ध्यान रखा गया है। इस नाटक का एक पात्र आंखों पर पट्टी बांधने के लिए परकीय शब्द रूमाल की जगह करचीर शब्द का प्रयोग करता है। सिर के नीचे तकिया न लगाकर शिरोधान लगाता है। बलात्कार की तरह नया शब्द छलात्कार रावी जी ने दिया है। इसी तरह प्रतीतिका शब्द भी रावीजी ने दिया है। वे साहित्यिक शब्दों के निर्माता भी थे। रावी जी का लिखा नाटक प्रबुद्ध सिद्धार्थ 16-17 वर्ष तक यूपी बोर्ड इलाहाबाद की इंटरमीडिएट कक्षाओं में पढ़ाया जाता रहा। विडम्बना यह कि इस नाटक की पाण्डुलिपि उन्होंने मात्र 500 रुपये में बेची थी।
रावीजी साहित्यिक संत थे। उनके जीवन में पैसे का उपयोग था, पर उसका मूल्य नहीं था। उन जैसा संतोषी साहित्यकार मुश्किल से ही मिलेगा। उनके जीवन में बाहर विकट अभाव और भीतर आनन्द ही आनन्द था। उनमें ऊपर तक इतना प्रेम भरा था कि उनके विरोधी को भी उनसे मिले बिना चैन नहीं पड़ता था। रावीजी लघुकथाओं के पितामह हैं। कहानी का बाना पहनाकर वे अपनी लघुकथाओं में एक विशिष्ट जीवन संदेश देते हैं। मेरे कथागुरु का कहना है- इस शीर्षक से उनकी लघुकथाएं भारतीय ज्ञान पीठ ने दो भागों में प्रकाशित की हैं। रावीजी सन् 47 से ही कैलास में रहने लगे थे। उन्हीं के कारण विख्यात साहित्यकार केएम मुंशी, गवर्नर सत्य नारायण रेड्डी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, विष्णु प्रभाकर आदि कई लोग कैलास आये थे। रावीजी कैलास में कुछ दिन श्यामकुटी में रहे थे, फिर स्वनिर्मित आवास नया नगर कैलास में। वहीं रहते हुए हिन्दी जगत को अपना साहित्य शरीर सौंप कर 1994 में उन्होंने अपना भौतिक शरीर छोड़ा।
मैत्रीक्लब के माध्यम से उन्होंने भारत भर के साहित्यकारों और सामान्य जनों का एक वृहत परिवार बनाया। इतना ही नहीं, हृदयों की हाट वार्ता के द्वारा उन्होंने भारत की यात्रा की और टूटे हृदयों को जोड़ा। नये विज्ञापन मासिक पत्र द्वारा मन के विज्ञापनों को प्रकाशित कर रावीजी ने पत्रकारिता जगत को भी एक अनूठी देन सौंपी है। इतना ही नहीं, पूर्णत: अशुद्ध नाम कैलाश का बहिष्कार कर उन्होंने शुद्ध नाम कैलास का बोध पढ़े-लिखों को भी कराया।
(सत्यप्रकाश गोस्वामी, 31/69 कटघर, आगरा द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी को समाहित करते हुए, गोस्वामी जी का फोन नम्बर है.08006386473)
लेबल:
vishesh
ऐसी हड़ताल का औचित्य क्या?
