शनिवार, 31 जुलाई 2010

एक बात जो समझनी है

जीवन एक कविता की तरह है। उतना ही सुंदर, उतना ही सुरुचिपूर्ण, उतना ही सुष्ठु, उतना ही मधुर। जिस तरह कविता कवि की रचना होती है और वह उसे भावों, शब्दों, अलंकारों से सजा कर प्रस्तुत करता है, उसी तरह जीवन को भी प्रकृति सुंदर से सुंदर बनाकर प्रस्तुत करती है। जिसे केवल जीवन चाहिए, वह इसे सुंदर बनाये रख सकता है, जिसे जीवन के बदले और भी चीजें चाहिए, उसे जीवन के सौदर्य से वंचित होना पड़ता है। रचना अपने आप में ही फल है। किसी कवि ने एक सुंदर कविता रची, यह उसका पारिश्रमिक है। क्यों नहीं सभी लोग कविता रच लेते हैं, किसी के भी शब्द काव्य में बदल जायं, ऐसा कहां होता है? जिसे काव्य सर्जन का वरदान मिला हुआ हो, जिसके कंठ पर सरस्वती बसती हों, उसी के शब्द काव्य में बदलते हैं, वही रचना कर पाता है। इस तरह उपजी कविता का पारिश्रमिक क्या मांगना?

कवि होना अपने आप में महत्तम नहीं है क्या? ऐसा ही जीवन के बारे में भी समझना चाहिए। जो इसे रचता है, वह कभी इससे कुछ नहीं चाहता। पर जिसे यह मिला है, वह रास्ता भटक जाता है। अपनी रचना से रचनाकार का अटूट रिश्ता होता है, वह इससे अलग हो ही नहीं सकता। जीवन का रचनाकार भी जीवन से अलग नहीं रह सकता, अलग रहता भी नहीं, बिल्कुल पास रहता है, जीवन के भीतर ही समाया हुआ रहता है। जिसके पास जीवन है, उसे समझ में आये या नहीं। जो उसकी उपस्थिति समझ लेते हैं, वे भाग्यशाली होते हैं, वे उसकी महानता को भी जान लेते हैं, वे स्वयं में ही उसे महसूस कर पाते हैं। उसके होने का अहसास इतना जीवंत, इतना मुग्धकारी होता है कि केवल उसकी उपस्थिति के अलावा जीवन धारण करने वाले को कुछ और नहीं चाहिए होता है।

पर जो इस सचाई को नहीं समझ पाते हैं, वे जीवन को अपना अधिकार मान लेते हैं और फिर इससे सब कुछ पा लेना चाहते हैं। वे जीवन के सौंदर्य को बाहर ढूढ़ने लगते हैं। बाहर की दुनिया तो बहुत आकर्षक है, बड़ी वैभवशालिनी है, अत्यंत सम्मोहित करने वाली है। उसके सम्मोहक उपकरणों का अंश मात्र भी किसी एक व्यक्ति को हासिल नहीं हो पाता है। इसीलिए पाने के सिलसिले को कोई अंत होता ही नहीं। इस अंधी दौड़ में आदमी भागता जाता है, भागता जाता है, सारा आसमान मुट्ठी में भर लेना चाहता है। वह समझ ही नहीं पाता कि इस तरह उसे जो मिला हुआ था, वह भी उसके हाथ से निकलता जाता है। उसका विलक्षण सौंदर्य, उसकी अद्भुत सामर्थ्य धीरे-धीरे खोती चली जाती है और एक दिन उसे लगता है कि उसने तो कुछ पाया ही नहीं, जो पाया था, वह भी व्यर्थ चला गया। पर जब तक यह समझ आती है, वापसी के सारे रास्ते बंद हो चुके होते हैं, लौटना संभव नहीं रह जाता है।

