मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

शब्द का मूल ब्रह्म

दोगलापन भाषा का या चरित्र का- भाग चार

भाषा का सर्वाधिक दुरुपयोग उस क्षेत्र में हुआ, जहां शब्द को ब्र्रह्म कहा जाता है। भारतीय प्राचीन साहित्य में ‘शब्दोब्रह्म:’ अर्थात् शब्द को ब्रह्म कहा गया है। ब्रह्म शायद इसलिए कि दोनों ही चेतना एक ही जगह से फूटती हैं। मनुष्य का अंतरतम् ब्रह्म की अनुभूति करता है। उसी अंतरतम से शब्दों का भी प्रस्फुटन होता है। गहरी वेदना चीख बनकर या कविता बनकर बाहर आ जाती है। आदि कवि ने बहेलिये के वाण से क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को घायल होकर दम तोड़ते देखा और उसपर उसकी मादा के करुण क्रंदन को सुना। उनकी सूक्ष्म चेतना जाग उठी। विश्व की प्रथम रचना का जन्म हुआ। तब तक डाकू वाल्मीकि ब्रह्मर्षि हो चुके थे। दशकों की अनवरत साधना के बाद उन्हें परमात्मा का बोध हुआ था। राम का उलटा मरा-मरा जपने वाले एक व्यक्ति ने त्याग और तप के बल पर मानव सभ्यता के आदि साहित्य की रचना की शक्ति पा ली। उन्हें ब्रह्म और भाषा दोनों का एक साथ ज्ञान हुआ। जब ब्रह्म की चेतना जागी, तो शब्दों के रूप में फूट पड़ी। शायद इसीलिए शब्द को ब्रह्म कहा गया है।

मनुष्य की विराट चेतना को ही ब्रह्म कहते हैं। यही उसकी सूक्ष्म चेतना भी है। जो विराट है, वही सूक्ष्म भी है। विराट का आभास ब्रह्म कहलाता है और सूक्ष्म चेतना शब्द और भाषा बनकर फूटती है। भगवान शिव के डमरू से व्याकरण के सूत्र फूटे। सारी विद्याओं का आदि पुरुष भगवान शिव को ही माना जाता है। इसे यदि प्रतीक मान लिया जाए, तो व्याख्या का आधार वैज्ञानिक हो सकेगा। शिव भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के विराट पुरुष हैं। उनका स्वरूप भगवान से पहले एक महान तपस्वी का है। वह त्याग और तपस्या के साक्षात् देवता हैं। वह अधनंगे रहते हैं। कैलाश पर्वत यानी हिमालय की बर्फीली चोटियों पर राख लपेटकर रहते हैं। बैल पर सवारी करते हैं। भूत-प्रेत उनके सेवक हैं। उन्हें गुलाब और कमल से ज्यादा धतूरा प्रिय है। पूजा में उन्हें केवल जल ही पर्याप्त है। पर सृष्टि के कल्याण के लिए संसार का सारा गरल खुद पी जाते हैं। जिसे संसार त्याज्य समझता है, वह सब भी उन्हें प्रिय लगता है। यही है मनुष्य की विराट चेतना। यही शंभु को जगदीश्वर बना देती है। जिसमें यह चेतना आई, उसमें ब्रह्मत्व आ जाता है। वही विद्या और ज्ञान का भी अजस्र स्रोत बन जाता है।

शब्दों और भाषा के जरिये विराट की चेतना तक पहुंचना ही शायद मानव जीवन का लक्ष्य रहा। परंतु छद्म के प्रत्यय ने सभ्यता की दिशा ही मोड़ दी। अब शब्द और भाषा का प्रयोग विराट चेतना को समझने-समझाने के लिए नहीं, मठों, धर्मालयों, आश्रमों पर कब्जे और राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए किया जाता है। वेद, पुराण, श्रीमद् भागवत्, रामायण, मानस, गीता, कुरान, बाइबल जैसे महान धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या, माीमांसा करने वाले, उपदेश देने वाले धर्मगुरुओं के कर्म इसके विपरीत होते हैं। उनका मन ईश-आराधना में नहीं, मठों की अपार संपत्ति को कब्जियाने में लगा रहता है। उन्हें ‘दुखों’ से मुक्ति नहीं, धन-संपत्ति का खजाना चाहिए। उनके संसार में भाषा और शब्दों का ही खेल चलता है। ऐसी भाषा जो धर्म के नाम पर अधर्म, नीति के नाम पर अनीति और सत्य के नाम पर झूठ की स्थापना करती है। इसीलिए धर्म की संगठित संस्थाएं अधर्म के खेल में मस्त हैं। ज्ञान के दीपों को अज्ञानता के उलूक चुनौतियां देते घूम रहे हैं।

समाप्त

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