बढ़ती महंगाई, श्रम कानूनों का उल्लंघन और सरकारी कंपनियों से विनिवेश जैसे मुद्दों को लेकर देश भर में आठ ट्रेड यूनियनों की हड़ताल का व्यापक असर देखा गया। खबर है कि कई इलाकों में हड़्ताल की वजह से 50 से भी ज्यादा मरीजों की सही समय पर इलाज न मिलने की वजह से मौत हो गयी। वामपंथी गढ़ों में सरकारें भी एक तरह से हड़ताल में शामिल रही। जाहिर है जैसा कि होता आया है, इस हड़ताल से भी बहुत नुकसान हुआ। बैंकों में काम-काज लगभग ठप हो जाने से अरबों के लेन-देन पर असर पड़ा। ट्रेनों के परिचालन और उड़ानों पर भी प्रभाव पड़ा। यह ठीक बात है कि हड़ताल किसी भी नीतिगत गलती के विरोध का एक मान्य तरीका है और संविधान ने भी मजदूरों को हड़ताल करने का अधिकार दे रखा है लेकिन क्या कोई अपने अधिकार के प्रयोग में दूसरों के अधिकार का अतिक्रमण करे, इसकी छूट भी कानून और संविधान ने दे रखी है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार की उदासीनता से महंगाई बहुत बढ़ गयी है, गरीब जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके लिए सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह जनता की परेशानियां कम करेगी, उसकी दिक्कतें सुलझायेगी, बढ़ायेगी नहीं। इसका विरोध होना ही चाहिए पर क्या ऐसे विरोध की इजाजत होनी चाहिए जो लोगों को कठिनाइयों में डाल दे, जो लोगों की परेशानियां और बढ़ा दे, जो देश को नुकसान पहुंचाये। यह मुद्दा कई बार जेरे-बहस रहा है। काम-काज बंद कराने वाली हड़तालों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने रोक भी लगायी है। जिससे दूसरों के हक बाधित होते हों, उस रास्ते का समर्थन कोई भी नहीं कर सकता। किसी को पैसे की जरूरत है, नितांत संकट की स्थिति है, पैसा नहीं मिलने पर उसको बड़ी क्षति हो सकती है, पर हड़ताल हो गयी है, बैंक बंद हैं, वह क्या करे। किसी के परिवार का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार है, अगर वह समय से अस्पताल नहीं पहुंचा तो उसकी जान जा सकती है, परिजन बेचैन हैं, बसें रुकी पड़ीं हैं, ट्रेनें भी प्रभावित हैं, कैसे ले जायें, क्या करें, हड़ताल के कारण वे विवश हैं।
हड़ताल करने वालों को ऐसे लोगों की पीड़ा से क्या कोई मतलब नहीं है? यह हड़ताल अगर उनके दुख को बढ़ाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या नैतिक रूप से हड़ताली संगठनों और उनके नेताओं को इन बातों पर भी गौर करने का दायित्व नहीं आ जाता है? अगर आता है तो उन्हें विरोध का ऐसा वैकल्पिक रास्ता तलाशना चाहिए, जो उनकी आवाज तो बुलंद तरीके से सरकार तक पहुंचाये लेकिन किसी भी दूसरे नागरिक के लिए परेशानी का सबब न बने। इन बातों पर गहराई से गौर किया जाना चाहिए। हड़ताल का असर सबसे ज्यादा वामपंथियों के गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल में देखा गया। कर्नाटक और तमिलनाडु में कोई असर नहीं दिखा। बैंकिंग सेक्टर में कामकाज नहीं हुआ। हड़ताल में करीब 6 करोड़ कर्मचारी शामिल हुए। यह नुकसान कौन भरे?
इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार की उदासीनता से महंगाई बहुत बढ़ गयी है, गरीब जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके लिए सरकार पूरी तरह जिम्मेदार है। सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह जनता की परेशानियां कम करेगी, उसकी दिक्कतें सुलझायेगी, बढ़ायेगी नहीं। इसका विरोध होना ही चाहिए पर क्या ऐसे विरोध की इजाजत होनी चाहिए जो लोगों को कठिनाइयों में डाल दे, जो लोगों की परेशानियां और बढ़ा दे, जो देश को नुकसान पहुंचाये। यह मुद्दा कई बार जेरे-बहस रहा है। काम-काज बंद कराने वाली हड़तालों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने रोक भी लगायी है। जिससे दूसरों के हक बाधित होते हों, उस रास्ते का समर्थन कोई भी नहीं कर सकता। किसी को पैसे की जरूरत है, नितांत संकट की स्थिति है, पैसा नहीं मिलने पर उसको बड़ी क्षति हो सकती है, पर हड़ताल हो गयी है, बैंक बंद हैं, वह क्या करे। किसी के परिवार का कोई सदस्य गंभीर रूप से बीमार है, अगर वह समय से अस्पताल नहीं पहुंचा तो उसकी जान जा सकती है, परिजन बेचैन हैं, बसें रुकी पड़ीं हैं, ट्रेनें भी प्रभावित हैं, कैसे ले जायें, क्या करें, हड़ताल के कारण वे विवश हैं।
हड़ताल करने वालों को ऐसे लोगों की पीड़ा से क्या कोई मतलब नहीं है? यह हड़ताल अगर उनके दुख को बढ़ाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या नैतिक रूप से हड़ताली संगठनों और उनके नेताओं को इन बातों पर भी गौर करने का दायित्व नहीं आ जाता है? अगर आता है तो उन्हें विरोध का ऐसा वैकल्पिक रास्ता तलाशना चाहिए, जो उनकी आवाज तो बुलंद तरीके से सरकार तक पहुंचाये लेकिन किसी भी दूसरे नागरिक के लिए परेशानी का सबब न बने। इन बातों पर गहराई से गौर किया जाना चाहिए। हड़ताल का असर सबसे ज्यादा वामपंथियों के गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल में देखा गया। कर्नाटक और तमिलनाडु में कोई असर नहीं दिखा। बैंकिंग सेक्टर में कामकाज नहीं हुआ। हड़ताल में करीब 6 करोड़ कर्मचारी शामिल हुए। यह नुकसान कौन भरे?
