गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

बदलाव की ताकत नहीं तो साहित्य नहीं

साहित्य क्या है? इसे कैसे समझा जाये? लिखी हुई कोई चीज आखिर साहित्य क्यों कही जानी चाहिए? क्या जो कुछ भी लिखा गया है या लिखा जा रहा है, वह सब साहित्य है? कोई साहित्य अच्छा है या नहीं, इसका मानक क्या है? कई बार इस तरह के सवाल सामने आते हैं और सब अपने-अपने ढंग से इसका उत्तर देते हैं। तमाम विद्वानों और साहित्यकारों ने भी इन प्रश्नों पर मंथन करने की कोशिश की है। पूरब और पश्चिम में अलग-अलग तरह से इसे समझने के प्रयास किये गये हैं। आइए सही उत्तर तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

अंग्रेजी का पूरी दुनिया के बड़े हिस्से पर प्रभाव रहा है। वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी ने उस जमाने से भी ज्यादा प्रभाव बढ़ा लिया है, जब कहा जाता था कि अंग्रेजों के राज में सूरज डूबता ही नहीं है। अंग्रेजी में बहुत सारा साहित्य लिखा गया है। इस भाषा ने कुछ बेहतरीन कवि और लेखक दुनिया को दिये हैं। साहित्य के लिए अंग्रेजी में लिटरेचर शब्द का प्रयोग होता है। इसका अगर शब्दार्थ ग्रहण किया जाय तो जो कुछ भी लिखा गया, वह साहित्य है। चाहे वह चिकित्सा के बारे में हो या धर्म के बारे में, विज्ञान से संबंधित हो या शिक्षा से। परंतु इसका जिस रूढ़ अर्थ में प्रयोग किया जाता है, वह थोड़ा भिन्न है। वह उसे कला से जोड़ता है, वह उसे कथन की चमत्कारिक शैली से जोड़ता है, वह उसे प्रभविष्णुता और बदल देने की शक्ति से जोड़ता है। एजरा पाउंड का कहना है कि अर्थ से लबालब भरी हुई भाषा ही साहित्य है। सीएस लेविस की मानें तो साहित्य केवल यथार्थ का कथन मात्र नहीं है, वह यथार्थ में कुछ और जोड़ता है। वह हमारे रेगिस्तान हो चुके दिलों को सींचता है। तमाम रचनाकारों ने साहित्य को अपने-अपने तरीके से समझने की कोशिश की है परंतु कुछ बातें ऐसी हैं, जो इन सबके चिंतन में समान रूप से उपस्थित हैं। उन्हीं के आधार पर साहित्य को समझा जा सकता है।

एक महत्वपूर्ण बात इस बिंदु पर आप को बता दूं कि साहित्य के अर्थ को लेकर भारतीय विद्वान कभी किसी भ्रम में नहीं रहे। प्राच्य विद्वानों ने कभी यह नहीं कहा कि जो कुछ लिखा गया, वह सब साहित्य है, चाहे वह कितना ही कूड़ा-कचरा क्यों न हो। संस्कृत काल से ही विशेष और कलात्मक अभिव्यक्ति को साहित्य कहा और माना जाता रहा है। शब्द को ब्रह्म कहा गया और किसी विशिष्ट प्रयोग के दौरान उसकी समूची अर्थ-शक्ति को व्यंजित करने वाली रचना को साहित्य कहा गया। इसीलिए साहित्य से प्राप्त आनंद को ब्रह्मानंद सहोदर भी माना गया। ब्रह्म अक्षर है, कभी न नष्ट होने वाला, इस तरह जो अक्षर है, वह ब्रह्म ही है। इन्हीं अक्षरों से वर्णमाला बनती है और यही शब्द बनाते हैं। शब्द से ब्रह्म तक पहुंचा जा सकता है, वह भी कभी नष्ट नहीं होते। शब्दों से ही साहित्य की रचना होती है।