एक साधु की कुटिया में आग लग गयी, सब कुछ जलकर भस्म हो गया। परंतु साधु सुरक्षित बच गया। वह उतना ही प्रसन्न था, जितना पहले कुटिया के रहने पर था। उसे देखकर लोगों को आश्चर्य हो रहा था। एक आदमी ने आखिर पूछ ही लिया, महाराज आप को तो इस आग से बहुत क्षति हो गयी, बड़ा दुख हो रहा होगा। साधु मुस्कराया और बोला, नहीं मित्र, दुख किस बात का। कुछ चीजें प्रकृति से मुझे मिली थीं, अब उसने वापस ले लीं, इसमें दुख की क्या बात। मेरा तो कुछ था नहीं, जिसका था, उसने ले लिया। मुझे तो खुशी है कि उसने यह सुंदर जीवन मुझसे वापस नहीं लिया। यह जीवन भी तो उसी का दिया हुआ है, वह चाहती तो इसे भी ले सकती थी, पर उसने ऐसा नहीं किया। उसने मेरे ऊपर यह जो कृपा की, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। साधु की यह प्रसन्नता बहुत सहज थी पर कितने लोग यह समझ पाते हैं कि कुछ भी उनका नहीं हैं, सब प्रकृति का है और वह एक दिन सब वापस ले सकती है। इतना ही समझ में आ जाय तो जीवन सुधर जाय, सुंदर हो जाय।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

हाय री महंगाई

 वीरेन्द्र सेंगर की कलम से 
संसद चल नहीं पा रही है, फच्चर फंसा हुआ है। सरकार ने साफ कर दिया है कि वह दोनों सदनों में बहस के लिए तैयार है, लेकिन वोटिंग के लिए नहीं। यहां तक कह दिया गया है कि इस फैसले में अब पुनर्विचार की कोई गुंजाइश नहीं है।वित्त मंत्री, प्रणव मुखर्जी ने भी कहा है कि विपक्ष जानबूझ कर संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे रहा है जबकि इस सत्र में कई जरूरी विधेयक पास होने हैं। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का कहना है कि सरकार सरासर गलत बयानी पर अमादा है। संसद तो ठप है, सरकार के अड़ियल रवैये के कारण। आखिर विपक्ष के काम रोको प्रस्ताव को स्वीकार करने में क्या दिक्कतें हैं? जबकि, सरकार दावा कर रही है कि उसकी संख्या गणित पूरी है। तो फिर क्या डर है? वैसे, भी ‘काम रोको’ प्रस्ताव के तहत वोटिंग होती है और इसमें पक्ष में बहुमत होता है, तो भी सरकार गिरने का खतरा नहीं है। इसके बावजूद सरकार इसलिए डर रही है कि कहीं उसकी ‘एकता’ की पोल न खुल जाए।

सरकार के रवैये से वाम मोर्चा नेतृत्व खासा नाराज है। सीपीएम के वरिष्ठ नेता, वासुदेव आचार्य का कहना है कि महंगाई के मुद्दे पर सरकार का रवैया कायराना है। वाम मोर्चा ने तो अपनी रणनीति का खुलासा कर दिया है। यही कि वह दबाव बनाने के लिए धरना-प्रदर्शन का रास्ता अपनाएगा। यह कार्रवाई संसद के बाहर भी होगी और संसद के अंदर भी। बसपा, राजद और सपा जैसे दल यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं। इन दलों का रवैया कुछ-कुछ अलग दिखाई पड़ा। बसपा ने तो मंगलवार को ही स्पष्ट कर दिया था कि वह काम रोको प्रस्ताव के तहत ही बहस कराने के लिए दबाव नहीं बनाएगी।  राजद और सपा का रवैया सरकार के प्रति इतना नर्म नहीं देखा गया। लालू यादव कहते हैं कि इतने गंभीर मुद्दे पर आखिर स्थगन प्रस्ताव पर ही बहस हो   जाएगी, तो कौन सी आफत आ जाएगी?

खास निशाने पर हैं मोदी!
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सीबीआई के खास निशाने पर आ गए हैं। सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में जांच कर रही टीम को षड्यंत्र के तार उच्च स्तर तक जुड़े लगते हैं।  जांच दल को कुछ ऐसे संकेत मिले हैं, जिनके बारे में मोदी से पूछताछ करना जरूरी हो गया है। विशेष जांच दल ने सुप्रीम कोर्ट को दी गई ‘स्टेटस रिपोर्ट’ में भी इस बात का उल्लेख कर दिया है। सीबीआई ने इस मामले के एक प्रमुख आरोपी पुलिस अधिकारी डीजी बंजारा का जेल में ‘स्टिंग’ आपरेशन करा लिया है। इसमें डीजी बंजारा अपने एक साथी कैदी से कहते हैं कि उन लोगों ने मंत्री अमित शाह के आदेश से सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी का अलग-अलग सफाया करा दिया था।  चर्चा है कि अमित शाह ने यह सब काम ‘बॉस’ के संकेत के बाद ही किया होगा। सीबीआई के सूत्र कहते हैं कि ये ‘बॉस’ मोदी ही हो सकते हैं। उनके पास 2007 से गृह मंत्रालय का प्रभार भी है। वैसे भी यह जग   जाहिर है कि अमित शाह 1980 से मोदी के खास ‘शागिर्द’ रहे हैं। ऐसे में इसकी पूरी संभावना है कि इस षड्यंत्र के तमाम घटनाक्रमों की जानकारी मोदी को रही हो।

 जांच दल  पता करना चाहता है कि आखिर वह कौन शख्स है, जो ‘हत्यारे’ पुलिस अधिकारियों को बचाने के लिए सत्ता का इस्तेमाल कर रहा था। चूंकि, पूर्व गृह राज्य मंत्री ने यह कह दिया है कि उन्हें इस ट्रांसफर की वजह नहीं मालूम है। ऐसे में मोदी से पूछताछ जरूरी बताई गई है। शाह ने रिकार्डेड बयान में ऐसी टिप्पणियां कर दी हैं, जिनके आधार पर जांच दल को मोदी से पूछताछ का पुख्ता आधार भी मिल गया है। सीबीआई एक आरोपी पुलिस अधिकारी एनके अमीन को सरकारी गवाह बनाने जा रही है। अमीन पूर्व डीएसपी हैं। उनके वकील का कहना है कि पूर्व गृह राज्य मंत्री शाह के दबाव में ही सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी का अलग-अलग ‘कत्ल’ किया गया था।  इस मामले में दो अगस्त को निर्णय होना है। अमित शाह के मामले में भाजपा नेतृत्व, केंद्र सरकार को राजनीतिक रूप से कटघरे में खड़ा करने की तैयारी कर रहा था लेकिन सीबीआई ने ऐसी तमाम जानकारियां जुटा ली हैं, जिनसे खुद मोदी सरकार मुसीबतों में फंस सकती है।

अविनाश वाचस्पति की चार प्रतिकविताएं

कैप्शन जोड़ें

मेरे प्रिय भाई अविनाश वाचस्पति एक ब्लॉगर  और व्यंग्यकार ही नहीं एक संवेदनशील कवि, रचनाकार भी हैं. बार-बार उनकी इस प्रतिभा को मैं देखता आया हूँ. आखर कलश में प्रकाशित मेरी कविताओं पर उनकी प्रतिक्रिया देखकर मैं अपने को रोक नहीं पाया. ये सिर्फ प्रतिक्रिया भर नहीं हैं, ये स्वतंत्र रचनाएँ हैं. उन्होंने लिखा भी है, मेरी विवशता है कि मैं प्रतिक्रिया में क्रिया की प्रक्रिया में जूझने लगता हूं। यह क्रिया की प्रक्रिया ही उनकी निधि है. यही उन्हें निरंतर सकारात्मक और रचनात्मक बनाए रखती है. उनकी चार प्रतिकविताएं यहाँ पेश हैं.....



1.
रचने का सच

रचना का सच
सच और सिर्फ सच
कवि की सच्‍चाई है
जो इंसानियत की रोशनाई है।


2.
फूल सदा खिला रहता है
मन की तरह
मन है न
नमन मन को।


3.
रोजाना झुलस रहा है
पर सोचता है पक रहा है
इतना पकना ठीक नहीं
जल्‍दी ही थकेगा
कब यह क्रोध रूकेगा।


4.
भाप को नहीं बनने देंगे बूंद
इस‍के लिए काटेंगे रोज ही
ऐसी फसल जमीन पर
जो इंसानियत को
कर देगी ढेर।

काश, फिर कोई चंडी समाज की आंखें खोल सकती!

बंशीधर मिश्र की कलम से

खता किया, बुरा किया। करके छोड़ा और बुरा किया। कोई अनपढ़ और गंवार ऐसा करे, तो समझ में आता है पर भौतिक चेतना की संगठित रूप मानी जाने वाली सरकारें यदि यह गलती करने लगें, तो तरस आता है। अभी हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ इसी तरह का काम किया। कई महीने पहले सरकार की तरफ से राजाज्ञा जारी हुई कि स्कूलों में दोपहर का भोजन बनाने का काम दलित वर्ग की महिलाएं ही करेंगी। कुछ महीने ही बीते होंगे कि अब सरकार की तरफ से नए निर्देश जारी कर दिए गए। अब भोजन बनाने में दलितों का आरक्षण नहीं होगा। यह काम जरूरतमंद महिलाओं, विधवा, तलाकशुदा और गरीब महिलाओं यहां तक कि ऐसे ही पुरुषों के हवाले कर देने का आदेश जारी किया गया है। यकीनन यह शासनादेश या तो स्कूलों तक पहुंच गया होगा या पहुंचने वाला होगा। इस तुगलकी बदलाव के पीछे सरकार की क्या मंशा थी और उसने ऐसा क्यों किया, यह विचारणीय प्रश्न है।

