बुधवार, 7 अप्रैल 2010

मैंने कुछ कहा

मैं नहीं जानता कि मैंने जो कुछ लिखा है, वो ग़ज़ल है कि नहीं पर इनमें मैं कुछ कहना जरूर चाहता हूँ. इसीलिए इसे आप तक पहुंचा रहा हूँ. आप देखें, पढ़ें और तय करें कि मैं कह पाया या नहीं.
१.
हाँ सुर्ख़ियों में नाम मेरे गाँव का कल था.
चर्चा नहर के पास मिले पांव का कल था.
 
इतनी दरिंदगी न कभी धूप की देखी
पेड़ों  से झरती आग सिर्फ छाँव का कल था
 
कल ही बना था बांध अचानक दरक गया
पेड़ों पे छत पे बस्तियां थीं  नाव का कल था
 
कर्जे चुकाएगी फसल उम्मीद थी उसको
बिरजू के लिए सत्य राम-नाम का कल था
 
२.
होठों  पे हंसी बात में कितनी मिठास है
ये फूल जैसा छद्म कहीं आस-पास है
 
देखा बहुत करीब से समझा नहीं मगर
उजली है उसकी देह या उजला लिबास है
 
मुंह में हैं राम संत सी रहनी लगी  मुझे
सब उसके खास और वो सभी का खास है
 
नेकी की कथाएं तो बहुत सी सुनी गयीं
पकड़ा तो पुलिस ने कहा गर्दनतराश   है
 
 
 
 
 
 

3 टिप्‍पणियां:

  1. नेकी की कथाएं तो बहुत सी सुनी गयीं
    पकड़ा तो पुलिस ने कहा गर्दनतराश है

    सुन्दर भावाभिवय्क्ति

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुंह में हैं राम संत सी रहनी लगी मुझे
    सब उसके खास और वो सभी का खास है

    -बढ़िया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं