बुधवार, 8 सितंबर 2010

गद्यकाव्य के आचार्य रावी जी की याद में

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आगरा की एक विशिष्ट विभूति, एक प्रखर रचनाकार और एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व से मुलाकात का अवसर मिला है। रावी जी को आगरा भले ही भुला चुका हो पर हिंदी साहित्य उन्हें और उनके योगदान को कभी विस्मृत नहीं कर पायेगा। मैं तब आज अखबार में था। उन्होंने मुझे फोन किया और पूछा कि अगर आप चाहें तो मैं आप के समाचारपत्र के लिये कुछ रोचक कथायें लिख सकता हूं। मैंने तत्काल हां कर दी और वे दो दिन के भीतर ही मेरे दफ्तर में प्रकट हो गये, अपनी कहानियों के साथ। चमत्कृत कर देने वाली भाषा, अद्भुत कल्पना शक्ति। मैंने उनकी कुछ कहानियां छापीं। तब मैं नहीं जानता था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, यह पूरे कथाजगत में अपने प्रयोगों के लिये विख्यात साहित्यकार रावी जी हैं। धीरे-धीरे उनके बारे में और जानकारियां हुईं। वे साहित्य में तो प्रयोग कर ही रहे थे, उन्होंने जीवन में भी कई प्रयोग किये। वे  कैलास के पास जंगलों में नयानगर नाम से एक मुक्तग्राम बसाना चाहते थे, जिसकी शुरुआत भी उन्होंने अपने जीवनकाल में कर दी थी, पर उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। नयानगर है तो मगर रावी की कल्पना वाला नहीं। वे कुछ समय और रह पाते तो शायद अपना सोचा कर पाते।

सोलह वर्ष बीत गये लेकिन उनकी आत्मा उनके साहित्य-शरीर में आज भी है। लघुकथा को एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने का श्रेय रावी जी को ही है। गद्यकाव्य को वे अलग विधा मानते थे और इस दिशा में उन्होंने बहुत ही उल्लेखनीय काम किया। उन्होंने गद्य की हर विधा में लिखा और बेजोड़ लिखा। उन जैसा सुगठित गद्य लिखने वाला दिखता नहीं, शायद कोई है भी नहीं। उनके किसी पैराग्राफ में एक शब्द भी कम करना किसी कुशल संपादक के लिए भी असंभव सी बात है। आगरा के लेखक सत्य प्रकाश गोस्वामी बताते हैं कि  एक बार उन्हें गद्यकाव्य की परिभाषा लिखने की जरूरत पड़ी। कई  बड़े-बड़े गद्य काव्यकारों से   सम्पर्क किया गया। किसी ने एक पृष्ठ तो किसी ने  एक पैराग्राफ की परिभाषा लिखकर दी। रावी जी ने जो परिभाषा लिखकर दी, वह अद्भुत थी। इससे उनके रचनाकार की सामर्थ्य समझी जा सकती है। उन्होंने लिखा....पद्य की गतिमयता से मुक्त ओर उसकी रसमयता से युक्त शब्दीकरण गद्यकाव्य है।

रावी ने गद्य की एक नई विधा गोष्ठी को भी जन्म दिया है। उनकी पुस्तक वीरभद्र की गोष्ठी भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित की है। शुभ्रा उनका उत्कृष्ट गद्यकाव्य है। ज्ञान मंडल काशी से प्रकाशित साहित्य कोश में भी रावीजी का परिचय छपा है। उनके लिखे नाटक प्रबुद्ध सिद्धार्थ के संवादों में देशकाल का विशेष ध्यान रखा गया है। इस नाटक का एक पात्र आंखों पर पट्टी बांधने के लिए परकीय शब्द रूमाल की जगह करचीर शब्द का प्रयोग करता है। सिर के नीचे तकिया न लगाकर शिरोधान लगाता है। बलात्कार की तरह नया शब्द छलात्कार रावी जी ने दिया है। इसी तरह प्रतीतिका शब्द भी रावीजी ने दिया है। वे साहित्यिक शब्दों के निर्माता भी थे। रावी जी का लिखा  नाटक प्रबुद्ध सिद्धार्थ 16-17 वर्ष तक यूपी बोर्ड इलाहाबाद की इंटरमीडिएट कक्षाओं में पढ़ाया जाता रहा। विडम्बना यह कि इस नाटक की पाण्डुलिपि उन्होंने मात्र 500 रुपये में बेची थी।

रावीजी साहित्यिक संत थे। उनके जीवन में पैसे का उपयोग था, पर उसका मूल्य नहीं था। उन जैसा संतोषी साहित्यकार मुश्किल से ही मिलेगा। उनके जीवन में बाहर विकट अभाव और भीतर आनन्द ही आनन्द था। उनमें ऊपर तक इतना प्रेम भरा था कि उनके विरोधी को भी उनसे मिले बिना चैन नहीं पड़ता था। रावीजी लघुकथाओं के पितामह हैं। कहानी का बाना पहनाकर वे अपनी लघुकथाओं में एक विशिष्ट जीवन संदेश देते हैं। मेरे कथागुरु का कहना है- इस शीर्षक से उनकी लघुकथाएं भारतीय ज्ञान पीठ ने दो भागों में प्रकाशित की हैं।  रावीजी सन् 47 से ही कैलास में रहने लगे थे। उन्हीं के कारण विख्यात साहित्यकार केएम मुंशी, गवर्नर सत्य नारायण रेड्डी, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, विष्णु प्रभाकर आदि कई लोग कैलास आये थे। रावीजी कैलास में कुछ दिन श्यामकुटी में रहे थे, फिर स्वनिर्मित आवास नया नगर कैलास में। वहीं  रहते हुए हिन्दी जगत को अपना साहित्य शरीर सौंप कर 1994 में उन्होंने अपना भौतिक शरीर छोड़ा।

