मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

हो गयी है पीर पर्वत-सी

दिल दहला देने वाला वाकया है। ऐसे वाकये देश में घटते ही रहते हैं, पर लोगों का ध्यान उधर जाता कहां है। कांशीरामनगर के शाहपुर गांव में एक संतानहीन दंपति ने अपने पड़ोसी के बच्चे की इस आकांक्षा में बलि चढ़ा दी कि इससे उसकी सूनी कोख भर जायेगी। यह सलाह उसे किसी तांत्रिक ने दी थी। जब हमारे देश के नेता विकास की बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हों, कहा जा रहा हो कि अब अपना हिंदुस्तान दुनिया के ताकतवर मुल्कों से मुकाबला करने को तैयार है, तब इस तरह की घटनाएँ मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख देती हैं। लगता है कि हम अंतरिक्ष में पहुंचकर भी अंधकार की अतल गहराइयों में पड़े हुए हैं।

शिक्षा और सामाजिक जागृति का पूरी तरह अभाव है। यह समझ पाना भी मुश्किल है कि क्या सही है, क्या गलत। लोगों के हृदय में इतना अंधेरा है कि कुछ दूर तक भी देखना संभव नहीं हो पाता। ठगड़े घूमते रहते हैं और अपने तथाकथित ज्ञान का ऐसा घटाटोप रचते हैं कि कोई भी आसानी से उनके जाल में आ जाता है। गांवों में ज्यादातर ऐसी चालाकी काम कर जाती है। वे अपने मायाजाल में लोगों को बांधकर उनसे पैसा ऐंठने में कामयाब हो जाते हैं। जो फंसते हैं, वे पहले से ही किसी निरर्थक आकांक्षा की पूर्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार बैठे रहते हैं। उनका मन स्वार्थ के दुराग्रह से इतना मलिन हो चुका होता है, उनकी आंखों पर ऐसा काला चश्मा चढ़ चुका होता है कि वे रौशनी का अर्थ भूल चुके होते हैं, सही-गलत का विवेक खो चुके होते हैं। वे सोच ही नहीं पाते कि वे जो कुछ करने जा रहे हैं, उसका परिणाम क्या होगा।

आप समझ सकते हैं कि उस समाज में कितनी जहालत होगी, जिसमें कोई आदमी इतनी गहरी विस्मृति में चला जाये कि उसे यह लगने लगे कि किसी के बच्चे की हत्या कर देने से उसे बच्चा मिल सकता है। उसने आखिर यह क्यों नहीं सोचा कि यह हत्या है और हत्या जुर्म है, जिसकी उसे सजा मिल सकती है। इसी तरह दहेज के लिए वधुओं की हत्याएं, प्रेम करने को अपराध घोषित करके किशोरों-किशोरियों की हत्याएं, गर्भ में ही बच्चियों की हत्याएँ भी हमारे ग्रामीण समाज में अक्सर देखने को मिलती हैं।

देश की सरकार में बड़े-बड़े मंत्री बैठते हैं। वे मुल्क की समस्याओं पर गौर करते हैं, उनके निदान का रास्ता गढ़ते हैं। आजादी के बाद से लगातार यह कसरत चल रही है। हमेशा गांव और गरीब की बात होती रही है, सबको शिक्षित करने की बात होती रही है, सामाजिक पिछड़ापन मिटाने और लोगों को जागरूक बनाने की बात होती रही है। जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद को मिटाने की बातें होती रही हैं। पर हुआ क्या? ये सब बातें करने वाले तो निरंतर संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ते गये परंतु जिनके बारे में बातें होती रहीं, वे मुफलिसी और अशिक्षा के गहरे से गहरे अंधेरे में उतरते चले गये। सामाजिक विषमताएँ बढ़ती चली गयीं। जिनकी सत्ता से सांठ-गांठ थी, उनका भरपूर भला हुआ। जो सत्ता के शिखर पर सोने का मुकुट रख सकते थे, नेताओं के लिए धन लुटा सकते थे, उनका वैभव बढ़ता गया।

जनता के प्रतिनिधि, नेता, मंत्री उन्हीं के लिए काम करते रहे, जो उनकी सुरसामुखी झोली का ध्यान रखता रहा। जो वंचित था, वह इन वंचकों के षडयंत्र का शिकार होता रहा। इससे और बड़ी-बड़ी समस्याएं जन्मी। नक्सलवाद, आतंकवाद, महंगाई, अपराध और अन्य तमाम। इन समस्याओं पर ध्यान इसलिए गया क्योंकि इससे सत्ता में बैठे लोगों को भी डर सा महसूस हुआ। लेकिन इनके मूल तक पहुंचने की कभी कोशिश नहीं की गयी। जब तक गरीबी रहेगी, अशिक्षा रहेगी, गैर-बराबरी रहेगी, सबको समान अवसरों की अनुपलब्धता रहेगी, अलग-अलग समाजों के लिए अलग-अलग कानून और सुविधाएं रहेंगी, हालात में बदलाव नामुमकिन है। ऐसे वक्त में हमेशा दुष्यंत याद आते हैं-

हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

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