रविवार, 11 अप्रैल 2010

जायज क्या, नाजायज क्या

डा. श्रीनिवास रामचंद्र सिरस। मराठी के अप्रतिम विद्वान, आलोचक और कवि। मशहूर कवि गजानन त्र्यंबक के गहन काव्य पर शोध करके ख्याति अर्जित करने वाले। अपने काव्य संकलन पया खालची हिरावल पर महाराष्ट्र साहित्य परिषद का पुरस्कार जीतने वाले। ऐसे प्रतिभाशाली रचनाकार का अचानक हमारे बीच से चले जाना कष्ट देने वाला है। पर यह बात तो और दुख देने वाली है कि उन्हें खुदकुशी करनी पड़ी या फिर अत्यंत अपमानजनक परिस्थितियों का सामना न कर पाने के कारण उन्हें हृदयाघात हुआ और वे नहीं रहे। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आधुनिक भारतीय भाषा विभाग में रीडर सिरस को पिछले 7 अप्रैल को उनके घर में मरा हुआ पाया गया। जांच पड़ताल से पता चला कि वे दो दिन पहले ही मर चुके थे। आटोप्सी रिपोर्ट के अनुसार प्रारंभिक तौर पर कहा जा सकता है कि उनकी मौत या तो हृदय गति रुकने से हुई या कोई जहरीला पदार्थ खाने से हुई। असली कारणों का पता लगाने के लिए फोरेंसिक जांच चल रही है।

वे भले-चंगे थे। पढ़ने-पढ़ाने में तल्लीन। अचानक आपदा आ पड़ी। उनके घर में घुसकर अपने को पत्रकार बताने वाले कुछ लोगों ने नंगी हालत में उनकी वीडियो बना ली। कहा गया कि उनके साथ एक और आदमी था। एक रिक्शावाला। दोनों अप्राकृतिक यौनाचार में संलग्न थे। सिरस ने ऐसा क्यों किया, यह उनकी आदत में था या पहला प्रयास था, यह तो वही जानते होंगे लेकिन उनके निजी जीवन का यह पन्ना सार्वजनिक नहीं था। उस समय भी वे अपने घर में थे। यद्यपि भारतीय जनमानस इस प्रकार की हरकतों को स्वीकार नहीं करता है और इसे सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र के लिए एक तरह से नुकसानदेह मानता है फिर भी सभी जानते हैं कि आपसी सहमति से और चोरी-छिपे हजारों लोग नित्य ही इस कुपथगमन में शरीक होते हैं। सिरस जो कुछ कर रहे थे, उसे किसी भी कीमत पर उचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन जिन लोगों ने जबरिया उनके घर में घुसकर उनकी वीडियोक्लिप बनायी, उनके इरादे भी नेक नहीं कहे जा सकते। सिरस ने पुलिस से शिकायत की परंतु उनकी शिकायत पर एफआईआर तब दर्ज की गयी, जब कोर्ट ने आदेश किया। तब तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उन्हें निलंबित कर दिया और परिसर में स्थित मकान से भी उन्हें बेदखल कर दिया। यह सब मामले की पूरी छानबीन किये बगैर किया गया। यद्यपि हाईकोर्ट ने उनका निलंबन रद कर दिया लेकिन तब तक उन्हें बहुत पीड़ा झेलनी पड़ी, अपमानित होना पड़ा। वे बिलकुल अलग-थलग पड़ गये थे।

एक जिम्मेदार पद पर होने के कारण उनसे इस तरह के आचरण की किसी को अपेक्षा नहीं हो सकती। ऐसा शिक्षक बच्चों को आखिर क्या दे सकता है? लेकिन मानवीय कमजोरियां तब तक क्षम्य हैं, जब तक वे निजी हैं। सबके निजी जीवन में बहुत सारी ऐसी कमजोरियां हो सकती हैं। जब तक वे निजी हैं, किसी पर उनका प्रभाव नहीं पड़ता, किसी को भी उन पर एतराज क्यों होना चाहिए? कोई भी अपने शयन-कक्ष में नंगा होने के लिए स्वतंत्र है। अब तो दुनिया में समलैंगिक संबंधों को भी इजाजत मिलने लगी है। भारत की अदालतों को भी इसे स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं है, बशर्ते ऐसे संबंध आपसी सहमति से हों और अपने घर के भीतर हों। सामाजिक रूप से भले ही इसे जायज न माना जाये लेकिन कानूनी रूप से सिरस जो कुछ कर रहे थे, उसे अपराध नहीं कहा जा सकता। उसे सार्वजनिक करने की जिन लोगों ने कोशिश की, अपराध तो उन्होंने किया। इसमें विश्वविद्यालय के कुछ लोगों का भी हाथ था या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता लेकिन सिरस की ओर से जो शिकायत दर्ज करायी गयी थी, उसमें पत्रकारों के अलावा यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को भी नामजद किया गया है। कोर्ट के आदेश के बाद भी उस पर अमल में जिस तरह विलंब हुआ, उससे बेशक सिरस की हताशा और बढ़ी होगी। इस अपमान, पीड़ा और हताशा ने सिरस को हमसे छीन लिया। जो लोग भी उनकी मौत के लिए दोषी हैं, उन्हें सजा जरूर मिलनी चाहिए।

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