लेबल:
samayiki
रविवार, 5 सितंबर 2010
‘ग्रीन हंट’ के बजाए डेवलपमेंट की तोप
वीरेन्द्र सेंगर की कलम से नक्सली हिंसा केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। इस चुनौती से मुकाबले के लिए ‘ग्रीन हंट’ जैसे आपरेशन जरूरी हैं या पिछड़े और आदिवासी बाहुल्य इलाकों में डेवलमेंट की ‘डोज’? इस मुद्दे पर उच्चस्तर पर सरकार में मंथन तेज हो गया है। इसी राजनीतिक ऊहापोह में पांच राज्यों में चल रहा नक्सल विरोधी आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ भी आधे अधूरे मन से चलाया जा रहा है। ऐसे में जाहिर है इसके परिणाम बहुत कारगर नहीं हुए। सरकार ने भी मान लिया है कि गोली का जवाब, गोली से देने के बजाए नक्सलियों की मजबूत जड़ें कमजोर करना ज्यादा जरूरी है। इसीलिए सरकार 35 जिलों के लिए 13,742 करोड़ रुपये का विशेष आर्थिक विकास पैकेज लाने जा रही है।
केंद्रीय योजना आयोग ने नक्सल प्रभावित राज्यों के चुनिंदा 35 जिलों में खास विकास की योजना तैयार कर ली है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी है। उम्मीद की जा रही है कि 15 सितंबर के आसपास इस पर कैबिनेट की मुहर लग जाएगी। अभी यह तय नहीं हो पाया कि इस योजना के लिए 35 जिलों का चुनाव किस आधार पर हो? आयोग ने इसके लिए एक गाइडलाइन बनाकर दी है। लेकिन, मुश्किल यह है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दबाव बढ़ाए हुए हैं कि उनके राज्यों के ज्यादा से ज्यादा अदिवासी बाहुल्य जिले आईएपी (एकीकृत कार्ययोजना) के तहत ले लिए जाएं।
केंद्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस योजना के लिए खास दिलचस्पी ले रहे हैं। उन्हीं की पहल के चलते योजना आयोग की एक विशेष समिति ने आईएपी की पूरी रूपरेखा तैयार की है। इसके तहत योजना में शामिल किए गए जिलों में सड़क, बिजली, स्कूल व अस्पतालों जैसी योजनाओं में विशेष ध्यान दिया जाएगा। मोंटेक सिंह ने यह सिफारिश की है कि इस कार्ययोजना की निगरानी दो स्तरों पर हो। राज्य भी निगरानी करें और केंद्र की एक अधिकार प्राप्त संस्था भी, इस पर खास नजर रखे। इसी के साथ व्यवस्था बनाई जाए कि ब्लाक और ग्राम स्तर पर चुने हुए प्रतिनिधि भी इसमें हिस्सेदारी करें।
योजना आयोग के सूत्रों के अनुसार, यह योजना चार सालों के लिए होगी। पहले दो सालों में जोर इस बात पर रहेगा कि कई स्तरों पर जन जागरूकता और विश्वास बहाली का अभियान चले। आदिवासी इलाकों में स्कूल और अस्पताल खोले जाएं। यह भी ध्यान रहे कि अस्पतालों में दवाएं भी पहुंचे और कर्मचारी भी तैनात रहें। रणनीति यह रहे कि हर स्तर पर स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री, कपिल सिब्बल ने यहां शनिवार को कहा है कि उनका मंत्रालय सुदूर पिछड़े इलाकों में 100 केंद्रीय विद्यालय खोलने की योजना बना रहा है। उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में कहा है कि इस बारे में वे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से विस्तृत चर्चा करने वाले हैं।
पिछले दिनों यहां राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने आर्थिक पैकेज पर खास जोर दिया था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि एकीकृत कार्य योजना के तहत केंद्र की भी निगरानी रहे, इसमें कोई ऐतराज नहीं हो सकता है। लेकिन, इतना जरूर हो कि कहीं राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ में राज्य सरकारों की भूमिका को नकार न दिया जाए। ऐसी कोशिश की गई, तो योजना की सफलता पर कई शंकाएं खड़ी जा जाएंगी।
आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ में तमाम आधुनिक सशस्त्र संसाधन झोंक देने के बाद भी नक्सली गुट पस्त नहीं हुए हैं। ऐसे में यह बहस तेज हुई है कि नक्सली हिंसा से निपटने का तरीका क्या गोली-बारूद और फौज ही है? कांग्रेस नेतृत्व में भी शीर्ष स्तर पर इस मुद्दे पर मतभेद गहराए हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने चिदंबरम की रणनीति की खिलाफत शुरू कर दी है। ऐसे नेताओं में सबसे अग्रणी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, दिग्विजय सिंह हैं। उन्होंने तो मीडिया में एक लेख लिखकर चिदंबरम के आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ की तीखी आलोचना कर डाली थी। इसके बाद मणिशंकर अय्यर से लेकर जयराम रमेश जैसे कई चर्चित नेताओं ने गृहमंत्री की रणनीति पर शंकाएं जाहिर कीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने हाल में कहा है कि नक्सली भी हमारे भाई-बहन हैं। सरकार उनसे हर तरह का संवाद करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री की इस ताजा टिप्पणी के बाद चिदंबरम ने भी अपने रुख में नरमी के संकेत दिए हैं। यहां राजनीतिक हल्कों में जाना जा रहा है कि आदिवासियों को विश्वास में लेने के लिए केंद्र ने अब वाकई में रणनीति बदल दी है।
केंद्रीय योजना आयोग ने नक्सल प्रभावित राज्यों के चुनिंदा 35 जिलों में खास विकास की योजना तैयार कर ली है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी है। उम्मीद की जा रही है कि 15 सितंबर के आसपास इस पर कैबिनेट की मुहर लग जाएगी। अभी यह तय नहीं हो पाया कि इस योजना के लिए 35 जिलों का चुनाव किस आधार पर हो? आयोग ने इसके लिए एक गाइडलाइन बनाकर दी है। लेकिन, मुश्किल यह है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दबाव बढ़ाए हुए हैं कि उनके राज्यों के ज्यादा से ज्यादा अदिवासी बाहुल्य जिले आईएपी (एकीकृत कार्ययोजना) के तहत ले लिए जाएं।
केंद्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया इस योजना के लिए खास दिलचस्पी ले रहे हैं। उन्हीं की पहल के चलते योजना आयोग की एक विशेष समिति ने आईएपी की पूरी रूपरेखा तैयार की है। इसके तहत योजना में शामिल किए गए जिलों में सड़क, बिजली, स्कूल व अस्पतालों जैसी योजनाओं में विशेष ध्यान दिया जाएगा। मोंटेक सिंह ने यह सिफारिश की है कि इस कार्ययोजना की निगरानी दो स्तरों पर हो। राज्य भी निगरानी करें और केंद्र की एक अधिकार प्राप्त संस्था भी, इस पर खास नजर रखे। इसी के साथ व्यवस्था बनाई जाए कि ब्लाक और ग्राम स्तर पर चुने हुए प्रतिनिधि भी इसमें हिस्सेदारी करें।
योजना आयोग के सूत्रों के अनुसार, यह योजना चार सालों के लिए होगी। पहले दो सालों में जोर इस बात पर रहेगा कि कई स्तरों पर जन जागरूकता और विश्वास बहाली का अभियान चले। आदिवासी इलाकों में स्कूल और अस्पताल खोले जाएं। यह भी ध्यान रहे कि अस्पतालों में दवाएं भी पहुंचे और कर्मचारी भी तैनात रहें। रणनीति यह रहे कि हर स्तर पर स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री, कपिल सिब्बल ने यहां शनिवार को कहा है कि उनका मंत्रालय सुदूर पिछड़े इलाकों में 100 केंद्रीय विद्यालय खोलने की योजना बना रहा है। उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में कहा है कि इस बारे में वे प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से विस्तृत चर्चा करने वाले हैं।
पिछले दिनों यहां राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने आर्थिक पैकेज पर खास जोर दिया था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि एकीकृत कार्य योजना के तहत केंद्र की भी निगरानी रहे, इसमें कोई ऐतराज नहीं हो सकता है। लेकिन, इतना जरूर हो कि कहीं राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ में राज्य सरकारों की भूमिका को नकार न दिया जाए। ऐसी कोशिश की गई, तो योजना की सफलता पर कई शंकाएं खड़ी जा जाएंगी।
आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ में तमाम आधुनिक सशस्त्र संसाधन झोंक देने के बाद भी नक्सली गुट पस्त नहीं हुए हैं। ऐसे में यह बहस तेज हुई है कि नक्सली हिंसा से निपटने का तरीका क्या गोली-बारूद और फौज ही है? कांग्रेस नेतृत्व में भी शीर्ष स्तर पर इस मुद्दे पर मतभेद गहराए हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने चिदंबरम की रणनीति की खिलाफत शुरू कर दी है। ऐसे नेताओं में सबसे अग्रणी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव, दिग्विजय सिंह हैं। उन्होंने तो मीडिया में एक लेख लिखकर चिदंबरम के आपरेशन ‘ग्रीन हंट’ की तीखी आलोचना कर डाली थी। इसके बाद मणिशंकर अय्यर से लेकर जयराम रमेश जैसे कई चर्चित नेताओं ने गृहमंत्री की रणनीति पर शंकाएं जाहिर कीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने हाल में कहा है कि नक्सली भी हमारे भाई-बहन हैं। सरकार उनसे हर तरह का संवाद करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री की इस ताजा टिप्पणी के बाद चिदंबरम ने भी अपने रुख में नरमी के संकेत दिए हैं। यहां राजनीतिक हल्कों में जाना जा रहा है कि आदिवासियों को विश्वास में लेने के लिए केंद्र ने अब वाकई में रणनीति बदल दी है।
लेबल:
samayiki
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
जन्माष्ट्मी शाम पांच बजे तक मना लीजिये
बांग्लादेश का बेतुका फरमान
बांग्लादेश भी अब सयाना होता दिखने लगा है। कुछ-कुछ पाकिस्तान की तरह। हालांकि अभी वहां हिंदुओं की वैसी दुर्दशा नहीं है, जैसी पाकिस्तान में है लेकिन वह भी उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। उसे तनिक भी इस बात का खयाल नहीं है कि अगर हिंदुस्तान ने मदद न की होती तो उसका वजूद भी नहीं होता। इस छोटे से देश में कुल आबादी का दस फीसदी हिंदू है। यह बहुत ही प्रसन्नता की बात रही है कि अब तक बांग्लादेशी हिंदू अपने त्योहार भारी उल्लास से मनाते आ रहे हैं। कोई रोक-टोक नहीं, कोई व्यवधान नहीं। वहां हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बांग्ला भाषा एक मजबूत पुल का काम करती आयी है। बातचीत और व्यवहार से कोई इन दोनों को अलग-अलग पहचान नहीं सकता। मुसलमान हिंदुओं के त्योहारों में और हिंदू मुसलमानों के पर्वों में पूरे उत्साह से शिरकत करते रहे हैं। इस सांप्रदायिक सौमनस्य को पलीता लगाने की कई बार कोशिशें की गयीं, मगर कामयाब नहीं हुईं।
पर पहली बार बांग्लादेश के हिंदुओं के दिल को ठेस पहुंचायी गयी है। यह काम किसी कट्टरवादी तंजीम ने किया होता तो ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि तब हिंदू-मुस्लिम दोनों मिलकर उसका मुकाबला कर लेते पर दुर्भाग्य यह है कि यह काम सरकार के बड़े ओहदे पर बैठी एक महिला मंत्री ने किया है। बांग्लादेश की गृह मंत्री सहारा खातून ने देश के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से कहा है कि वे भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को 'शांतिपूर्वक' मनायें और रोजा खुलने के समय, यानी शाम पांच बजे तक जन्माष्टमी मना लें। अब बताइये, जब भगवान का जन्म ही 12 बजे रात को होता है तो पांच बजे शाम तक हिंदू अपना उत्सव कैसे मना लेंगे। क्या ये तथ्य मोहतरमा खातून को नहीं मालूम है। कोई पहली बार तो बांग्लादेश में जन्माष्टमी मनायी नहीं जा रही है और ऐसा भी नहीं है कि रमजान के महीने में यह त्योहार पहली बार पड़ा हो।