मैत्रीक्लब के माध्यम से उन्होंने भारत भर के साहित्यकारों और सामान्य जनों का एक वृहत परिवार बनाया। इतना ही नहीं, हृदयों की हाट वार्ता के द्वारा उन्होंने भारत की यात्रा की और टूटे हृदयों को जोड़ा। नये विज्ञापन मासिक पत्र द्वारा मन के विज्ञापनों को प्रकाशित कर रावीजी ने पत्रकारिता जगत को भी एक अनूठी देन सौंपी है। इतना ही नहीं, पूर्णत: अशुद्ध नाम कैलाश का बहिष्कार कर उन्होंने शुद्ध नाम कैलास का बोध पढ़े-लिखों को भी कराया।  

(सत्यप्रकाश गोस्वामी, 31/69 कटघर, आगरा  द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी को समाहित करते हुए, गोस्वामी जी का फोन नम्बर है.08006386473)

8 टिप्‍पणियां:

  1. param aadarniya ravi ji ki kahaniyaan padhi hain maine. unki kahaaniyaan padhane ke baad sirf khalil zibran hi meri nazar main tik paye. Ravi ji jaisa vyaktitva hazaron salon main hota hai. lekh bahut achchha hai aur upyogi bhi.

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  2. रावी जी के इस संस्मरणात्मक लेख से उनके साहित्यिक अवदानों की जानकारी हुयी -आभार !

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  3. लघुकथा आंदोलन के दौर में रावी जी की लघुकथाओं को पढ़ने का जैसा एक जुनून सा छाया रहता था। उनके बारे में यहां पढ़कर अच्‍छा लगा।

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  4. आदरणीय डॉ. सुभाष राय जी, आप मस्तिष्क नहीं, कम्प्यूटर है. मऊ से लेकर आज़मगढ़, इलाहाबाद और फिर आगरा. व्यक्तित्व और संस्मरण तो इंसाइकलोपीडिया की तरह आपके दिमाग में अंकित हैं. मैं कहता हूँ आप पुरुष नहीं, .................................................................................................महापुरुष हैं.

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  5. मेरे जैसे अदना लेखक के लिये तो बहुत उपयोगी ग्यानवर्द्धक जानकारी है। धन्यवाद।

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  6. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  7. SAHITYAKAR, LAGHUKATHAKAR RAAVI HINDI SAHITYA JAGAT KI WAH ANMOL VIBHUTI HEIN.JO AB KAHIN BHI MILNA MUSKIL HAI.SUCH KAHUN TO RAAVI AUR UNKE SAHITYA KO SAMAJHNE WALA AAJ TAK SAMNE NAHIN AAYA .AGARA UNIVERCITY SE BHI RAAVI SAHITYA PAR Ph.d karne ka PRAYAS BHI KUCHH CHHATRAON NE KIYA ,LEKIN YE STUDENT KE VASH KI BAAT NAHIN THI .ISKE LIYE TO HINDI SAHITYA KE MARMAGYA VIDWAN KI AWSHKTA THI JO ABHI TAK POORA NAHIN HO PAYI .ISSE RAAVI KA NAHIN BALKI HIDI SAHITYA KA HI NUKSAN HO RAHA HAI .BHASH AUR VISHAYA PAR UNKI PAKAR TO DEKHTE HI BANTI HAI .AAJ BHLE HI RAAVI HAMARE BEECH NAHIN HAEIN LEKIN UNKA SAHITYA AMAR HAI .---SUNIL ANURAGI,KOTDWAR,UTTARAKHAND

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  8. SAHITYAKAR, LAGHUKATHAKAR RAAVI HINDI SAHITYA JAGAT KI WAH ANMOL VIBHUTI HEIN.JO AB KAHIN BHI MILNA MUSKIL HAI.SUCH KAHUN TO RAAVI AUR UNKE SAHITYA KO SAMAJHNE WALA AAJ TAK SAMNE NAHIN AAYA .AGARA UNIVERCITY SE BHI RAAVI SAHITYA PAR Ph.d karne ka PRAYAS BHI KUCHH CHHATRAON NE KIYA ,LEKIN YE STUDENT KE VASH KI BAAT NAHIN THI .ISKE LIYE TO HINDI SAHITYA KE MARMAGYA VIDWAN KI AWSHKTA THI JO ABHI TAK POORA NAHIN HO PAYI .ISSE RAAVI KA NAHIN BALKI HIDI SAHITYA KA HI NUKSAN HO RAHA HAI .BHASH AUR VISHAYA PAR UNKI PAKAR TO DEKHTE HI BANTI HAI .AAJ BHLE HI RAAVI HAMARE BEECH NAHIN HAEIN LEKIN UNKA SAHITYA AMAR HAI .

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