रविवार, 4 अप्रैल 2010

दोगलापन भाषा का या चरित्र का (भाग-2)

दोगलापन भाषा का या चरित्र का (भाग-2)

पूरी दुनिया में एक दस्तूर बहुत आम रहा है. शासन व्यवस्थाएं चलाने के लिए शासकों ने हमेशा दो चेहरे रखे हैं. एक राजा का, दूसरा उसके नाम पर काम करने वाली नौकरशाही का. राजा का रूप कोई भी हो सकता है. मसलन, राजतन्त्र में राजा , प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति. नौकरशाही का रूप भी व्यवस्थाओं की प्रकृति के हिसाब से अलग-अलग होता है. लेकिन उसके चरित्र में बुनियादी फर्क नहीं होता. लोकतंत्र में नौकरशाहों को जनसेवक कहा जाता है. जनता की भूमिका राजा की होती है. इंडियन सिविल सर्विस के नाम से जानी जाने वाली भारतीय नागरिक सेवा के चरित्र की पड़ताल की जाय तो उसका असली चरित्र समझ में आता है. झूठ का इतना बड़ा मायाजाल शायद ही कहीं देखने को मिले। इस तिलस्म में कोई एक देश ही नहीं पूरी दुनिया फँसी हुई है। बौद्धिकता के शीर्ष पर बैठा यह वर्ग झूठ का दस्तावेज तैयार करने में बहुत माहिर है।
दुनिया के इतिहास लेखन पर उसी के शासन की छाप होती है. गजट अर्थात वस्तुगत इतिहास का बुनियादी दस्तावेज नौकरशाही द्वारा ही तैयार किया जाता है। मिसाल के तौर पर लें। मौजूदा वक्त में जो भी गजट तैयार किया जा रहा है, उसमे देश की तस्वीर चमकते हुए भारत की है। भंडार गृहों में अनाज रखने की जगह नहीं है। सूचकांक आसमान छू रहा है। जीडीपी और जीएनपी दरें बहुत ऊँची हैं। देशभर में चमचमाती सडकों का जाल बिछा है। देश बहुत तरक्की कर चुका है. यहाँ अब कोई भूखा नहीं मरता। मोबाईल दुनिया के किसी भी कोने में पलक झपकते ही दिल की बातें करा देते हैं. देश का शासन लोकतान्त्रिक संविधान के आधार पर चलाया जा रहा है। देश परमाणु शक्ति बन चुका है। हर तरफ बहुत तरक्की है।
आने वाली पीढियां इन्हीं आंकड़ों पर भरोसा करेंगी और कहेंगी कि अतीत में देश में चारों तरफ अमन-चैन था. रामराज था. पर सच तो बड़ा भयावह है। बुंदेलखंड, कालाहांडी समेत देश के कई हिस्सों में भूख से लोग मर रहे हैं। सोमालिया और इथियोपिया का सच पूरी मानव सभ्यता के लिए कलंक है। वहां की अस्सी फीसदी आबादी पिछले तीस सालों में अकाल और दुर्भिक्ष की भेंट चढ़ चुकी है। महीनों भूख से तडपता आदमी जिन्दा नरकंकाल बन चुका दीखता है। जमीन पर पड़ी जिन्दा लाशों की अंतिम सांसें गिद्ध और चील गिना करते हैं। अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों के लोग जिस अनाज को फ़ेंक देते हैं या जिस पके हुए भोजन को जूठन कि तरह कुडाघरों में सडा देते हैं, उसे दुनियां के कई गरीब मुल्कों के लोग अपनी भूख मिटाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. मानव सभ्यता ने शायद ही कभी इतना बड़ा विरोधाभास देखा हो। अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों में जितना अनाज और भोजन सड़-गल जाता है और जानवरों को खिला दिया जाता है, उससे दुनिया के कई देशों की करोड़ों भूखी मानवता का पेट भरा जा सकता है।
नौकरशाही अपना पेट भरने में लगी रहती है। गरीब जनता के नाम आने वाले करोड़ो-अरबों का बजट बंदरबांट कर लिया जाता है। कचहरी से लेकर सस्ते गल्ले की दुकानों तक लूट का खेल बदस्तूर जारी है। भ्रष्टाचार का नंगा खेल पूरी बेशर्मी के साथ खेला जाता है। अफसरों, शासकों को घूस खिलाकर बाजारों में जहर बेचने का काम किया जा रहा है। अफसरों को रिश्वत देकर आदमखोर ताकतें समाज और प्रकृति दोनों का दोहन करने में लगी हैं। पुलिसवाला डंडे मारकर खोमचेवाले से वसूली करता है। पेशकार तारीख देने के नाम पर सुदूर गांव से आने वाले दरिद्रनारायणों की जेबें खाली कर लेता है। पंसारी आपूर्ति निरीक्षक और अधिकारी को पैसे देकर मिलावटखोरी का धंधा करता है। बोर्ड लगाता है ग्राहक हमारे भगवान हैं और उन्हीं भगवान को घी के बदले इसेंस डालकर डालडा, मसाले की जगह घोड़े की लीद और दवा की जगह जहर बेच देता है। परंतु सरकारी दस्तावेजों में सब कुछ बहुत अच्छा है। न गरीबी है और न कहीं अभाव। शब्दों की बाजीगरी ऐसी कि ऊपर से उतरे हुए फरिश्ते भी गच्चा खा जाएं। कागजों पर हर गांव रोशन हैं। वहां सड़कें हैं, नदियों पर पुल हैं। खेतों में लहलहाती फसलें हैं। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। आला अफसरों की ऊंची कुर्सियों के ऊपर अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की फोटो लगी होती है। न्यायालयों में गीता और कुरान पर हाथ रखवाकर कसमें खिलवाने वाले जज हैं। पर झूठ और भ्रष्टाचार की गति इन सबसे तेज है। ज्ञान पर झूठ और पाखंड भारी पड़ गया। यही इस सभ्यता की विडंबना है।
जारी......

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