दरअसल, यह अदूरदर्शी राजनीति से उपजे भय का परिणाम है। हुआ यूं कि दोनों शासनादेशों के बीच का समय स्कूलों में उठे मौन विद्रोह के घनेरे बादलों ने भर लिया। यह अजीब किस्म का विद्रोह था। इसमें न तो लाठियां थीं, न डंडे। किसी ने न तो किसी को गालियां दीं, न गोलियां मारीं। बस स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों ने यह कहा कि हम नहीं खाएंगे। क्यों नहीं खाएंगे? भूख नहीं है। कुछ दिन बाद पता चला कि ऊंची जाति के इन नन्हें बच्चों की भूख का संबंध स्कूलों के रसोईघरों में हाल ही दाखिल हुईं  दलित महिलाओं से था।

पर भूख और प्यास जाति का भेद नहीं पहचानती। आद्य गुरु शंकर को जब खालिस रेगिस्तान में जोर की प्यास लगी, तो वह बेचैन हो उठे। उसी पगडंडी से सिर पर पानी का घड़ा लिए एक चांडाल कन्या जा रही थी। आद्य गुरु संन्यासी थे। उन्हें प्यास बेचैन कर रही थी। पर सामाजिक मर्यादा के भय से चांडाल कन्या से पानी नहीं मांग पा रहे थे। थोड़ी दूर चलने पर उनकी प्यास और बेचैनी बढ़ने लगी। प्राण हलक में अटक रहे थे। उनका गला सूखने लगा। उन्होंने उससे पानी मांगा। देवि, पानी दे दे। उसने विस्मय से जवाब दिया- ऐ संन्यासी, तू देवता तुल्य, मैं ठहरी चांडाल। तेरा धर्म भ्रष्ट नहीं होगा? आद्य गुरु सहम गए। कुछ दूर चले, तो फिर लगा प्राण निकल जाएंगे। वह याचक बन पानी की भीख मांगने लगे। सारी मर्यादा धरी रह गई। चांडाल कन्या कोई और नहीं साक्षात मां काली थीं। उन्होंने आद्य गुरु को फटकार लगाई कि ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या के दर्शन का प्रतिपादन करने वाला छूत और अछूत का भेद करे, तो दर्शन किस काम का। जो कहा उसको धारण करो। आद्य गुरु की आंखें खुल गर्इं। वह दंडी स्वामी और सनातन धर्म के पुनरुद्धारक थे। पूरे देश में अपने सिद्धांत की प्रतिस्थापना की थी। ब्रह्म सत्य है और माया रूप जगत मिथ्या। यह केवल दीखता है, होता नहीं। पर व्यवहार के धरातल पर वह वर्ण व्यवस्था के जड़ बंधन से बाहर नहीं निकल पाए थे। जब प्यास ने उन्हें बेचैन किया, तो दर्शन और व्यवहार का अंतर मिट गया। यही सत्य है।