पहले भी कई बार रोजे के दिनों में कृष्ण जनमोत्सव मनाया जा चुका है। वह भी पूरे उत्साह से, गाजे-बाजे के साथ। वहां के किसी नागरिक को कभी बुरा नहीं लगा, किसी ने कभी किसी तरह का एतराज नहीं किया। फिर अचानक इस बार क्या हो गया, कौन सी आफत आ पड़ी कि सरकार को निहायत बेतुका फरमान जारी करना पड़ा। इस आदेश पर भारत में नाराजगी है, बांग्लादेश में भी लोग खुश नहीं हैं। गृह मंत्री की सलाह मानना हिंदुओं के लिए आसान नहीं होगा। गृह मंत्री के बयान की हर ओर आलोचना हो रही है। बांग्ला मीडिया ने इसे भेदभाव भरा बयान कहा है। 'न्यू एज' अखबार ने भी इस मुद्दे पर सहारा खातून की खिंचाई की है। अख़बार के मुताबिक बांग्लादेश में हिंदुओं पर यह पाबंदी भेदभावपूर्ण कार्रवाई है। इसे रद्द किया जाना चाहिए।
बांग्लादेश भी अब सयाना होता दिखने लगा है। कुछ-कुछ पाकिस्तान की तरह। हालांकि अभी वहां हिंदुओं की वैसी दुर्दशा नहीं है, जैसी पाकिस्तान में है लेकिन वह भी उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। उसे तनिक भी इस बात का खयाल नहीं है कि अगर हिंदुस्तान ने मदद न की होती तो उसका वजूद भी नहीं होता। इस छोटे से देश में कुल आबादी का दस फीसदी हिंदू है। यह बहुत ही प्रसन्नता की बात रही है कि अब तक बांग्लादेशी हिंदू अपने त्योहार भारी उल्लास से मनाते आ रहे हैं। कोई रोक-टोक नहीं, कोई व्यवधान नहीं। वहां हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बांग्ला भाषा एक मजबूत पुल का काम करती आयी है। बातचीत और व्यवहार से कोई इन दोनों को अलग-अलग पहचान नहीं सकता। मुसलमान हिंदुओं के त्योहारों में और हिंदू मुसलमानों के पर्वों में पूरे उत्साह से शिरकत करते रहे हैं। इस सांप्रदायिक सौमनस्य को पलीता लगाने की कई बार कोशिशें की गयीं, मगर कामयाब नहीं हुईं।
पर पहली बार बांग्लादेश के हिंदुओं के दिल को ठेस पहुंचायी गयी है। यह काम किसी कट्टरवादी तंजीम ने किया होता तो ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि तब हिंदू-मुस्लिम दोनों मिलकर उसका मुकाबला कर लेते पर दुर्भाग्य यह है कि यह काम सरकार के बड़े ओहदे पर बैठी एक महिला मंत्री ने किया है। बांग्लादेश की गृह मंत्री सहारा खातून ने देश के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से कहा है कि वे भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव को 'शांतिपूर्वक' मनायें और रोजा खुलने के समय, यानी शाम पांच बजे तक जन्माष्टमी मना लें। अब बताइये, जब भगवान का जन्म ही 12 बजे रात को होता है तो पांच बजे शाम तक हिंदू अपना उत्सव कैसे मना लेंगे। क्या ये तथ्य मोहतरमा खातून को नहीं मालूम है। कोई पहली बार तो बांग्लादेश में जन्माष्टमी मनायी नहीं जा रही है और ऐसा भी नहीं है कि रमजान के महीने में यह त्योहार पहली बार पड़ा हो।
पहले भी कई बार रोजे के दिनों में कृष्ण जनमोत्सव मनाया जा चुका है। वह भी पूरे उत्साह से, गाजे-बाजे के साथ। वहां के किसी नागरिक को कभी बुरा नहीं लगा, किसी ने कभी किसी तरह का एतराज नहीं किया। फिर अचानक इस बार क्या हो गया, कौन सी आफत आ पड़ी कि सरकार को निहायत बेतुका फरमान जारी करना पड़ा। इस आदेश पर भारत में नाराजगी है, बांग्लादेश में भी लोग खुश नहीं हैं। गृह मंत्री की सलाह मानना हिंदुओं के लिए आसान नहीं होगा। गृह मंत्री के बयान की हर ओर आलोचना हो रही है। बांग्ला मीडिया ने इसे भेदभाव भरा बयान कहा है। 'न्यू एज' अखबार ने भी इस मुद्दे पर सहारा खातून की खिंचाई की है। अख़बार के मुताबिक बांग्लादेश में हिंदुओं पर यह पाबंदी भेदभावपूर्ण कार्रवाई है। इसे रद्द किया जाना चाहिए।
लेबल:
samayiki
सदस्यता लें
संदेश (Atom)