शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य नहीं

कविता क्या है? अक्सर यह सवाल किया जाता है। कोई नहीं जानता कि पहली कविता ने कब जन्म लिया, किसने सबसे पहले शब्द को कविता का रूप दिया लेकिन इतना कोई भी कह सकता है कि कविता ने दुख से ही जन्म लिया होगा। उमड़ कर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान। दुनिया भर के विद्वानों, कवियों, आलोचकों ने कविता को परिभाषाओं में बांधने का काम किया। भारतीय मेधा ने स्वीकार किया कि रसो वै काव्यम। रस ही काव्य है। जिसे पढ़ने या सुनने से आदमी के भीतर बहुत गहरे रस की अनुभूति हो। उसे महसूस हो कि जो बात कही गयी लगती है, वह उतनी ही नहीं है। वह जितना डूबे, उतना ही आनंद से सराबोर होता चला जाय। यह आनंद अभिव्यक्ति की सचाई से पैदा होता है। सुनने वाला या पढ़ने वाला वैसी ही अनुभूति अपने भीतर ढूंढ लेता है और यह अनुभूति की साम्यता ही उसे आह्लादित करती है। गहरी पीड़ा की अभिव्यक्ति से एकाकार होते ही आंखों में आंसू आ जाते हैं। इस तरह कविता व्यक्ति को अपने कथ्य के केंद्र की ओर खींच ले जाती है। वह कवि की तरह ही सोचने लगता है, अनुभव करने लगता है। अगर कोई कविता ऐसा नहीं कर पाती तो उसके कविता होने पर संदेह स्वाभाविक है।

पश्चिमी विद्वानों ने भी कविता को समझने-समझाने की कोशिश की। वर्ड्सवर्थ ने कहा कि कविता गहरे भावों का आकुलता भरा उफनता प्रवाह है। एमिली डिकिंसन ने कहा कि जब मैं कोई पुस्तक पढ़ती  हूं और वह मुझे इतना शीतल कर देती है कि कोई भी आग गरम न कर पाये, मैं समझ जाती  हूं कि वह कविता के अलावा और कुछ नहीं हो सकती है। तमाम परिभाषाओं के बावजूद समय के साथ कविता अपने रूप बदलती रहती है और इसीलिए वह किसी भी परिभाषा में बंधने से इंकार करती रही है। फिर भी उसे समझने के लिए हमेशा ही नयी-नयी परिभाषाएँ गढ़ने की कोशिशें होती रहती हैं। पूरी दुनिया में कविता के आंदोलन चलते रहे हैं। अलग-अलग दौर में कविता को अलग-अलग तरीके से समझने का प्रयास किया गया। पारंपरिक अनुशासन को आवश्यक मानने वाले लोगों का कहना है कि कविता में गेय तत्व होना ही चाहिए अन्यथा गद्य और काव्य में अंतर क्या रह जायेगा। परंतु इस नाते क्या जो भी गेय हो, उसे कविता कह देना समीचीन होगा? कविता की और भी जरूरतें होती हैं और उनके होने पर ही वह कविता होगी।

कवि अपनी बात सीधे नहीं कहता। वह उसे कलात्मक संक्षिप्ति के साथ व्यक्त करता है। इस कला में शब्द की व्यंजना, बिम्ब, प्रतीक, ध्वन्यार्थ आदि आते हैं। यही कविता को सीधे गद्य से अलग करते हैं। गेयता भी काव्य कला का एक तत्व है, लेकिन एकमात्र या अंतिम तत्व नहीं। और यह भी जरूरी नहीं कि किसी कविता को कविता तभी माना जायेगा, जब उसमें सारे तत्व समाहित हों। इसी अर्थ में गेयता न भी हो और बाकी तत्व हों तो भी कविता बन सकती है। कविता की सबसे बड़ी ताकत उसमें पढ़ने या सुनने वाले की उपस्थिति है, आम आदमी की उपस्थिति है। यह काव्य का प्रमुख और अनिवार्य तत्व है। अगर कोई कविता सारे अनुशासन से लैस है, अलंकार, छन्द, प्रतीक, बिम्ब और उत्तम भाषा-शैली से भी संपन्न है लेकिन उसका कथ्य लोगों की संवेदना को झकझोरता नहीं, उनमें गुस्सा, भय, क्रोध या प्यार नहीं पैदा नहीं करता तो उसे कविता कहने की कोई मजबूरी नहीं है।

इसीलिए कविता करना बहुत कठिन और विरल बात है। कविता प्रयास और कल्पना से नहीं बनती। कवि जन्म लेता है, पैदा होता है। कोई भी कवि बन जाय, सहज संभाव्य नहीं है। शब्द जिसके हाथों में खेल सकते हों, अर्थ जिसके भाव का अनुगामी हो, ऐसे लोगों को प्रकृति अलग से ही रचती है। समय उन्हीं के चरण चूमता है, जो समय के आगे चल सकते हैं, सच्चे सपनों को पहचान सकते हैं और यह काम केवल कवि ही कर सकता है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रगल्भित आलेख !

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  2. कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य नहीं ...
    कविता लेखन प्रकृति पर एक सार्थक विवेचन ...!!

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