यह हैरान करने वाली बात है कि आद्य गुरु के धार्मिक प्रतिपादन की विरासत ढोने वाला भारतीय सनातन समाज डेढ़ हजार साल बाद भी उनकी व्यावहारिक दीक्षा को मिसाल नहीं बना पाया है। इसीलिए तो सवर्ण बच्चों के बैग में घर के बने स्वादिष्ट व्यंजन होते थे, ताकि उनका मन किसी भी हालत में स्कूल में बनने वाले सरकारी दलिये या खिचड़ी पर न ललचाए क्योंकि बच्चे तो बच्चे ठहरे। उनके लिए कौन दलित, कैसा दलित? मगर उनके माँ-बाप नहीं चाहते थे कि किसी भी कीमत पर बच्चे गांव की अछूत महिला के हाथ बना खाना खाएं। इसलिए उनके कोमल मन में भेद पैदा किया गया। इसी की परिणति थी कि बच्चे, फिर बच्चे नहीं रह गये बल्कि सामाजिक जड़ता को ढोने के वाहक बन गये। उन्हें पहले भेदभाव मिटाने की इस सरकारी कोशिश के खिलाफ तलवार की तरह इस्तेमाल किया गया। मीडिया और प्रबुद्धजनों ने हस्तक्षेप किया, तो उन्हें ढाल बना दिया गया। चिंताजनक यह रहा कि लखनऊ में बैठे अफसरों ने हकीकत जाननी ही नहीं चाही, बस खबरों को पढ़ा और निर्णय लिया। वही निर्णय जो सोलहवीं सदी की पंचायतों में लिये जाते थे। यह अछूत है, इसे गांव के बाहर ही रहना होगा। उस समय तो न शिक्षा की नौटंकी थी, न जागरूकता का भ्रम और न ही इक्कीसवीं सदी में पहुंचने का दंभ, इसलिए उसे नजरअंदाज किया जा सकता है। किताबों में लिखा है कि यह अक्षम्य अपराध है। पर यह ऐसा अपराध है जो मानव समाज में कभी वर्ण के रूप में तो कभी वर्ग के रूप में किया जाता रहा है। यह आज भी बार-बार दोहराया जा रहा है। संविधान महज एक किताब सी हो गयी जो अलमारियों में सजा कर रख दी जाती है। वह निर्जीव वस्तु है इसलिए उसकी भावनाओं से किसी को क्या लेना-देना। यहां तो जीवितों की भावनाओं की परवाह नहीं की जाती फिर निर्जीव की क्या बिसात। इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि यह उस उत्तर प्रदेश में हुआ है जहां की मुख्यमंत्री सवर्णों को कोस-कोसकर उस पद तक पहुंचीं। गांव से बाहर रहने वाली इस कौम को उनसे बहुत उम्मीद थी कि वह गांव में आ जायेगी। शायद ऐसा इसलिए कि उनके लिए ‘वर्ण’ का अंतर मायने नहीं रखता। क्योंकि उनका ‘वर्ग’ बदल गया है। वह अरबों की मिल्कियत वाली राजाओं की श्रेणी में गिनी जाने लगी हैं। और राजाओं की कोई जाति नहीं होती। इसीलिए उनको जातीय भेदभाव का दंश असर नहीं करता।

अब यह कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि स्कूलों में रसोइयों के संबंध में लिए गए दोनों निर्णय जल्दबाजी में थे। पहले समाज को उसके लिए तैयार कर लिया जाता, तो शायद यह सामाजिक फूहड़पन न होता। सरकार इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। पर समाज भी इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। ऐसा समाज कभी श्रेष्ठ नहीं बन सकता जहां मनुष्य में अंतर सिर्फ इस आधार पर किया जाता है कि वह उसका वर्ण नीचा है या वह गरीब वर्ग से संबंध रखता है। समता प्रकृति का चरित्र है। सूरज की रोशनी सब के लिए होती है। हवाएं समूची धरती को सुख देती हैं। बादल कभी ऊंच-नीच का भेद करके नहीं बरसते। यकीनन यही मां काली ने भी आद्य गुरु को समझाया होगा। तभी उनकी आंखें खुली थीं। काश, फिर कोई चंडी भारतीय समाज की आंखें खोल सकती!

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

बच्चे के हाथ में पिस्तौल

देश में एक बार फिर स्कूल में एक बच्चे ने दूसरे बच्चे पर गोली चला दी। हमलावर कक्षा नौ का छात्र है, जिस पर गोली चलायी गयी, वह कक्षा आठ का छात्र है। दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में बच्चों के दो गुटों में मामूली सा झगड़ा हुआ और उसने पिस्तौल निकाली, गोली चला दी। वह तो संयोग अच्छा रहा कि गोली दूसरे बच्चे के जिस्म को खुरचती हुई निकल गयी, अन्यथा उसकी जान चली जाती। बच्चे का कहना है कि उसे पिस्तौल रास्ते में गिरी हुई मिल गयी। निश्चित रूप से वह झूठ बोल रहा है। जो स्कूल में गोली चला सकता है, उससे सच बोलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। वह पिस्तौल घर से ले आया होगा, पहले से ही उसका ऐसा इरादा रहा होगा। झगड़ा भी पुराना होगा, इसीलिए तयशुदा तरीके से वह पूरी तैयारी के साथ आया रहा होगा।

