शनिवार, 17 अप्रैल 2010

कौन खत्म करेगा जातिवाद

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार जातिवाद पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे अमानवीय करार दिया है। दलितों के सामूहिक नरसंहार में फैसला सुनाते समय यह टिप्पणी की कि जातिवाद का समूल नाश होना चाहिए। वस्तुतः जातिवाद के खिलाफ हमारे महापुरुषों स्वामी विवेकानंद, डा. अम्बेडकर और डा. राम मनोहर लोहिया आदि का अभिमत गलत नहीं था। उन्होंने भारतीय समाज में जातिवाद का भयंकर खतरे के रूप में देखा था। राष्टीय एकता और अखंडता के लिए वह जातिवाद को सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। इसीलिए यह महापुरुष आजीवन जातिप्रथा के खिलाफ संघर्षरत् रहे। जहां डा. अम्बेडकर जातिविहीन व शोषणविहीन समाज के हिमायती थे। वहीं जातिप्रथा के खिलाफ डा. लोहिया ने जाति तोड़ो का नारा दिया था। लेकिन हमने इन महापुरुषों की बात को हवा में उड़ा दिया जिसका खामियाजा आज सम्पूर्ण देश उठा रहा है। अफसोस इस बात का है कि न तो डा. अम्बेडकर के अनुयायियों ने उनकी जातिविहीन समाज की परिकल्पना को साकार करने का प्रयास किया और न ही डा. लोहिया के चेलों ने जाति तोड़ने में दिलचस्पी दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपना अभिमत जाहिर करके एक ज्वलंत बहस को जन्म दिया है।इस वास्तविकता से इंकार नहीं किया जा सकता कि जाति प्रथा इस देश में आदिकाल से चली आ रही है। इसके मूल में हमारे कथित धर्म हैं। हमारा हिंदू धर्म वर्ण व्यवस्था पर आधारित है जो मानता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र से ही भारतीय समाज की संरचना हुई है। इसके साथ यह कहना समीचीन होगा कि इस वर्ण अथवा जाति-व्यवस्था की मुख्य विशेषता ऊंच-नीच भी है। अमुक जाति उच्च है कि अमुक जाति से नीची। इस जाति प्रथा ने मानव को जन्म से ही शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कथित सवर्ण जहां जन्म के आधार पर अपने को श्रेष्ठता का अनुभव करता है वहीं दूसरी ओर शूद्र जन्म से ही अपने को नीच मानकर कुंठा और हीनभावना से ग्रसित हो जाता है। यह स्थिति केवल हिंदू धर्म में ही नहीं अपितु सभी धर्मों में है। जिन लोगों ने हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था से त्रस्त होकर इस्लाम ग्रहण किया। वह भी जातिवाद के शिकार है। कथित उच्च कुंलीन मुस्लिम भी जातिवाद की बुराई से अलग नहीं हैं। यही स्थिति ईसाई धर्म में भी है। जो दलित जातियां जाति प्रथा से मुक्ति का सपना देखते-देखते क्रिश्चियन हो गई। वह भी अपने से दलित रूपी जिन्न को दूर नहीं कर पाई हैं। और तो और सिख धर्म जो मानवता का संदेश देता है। जिसके गुरूओं ने जातिवाद को मानवता के लिए खतरा बताया। वह भी जातिवाद की बीमारी से मुक्त नहीं है। आज भी पंजाब में दलित अथवा पिछड़े सिखों के अलग गुरूद्वारे दिखाई देते हैं। सवाल पैदा होता है कि जातिवाद को कौन दूर करेगा ? अगर करेगा भी तो क्यों ? जिस जाति के लोगों को जाति के नाम पर श्रेष्ठता की बीमारी लग चुकी है। उससे जातिवाद समाप्त करने की अपेक्षा करना क्या उचित होगा ? जो लोग जातिवाद के शिकार हैं और जिन पर जाति के नाम पर अत्याचार व अमानवीय व्यवहार होता है, क्या उनकी आवाज को देश सुनेगा। इस जातिवाद को मिटाने के लिए सरकारों की भूमिका क्या होगी ? यह प्रश्न भी मन को मथ रहा है। क्या इस समस्या को मिटाने में सामाजिक संगठन अपनी सक्रिय भूमिका निभायेंगे ? यह अनुत्तरित प्रश्न है।