गुरुवार, 18 मार्च 2010

क्रांति का बिगुल

हम गीत प्यार के गाते हैं
क्रांति का बिगुल बजाते हैं
हम परिवर्तन के अग्रदूत
पानी में आग लगाते हैं

जब जब धरती का मान गिरा
और बेबस का सम्मान गिरा
मर्यादा का चीर के दामन
जब भूखे का इमान गिरा
तभी शब्द का तरकश लेकर सत्ता से टकराते हैं

धर्म  बना  मानव का बंधन
स्वार्थ  हुआ माथे का चन्दन
जहरीली पछुआ  बयारों से
होता है बगिया  में क्रंदन
काले मेघा कजरारे हम
जीवन जल बरसाते हैं

हम हरिश्चंद हें सतयुग के
घटघट वासी राम हैं
गीता का सन्देश सुनाते
हमीं स्वयं घनश्याम हैं
मानवता हित जहर को पीकर स्वयं शंकर बन जाते हैं

जब हंस चले बगुले की चाल
और नफरत की जले मसाल
भाईचारे को दफनाकर
प्यार बने बाजारू माल
कबिरा की वाणी बन जग को हम फटकार लगाते हैं

हम काँटों के मीत पुराने
हर आंसू से प्रीत है
रमते जोगी बहते पानी
यही हमारी रीत है
मिटा विषमता के जंगल को प्यार का फूल खिलाते हैं

हम गुरुकुल हैं संदीपनी के
और  कौशल  में बलराम हैं
इस सरसती के जीवनदाता
हमीं सुबह और शाम हैं
अंधकार की मिटा कालिमा सूरज हमीं उगाते हैं




1 टिप्पणी:

  1. sachche kalamkaaron ka yahi kaam hai- asambhav ko sambhav ker dikhana. achchhe geet ke liye badhai.

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