इस तरह की घटनाएं यद्यपि विदेशों की तरह हमारे देश में अभी आम नहीं हैं, कभी-कभी हो जाती हैं लेकिन केवल इसलिए इसकी गंभीरता कम करके नहीं आँकी जानी चाहिए। बच्चों में अराजकता, अवज्ञा बढ़ रही है। बच्चे कई बार छोटे-छोटे अपराध करते भी पकड़े जाने लगे हैं। देश के कई इलाकों में इस तरह की घटनाएं हुई हैं, जब बच्चों को मोटरसाइकिलें उठाते पकड़ा गया है, चेनस्नेचिंग करते धरा गया है। इस तरह की प्रवृत्ति आखिर बच्चों में क्यों पैदा हो रही है? क्या यह मात्र संयोग है या कतिपय घरों के माहौल का असर? ये मनोवैज्ञानिक प्रश्न है और इसका अध्ययन बहुत जरूरी है।

स्कूल जाने वाले बच्चों को भी कुछ मां-बाप उनकी जरूरत से ज्यादा पैसे पाकेट खर्च के नाम पर देते हैं। कई बार जब उनकी जेब में किसी कारणवश कम पैसा होता है और उनकी आवश्यकता बड़ी होती है तो वे यह सोचकर दुस्साहस कर बैठते हैं कि एक ही बार तो कर रहे हैं। ऐसे मामलों में अगर वे पकड़े गये तो उनकी जिंदगी गलत दिशा अख्तियार कर लेती है और अगर नहीं पकड़े गये, अपने इरादे में कामयाब हो गये तो वह प्रयोग दुहराने की हिम्मत पैदा हो जाती है। ऐसे अभिभावक, जो केवल अपनी पैसे की ताकत से बच्चों को खुश रखने की कोशिश करते हैं, सचमुच उनके पास अपनी व्यस्तता में से बच्चों के लिए समय निकाल पाना या तो संभव नहीं होता या वे उसकी जरूरत नहीं समझते। यही गलती बच्चों को अपने ढंग से हर मामले में निर्णय करने की प्रवृत्ति पैदा करती है और जब कभी उन्हें किसी दूसरे के फैसले पर चलना होता है, वे उसे स्वीकार नहीं कर पाते।

ऐसे बच्चे उद्दंड हो जाते हैं और यह उद्दंडता अपराध की पहली सीढ़ी है। इस तरह के उद्दंड बच्चे दोस्त बनाने में बहुत माहिर होते हैं और स्कूलों में और बच्चों को भी गंदा करते हैं, गलत रास्ते पर चलने को प्रेरित करते हैं। विदेशों में तो यह अराजकता काफी गंभीर रूप ले चुकी है। अमेरिका में हर महीने स्कूल में गोलीबारी की कोई न कोई घटना हो ही जाती है। उनका जीवन-दर्शन और रहन-सहन का तरीका जिस तरह का है, उसमें इन घटनाओं पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता। वहां बंदूकों की खरीद पर कोई पाबंदी नहीं है। परंतु भारत जैसे देश में, जहां इस तरह के हथियारों पर न केवल लाइसेंस की बंदिश है, बल्कि जहां नैतिकता और शांति का जीवन शैली में खास महत्व है, इस तरह की घटनाएं चिंता पैदा करने वाली हैं।

बुधवार, 28 जुलाई 2010

महंगाई पर राजनीतिक ‘महाभारत’

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से 
महाभारत के पात्र ललकारते भी हैं, छल कपट के दांव भी आजमाते हैं। कहीं नैतिकता की दुहाई देते हैं, तो कहीं राजधर्म का मर्म समझाते हैं। कुछ इसी तरह का परिदृश्य इन दिनों संसद में है। महंगाई के मुद्दे पर बचने-बचाने और मरने-मारने के दांव चले जा रहे हैं। वे आम आदमी के एजेंडे की दुहाई देकर सत्ता सिंहासन में बैठे थे। अब विपक्ष उन पर विरोध के तीखे बाण छोड़ रहा है। कह रहा है कि आम आदमी तो महंगाई से तबाह हो रहा है जबकि तुम सत्ता सिंहासन का सुख लूट रहे हो। इसी पर राजनीतिक तलवारें खनक रही हैं। सरकार ने भी राजनीतिक ढीठपन के पैंतरे चलने शुरू कर दिए हैं। ना-ना करते हुए राइट और लेफ्ट विंग एक स्वर में बोलने लगे हैं। वे रणनीतिक दूरियां भले कायम रखें, लेकिन अंदर ही अंदर दोनों धड़ों के बीच एक समझदारी बन गई है। भाजपा नेतृत्व वाला मोर्चा गरम है, तो वाम मोर्चा में सरकार के प्रति खासा उबाल देखने को मिल रहा है। सरकार किसी कीमत पर महंगाई के मुद्दे पर सदन में मत विभाजन  के लिए तैयार नहीं है जबकि दोनों धड़ों ने कह दिया है कि सरकार जिद पर अड़ी तो राजनीतिक महाभारत और तेज होगा। संसद ठप रहेगी।