साहित्य में सहित समाया हुआ है। आशय यह है कि साहित्य वह है जो संपूर्ण समाज के परिष्कार की ताकत रखता हो, उसे बदलने की शक्ति रखता हो। जिसमें समग्रता की दृष्टि हो। इसी संदर्भ में हमारे प्राचीन कवियों, लेखकों ने कहा कि साहित्य वह है जो सत्य, शिव और सुंदर से समन्वित हो। साहित्य जिस समाज के निर्माण की आकांक्षा रखता है, उसमें सत्य के प्रति अकाट्य दृढ़ता, सबके कल्याण का भाव और एक सुंदर दुनिया के निर्माण की इच्छा होनी ही चाहिए। अगर कोई रचना इस तरह की सामर्थ्य रखती है तो वह निश्चित ही साहित्य कहलाने की अधिकारी है।

साहित्य के मर्म को समझने वाले चाहे वे पश्चिम के विद्वान हों या पूरब के, सबका यह मानना है कि साहित्य में परिवर्तन की अचूक शक्ति होती है। किसी साहित्यकार को समाज में इसीलिए विशिष्ट दर्जा मिलता है क्योंकि वह सामान्य शब्दों में इतनी ऊर्जा पैदा कर देता है कि वे अपना साधारण रूप छोड़कर असाधारण कवच ग्रहण कर लेते हैं, वह शब्दों को ऐसे नये अर्थ देता है, जो लोगों को चमत्कृत कर देते हैं। यह अर्थ का वैराट्य ही सुनने या पढ़ने वालों को अपनी दिशा में मोड़ने में कामयाब होता है। जिसमें अर्थ संप्रेषण की जितनी ज्यादा ताकत होती है, वह उतना ही बड़ा साहित्यकार हो जाता है। व्यास, वाल्मीकि या तुलसी आज इतने महान इसीलिए हैं कि उन्होंने अपनी कल्पना और अपने आदर्श को इतने ऊर्जस्वित और अर्थपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया कि वह हमारी कई पीढ़ियों के मानस में गहराई तक पसरने और पूरे समाज को अपनी वांछित दिशा में ले जाने में समर्थ हो सका।

शब्द के साथ ही दृष्टिसंपन्नता और कला भी साहित्य के लिए जरूरी औजार हैं। जिसमें समाज के भीतर चल रही अंतर्क्रियाओं को समझने की शक्ति नहीं है, वह साहित्य नहीं रच सकता। यह समझ ही रचनाकार को भविष्य के सटीक पूर्वानुमान की ताकत देती है। इसी कारण कवि, कहानीकार, उपन्यासकार या किसी भी विधा का रचनाकार वर्तमान को तो रचता ही है, समय में आगे तक झांककर देख सकता है। वह अपनी दृष्टिसंपन्नता के कारण ही शब्दशिल्पी होने के साथ ही भविष्यद्रष्टा भी बन जाता है। कला उसके लिए साधन है। वह उसे सुरुचिपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त होने का माध्यम प्रदान करती है। किसी भी साहित्यकार के लिए यह जरूरी होता है कि भाषा, शिल्पविधान और अन्य कलात्मक तत्वों की उसे पूरी जानकारी हो और रचना के समय वह इनके प्रति पूरी तरह जागरूक हो। केवल तभी वह कुछ नया रच सकेगा, कुछ तोड़ सकेगा, कुछ बदल सकेगा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह राय साहिब ! साहित्य के स्वरुप, दायित्व और उसकी पहचान पर बहुत ही समीचीन राय व्यक्त की है आपने। सी एस लेविस का कथन कि 'साहित्य हमारे रेगिस्तान हो चुके दिलों को सींचता है'तो अपने आप में बीज वाक्य है ही आपका अपना मंतव्य कि 'साहित्य में सत्य के प्रति अकाट्य दृढ़ता, सबके कल्याण का भाव और एक सुंदर दुनियां के निर्माण की इच्छा होनी चाहिए' साहित्य के स्वरुप और उसकी भूमिका पर निश्चित रूप से एक बड़ा कथन है। चिंतन के इस मकाम पर पहुँच पाने के लिए बधाई।

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  2. विनोद शुक्ल23 अप्रैल 2010 को 11:59 pm

    निश्चित रूप से तरल जी के कथन से सहमत हुआ जा सकता है। परन्तु हिन्दी का भविश्य क्या है इस पर भी विचार करे!

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