मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

मां को इस तरह न छेड़ो

प्रकृति में रचना की शक्ति है तो ध्वंस की भी। उसमें सौंदर्य है तो विद्रूपता भी। बर्फ से लदे पहाड़, कल-कल बहती नदियां, शांत झीलें, फूलों से लदी घाटियां और लहराता विशाल सागर किसके मन को नहीं लुभाता? किसे नहीं अच्छा लगता चांदनी रात में आसमान में दौड़ते बादलों को देखना? जुगनुओं का जलना-बुझना, तारों का टूटना, सूरज का उगना और डूबना किसके मन को शीतल नहीं करता? प्रकृति जब शांत होती है, अपने रचनाकाल में होती है तो उसका रूप-लावण्य मन को मोहने वाला होता है, मस्तिष्क को चमत्कृत कर देने वाला होता है। लेकिन वही प्रकृति जब ध्वंसलीला पर उतर आती है तो विज्ञान की अपनी मेधा से जल,थल और नभ को जीतने का दावा करने वाला मनुष्य अपनी प्राण-रक्षा के लिए भागने या महाचेतनात्मिका मां से प्रार्थना के अलावा कुछ नहीं कर पाता। जब कभी सुनामी आती है, चक्रवात आते हैं, भू-स्खलन होता है, बाढ़ आती है तो सभी असहाय हो जाते हैं। प्रकृति का रौंद्र रूप देखकर किसी का भी मन भय से कांप उठता है।

फिर भी हम गंभीरता से नहीं सोचते। प्रकृति ने जो जीवन-चक्र रचे हैं, जो वानस्पतिक और जैविक विविधता धरती को सौंपी है, उसके संरक्षण की जगह आदमी ने भौतिक प्रगति के लिए उसमें लगातार छेड़-छाड़ की है, धरती का गंभीर दोहन किया है। प्राकृतिक संतुलन धरती के ऊपर तो बिगड़ा ही है, धरती के भीतर भी दबाव के अनेक नये क्षेत्र बने हैं। इस कारण भूकंप और ज्वालामुखियों की हलचल बढ़ी है। तमाम प्रयोग और अध्ययन हो रहे हैं कि इन प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए सटीक भविष्यवाणी की जा सके, लेकिन कोई प्रामाणिक कामयाबी अभी तक मनुष्य को नहीं मिली है। इसीलिए हर साल दुनिया के तमाम इलाकों में प्रकृति के कोप से हजारों जानें जाती हैं, भारी आर्थिक नुकसान होता है। इससे बचने का कोई भौतिक उपाय खोजने की जगह मनुष्य को प्रकृति का दोहन बंद करना चाहिए, लेकिन उसे यह सीधी सी बात समझ में नहीं आ रही है।

अब देखिये, पूरा यूरोप आइसलैंड के एक ज्वालामुखी से थर्राया हुआ है। उसके धुएं और राख ने आसमान को ढंक लिया है। एक हफ्ते से बड़ी विषम स्थिति बनी हुई है। उड़ानें बंद हैं। जो जाने वाले थे, वे जा नहीं पा रहे हैं। जो लौटने वाले थे, वे लौट नहीं पा रहे हैं। दुनिया भर के हवाई अड्डों पर हजारों लोग फंसे हुए हैं। कोई व्यापार के सिलसिले में निकला था, कोई पढ़ाई के लिए, कोई घूमने के लिए लेकिन सब के सब इधर-उधर फंस गये हैं। पूरा उत्तरी यूरोप असहाय स्थिति में है। एयरलाइंस को 20 करोड़ डालर प्रति दिन का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यूरोप अभी मंदी की मार से बाहर निकल नहीं पाया था कि उसे प्राकृतिक आपदा का यह गहरा झटका झेलना पड़ रहा है। इससे केवल एयरलाइंस ही प्रभावित नहीं हुई हैं बल्कि ट्रेवल, टूरिज्म, हास्पिटेलिटी, इंश्योरेंस, एयर कार्गो, फल-सब्जी व्यापार और लोजिस्टिक इंडस्ट्रीज भी इसके चपेट में हैं। भारत के हवाई अड्डों पर भी सैकड़ों विदेशी फंसे हुए हैं, कई यूरोपीय देशों को भारतीय उड़ानें भी स्थगित हैं। अभी तक भारत की एयरलाइंस इंडस्ट्री को सौ करोड़ का नुकसान हो चुका है।

संकट मंगलवार को थोड़ा कम होता दिखायी पड़ा तो कुछ उड़ानों का रास्ता साफ हुआ लेकिन सर मुड़ाते ही ओले पड़े। पता चला है कि एक दूसरे ज्वालामुखी ने लावा उगलना शुरू कर दिया है। सभी सजग हैं, डरे हुए भी। देखो और इंतजार करो के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। तुरंत यह कहना मुश्किल है कि यूरोपीय देशों को इस आपदा ने कितना बड़ा झटका दिया है लेकिन निश्चय ही वह मंदी से उबरते हुए यूरोप की कमर तोड़ देने वाला साबित हो सकता है।

प्रकृति के सहज स्वरूप को मनुष्य ने ही विकृत किया है। उसके भयानक परिणाम भी उसे ही भुगतने पड़ेंगे। कोई भी अनुभव कर सकता है कि सामान्य ऋतु चक्र असंतुलित हो गये हैं। गर्मी, जाड़ा और बरसात अब अपने समय से नहीं आते। गर्मी में ताप सामान्य से इतना ऊपर जाने लगा है कि सहना मुश्किल हो रहा है। इसी तरह जाड़े में तापमान सामान्य से बहुत नीचे चला जाता है, ठंड काटनी मुश्किल हो जाती है। कभी तो इतनी बरसात होती है कि बस्तियां, कस्बे, शहर अपंग हो जाते हैं, बाहर निकलना असंभव हो जाता है और कभी लोग बूंद-बूंद के लिए आकाश की ओर ताकते रहते हैं, बादल दिखते ही नहीं। याद है पिछले जाड़े में अमेरिका और यूरोप जम गये थे, बर्फ की मोटी चादर में ढंक गये थे। यह सब प्राकृतिक असंतुलन आदमी के किये का परिणाम है, इसलिए उसे भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। परंतु सबसे बड़ी बात यह है कि अब भी अगर उसे होश आ जाय तो वह भयानकतम संकट से बच सकता है। प्रकृति की चेतावनी को समझने की जरूरत है अन्यथा बहुत देर हो जायेगी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. व्‍यक्ति यदि प्रकृति का दोहन करे तो प्रकृति हमें आशीर्वाद देती है और जब शोषण करने लगती है तब वह दण्‍ड देती है। अच्‍छी पोस्‍ट, बधाई।

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  2. प्रकृति की लाठी में भी आवाज़ नहीं है ...कभी भी पड़ सकती है ...पड़ती है ...
    प्रकृति के सौंदर्य का बहुत खूबसरत शब्दों में चित्रण ...आभार ...!!

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