महंगाई के मुद्दे पर  भाजपा और वाम दलों ने काम रोको प्रस्ताव दिए हैं। सरकार बहस कराने को तो राजी है लेकिन, वोटिंग कराने को नहीं। सीपीएम के वरिष्ठ नेता, सीता राम येचुरी हैरानी का सवाल है कि केंद्र सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है, तो वह विपक्ष के ‘काम रोको’ प्रस्ताव से क्यों भाग रही है? वे कहते हैं कि सरकार खुद नहीं चाहती कि संसद की कार्यवाही चले, यदि ऐसा न होता तो वह अड़ियल रुख नहीं अपनाती। वाम मोर्चे और एनडीए ने राज्य सभा में भी नियम 168 के तहत महंगाई पर बहस करने का प्रस्ताव दिया है। इस नियम के तहत बहस के बाद मतविभाजन का प्रावधान होता है। सरकार को यह प्रस्ताव भी मंजूर नहीं है। सरकार के रणनीतिकार इस कोशिश में हैं कि किसी तरह विपक्षी एकता में ‘सेंध’ लगा दी जाए। इसके लिए ये लोग हर तरह के दांव अजमा रहे हैं।

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने मंगलवार को एक बार फिर कोशिश की कि कुछ सेक्यूलर दलों से ‘समझदारी’ बना ली जाए। इसीलिए उन्होंने बसपा के नेता, दारा सिंह से मुलाकात की। राजद सुप्रीमो लालू यादव से भी बात की। सूत्रों के अनुसार, इन दोनों नेताओं ने दो टूक कह दिया कि वे भाजपा के किसी प्रस्ताव के पक्ष में राजनीतिक कारणों से नहीं खड़े हो सकते। यह जरूर है कि वे लोग महंगाई के मुद्दे पर सरकार का विरोध करेंगे। भाजपा वाम मोर्चे के स्थगन प्रस्ताव को भी  समर्थन देने को तैयार है। यदि सरकार पर दबाव बनाना है, तो यह समय राजनीतिक ‘छुआ-छूत’ का नहीं है। इस ‘प्रस्ताव’ पर वाम नेताओं ने भाजपा नेतृत्व से साफ-साफ कुछ भी नहीं कहा।

कांग्रेस को सबसे पहले बसपा का ‘साथ’ मिल भी गया है। इस दल के सांसद विजय बहादुर सिंह ने कह दिया है कि उनकी पार्टी महंगाई पर संसद में बहस तो चाहती है, लेकिन वोटिंग पर ज्यादा जोर देने की अहमियत नहीं समझती है। सपा सुप्रीमो, मुलायम सिंह ने भी बसपा के रवैये के बाद कुछ दुविधा के संकेत देने शुरू किए हैं। जबकि, लालू यादव के तेवर गरम दिखे। वे बोले कि अब इस सरकार को ‘रियायत’ देने का मन नहीं करता। ऐसा करने से उनकी ‘आत्मा’ पर जोर पड़ने लगा है। महंगाई के महाभारत के बीच सरकारी गेहूं सड़ने का मामला भी तूल पकड़ गया है। इस मामले में कृषि मंत्री शरद पवार जवाब नहीं दे पा रहे हैं। मंगलवार को तो इस मामले में सवालों से भन्ना गए थे। खीझकर वे मीडिया के लोगों से कह रहे थे कि वे केवल संसद के प्रति जवाबदेह हैं।महंगाई की चर्चा के दौरान ‘सड़ा’ हुआ गेहूं भी सरकार के लिए राजनीतिक ‘बदबू’ बनता जा रहा है।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

शाह को ‘राम भरोसे’ छोड़ा!