अगर सरकार की मंशा होती तो जातिवाद कब का समाप्त हो गया होता। लेकिन उसने इस ओर पहल नहीं की। बल्कि जातिवाद के सहारे अपनी राजनीति चलाते रहे। हां जातिवाद के खिलाफ चौ. चरण सिंह का एक साहसिक कदम याद आता है कि जब वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने प्रदेश में जाति के आधार पर संचालित व सरकार द्वारा अनुदानित शिक्षण संस्थान के नाम बदलने के लिए इन संस्थानों के प्रबंधक मंडल को विवश कर दिया था। उनके प्रयास का यह परिणाम हुआ कि राजपूत कालेज आरबीएस कालेज बन गया। ब्राह्ण कालेज परशुराम तथा अग्रवाल कालेज महाराजा अग्रसेन कालेज बन गया। अगर अन्य राजनेताओं ने चौधरी साहब का अनुसरण किया होता तो निश्चित रूप से जातिवाद का प्रभाव अवश्य कम होता।यह प्रगति की ओर अग्रसर भारत के लिए शर्मनाम बात है कि वह आज भी जातिवाद रूपी बीमारी को ढो रहा है। जब समाज का समूचा ताना-बाना बदल रहा है। परम्परागत पेशे बदल रहे हैं। पढ़ने-पढ़ाने, लड़ने-लड़ाने, व्यापार तथा सेवा करने में समाज की सभी जातियों ने अपने मूल स्वरूप को छोड़ दिया है तो फिर जातिवाद की लाश को ढोने से क्या फायदा ? समय का तकाजा है कि सरकार और सामाजिक संगठनों को इस बीमारी से निजात दिलाने के लिए पहल करनी होगी तथा साहसिक फैसले लेने होंगे। सरकार को सबसे पहला काम जाति-आधारित संगठनों की गतिविधियों पर रोक लगानी होगी। जाति के नाम के मोहल्लों और गांवो के नाम बदलने होंगे। चुनाव से पूर्व जाति-वार आंकड़े जो अखबारों में छपते हैं, उनपर रोक लगानी होगी। सभी केन्द्रीय, प्रांतीय, सार्वजनिक उपक्रम, शिक्षा तथा व्यवसाय से जुड़े लोगों को जातिय संगठनों से जुड़ने पर रोक लगानी होगी। सभी राजनैतिक दलों, सामाजिक संगठनों को जाति संगठनों से जुड़े लोगों से परहेज करना होगा। विद्यालयों और नौकरी के फार्मों से जाति के नाम का कॉलम समाप्त करना होगा। सरकार को अंतरजातीय-अर्न्तधार्मिक विवाहों को प्रोत्साहित करना होगा। अगर संभव हो तो सरकारी नौकरी पाने की आवश्यक योग्यता में अन्तरजातीय विवाह का प्रावधान करना होगा। मीडिया भी जातिवाद के उन्मूलन में सकारात्मक व ऐतिहासिक भूमिका निभा सकता है। अगर वह अपने अखबारों, चैनल्स पर जाति संगठनों के समाचार और गतिविधियां को छापने अथवा प्रसारित करने पर पाबंदी लगा दे तो जातिवाद की कमर सहज ही टूट सकती है। लेकिन सौ टके का सवाल पैदा यह होता है कि समाज, सरकार, मीडिया जातिवाद को वास्तव में मिटाना चाहते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जरूर भी पैदा नजातिवाद को मिटाने का अचूक उपाय - समान शिक्षा अनिवार्य सभी के लिए तथा कोई अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्द न जोड़े शादियाँ कानूनी रूप से जरूरी और अदालत में ही जोड़ों की आपसी रजामंदी से कराई जावें तब कोइ आरक्षण की हीं होगी

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  2. I appreciate your article and the thoughts that are against casteism. Casteism must be eradicated from India (for the development overall).
    The 'column' must be added in public and private sector jobs that provide preference to the intercaste married couples.
    Thanks.
    11 June 2010, Bahraich (UP)

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