वीरेन्द्र सेंगर की कलम से
नये  घटनाक्रमों की नजाकत देखते हुए आखिर भाजपा नेतृत्व ने चर्चित अमित शाह को ‘राम भरोसे’ छोड़ने का फैसला कर लिया है। उसने अपनी राजनीतिक जिद छोड़ दी है। अब वह महंगाई के मुद्दे पर पूरे विपक्ष के साथ कदमताल बनाने की कोशिश करेगा। इसके पहले भाजपा नेतृत्व इस बात पर अड़ गया था कि वह पहले अमित शाह के मामले में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेगा।  रातोंरात अपनी प्राथमिकता बदलने का फैसला करने की खास वजह यह रही कि गुजरात सरकार के गृहराज्य मंत्री रहे अमित शाह के बारे में ऐसे कई खुलासे सामने आए हैं, जिनकी तरफदारी उल्टे गले की घंटी बन सकती है। नवंबर 2005 में सोहराबुद्दीन को आतंकवादी के नाम पर एक कथित पुलिस मुठभेड़ में मार गिराने के मामले में कई वरिष्ठ आईपीएस अफसरों के साथ ही मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह का भी नाम आया था। सीबीआई ने कानूनी फंदा  कस दिया तो रविवार को उन्होंने एक नाटकीय घटनाक्रम में  गांधी नगर में समर्पण किया।

अमित शाह के बारे में कई नए खुलासे सामने आ चुके हैं। इनमें सबसे गंभीर मामला केतन पारिक से जुड़ा हुआ है। पारिक शेयर मार्केट के एक चर्चित घोटाले के आरोपी हैं। कई साल पहले 1200 करोड़ रुपये के बैंक के घोटाले का उनका मामला चर्चित हुआ था। पारिक ने गुजरात के माधवपुरा बैंक में बड़े स्तर पर हेराफेरी की थी। इससे हजारों जमाकर्ताओं का पैसा डूबा था। शिकायत हुई थी कि इस बैंक के तत्कालीन निदेशक अमित शाह ने पारिक को राहत दिलाने की भूमिका निभाई थी। इसके एवज में उन्होंने पारिक से ढाई करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। सोहराबुद्दीन मामले में गुजरात के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कुलदीप शर्मा ने जांच कराई थी।  उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इसमें अमित शाह जैसे बड़े नेताओं का नाम आ रहा है। इसलिए जरूरी है कि इस मामले की जांच सीबीआई से करायी जाए। उन्होंने तीन पेज की सिफारिश   सरकार से की थी। यह रिपोर्ट आने के बाद ही कुलदीप शर्मा को एक गैर महत्वपूर्ण पद पर भेज दिया गया था और रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। इस मामले का खुलासा सामने आ गया है।

मीडिया में भी इस मामले की चर्चा के बाद भाजपा ने यही ठीक माना कि अमित शाह की ज्यादा पैरवी की गई तो कहीं बाजी उल्टी न पड़ जाए क्योंकि कांग्रेस  पलटवार कर सकती है कि भाजपा एक बड़े घोटालेबाज के ‘संरक्षक’ नेता को बचाने में जुटी है। भाजपा नेतृत्व के सामने एक मुश्किल यह भी आ गई है कि शाह के मामले में सीबीआई  के हाथ काफी पुख्ता सबूत आ गए हैं। उसने अमीन सहित कई उन पुलिस अधिकारियों को पूर्व गृहराज्य मंत्री के खिलाफ सरकारी गवाह बनाने की तैयारी कर ली है। माना जा रहा है कि अपने बचाव के लालच में आरोपी पुलिस अधिकारी पूरा इल्जाम अमित शाह पर डाल सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक किरकिरी का खतरा काफी है। शायद इन्हीं अंदेशों के चलते पार्टी ने अपना राजनीतिक पैंतरा बदल दिया है।
 
राजनीकि हल्कों में यह माना जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व ने यह समझ लिया है कि उसने गुजरात के मुद्दे पर जिद की तो कहीं न कहीं कांग्रेस को राहत मिल जाएगी। इसके आसार इसलिए भी बढ़ गए थे कि शाह के मामले में विपक्ष के सेक्यूलर दल भाजपा के साथ खड़े होने को तैयार नहीं थे। भाजपा नेतृत्व ने तय किया है कि शाह को राहत दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने का विकल्प ही सही है क्योंकि मामला ज्यादा आगे बढ़ा तो इसकी आंच सीधे नरेंद्र मोदी तक पहुंच सकती है। नरेंद्र मोदी भी इस मामले में कोई कोताही नहीं कर रहे। जाने-माने वकील राम जेठमलानी को उन्होंने शाह का वकील बनने के लिए तैयार कर लिया है। अब राम  ही शाह की रक्षा करेंगे।